काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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आक्रान्त तथा ग्रहों द्वारा स्पर्श किया जाता है अथवा वमन, विरेचन, स्नेहपान या अनुवासन का प्रयोग करने के बाद तुरन्त जो व्यक्ति शीत उपचार, गुरु अन्न तथा मैथुन का सेवन करता है—उस व्यक्ति के भी अस्थियों की मज्जा के अन्दर का वायु कुपित होकर शीघ्र ही कफ एवं पित्त को प्रकुपित कर देता है। इस प्रकार धातुओं के विषम हो जाने से उसे सतत, अन्येद्युक, तृतीयक तथा चतुर्थक नामक विषम ज्वर हो जाते हैं।
वक्तव्य—कषाय—यहां कषाय शब्द से कसैले द्रव्यों का अथवा पांच प्रकार की कषायकल्पनाओं में से किसी भी कषाय रस प्रधान रस प्रधान कल्पना का ग्रहण किया जाता है। क्योंकि कषाय रस स्तम्भक (Astringent) होने से दोषों की प्रवृत्ति नहीं होने देता इसीलिये दोषों की अपरिपक्वावस्था अथवा तरुण ज्वर में इसका निषेध किया गया है तथा स्वरस आदि पांचों कल्पनाओं में जो कषाय कल्पना है उसका भी त्याग करना चाहिये। कहा भी है—चतुर्भागावशिष्टस्तु यः षोडशगुणाम्भसा। स कषायः कषायः स्यात् स वर्ज्यस्तरुणज्वरे॥ कषायं यः प्रयुञ्जीत नराणां तरुणज्वरे। स सुप्तं कृष्णसर्पन्तु कराग्रेण परामृशेत्॥ तथा—न कषायं प्रयुञ्जीत नराणां तरुणे ज्वरे। कषायेणाकुलीभूता दोषा जेतुं सुदुष्कराः॥ इसी लिये चरक चि. अ. ३ में भी कहा है—नवज्वरे दिवास्वप्नस्नानाभ्यङ्गात्रमैथुनम्। क्रोधप्रवातव्यायामकषायांश्च विवर्जयेत् ॥१६-२०॥
न च नोपशमं याति न च भूयो न कुप्यति। शमप्रकोपयोः कालं न चायमतिवर्तते ॥२१॥
ये विषमज्वर शान्त न होते हों या पुनः प्रकुपित न होते हों—ऐसी बात नहीं है अर्थात् ये शान्त हो कर पुनः प्रकुपित हो जाते हैं। तथा इनका शमन एवं प्रकुपित होने के समय का उल्लंघन नहीं होता अर्थात् ये लगभग निश्चित समय पर शान्त होते हैं तथा निश्चित समय पर ही पुनः प्रकुपित होते हैं ॥२१॥
न च स्वभावोपशमं गच्छत्यनुशयात्मकः। न हि स्वभावशान्तानां भावानामस्ति संभवः ॥२२॥
अनुशय होने के कारण इनका स्वभाव शान्त नहीं होता। स्वभाव के शान्त हो जाने पर पदार्थों की पुनः उत्पत्ति नहीं होती है अर्थात् इनका स्वभाव नष्ट नहीं होता है इसलिये ये पूर्णरूप नष्ट नहीं हो पाते हैं तथा बार २ ये ज्वर अपना रूप प्रकट करते हैं ॥२२॥
ज्वरप्रवेगोपरमे देही मुक्त इवेक्ष्यते। तथाऽप्यस्यामवस्थायामेभिर्लिङ्गैर्न मुच्यते ॥२३॥
मुखवैरस्यकटुक्यमाधुर्यादिभिरल्पशः। नात्यन्नलिप्साग्लानिभ्यां शिरसो गौरवेण च ॥२४॥
ज्वर के वेग के शान्त हो जाने पर रोगी ज्वर से यद्यपि मुक्त हुआ प्रतीत होता है तथापि इस अवस्था में भी (अर्थात् वेग के शान्त होने पर भी) रोगी मुखवैरस्य (मुख की विरसता) तथा थोड़ा २ मुख का कड़वापन एवं मधुरता, अन्न की अधिक रुचि न होना, ग्लानि तथा सिर का भारी होना—इत्यादि लक्षणों से मुक्त नहीं हो पाता है ॥२३-२४॥
पुनः पुनर्यथा चैष जायते तन्निबोध मे। निरुद्धमार्गों दोषेण विषमज्वरहेतुना ॥२५॥
वायुस्तद्दोषकोपान्ते लब्धमार्गों यथाक्रमम्। दोषशेषं तमादाय यथास्थानं प्रपद्यते ॥२६॥
स दोषशेषः. स्वे स्थाने लीनः कालबलाश्रयात्।
रसस्थानमुपागम्य भूयो जनयति ज्वरम् ॥२७॥
यह विषमज्वर बार २ किस कारण से हो जाता है—वह अब तू मेरे से सुन—विषमज्वर को उत्पन्न करने वाले दोषों के द्वारा जिसका मार्ग रुक गया है ऐसा वायु उस दोष के प्रकोप के अन्त में मार्ग को प्राप्त करके क्रमशः उस बचे हुए दोष को लेकर यथास्थान पहुंच जाता है जिससे अपने स्थान पर लीन (स्थित) हुआ अवशिष्ट दोष काल एवं बल