भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 700

३४० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् संहिताकल्प: ? ]

निरन्तर इस शास्त्र का अध्ययन करने एवं सम्यक् प्रकार से अध्यापन करने से वैद्य इस लोक में यश को प्राप्त करके इन्द्रलोक (परलोक) में प्रतिष्ठा को प्राप्त करता है ॥१३॥

दक्षयज्ञे वधत्रापाद्देवर्षीणां पलायताम् । रोगाः सर्वे समुत्पन्नाः संतापाद्देहचेतसोः ॥१४॥

प्रजापति दक्ष के यज्ञ में (रुद्र द्वारा यज्ञ के ध्वंस करने पर) मृत्यु के डर से पलायन करते (दौड़ते) हुए देवता और ऋषियों के देह (शरीर) एवं मन के सन्ताप से सम्पूर्ण रोग उत्पन्न हुए ॥१४॥

ज्वरो गुरुत्वाद् गुल्मस्तु धावतां प्लवनात् प्लीहा । भ्रमो विषादाद्विद्भेदो धावतां वेगधारणात् ॥१५॥
तृष्णा च रक्तपित्तं च श्रमादुष्णे च धावताम् ।
हिक्काश्वासौ कफाधिक्याद्धावतां पिबतां जलम् ॥१६॥
प्रागुत्पत्तिस्तथाऽन्येषां रोगाणां परिकीर्तिता । कृतत्रेतान्तरत्वेन प्रादुर्भूता यथा नृणाम् ॥१७॥
धर्मार्थकाममोक्षेषु विद्याबलयशोहराः ।

शरीर के गुरु होने से ज्वर, उनके दौड़ने से गुल्म, प्लवन (तैरने) से प्लीहा (प्लीहावृद्धि-Enlargement of spleen), विषाद से भ्रम, दौड़ते हुए के वेगों को धारण करने से विड्भेद (अतिसार), दौड़ते हुए लोगों के उष्णकाल में श्रम (थकावट) से तृष्णा एवं रक्तपित्त, कफ की अधिकता एवं दौड़ते हुए जल पीने से हिक्का एवं श्वासयोग तथा अन्य भी धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, विद्या, बल एवं यश को नष्ट करने वाले रोग सत्ययुग तथा त्रेतायुग के मध्य में जिस प्रकार उत्पन्न हुए हैं, उनकी पूर्व उत्पत्ति का वर्णन किया गया है ॥१५-१७॥

ततो हितार्थं लोकानां कश्यपेन महर्षिणा ॥१८॥
पितामह्नियोगाच्च दृष्ट्वा च ज्ञानचक्षुषा । तपसा निर्मितं तन्त्रमृषयः प्रतिपेदिरे ॥१९॥
जीवको निर्गततमा ऋचीकतनयः शुचिः । जगृहेऽग्रे महातन्त्रं संचिक्षेप पुनः स तत् ॥२०॥
नाभ्यनन्दन्त तत् सर्वे मुनयो बालभाषितम् ।

तब लोक कल्याण के लिये महर्षि कश्यप ने पितामह ब्रह्मा के नियोग एवं अपने ज्ञानचक्षुओं से देखकर तपस्या के प्रभाव से तन्त्र का निर्माण किया । तथा ऋषियों ने उसका प्रतिपादन किया । उसके बाद सर्वप्रथम तम (अज्ञान) से शून्य, पवित्र एवं ऋचीक के पुत्र जीवक ने इस महान् तन्त्र को ग्रहण करके संक्षिप्त किया । परन्तु सब ऋषियों ने बालभाषित (बालक का वचन) कहकर उसकी प्रशंसा नहीं की ॥१८-२०॥

ततः समक्षं सर्वेषामृषीणां जीवकः शुचिः ॥२१॥
गङ्गाह्रदे कनखले निमग्नः पञ्चवार्षिकः । वलीपलितविग्रस्त उन्ममज्ज मुहूर्त्तकात् ॥२२॥

तब उस पांच वर्ष की आयु वाले एवं पवित्र जीवक ने सब ऋषियों के समक्ष कनखल स्थित गङ्गा के कुण्ड में डुबकी लगाई । तथा क्षणभर में झुर्रियों एवं सफेद बालों से युक्त होकर बाहर निकल आया ॥२१-२२॥

ततस्तदद्भुतं दृष्ट्वा मुनयो विस्मयं गताः । वृद्धजीवक इत्येव नाम चक्रुः शिशोरपि ॥२३॥
प्रत्यगृह्णन्त तन्त्रं च भिषक्च्छ्रेष्ठं च चक्रिरे ।

तब इस अद्भुत घटना को देखकर सम्पूर्ण मुनियों को बड़ा आश्चर्य हुआ तथा उस बालक का नाम भी उन्होंने वृद्ध जीवक रखदिया । तथा उसके तन्त्र को स्वीकार करके उसे श्रेष्ठ वैद्य मान लिया ॥२३॥

ततः कलियुगे नष्टं तन्त्रमेतद्यदृच्छया ॥२४॥