काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
संहिताकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३३९
संहिताध्ययने युक्तः शुचिः साधुर्जितेन्द्रियः । वैद्यो वैद्यकुले जातो ग्रन्थे चार्थे च निश्चितः ।। ३ ।।
स पृष्टोऽन्येन वैद्येन प्रब्रूयात् संहिताविधिम् ।
पवित्र, सज्जन, जितेन्द्रिय, वैद्यकुल में उत्पन्न हुए तथा ग्रन्थ एवं विषय में निष्ठा (विश्वास) रखने वाले वैद्य को संहिता के अध्ययन में तत्पर होना चाहिये। तथा दूसरे वैद्य के पूछने पर वह उसे संहिता की सम्पूर्ण विधि बताये ।।
कति स्थानमिदं तन्त्रं कस्मात्तन्त्रमिति स्मृतम् ।। ४ ।।
स्थानानां कानि नामानि कर्माध्यायानि यानि च ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १९७ तमं पत्रम्)
स्थानानामानुपूर्वीं च श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।। ५ ।।
भगवन् ! मैं ठीक प्रकार से सुनना चाहता हूँ कि इस तन्त्र में कितने स्थान हैं ? इसे तन्त्र क्यों कहा है ? स्थानों के क्या २ नाम हैं ? उनमें कर्म (विषय) एवं अध्याय कौन से हैं ? तथा इसमें उपर्युक्त स्थानों के क्या क्रम हैं ? इत्यादि विषयों को मैं तत्वपूर्वक सुनना चाहता हूँ ।।४-५।।
अष्टौ स्थानानि वाच्यानि ततोऽतस्तन्त्रमुच्यते ।
अध्यायानां शतं विंशं योऽधीते स तु पारगः ।। ६ ।।
इस संहिता में आठ स्थान हैं इस लिये इसे तन्त्र कहते हैं। इन आठ स्थानों में १२० अध्याय हैं। जो इस संहिता का अध्ययन करता है वह इस भवसागर से पार हो जाता है ।।
सूत्रस्थाननिदानानि विमानान्यात्मनिश्चयः । इन्द्रियाणि चिकित्सा च सिद्धिः कल्पाश्च संहिता ।। ७ ।।
इस संहिता में सूत्र, निदान, विमान, शारीर, इन्द्रिय, चिकित्सा, सिद्धि तथा कल्प-ये आठ स्थान हैं ।।७।।
सूत्रस्थानं चिकित्सा च त्रिंशदध्यायके उभे ।
निदानानि विमानाश्च शारीराण्राष्टकानि तु ।। ८ ।।
सिद्धयो द्वादशाध्यायाः कल्पाश्चैवेन्द्रियाणि च । खिलान्यशीतिरध्यायास्तन्त्रं सखिलमुच्यते ।। ९ ।।
सूत्र एवं चिकित्सा स्थान इन दोनों में तीस २ अध्याय हैं। निदान, विमान एवं शारीर स्थान में आठ २ अध्याय हैं। सिद्धि, कल्प एवं इन्द्रिय स्थान में बारह २ अध्याय हैं। खिलस्थान में ८० अध्याय हैं। इस प्रकार खिलस्थान सहित यह सम्पूर्ण तन्त्र कहलाता है ।।८-९।।
धारणं ह्यस्य तन्त्रस्य वेदानां धारणं यथा । पुण्यं मङ्गल्यमायुष्यं दुःस्वप्नकलिनाशनम् ।। १० ।।
धर्मार्थकाममोक्षाणां धर्म्यायतनं महत् । सुखप्रदं नृणां शश्वद्धनमानयशस्करम् ।। ११ ।।
वेदों के धारण के समान इस तन्त्र का धारण करना पुण्य एवं मंगलकारक, आयुष्य का देने वाला, दुःस्वप्न एवं कलि (पापों) का नाश करने वाला, धर्म, अर्थ काम तथा मोक्ष का देने वाला, धर्म का महान् आयतन, तथा प्राणियों को निरन्तर सुख, धन, मान, एवं यश का देने वाला है ।।१०।।
नाधार्मिको न चापुत्रो नाविद्वान्न च गर्हितः । नापूजितो नाविदितो लोके भवति पारगः ।। १२ ।।
जो व्यक्ति धार्मिक, पुत्रवान् (पुत्र युक्त), विद्वान्, अनिन्दित, पूजा (आदर) युक्त तथा ज्ञानी नहीं है वह इस संसार सागर से पार नहीं हो सकता है ।।१२।।
सततं चाप्यधीयानः सम्यगध्यापयन् भिषक् । इह लोके यशः प्राप्य शक्रलोके महीयते ।। १३ ।।
३४० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् संहिताकल्प: ? ]
निरन्तर इस शास्त्र का अध्ययन करने एवं सम्यक् प्रकार से अध्यापन करने से वैद्य इस लोक में यश को प्राप्त करके इन्द्रलोक (परलोक) में प्रतिष्ठा को प्राप्त करता है ॥१३॥
दक्षयज्ञे वधत्रापाद्देवर्षीणां पलायताम् । रोगाः सर्वे समुत्पन्नाः संतापाद्देहचेतसोः ॥१४॥
प्रजापति दक्ष के यज्ञ में (रुद्र द्वारा यज्ञ के ध्वंस करने पर) मृत्यु के डर से पलायन करते (दौड़ते) हुए देवता और ऋषियों के देह (शरीर) एवं मन के सन्ताप से सम्पूर्ण रोग उत्पन्न हुए ॥१४॥
ज्वरो गुरुत्वाद् गुल्मस्तु धावतां प्लवनात् प्लीहा । भ्रमो विषादाद्विद्भेदो धावतां वेगधारणात् ॥१५॥
तृष्णा च रक्तपित्तं च श्रमादुष्णे च धावताम् ।
हिक्काश्वासौ कफाधिक्याद्धावतां पिबतां जलम् ॥१६॥
