भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 706
३४६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्विषमज्वरनिर्दशीयाध्याय ? ]

तृतीयेऽहनि निर्वृत्तिं जनयेत् स तृतीयकः ।

तृतीयक ज्वर—तृतीयक ज्वर का स्थान कण्ठ होता है। प्रथम अहोरात्र (२४ घण्टे) में दोष कण्ठ से च्युत होकर उर (छाती) में पहुंचता है तथा दूसरे अहोरात्र में वह यथाक्रम रसधातु (आमाशय स्थित) में पहुंचकर ऊष्मा (उष्णता) के साथ मूर्च्छित हुआ तीसरे दिन पुनः प्रकट होता है। उसे तृतीयक ज्वर कहते हैं। अर्थात् दोष अपने स्थान कण्ठ से क्रमशः प्रथम दिन छाती में पहुंचता है तथा वहां से अगले दिन आमाशय में पहुंचता है आमाशय में पहुंचकर पूर्वोक्तानुसार दोष रसवाहिनियों के मार्गों को बन्द कर देता है तब ज्वर की उत्पत्ति होती है। इसलिये तृतीयक ज्वर एक दिन छोड़कर अर्थात् तीसरे दिन (४८ घण्टे में एकबार) उत्पन्न होता है ॥३४-३५॥

शिरश्चतुर्थकस्थानं चतुर्थं समुदाहृतम् ।।३६।।
अहोरात्राच्च्युतः स्थानाद्दोषः कण्ठेऽवतिष्ठते । ततः पुनरहोरात्रादुरसि प्रतिपद्यते ।।३७।।
तृतीये चाप्यहोरात्रे रसधातौ प्रकुप्यति । चतुर्थकः स विज्ञेयश्चिरस्थायी महाज्वरः ।।३८।।
गम्भीरस्थानसंभूतो धातुसंकरदूषितः । दर्शयित्वा बलं काले जन्तोः शिरसि लीयते ।।३९।।
त्रिदोषसंभवत्वाच्च भूतसंस्पर्शनादपि । दुश्चिकित्स्यतमो ह्येष तस्माद्यत्नेनमुपक्रमेत् ।।४०।।

चतुर्थक ज्वर—चौथा चतुर्थक ज्वर होता है इसका स्थान शिर माना गया है। प्रथम अहोरात्र में अपने स्थान शिर से च्युत होकर दोष कण्ठ में पहुंचता है। अगले अहोरात्र में वह उर (छाती) में पहुंचता है तथा तृतीय अहोरात्र में वह दोष आमाशय स्थित रस धातु में पहुँचकर प्रकुपित होता है इसे चतुर्थक ज्वर कहते हैं। यह महाज्वर चिरस्थायी होता है अर्थात् यह अत्यन्त कठिनता से ठीक होता है। गंभीर स्थान में उत्पन्न होकर तथा अनेक धातुओं से दूषित हुआ यह अपने समय पर बलको प्रकट करके अर्थात् चतुर्थ दिन (७२ घंटे में एक बार) प्रकुपित होकर पुनः शिर में लीन हो जाता है अर्थात् वहां स्थित हो जाता है। त्रिदोष से उत्पन्न होने तथा भूतों का संसर्ग होने के कारण यह दुश्चिकित्स्य होता है इसलिये निम्न उपायों के द्वारा इसकी चिकित्सा करे। अर्थात् तीन अहोरात्र के बाद दोष अपने स्थान सिरसे यथाक्रम आमाशय में पहुंचता है इसलिये चतुर्थ दिन प्रकुपित होकर यह चतुर्थक ज्वर को करता है। तृतीयक तथा चतुर्थक ज्वर के लिये चरक चि. अ. ३ में कहा है—दोषोऽस्थिमज्जगः कुर्यात्तृतीयकचतुर्थकौ। अर्थात् अस्थि और मज्जा में पहुंचा हुआ दोष क्रमशः तृतीयक और चतुर्थक ज्वर को करता है। वहीं इन ज्वरों की गतियां निम्न प्रकार से कही गई हैं—गतिद्वयकान्तरान्येद्युर्दोषस्योक्ताऽन्यथा परैः । रक्तमेवाभिसंसृज्य कुर्यादन्येद्युकं ज्वरम् ।। मांसस्रोतांस्यनुसृतो जनयेत्तु तृतीयकम् । ज्वरं दोषः संसृतो हि मेदोमार्गं चतुर्थकम् ।। अर्थात् दोषों की गतियां क्रमशः प्रतिदिन, एक दिन छोड़कर अथवा दो दिन छोड़कर कही गई हैं। जब प्रतिदिन एक बार गति होती है तब अन्येद्युक ज्वर होता है। जब एक दिन के अन्तर से होती है तब तृतीयक और जब दो दिन के अन्तर से होती है तब चतुर्थक ज्वर होता है। सुश्रुत उ. अ. ३९ में ये गतियां निम्न प्रकार दी गई हैं—सन्ततं रसरक्तस्थः सोऽन्येद्युः पिशिताश्रितः । मेदोगतस्तृतीयेऽह्नि त्वस्थिमज्जगतः पुनः ।। कुर्याच्चतुर्थकं घोरमन्तकं रोगसङ्करम् ।।३६-४०।।

बलिभिः शान्तिहोमैश्च सिद्धैर्मन्त्रपदैस्तथा । पापापहरणं चास्य कर्तव्यं सिद्धिरिच्छता ।।४१।।
भूतेश्वरं नीलकण्ठं प्रपद्येत वृषध्वजम् ।

सिद्धि को चाहने वाले वैद्य को बलि, शान्ति, होम (शान्ति के निमित्त किये जाने वाले यज्ञ) तथा सिद्ध मन्त्रों के द्वारा इसके पाप का निराकरण करना चाहिये। नीलकण्ठ (नीले कण्ठ वाले) तथा वृषध्वज (जिसकी ध्वजा पर वृष-बैल का चिह्न हो) भूतेश्वर महादेव की उपासना करनी चाहिये ॥४१॥