काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविषमज्वरनिदंशीयाध्याय ? ] खिलस्थानम् ३४५
के आश्रय से रसस्थान (आमाशय) में पहुंच कर पुनः ज्वर को कर देता है। अष्टाङ्ग संग्रह चि. अ. १ में कहा है—आमाशयस्थो हत्वाग्निं सामो मार्गान् पिधापयन्। विदधाति ज्वरं दोषः ........।। अर्थात् आमाशय में आम रस के साथ मिलकर दोष शरीर में स्रोतों के मुखों को बन्द कर देते हैं। इससे जाठराग्नि मन्द हो जाती है तथा भोजन का पाक नहीं हो पाता है। जितना ही भोजन किया जायगा उतनी ही शरीर में आमरस की उत्पत्ति होगी—जिससे ज्वर की वृद्धि होगी ।।२५-२७।।
उपक्रमविशेषेण स्वबलस्य व्ययेन च। क्षयं प्राप्नोति वृद्धिं च समानगुणसंश्रयात् ।।२८।।
चिकित्सा की विशेषता के कारण अथवा ज्वर के बल के कम होने के कारण समान गुण के आश्रित होने से ज्वर क्षय अथवा वृद्धि को प्राप्त करता है ।।२८।।
सोऽयं निवृत्तिं संप्राप्य यथा दीपः स्वभावतः ।
पुनः पुनः प्रज्वलति क्षीणतैलेन्धनोऽपि सन् ।।२९।।
स्वमधिष्ठानमाश्रित्य शान्तः शान्तस्तथा ज्वरः।
काले बलं दर्शयति क्षीणदोषेन्धनोऽपि सन् ।।३०।।
जिस प्रकार निवृत्ति को प्राप्त होने पर दीपक तैल रूपी इन्धन के क्षीण होने पर स्वभाव से ही पुनः २ प्रज्वलित होता रहता है, उसी प्रकार यह ज्वर अपने अधिष्ठान (आमाशय) में पहुंच कर शान्त हुआ भी दोषरूपी इन्धन के क्षीण होने पर स्वयमेव समय पर अपने बल को प्रकट करता है अर्थात् दोषों के क्षीण हो जाने पर स्वभाव के नष्ट न होने से पुनः ज्वर को प्रकट करता है ।।२९-३०।।
स्वहेतुदोषमाश्रित्य नियतो नियमेन यः । अहोरात्रे दर्शयति कालहेतुकृतं बलम् ।।३१।।
द्विकालं स यथादोषं ज्वरः सततकः स्मृतः । स्थानमामाशयस्तस्य यं समाश्रित्य वर्तते ।।३२।।
सतत ज्वर—ज्वरोत्पादक हेतु एवं दोष का आश्रय करके जो नियमपूर्वक दिन रात (२४ घण्टे) में दो बार निश्चित समय पर काल एवं हेतु कृत बल को प्रकट करता है उसे सतत ज्वर कहते हैं। इसका स्थान आमाशय होता है इसके आश्रित होकर यह बढ़ता है। चरक चि. अ. ३ में इसकी सम्प्राप्ति निम्न प्रकार बताई है—रसधात्वाश्रयः प्रायो दोषः सततकं ज्वरम्। सप्रत्यनीकः कुरुते कालवृद्धिक्षयात्मकम् ।। अहोरात्रे सततको द्वौ कालावनुवर्तते । कालप्रकृतिदूष्याणां प्राप्यैवान्यतमाद्बलम् ।।३१-३२।।
उरस्त्वन्येद्युकस्थानमहोरात्रादुरश्च्युतः । दोषो रसं समासाद्य यदा दर्शयते बलम् ।।३३।।
तदाऽनुषङ्गी स्वे काले जायतेऽन्येद्युको ज्वरः ।
अन्येद्युक ज्वर—अन्येद्युक ज्वर का स्थान उर (छाती) माना गया है। अहोरात्र (२४ घण्टे) में छाती से यह दोष आमाशयस्थित रस में पहुंच कर अपने बल को प्रकट करता है तथा यह अनुषङ्गी हुआ प्रतिदिन अपने समय पर होता है इसे अन्येद्युक ज्वर कहते हैं। चरक चि. अ. ३ में कहा है—दोषो मेदोवहा रुद्ध्वा नाडीरन्येद्युकं ज्वरम्। सप्रत्यनीकः कुरुते एक कालमहर्निशि ।। अर्थात् २४ घण्टे में इसका वेग एक बार होता है ।।३३।।
कण्ठस्तृतीयकस्थानमहोरात्राच्च्युतस्ततः ।।३४।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १९९ तमं पत्रम् ।)
उरः प्रपद्यतेऽन्यस्मादहोरात्राद्यथाक्रमम् । रसधात्वाश्रितो दोष ऊष्मणा सह मूर्च्छितः ।।३५।।