प्रागुत्पत्तिस्तथाऽन्येषां रोगाणां परिकीर्तिता । कृतत्रेतान्तरत्वेन प्रादुर्भूता यथा नृणाम् ॥१७॥
धर्मार्थकाममोक्षेषु विद्याबलयशोहराः ।
शरीर के गुरु होने से ज्वर, उनके दौड़ने से गुल्म, प्लवन (तैरने) से प्लीहा (प्लीहावृद्धि-Enlargement of spleen), विषाद से भ्रम, दौड़ते हुए के वेगों को धारण करने से विड्भेद (अतिसार), दौड़ते हुए लोगों के उष्णकाल में श्रम (थकावट) से तृष्णा एवं रक्तपित्त, कफ की अधिकता एवं दौड़ते हुए जल पीने से हिक्का एवं श्वासयोग तथा अन्य भी धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, विद्या, बल एवं यश को नष्ट करने वाले रोग सत्ययुग तथा त्रेतायुग के मध्य में जिस प्रकार उत्पन्न हुए हैं, उनकी पूर्व उत्पत्ति का वर्णन किया गया है ॥१५-१७॥
ततो हितार्थं लोकानां कश्यपेन महर्षिणा ॥१८॥
पितामह्नियोगाच्च दृष्ट्वा च ज्ञानचक्षुषा । तपसा निर्मितं तन्त्रमृषयः प्रतिपेदिरे ॥१९॥
जीवको निर्गततमा ऋचीकतनयः शुचिः । जगृहेऽग्रे महातन्त्रं संचिक्षेप पुनः स तत् ॥२०॥
नाभ्यनन्दन्त तत् सर्वे मुनयो बालभाषितम् ।
तब लोक कल्याण के लिये महर्षि कश्यप ने पितामह ब्रह्मा के नियोग एवं अपने ज्ञानचक्षुओं से देखकर तपस्या के प्रभाव से तन्त्र का निर्माण किया । तथा ऋषियों ने उसका प्रतिपादन किया । उसके बाद सर्वप्रथम तम (अज्ञान) से शून्य, पवित्र एवं ऋचीक के पुत्र जीवक ने इस महान् तन्त्र को ग्रहण करके संक्षिप्त किया । परन्तु सब ऋषियों ने बालभाषित (बालक का वचन) कहकर उसकी प्रशंसा नहीं की ॥१८-२०॥
ततः समक्षं सर्वेषामृषीणां जीवकः शुचिः ॥२१॥
गङ्गाह्रदे कनखले निमग्नः पञ्चवार्षिकः । वलीपलितविग्रस्त उन्ममज्ज मुहूर्त्तकात् ॥२२॥
तब उस पांच वर्ष की आयु वाले एवं पवित्र जीवक ने सब ऋषियों के समक्ष कनखल स्थित गङ्गा के कुण्ड में डुबकी लगाई । तथा क्षणभर में झुर्रियों एवं सफेद बालों से युक्त होकर बाहर निकल आया ॥२१-२२॥
ततस्तदद्भुतं दृष्ट्वा मुनयो विस्मयं गताः । वृद्धजीवक इत्येव नाम चक्रुः शिशोरपि ॥२३॥
प्रत्यगृह्णन्त तन्त्रं च भिषक्च्छ्रेष्ठं च चक्रिरे ।
तब इस अद्भुत घटना को देखकर सम्पूर्ण मुनियों को बड़ा आश्चर्य हुआ तथा उस बालक का नाम भी उन्होंने वृद्ध जीवक रखदिया । तथा उसके तन्त्र को स्वीकार करके उसे श्रेष्ठ वैद्य मान लिया ॥२३॥
ततः कलियुगे नष्टं तन्त्रमेतद्यदृच्छया ॥२४॥
संहिताकल्प: ? ] कल्पस्थानम् ३४१
अनायासेन यक्षेण धारितं लोकभूतये। वृद्धजीवकवंशयेन ततो वात्स्येन धीमता ।।
अनायामं प्रसाद्याथ लब्धं तन्त्रमिदं महत्।
उसके बाद सहसा नष्ट हुए इस तन्त्र को लोककल्याण के लिये कलियुग में अनायास नामक यक्ष ने धारण किया। तब वृद्ध जीवक के वंश वाले बुद्धिमान् वात्स्य ने अनायास नामक यज्ञ को प्रसन्न करके इस महान तन्त्र को प्राप्त किया ॥
ऋग्यजुःसामवेदाँस्त्रीनधीत्याङ्गानि सर्वशः ।।२६।।
शिवकश्यपयक्षांश्च प्रसाद्य तपसा धिया। संस्कृतं तत् पुनस्तन्त्रं वृद्धजीवकनिर्मितम् ।।२७।।
धर्मकीर्तिसुखार्थाय प्रजानामभिवृद्धये।
ऋक्, यजु, साम आदि तीनों वेदों एवं शिक्षा, व्याकरण आदि छओं अङ्गों का अध्ययन करके तथा अपनी तपस्या एवं बुद्धि के कारण शिव, कश्यप और यक्षों को प्रसन्न करके धर्म, कीर्ति तथा सुख एवं लोकसमृद्धि के लिये उसने वृद्धजीवक के बनाये हुए उस तन्त्र का संस्कार किया ॥२६-२७॥
स्थानेष्वष्टसु शाखायां यद्यन्नोक्तं प्रयोजनम् ।।२८।।
तत्तद्भूयः प्रवक्ष्यामि खिलेषु निखिलेन ते।
इस संहिता के आठों स्थानों तथा शाखाओं में जो २ विषय नहीं कहा गया है उसका मैं पुनः खिलस्थान में उपदेश करूँगा ॥२०॥
(इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।)
(इति) वृद्धजीवकीये तन्त्रे कौमारभृत्ये वात्स्यप्रतिसंस्कृते कल्पेषु संहिताकल्पो नाम द्वादशः ।।
समाप्तं च कल्पस्थानम् ।। संमाप्ता चेयं सहिता ।।
अतः परं खिलस्थानं भवति ।।
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।
इति कल्पस्थानंसमाप्तम् ।
अथ नवमं खिलस्थानम्। ..................................
