काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविषमज्वरनिदंशीयाध्याय ? ] खिलस्थानम् ३४३
रक्त, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा, शुक्र आदि ७ आश्रय दिये हैं—इनमें से जो केवल एक को ही आश्रित करके हो), सुखपूर्वक जिसकी चिकित्सा की जा सके तथा जो लघुपाक वाला होता है वह समज्वर कहलाता है। बहिर्वेग ज्वर के चरक चि.अ. ३ में निम्न लक्षण दिये हैं—सन्तापोऽभ्यधिको बाह्यस्तृष्णादीनां च मार्दवम्। बहिर्वेगस्य लिङ्गानि सुखसाध्यत्वमेव च॥ यह सुखसाध्य माना गया है ॥८॥
विषमस्तद्विपर्यस्तस्तीक्ष्णत्वात् संततो मतः । तद्वत् प्रेतग्रहोत्था ये चत्वारो विषमागमात् ।।९।।
इसके विपरीत तीक्ष्ण होने के कारण सन्ततज्वर तथा प्रेत एवं ग्रहों से उत्पन्न होने वाले सतत आदि चारों ज्वर भी विषम गति के कारण विषमज्वर कहलाते हैं ॥९॥
दुर्जयत्वा(दुर्ग्रहत्वा)दुग्रग्रहपरिग्रहात् । वैषम्यं संततादीनां दारुणत्वादुदाहृतम् ।।१०।।
दुर्जय (दुर्ग्रह) होने के कारण, उग्र ग्रहों द्वारा गृहीत होने तथा दारुण (भयंकर) होने के कारण सन्तत आदि को विषमज्वर कहा गया है ॥१०॥
तथा सततकादीनां चतुर्णां कालकारितम् । विषमत्वं प्रवक्ष्यामि ज्वराणां जायते यथा ।।११।।
इसी प्रकार सतत आदि चारों प्रकार के ज्वर भी काल के अनुसार जिस प्रकार विषम होते हैं उनका मैं वर्णन करूंगा ।।
समस्ता द्वन्द्वशो वाऽपि धमनी रसवाहिनीः । दोषाः प्रपन्नाः कुर्वन्ति विषमा विषमज्ज्ववम् ।।१२।।
सम्पूर्ण अथवा दो २ दोष रसवाहिनियों धमनियों में पहुंच कर विषम हुए विषमज्वर को उत्पन्न करते हैं ॥१२॥
ज्वरितो मुच्यमानो वा मुक्तमात्रश्च यो नरः । व्यायामगुर्वसात्म्यान्नमत्तिमात्रमथो जलम् ।।१३।। पायसं कृशरां पिष्टं पललं दधि मन्दकम् । पिण्याकमाषविकृतीर्ग्राम्यानूपं तथाऽऽमिषम् ।।१४।। एवं विधानि चान्यानि विरुद्धानि गुरूणि च । सेवते च दिवास्वप्नमजीर्णाध्यशनानि च ।।१५।। ज्वरोऽभिवर्धते तस्य विषमो वाऽऽशु जायते ।
जो व्यक्ति ज्वरयुक्त अवस्था में, जो ज्वर से मुक्त होने की अवस्था में तथा जो ज्वर से मुक्त होने के बाद तुरन्त व्यायाम, गुरु एवं असात्म्य अन्न तथा अधिक मात्रा में जल, खीर, खिचड़ी, उड़द की पिट्ठी के बने हुए पदार्थ, मांस, अपूर्ण जमा हुआ दही, खल, उड़द के बने हुए पदार्थ, ग्राम्य तथा आनूप मांस तथा इसी प्रकार अन्य विरुद्ध एवं गुरु पदार्थों का तथा दिवास्वप्न, अजीर्ण एवं अध्यशन का सेवन करता है—उसका ज्वर बढ़ जाता है तथा वह शीघ्र ही विषम ज्वर का रूप धारण कर लेता है ॥१३-१५॥
दोषेष्वपरिपक्वेषु कषायं यश्च सेवते ।।१६।। लौल्याद्वा स्नेहपानानि क्षीरं संतर्पणानि वा । दैवतानामभिध्यानाद् ग्रहसंस्पर्शनादपि ।।१७।। सद्यो वान्तो विरिक्तो वा स्नेहपीतोऽनुवासितः । शीतोपचारं गुर्वन्नं व्यवायं यश्च सेवते ।।१८।। तस्यापि सहसा वायुरस्थिमज्जान्तरं गतः । कुपितः कोपयत्याशु श्लेष्माणं पित्तमेव च ।।१९।। ततोऽस्य धातुवैषम्याद्विषमो जायते ज्वरः । संततोऽन्येद्युको वाऽपि तृतीयः सचतुर्थकः ।।२०।।
दोषों के न पचने पर ही अर्थात् आमावस्था या ज्वर की तरुण अवस्था में ही जो कषाय का सेवन करता है अथवा जिह्वालौल्य के कारण जो व्यक्ति स्नेहपान, क्षीर अथवा सन्तर्पण (बृंहण) द्रव्यों का सेवन करता है, जो देवताओं द्वारा