भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 701

संहिताकल्प: ? ] कल्पस्थानम् ३४१

अनायासेन यक्षेण धारितं लोकभूतये। वृद्धजीवकवंशयेन ततो वात्स्येन धीमता ।।
अनायामं प्रसाद्याथ लब्धं तन्त्रमिदं महत्।

उसके बाद सहसा नष्ट हुए इस तन्त्र को लोककल्याण के लिये कलियुग में अनायास नामक यक्ष ने धारण किया। तब वृद्ध जीवक के वंश वाले बुद्धिमान् वात्स्य ने अनायास नामक यज्ञ को प्रसन्न करके इस महान तन्त्र को प्राप्त किया ॥

ऋग्यजुःसामवेदाँस्त्रीनधीत्याङ्गानि सर्वशः ।।२६।।
शिवकश्यपयक्षांश्च प्रसाद्य तपसा धिया। संस्कृतं तत् पुनस्तन्त्रं वृद्धजीवकनिर्मितम् ।।२७।।
धर्मकीर्तिसुखार्थाय प्रजानामभिवृद्धये।

ऋक्, यजु, साम आदि तीनों वेदों एवं शिक्षा, व्याकरण आदि छओं अङ्गों का अध्ययन करके तथा अपनी तपस्या एवं बुद्धि के कारण शिव, कश्यप और यक्षों को प्रसन्न करके धर्म, कीर्ति तथा सुख एवं लोकसमृद्धि के लिये उसने वृद्धजीवक के बनाये हुए उस तन्त्र का संस्कार किया ॥२६-२७॥

स्थानेष्वष्टसु शाखायां यद्यन्नोक्तं प्रयोजनम् ।।२८।।
तत्तद्भूयः प्रवक्ष्यामि खिलेषु निखिलेन ते।

इस संहिता के आठों स्थानों तथा शाखाओं में जो २ विषय नहीं कहा गया है उसका मैं पुनः खिलस्थान में उपदेश करूँगा ॥२०॥

(इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।)
(इति) वृद्धजीवकीये तन्त्रे कौमारभृत्ये वात्स्यप्रतिसंस्कृते कल्पेषु संहिताकल्पो नाम द्वादशः ।।
समाप्तं च कल्पस्थानम् ।। संमाप्ता चेयं सहिता ।।
अतः परं खिलस्थानं भवति ।।

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।
इति कल्पस्थानंसमाप्तम् ।