विषमज्वरनिर्देशीयाध्यायः प्रथमः।
अथातो विषमज्वरनिर्देशीयं नामाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम विषमज्वरनिर्देशीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥
कश्यपं सर्वशास्त्रज्ञं सर्वलोकगुरुं गुरुम्। भार्गवः परिपप्रच्छ संशयं संश्रितव्रतः ॥३॥
सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता, सब लोकों के गुरु तथा महान् कश्यप से व्रत का धारण करने वाले भार्गव (वृद्धजीवक) ने संशय युक्त प्रश्न को पूछा ॥३॥
प्रोक्तं ज्वरचिकित्सायां विषमज्वरभेषजम्। न निर्दिष्टं भगवता विषमत्वस्य कारणम् ॥४॥
आपने ज्वर चिकित्सा में विषम ज्वर की ओषधि का वर्णन किया था परन्तु वहां आपने विषमता का कारण नहीं बतलाया ॥४॥
युक्तं सततकादीनां वैषम्यं विषमागतेः। अविसर्गी ज्वरः कस्मात् संततो विषमः स्मृतः ॥५॥
(इति ताडपत्रपुस्तके १९८ तमं पत्रम्)
प्रेतज्वरो ग्रहोत्थश्च विषमः केन हेतुना।
विषम गति वाले सतत आदि ज्वरों की विषमता तो युक्तियुक्त है परन्तु अविसर्गी (निरन्तर रहने वाले) सन्तत ज्वर को विषम कहने का क्या अर्थ है ? इसी प्रकार प्रेतज्वर एवं ग्रहोत्थ ज्वर को विषम मानने का क्या कारण है ? ॥५॥
तदिदानीं यथाकालं वक्तव्योऽवयवाद्यथा ॥६॥
वक्तुमर्हसि तत्त्वेन सविशेषं सविस्तरम्।
अब आप यथासमय पृथक् २ तथा विस्तार पूर्वक इन सबों का वर्णन करने की कृपा करें ॥६॥
इति पृष्टः स शिष्येण प्रश्नं प्रोवाच कश्यपः ॥७॥
इस प्रकार शिष्य द्वारा प्रश्न पूछा जाने पर महर्षि कश्यप ने उत्तर दिया ॥७॥
अल्पहेतुर्बहिर्मार्गो वैकृतो निरुपद्रवः। एकाश्रयः सुखोपायो लघुपाकः समो ज्वरः ॥८॥
समज्वर के लक्षण—स्वल्प कारणों वाला अर्थात् अल्प कारणों से उत्पन्न होने वाला, बहिर्मार्ग अर्थात् बहिर्वेगो बाला, वैकृत (विकारों से उत्पन्न होने वाला), उपद्रव रहित, एक आश्रय वाला (चरक चि. अ. ३ में—ज्वर के रस,
विषमज्वरनिदंशीयाध्याय ? ] खिलस्थानम् ३४३
रक्त, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा, शुक्र आदि ७ आश्रय दिये हैं—इनमें से जो केवल एक को ही आश्रित करके हो), सुखपूर्वक जिसकी चिकित्सा की जा सके तथा जो लघुपाक वाला होता है वह समज्वर कहलाता है। बहिर्वेग ज्वर के चरक चि.अ. ३ में निम्न लक्षण दिये हैं—सन्तापोऽभ्यधिको बाह्यस्तृष्णादीनां च मार्दवम्। बहिर्वेगस्य लिङ्गानि सुखसाध्यत्वमेव च॥ यह सुखसाध्य माना गया है ॥८॥
विषमस्तद्विपर्यस्तस्तीक्ष्णत्वात् संततो मतः । तद्वत् प्रेतग्रहोत्था ये चत्वारो विषमागमात् ।।९।।
इसके विपरीत तीक्ष्ण होने के कारण सन्ततज्वर तथा प्रेत एवं ग्रहों से उत्पन्न होने वाले सतत आदि चारों ज्वर भी विषम गति के कारण विषमज्वर कहलाते हैं ॥९॥
दुर्जयत्वा(दुर्ग्रहत्वा)दुग्रग्रहपरिग्रहात् । वैषम्यं संततादीनां दारुणत्वादुदाहृतम् ।।१०।।
दुर्जय (दुर्ग्रह) होने के कारण, उग्र ग्रहों द्वारा गृहीत होने तथा दारुण (भयंकर) होने के कारण सन्तत आदि को विषमज्वर कहा गया है ॥१०॥
तथा सततकादीनां चतुर्णां कालकारितम् । विषमत्वं प्रवक्ष्यामि ज्वराणां जायते यथा ।।११।।
इसी प्रकार सतत आदि चारों प्रकार के ज्वर भी काल के अनुसार जिस प्रकार विषम होते हैं उनका मैं वर्णन करूंगा ।।
समस्ता द्वन्द्वशो वाऽपि धमनी रसवाहिनीः । दोषाः प्रपन्नाः कुर्वन्ति विषमा विषमज्ज्ववम् ।।१२।।
सम्पूर्ण अथवा दो २ दोष रसवाहिनियों धमनियों में पहुंच कर विषम हुए विषमज्वर को उत्पन्न करते हैं ॥१२॥
