भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 699

संहिताकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३३९

संहिताध्ययने युक्तः शुचिः साधुर्जितेन्द्रियः । वैद्यो वैद्यकुले जातो ग्रन्थे चार्थे च निश्चितः ।। ३ ।।
स पृष्टोऽन्येन वैद्येन प्रब्रूयात् संहिताविधिम् ।

पवित्र, सज्जन, जितेन्द्रिय, वैद्यकुल में उत्पन्न हुए तथा ग्रन्थ एवं विषय में निष्ठा (विश्वास) रखने वाले वैद्य को संहिता के अध्ययन में तत्पर होना चाहिये। तथा दूसरे वैद्य के पूछने पर वह उसे संहिता की सम्पूर्ण विधि बताये ।।

कति स्थानमिदं तन्त्रं कस्मात्तन्त्रमिति स्मृतम् ।। ४ ।।
स्थानानां कानि नामानि कर्माध्यायानि यानि च ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १९७ तमं पत्रम्)
स्थानानामानुपूर्वीं च श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।। ५ ।।

भगवन् ! मैं ठीक प्रकार से सुनना चाहता हूँ कि इस तन्त्र में कितने स्थान हैं ? इसे तन्त्र क्यों कहा है ? स्थानों के क्या २ नाम हैं ? उनमें कर्म (विषय) एवं अध्याय कौन से हैं ? तथा इसमें उपर्युक्त स्थानों के क्या क्रम हैं ? इत्यादि विषयों को मैं तत्वपूर्वक सुनना चाहता हूँ ।।४-५।।

अष्टौ स्थानानि वाच्यानि ततोऽतस्तन्त्रमुच्यते ।
अध्यायानां शतं विंशं योऽधीते स तु पारगः ।। ६ ।।

इस संहिता में आठ स्थान हैं इस लिये इसे तन्त्र कहते हैं। इन आठ स्थानों में १२० अध्याय हैं। जो इस संहिता का अध्ययन करता है वह इस भवसागर से पार हो जाता है ।।

सूत्रस्थाननिदानानि विमानान्यात्मनिश्चयः । इन्द्रियाणि चिकित्सा च सिद्धिः कल्पाश्च संहिता ।। ७ ।।
इस संहिता में सूत्र, निदान, विमान, शारीर, इन्द्रिय, चिकित्सा, सिद्धि तथा कल्प-ये आठ स्थान हैं ।।७।।

सूत्रस्थानं चिकित्सा च त्रिंशदध्यायके उभे ।
निदानानि विमानाश्च शारीराण्राष्टकानि तु ।। ८ ।।
सिद्धयो द्वादशाध्यायाः कल्पाश्चैवेन्द्रियाणि च । खिलान्यशीतिरध्यायास्तन्त्रं सखिलमुच्यते ।। ९ ।।

सूत्र एवं चिकित्सा स्थान इन दोनों में तीस २ अध्याय हैं। निदान, विमान एवं शारीर स्थान में आठ २ अध्याय हैं। सिद्धि, कल्प एवं इन्द्रिय स्थान में बारह २ अध्याय हैं। खिलस्थान में ८० अध्याय हैं। इस प्रकार खिलस्थान सहित यह सम्पूर्ण तन्त्र कहलाता है ।।८-९।।

धारणं ह्यस्य तन्त्रस्य वेदानां धारणं यथा । पुण्यं मङ्गल्यमायुष्यं दुःस्वप्नकलिनाशनम् ।। १० ।।
धर्मार्थकाममोक्षाणां धर्म्यायतनं महत् । सुखप्रदं नृणां शश्वद्धनमानयशस्करम् ।। ११ ।।

वेदों के धारण के समान इस तन्त्र का धारण करना पुण्य एवं मंगलकारक, आयुष्य का देने वाला, दुःस्वप्न एवं कलि (पापों) का नाश करने वाला, धर्म, अर्थ काम तथा मोक्ष का देने वाला, धर्म का महान् आयतन, तथा प्राणियों को निरन्तर सुख, धन, मान, एवं यश का देने वाला है ।।१०।।

नाधार्मिको न चापुत्रो नाविद्वान्न च गर्हितः । नापूजितो नाविदितो लोके भवति पारगः ।। १२ ।।
जो व्यक्ति धार्मिक, पुत्रवान् (पुत्र युक्त), विद्वान्, अनिन्दित, पूजा (आदर) युक्त तथा ज्ञानी नहीं है वह इस संसार सागर से पार नहीं हो सकता है ।।१२।।

सततं चाप्यधीयानः सम्यगध्यापयन् भिषक् । इह लोके यशः प्राप्य शक्रलोके महीयते ।। १३ ।।