भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 702

अथ नवमं खिलस्थानम्। ..................................

विषमज्वरनिर्देशीयाध्यायः प्रथमः।

अथातो विषमज्वरनिर्देशीयं नामाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम विषमज्वरनिर्देशीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥

कश्यपं सर्वशास्त्रज्ञं सर्वलोकगुरुं गुरुम्। भार्गवः परिपप्रच्छ संशयं संश्रितव्रतः ॥३॥
सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता, सब लोकों के गुरु तथा महान् कश्यप से व्रत का धारण करने वाले भार्गव (वृद्धजीवक) ने संशय युक्त प्रश्न को पूछा ॥३॥

प्रोक्तं ज्वरचिकित्सायां विषमज्वरभेषजम्। न निर्दिष्टं भगवता विषमत्वस्य कारणम् ॥४॥
आपने ज्वर चिकित्सा में विषम ज्वर की ओषधि का वर्णन किया था परन्तु वहां आपने विषमता का कारण नहीं बतलाया ॥४॥

युक्तं सततकादीनां वैषम्यं विषमागतेः। अविसर्गी ज्वरः कस्मात् संततो विषमः स्मृतः ॥५॥
(इति ताडपत्रपुस्तके १९८ तमं पत्रम्)
प्रेतज्वरो ग्रहोत्थश्च विषमः केन हेतुना।

विषम गति वाले सतत आदि ज्वरों की विषमता तो युक्तियुक्त है परन्तु अविसर्गी (निरन्तर रहने वाले) सन्तत ज्वर को विषम कहने का क्या अर्थ है ? इसी प्रकार प्रेतज्वर एवं ग्रहोत्थ ज्वर को विषम मानने का क्या कारण है ? ॥५॥

तदिदानीं यथाकालं वक्तव्योऽवयवाद्यथा ॥६॥
वक्तुमर्हसि तत्त्वेन सविशेषं सविस्तरम्।
अब आप यथासमय पृथक् २ तथा विस्तार पूर्वक इन सबों का वर्णन करने की कृपा करें ॥६॥

इति पृष्टः स शिष्येण प्रश्नं प्रोवाच कश्यपः ॥७॥
इस प्रकार शिष्य द्वारा प्रश्न पूछा जाने पर महर्षि कश्यप ने उत्तर दिया ॥७॥

अल्पहेतुर्बहिर्मार्गो वैकृतो निरुपद्रवः। एकाश्रयः सुखोपायो लघुपाकः समो ज्वरः ॥८॥
समज्वर के लक्षण—स्वल्प कारणों वाला अर्थात् अल्प कारणों से उत्पन्न होने वाला, बहिर्मार्ग अर्थात् बहिर्वेगो बाला, वैकृत (विकारों से उत्पन्न होने वाला), उपद्रव रहित, एक आश्रय वाला (चरक चि. अ. ३ में—ज्वर के रस,