ज्वरितो मुच्यमानो वा मुक्तमात्रश्च यो नरः । व्यायामगुर्वसात्म्यान्नमत्तिमात्रमथो जलम् ।।१३।। पायसं कृशरां पिष्टं पललं दधि मन्दकम् । पिण्याकमाषविकृतीर्ग्राम्यानूपं तथाऽऽमिषम् ।।१४।। एवं विधानि चान्यानि विरुद्धानि गुरूणि च । सेवते च दिवास्वप्नमजीर्णाध्यशनानि च ।।१५।। ज्वरोऽभिवर्धते तस्य विषमो वाऽऽशु जायते ।
जो व्यक्ति ज्वरयुक्त अवस्था में, जो ज्वर से मुक्त होने की अवस्था में तथा जो ज्वर से मुक्त होने के बाद तुरन्त व्यायाम, गुरु एवं असात्म्य अन्न तथा अधिक मात्रा में जल, खीर, खिचड़ी, उड़द की पिट्ठी के बने हुए पदार्थ, मांस, अपूर्ण जमा हुआ दही, खल, उड़द के बने हुए पदार्थ, ग्राम्य तथा आनूप मांस तथा इसी प्रकार अन्य विरुद्ध एवं गुरु पदार्थों का तथा दिवास्वप्न, अजीर्ण एवं अध्यशन का सेवन करता है—उसका ज्वर बढ़ जाता है तथा वह शीघ्र ही विषम ज्वर का रूप धारण कर लेता है ॥१३-१५॥
दोषेष्वपरिपक्वेषु कषायं यश्च सेवते ।।१६।। लौल्याद्वा स्नेहपानानि क्षीरं संतर्पणानि वा । दैवतानामभिध्यानाद् ग्रहसंस्पर्शनादपि ।।१७।। सद्यो वान्तो विरिक्तो वा स्नेहपीतोऽनुवासितः । शीतोपचारं गुर्वन्नं व्यवायं यश्च सेवते ।।१८।। तस्यापि सहसा वायुरस्थिमज्जान्तरं गतः । कुपितः कोपयत्याशु श्लेष्माणं पित्तमेव च ।।१९।। ततोऽस्य धातुवैषम्याद्विषमो जायते ज्वरः । संततोऽन्येद्युको वाऽपि तृतीयः सचतुर्थकः ।।२०।।
दोषों के न पचने पर ही अर्थात् आमावस्था या ज्वर की तरुण अवस्था में ही जो कषाय का सेवन करता है अथवा जिह्वालौल्य के कारण जो व्यक्ति स्नेहपान, क्षीर अथवा सन्तर्पण (बृंहण) द्रव्यों का सेवन करता है, जो देवताओं द्वारा
३४४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ]
आक्रान्त तथा ग्रहों द्वारा स्पर्श किया जाता है अथवा वमन, विरेचन, स्नेहपान या अनुवासन का प्रयोग करने के बाद तुरन्त जो व्यक्ति शीत उपचार, गुरु अन्न तथा मैथुन का सेवन करता है—उस व्यक्ति के भी अस्थियों की मज्जा के अन्दर का वायु कुपित होकर शीघ्र ही कफ एवं पित्त को प्रकुपित कर देता है। इस प्रकार धातुओं के विषम हो जाने से उसे सतत, अन्येद्युक, तृतीयक तथा चतुर्थक नामक विषम ज्वर हो जाते हैं।
वक्तव्य—कषाय—यहां कषाय शब्द से कसैले द्रव्यों का अथवा पांच प्रकार की कषायकल्पनाओं में से किसी भी कषाय रस प्रधान रस प्रधान कल्पना का ग्रहण किया जाता है। क्योंकि कषाय रस स्तम्भक (Astringent) होने से दोषों की प्रवृत्ति नहीं होने देता इसीलिये दोषों की अपरिपक्वावस्था अथवा तरुण ज्वर में इसका निषेध किया गया है तथा स्वरस आदि पांचों कल्पनाओं में जो कषाय कल्पना है उसका भी त्याग करना चाहिये। कहा भी है—चतुर्भागावशिष्टस्तु यः षोडशगुणाम्भसा। स कषायः कषायः स्यात् स वर्ज्यस्तरुणज्वरे॥ कषायं यः प्रयुञ्जीत नराणां तरुणज्वरे। स सुप्तं कृष्णसर्पन्तु कराग्रेण परामृशेत्॥ तथा—न कषायं प्रयुञ्जीत नराणां तरुणे ज्वरे। कषायेणाकुलीभूता दोषा जेतुं सुदुष्कराः॥ इसी लिये चरक चि. अ. ३ में भी कहा है—नवज्वरे दिवास्वप्नस्नानाभ्यङ्गात्रमैथुनम्। क्रोधप्रवातव्यायामकषायांश्च विवर्जयेत् ॥१६-२०॥
न च नोपशमं याति न च भूयो न कुप्यति। शमप्रकोपयोः कालं न चायमतिवर्तते ॥२१॥
ये विषमज्वर शान्त न होते हों या पुनः प्रकुपित न होते हों—ऐसी बात नहीं है अर्थात् ये शान्त हो कर पुनः प्रकुपित हो जाते हैं। तथा इनका शमन एवं प्रकुपित होने के समय का उल्लंघन नहीं होता अर्थात् ये लगभग निश्चित समय पर शान्त होते हैं तथा निश्चित समय पर ही पुनः प्रकुपित होते हैं ॥२१॥
न च स्वभावोपशमं गच्छत्यनुशयात्मकः। न हि स्वभावशान्तानां भावानामस्ति संभवः ॥२२॥
