काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 708, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३४८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | विषमज्वरनिदंशीयाध्याय ? ] |
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P. Vivex—यह Benign Tertian Malaria को उत्पन्न करता है। इसका Asexual cycle ४८ घण्टे का होता है अर्थात् यह तृतीयक ज्वर को करता है।
P. Malarial—यह Quartan Malaria को उत्पन्न करता है। इसका Asexual cycle ७२ घण्टे का होता है। अर्थात् यह चातुर्थिक ज्वर को करता है।
P. Falsiparum—यह Malignant Tertian Malaria (Quotidian) को उत्पन्न करता है। इसका Asexual cycle २४-४८ घण्टे का होता है। यह अन्येद्युक को करता है। जब कभी साथ में ही दूसरा (Double) Infection हो जाता है तब सततज्वर (Double Tertian) होता है। रक्त में Spores के आने से जब उनका रक्त विष में मिलता है तब ज्वर का आक्रमण होता है। G. E. Beaumont की Medicine में लिखा है—The fever is thought to correspond with the liberation of the spores in the blood, perhaps due to freeing of their toxins, but there must be a threshold value, a definite amount of toxin being required in any individual to produce a rise of temperature. इसी प्रकार अखिलरञ्जन मजूमदार की Bedside Midicine में भी लिखा है—The mature rose the ruptures and young parasites (merozoites) and a toxin are thrown into the general circulation, If many such red cells rupture liberating, a quantity of toxin, a paroxysm of fever follows. ।।४२।।
पञ्चमेऽहनि षष्ठे वा कस्मादेष न जायते ।।४३।।
तस्य त्वामाशयः स्थानमुरः कण्ठः शिरस्तथा।
स्थानमन्यत्ततो नास्ति स्थानाभावान्न जायते ।।४४।।
यह विषमज्वर पांचवें तथा छठे दिन क्यों नहीं होता है ? इसका उत्तर—विषमज्वर के आमाशय, उर (छाती), कण्ठ तथा शिर ये चार स्थान हैं। इनके अतिरिक्त और कोई स्थान नहीं है। इसलिये अन्य स्थानों के अभाव से इन चार के अतिरिक्त पांचवें तथा छठे दिन यह ज्वर नहीं होता है ।।४३-४४।।
आग्नेयः स्यात् सततको वायव्यो हि द्वितीयकः। वैश्वदेवस्तृतीयः स्यादैशानस्तु चतुर्थकः ।।४५।।
सततज्वर आग्नेय (दक्षिण पूर्व दिशा) होता है। द्वितीयक (अन्येद्यक) वायव्य (पश्चिमोत्तर दिशा) होता है। तृतीयक वैश्वदेव तथा चतुर्थक ज्वर ऐशान (ईशान सम्बन्धी पूर्वोत्तर दिशा) होता है ।।४५।।
कस्मात् परिक्षीणबलः क्षीणधातुबलौजसः। ज्वरो विवर्धति जन्तोर्मोक्षकाले विशेषतः ।।४६।।
जिसका धातु, बल एवं ओज क्षीण हो गया है ऐसे व्यक्ति का क्षीण बल वाला ज्वर विशेष कर मोक्षकाल में क्यों वृद्धि को प्राप्त होता है ।।४६।।
| गतेरभावाद्वाह्येन | वायुनाऽभ्याहतक्रमः । |
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| संक्षीणवर्त्यनुगतः | स्नेहाव्वाभिमूर्च्छितः । |
| शान्तोऽपि तदुपादानाद्यथा | दीपो न (ऽनु ?) दीप्यते ।। |
तद्वद्धातुबले क्षीणे ज्वरः क्षीणबलोऽपि सन्। निरुपादानदोषत्वान्मोक्षकाले विशेषतः ।।४८।।
हेतुशेषमशेषेण दहन् दर्शयते बलम्। सप्रतीकारवैशेष्यात् प्रशमं याति हन्ति वा ।।४९।।
उपर्युक्त प्रश्न का उत्तर—जिस प्रकार गति के अभाव में बाह्य वायु द्वारा आक्रान्त हुआ तथा बत्ती के क्षीण हो जाने से अनुगामी हुआ तथा स्नेह एवं वायु से मूर्च्छित होने के कारण शान्त हुआ भी दीपक अपने उपादान कारण के विद्यमान