अनुशय होने के कारण इनका स्वभाव शान्त नहीं होता। स्वभाव के शान्त हो जाने पर पदार्थों की पुनः उत्पत्ति नहीं होती है अर्थात् इनका स्वभाव नष्ट नहीं होता है इसलिये ये पूर्णरूप नष्ट नहीं हो पाते हैं तथा बार २ ये ज्वर अपना रूप प्रकट करते हैं ॥२२॥
ज्वरप्रवेगोपरमे देही मुक्त इवेक्ष्यते। तथाऽप्यस्यामवस्थायामेभिर्लिङ्गैर्न मुच्यते ॥२३॥
मुखवैरस्यकटुक्यमाधुर्यादिभिरल्पशः। नात्यन्नलिप्साग्लानिभ्यां शिरसो गौरवेण च ॥२४॥
ज्वर के वेग के शान्त हो जाने पर रोगी ज्वर से यद्यपि मुक्त हुआ प्रतीत होता है तथापि इस अवस्था में भी (अर्थात् वेग के शान्त होने पर भी) रोगी मुखवैरस्य (मुख की विरसता) तथा थोड़ा २ मुख का कड़वापन एवं मधुरता, अन्न की अधिक रुचि न होना, ग्लानि तथा सिर का भारी होना—इत्यादि लक्षणों से मुक्त नहीं हो पाता है ॥२३-२४॥
पुनः पुनर्यथा चैष जायते तन्निबोध मे। निरुद्धमार्गों दोषेण विषमज्वरहेतुना ॥२५॥
वायुस्तद्दोषकोपान्ते लब्धमार्गों यथाक्रमम्। दोषशेषं तमादाय यथास्थानं प्रपद्यते ॥२६॥
स दोषशेषः. स्वे स्थाने लीनः कालबलाश्रयात्।
रसस्थानमुपागम्य भूयो जनयति ज्वरम् ॥२७॥
यह विषमज्वर बार २ किस कारण से हो जाता है—वह अब तू मेरे से सुन—विषमज्वर को उत्पन्न करने वाले दोषों के द्वारा जिसका मार्ग रुक गया है ऐसा वायु उस दोष के प्रकोप के अन्त में मार्ग को प्राप्त करके क्रमशः उस बचे हुए दोष को लेकर यथास्थान पहुंच जाता है जिससे अपने स्थान पर लीन (स्थित) हुआ अवशिष्ट दोष काल एवं बल
विषमज्वरनिदंशीयाध्याय ? ] खिलस्थानम् ३४५
के आश्रय से रसस्थान (आमाशय) में पहुंच कर पुनः ज्वर को कर देता है। अष्टाङ्ग संग्रह चि. अ. १ में कहा है—आमाशयस्थो हत्वाग्निं सामो मार्गान् पिधापयन्। विदधाति ज्वरं दोषः ........।। अर्थात् आमाशय में आम रस के साथ मिलकर दोष शरीर में स्रोतों के मुखों को बन्द कर देते हैं। इससे जाठराग्नि मन्द हो जाती है तथा भोजन का पाक नहीं हो पाता है। जितना ही भोजन किया जायगा उतनी ही शरीर में आमरस की उत्पत्ति होगी—जिससे ज्वर की वृद्धि होगी ।।२५-२७।।
उपक्रमविशेषेण स्वबलस्य व्ययेन च। क्षयं प्राप्नोति वृद्धिं च समानगुणसंश्रयात् ।।२८।।
चिकित्सा की विशेषता के कारण अथवा ज्वर के बल के कम होने के कारण समान गुण के आश्रित होने से ज्वर क्षय अथवा वृद्धि को प्राप्त करता है ।।२८।।
सोऽयं निवृत्तिं संप्राप्य यथा दीपः स्वभावतः ।
पुनः पुनः प्रज्वलति क्षीणतैलेन्धनोऽपि सन् ।।२९।।
स्वमधिष्ठानमाश्रित्य शान्तः शान्तस्तथा ज्वरः।
काले बलं दर्शयति क्षीणदोषेन्धनोऽपि सन् ।।३०।।
जिस प्रकार निवृत्ति को प्राप्त होने पर दीपक तैल रूपी इन्धन के क्षीण होने पर स्वभाव से ही पुनः २ प्रज्वलित होता रहता है, उसी प्रकार यह ज्वर अपने अधिष्ठान (आमाशय) में पहुंच कर शान्त हुआ भी दोषरूपी इन्धन के क्षीण होने पर स्वयमेव समय पर अपने बल को प्रकट करता है अर्थात् दोषों के क्षीण हो जाने पर स्वभाव के नष्ट न होने से पुनः ज्वर को प्रकट करता है ।।२९-३०।।
स्वहेतुदोषमाश्रित्य नियतो नियमेन यः । अहोरात्रे दर्शयति कालहेतुकृतं बलम् ।।३१।।
द्विकालं स यथादोषं ज्वरः सततकः स्मृतः । स्थानमामाशयस्तस्य यं समाश्रित्य वर्तते ।।३२।।
सतत ज्वर—ज्वरोत्पादक हेतु एवं दोष का आश्रय करके जो नियमपूर्वक दिन रात (२४ घण्टे) में दो बार निश्चित समय पर काल एवं हेतु कृत बल को प्रकट करता है उसे सतत ज्वर कहते हैं। इसका स्थान आमाशय होता है इसके आश्रित होकर यह बढ़ता है। चरक चि. अ. ३ में इसकी सम्प्राप्ति निम्न प्रकार बताई है—रसधात्वाश्रयः प्रायो दोषः सततकं ज्वरम्। सप्रत्यनीकः कुरुते कालवृद्धिक्षयात्मकम् ।। अहोरात्रे सततको द्वौ कालावनुवर्तते । कालप्रकृतिदूष्याणां प्राप्यैवान्यतमाद्बलम् ।।३१-३२।।
उरस्त्वन्येद्युकस्थानमहोरात्रादुरश्च्युतः । दोषो रसं समासाद्य यदा दर्शयते बलम् ।।३३।।
तदाऽनुषङ्गी स्वे काले जायतेऽन्येद्युको ज्वरः ।
अन्येद्युक ज्वर—अन्येद्युक ज्वर का स्थान उर (छाती) माना गया है। अहोरात्र (२४ घण्टे) में छाती से यह दोष आमाशयस्थित रस में पहुंच कर अपने बल को प्रकट करता है तथा यह अनुषङ्गी हुआ प्रतिदिन अपने समय पर होता है इसे अन्येद्युक ज्वर कहते हैं। चरक चि. अ. ३ में कहा है—दोषो मेदोवहा रुद्ध्वा नाडीरन्येद्युकं ज्वरम्। सप्रत्यनीकः कुरुते एक कालमहर्निशि ।। अर्थात् २४ घण्टे में इसका वेग एक बार होता है ।।३३।।
कण्ठस्तृतीयकस्थानमहोरात्राच्च्युतस्ततः ।।३४।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १९९ तमं पत्रम् ।)
उरः प्रपद्यतेऽन्यस्मादहोरात्राद्यथाक्रमम् । रसधात्वाश्रितो दोष ऊष्मणा सह मूर्च्छितः ।।३५।।
तृतीयेऽहनि निर्वृत्तिं जनयेत् स तृतीयकः ।
| ३४६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | विषमज्वरनिर्दशीयाध्याय ? ] |
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तृतीयेऽहनि निर्वृत्तिं जनयेत् स तृतीयकः ।
तृतीयक ज्वर—तृतीयक ज्वर का स्थान कण्ठ होता है। प्रथम अहोरात्र (२४ घण्टे) में दोष कण्ठ से च्युत होकर उर (छाती) में पहुंचता है तथा दूसरे अहोरात्र में वह यथाक्रम रसधातु (आमाशय स्थित) में पहुंचकर ऊष्मा (उष्णता) के साथ मूर्च्छित हुआ तीसरे दिन पुनः प्रकट होता है। उसे तृतीयक ज्वर कहते हैं। अर्थात् दोष अपने स्थान कण्ठ से क्रमशः प्रथम दिन छाती में पहुंचता है तथा वहां से अगले दिन आमाशय में पहुंचता है आमाशय में पहुंचकर पूर्वोक्तानुसार दोष रसवाहिनियों के मार्गों को बन्द कर देता है तब ज्वर की उत्पत्ति होती है। इसलिये तृतीयक ज्वर एक दिन छोड़कर अर्थात् तीसरे दिन (४८ घण्टे में एकबार) उत्पन्न होता है ॥३४-३५॥
शिरश्चतुर्थकस्थानं चतुर्थं समुदाहृतम् ।।३६।।
अहोरात्राच्च्युतः स्थानाद्दोषः कण्ठेऽवतिष्ठते । ततः पुनरहोरात्रादुरसि प्रतिपद्यते ।।३७।।
तृतीये चाप्यहोरात्रे रसधातौ प्रकुप्यति । चतुर्थकः स विज्ञेयश्चिरस्थायी महाज्वरः ।।३८।।
गम्भीरस्थानसंभूतो धातुसंकरदूषितः । दर्शयित्वा बलं काले जन्तोः शिरसि लीयते ।।३९।।
त्रिदोषसंभवत्वाच्च भूतसंस्पर्शनादपि । दुश्चिकित्स्यतमो ह्येष तस्माद्यत्नेनमुपक्रमेत् ।।४०।।
चतुर्थक ज्वर—चौथा चतुर्थक ज्वर होता है इसका स्थान शिर माना गया है। प्रथम अहोरात्र में अपने स्थान शिर से च्युत होकर दोष कण्ठ में पहुंचता है। अगले अहोरात्र में वह उर (छाती) में पहुंचता है तथा तृतीय अहोरात्र में वह दोष आमाशय स्थित रस धातु में पहुँचकर प्रकुपित होता है इसे चतुर्थक ज्वर कहते हैं। यह महाज्वर चिरस्थायी होता है अर्थात् यह अत्यन्त कठिनता से ठीक होता है। गंभीर स्थान में उत्पन्न होकर तथा अनेक धातुओं से दूषित हुआ यह अपने समय पर बलको प्रकट करके अर्थात् चतुर्थ दिन (७२ घंटे में एक बार) प्रकुपित होकर पुनः शिर में लीन हो जाता है अर्थात् वहां स्थित हो जाता है। त्रिदोष से उत्पन्न होने तथा भूतों का संसर्ग होने के कारण यह दुश्चिकित्स्य होता है इसलिये निम्न उपायों के द्वारा इसकी चिकित्सा करे। अर्थात् तीन अहोरात्र के बाद दोष अपने स्थान सिरसे यथाक्रम आमाशय में पहुंचता है इसलिये चतुर्थ दिन प्रकुपित होकर यह चतुर्थक ज्वर को करता है। तृतीयक तथा चतुर्थक ज्वर के लिये चरक चि. अ. ३ में कहा है—दोषोऽस्थिमज्जगः कुर्यात्तृतीयकचतुर्थकौ। अर्थात् अस्थि और मज्जा में पहुंचा हुआ दोष क्रमशः तृतीयक और चतुर्थक ज्वर को करता है। वहीं इन ज्वरों की गतियां निम्न प्रकार से कही गई हैं—गतिद्वयकान्तरान्येद्युर्दोषस्योक्ताऽन्यथा परैः । रक्तमेवाभिसंसृज्य कुर्यादन्येद्युकं ज्वरम् ।। मांसस्रोतांस्यनुसृतो जनयेत्तु तृतीयकम् । ज्वरं दोषः संसृतो हि मेदोमार्गं चतुर्थकम् ।। अर्थात् दोषों की गतियां क्रमशः प्रतिदिन, एक दिन छोड़कर अथवा दो दिन छोड़कर कही गई हैं। जब प्रतिदिन एक बार गति होती है तब अन्येद्युक ज्वर होता है। जब एक दिन के अन्तर से होती है तब तृतीयक और जब दो दिन के अन्तर से होती है तब चतुर्थक ज्वर होता है। सुश्रुत उ. अ. ३९ में ये गतियां निम्न प्रकार दी गई हैं—सन्ततं रसरक्तस्थः सोऽन्येद्युः पिशिताश्रितः । मेदोगतस्तृतीयेऽह्नि त्वस्थिमज्जगतः पुनः ।। कुर्याच्चतुर्थकं घोरमन्तकं रोगसङ्करम् ।।३६-४०।।
बलिभिः शान्तिहोमैश्च सिद्धैर्मन्त्रपदैस्तथा । पापापहरणं चास्य कर्तव्यं सिद्धिरिच्छता ।।४१।।
भूतेश्वरं नीलकण्ठं प्रपद्येत वृषध्वजम् ।
सिद्धि को चाहने वाले वैद्य को बलि, शान्ति, होम (शान्ति के निमित्त किये जाने वाले यज्ञ) तथा सिद्ध मन्त्रों के द्वारा इसके पाप का निराकरण करना चाहिये। नीलकण्ठ (नीले कण्ठ वाले) तथा वृषध्वज (जिसकी ध्वजा पर वृष-बैल का चिह्न हो) भूतेश्वर महादेव की उपासना करनी चाहिये ॥४१॥
विषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ] खिलस्थानम् ३४७
चिरानुबन्धी विषमो यथाकालं विवर्धते ।।४२।।
एकाहाच्च द्व्यहाच्चैव त्र्याहाच्चतुरहात्तथा ।
चिरानुबन्धी (चिरकालीन अनुबन्ध वाला-जीर्ण) विषमज्वर यथासमय एक, दो, तीन तथा चार दिन बाद वृद्धि को प्राप्त होता है।
**वक्तव्य—**आधुनिक विज्ञान के अनुसार हम विषमज्वर को Malarial fever कह सकते हैं। पाश्चात्य विज्ञान मलेरिया को एक Specific protozoon (Malarial parasite) द्वारा उत्पन्न हुआ मानता है। मादा Anopheline नामक मच्छर के काटने से इसका संक्रमण मनुष्यों में होता है। इस पराश्रयी (Parasite) के दो Life cycles होते हैं। १. मनुष्य में Asexual cycle तथा २. मच्छर में Sexual cycle । सर्वप्रथम मच्छर के काटने से मनुष्य के अन्दर Sporozoite प्रविष्ट हो जाता है। वह रक्तकणों में प्रविष्ट होकर धीरे २ बढ़ता जाता है तथा अन्त में Merozoites के रूप में आजाता है। इस प्रकार Parasite का Asexual cycle मनुष्य में पूर्ण हो जाता है। अब जब मनुष्य को पुनः मच्छर काटता है तब ये मच्छर के आमाशय में पहुंचकर फिर वृद्धि को प्राप्त होते हैं तथा धीरे २ बढ़कर पुनः Sporozoites की अवस्था में मच्छर की लालाग्रन्थियों में पहुंच जाते हैं। इस प्रकार Parasite का Sexual cycle मच्छर में पूर्ण हो जाता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि Parasite के दो Life cycle हैं। इसे हम निम्न तालिका से प्रकट कर सकते हैं—
Macrogametocyte Microgametocyte
│ │
Macrogamete Microgamete
└───┬─────────────┘
Sexual cycle │
(मच्छर में) Zygote
│
Oocyst
│
Sporozoites
│
Sporozoite मच्छर के काटनेसे प्रविष्ट
│
Asexual cycle Trophozoite
(मनुष्य में) │
Schizont
│
Merozoites
Malarial Parasite तीन प्रकार के होते हैं—
- Plasmodium Vivex 2. P. Malarial 3. P. Falsiparum.
| ३४८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | विषमज्वरनिदंशीयाध्याय ? ] |
|---|
P. Vivex—यह Benign Tertian Malaria को उत्पन्न करता है। इसका Asexual cycle ४८ घण्टे का होता है अर्थात् यह तृतीयक ज्वर को करता है।
P. Malarial—यह Quartan Malaria को उत्पन्न करता है। इसका Asexual cycle ७२ घण्टे का होता है। अर्थात् यह चातुर्थिक ज्वर को करता है।
P. Falsiparum—यह Malignant Tertian Malaria (Quotidian) को उत्पन्न करता है। इसका Asexual cycle २४-४८ घण्टे का होता है। यह अन्येद्युक को करता है। जब कभी साथ में ही दूसरा (Double) Infection हो जाता है तब सततज्वर (Double Tertian) होता है। रक्त में Spores के आने से जब उनका रक्त विष में मिलता है तब ज्वर का आक्रमण होता है। G. E. Beaumont की Medicine में लिखा है—The fever is thought to correspond with the liberation of the spores in the blood, perhaps due to freeing of their toxins, but there must be a threshold value, a definite amount of toxin being required in any individual to produce a rise of temperature. इसी प्रकार अखिलरञ्जन मजूमदार की Bedside Midicine में भी लिखा है—The mature rose the ruptures and young parasites (merozoites) and a toxin are thrown into the general circulation, If many such red cells rupture liberating, a quantity of toxin, a paroxysm of fever follows. ।।४२।।
पञ्चमेऽहनि षष्ठे वा कस्मादेष न जायते ।।४३।।
तस्य त्वामाशयः स्थानमुरः कण्ठः शिरस्तथा।
स्थानमन्यत्ततो नास्ति स्थानाभावान्न जायते ।।४४।।
यह विषमज्वर पांचवें तथा छठे दिन क्यों नहीं होता है ? इसका उत्तर—विषमज्वर के आमाशय, उर (छाती), कण्ठ तथा शिर ये चार स्थान हैं। इनके अतिरिक्त और कोई स्थान नहीं है। इसलिये अन्य स्थानों के अभाव से इन चार के अतिरिक्त पांचवें तथा छठे दिन यह ज्वर नहीं होता है ।।४३-४४।।
आग्नेयः स्यात् सततको वायव्यो हि द्वितीयकः। वैश्वदेवस्तृतीयः स्यादैशानस्तु चतुर्थकः ।।४५।।
सततज्वर आग्नेय (दक्षिण पूर्व दिशा) होता है। द्वितीयक (अन्येद्यक) वायव्य (पश्चिमोत्तर दिशा) होता है। तृतीयक वैश्वदेव तथा चतुर्थक ज्वर ऐशान (ईशान सम्बन्धी पूर्वोत्तर दिशा) होता है ।।४५।।
कस्मात् परिक्षीणबलः क्षीणधातुबलौजसः। ज्वरो विवर्धति जन्तोर्मोक्षकाले विशेषतः ।।४६।।
जिसका धातु, बल एवं ओज क्षीण हो गया है ऐसे व्यक्ति का क्षीण बल वाला ज्वर विशेष कर मोक्षकाल में क्यों वृद्धि को प्राप्त होता है ।।४६।।
| गतेरभावाद्वाह्येन | वायुनाऽभ्याहतक्रमः । |
|---|---|
| संक्षीणवर्त्यनुगतः | स्नेहाव्वाभिमूर्च्छितः । |
| शान्तोऽपि तदुपादानाद्यथा | दीपो न (ऽनु ?) दीप्यते ।। |
तद्वद्धातुबले क्षीणे ज्वरः क्षीणबलोऽपि सन्। निरुपादानदोषत्वान्मोक्षकाले विशेषतः ।।४८।।
हेतुशेषमशेषेण दहन् दर्शयते बलम्। सप्रतीकारवैशेष्यात् प्रशमं याति हन्ति वा ।।४९।।
उपर्युक्त प्रश्न का उत्तर—जिस प्रकार गति के अभाव में बाह्य वायु द्वारा आक्रान्त हुआ तथा बत्ती के क्षीण हो जाने से अनुगामी हुआ तथा स्नेह एवं वायु से मूर्च्छित होने के कारण शान्त हुआ भी दीपक अपने उपादान कारण के विद्यमान
विषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ] खिलस्थानम् ३४९
होने से प्रदीप्त (तेजी से जलना) होता है उसी प्रकार धातु एवं बल के क्षीण हो जाने पर ज्वर क्षीण बलवाला हो जाने पर भी उपादान दोषों के बचे होने से मोक्षकाल में विशेष कर बचे हुए दोष रूप हेतुओं को विशेषरूप से दहन करता (जलाता) हुआ अपने बलको प्रकट करता है। यह चिकित्सा की विशेषता के कारण शान्त हो जाता है अथवा रोगी को मार देता है अर्थात् यदि ठीक तरह से चिकित्सा हो जाय तो ज्वर शान्त हो जाता है अन्यथा रोगी समाप्त हो जाता है ॥४७-४९॥
पाकाद्वा शमनाद्वाऽपि शोधनाद्वा हृताधिके । स्वस्थानस्थे नरो दोषे शुद्धस्रोता विसृज्यते ॥५०॥
दोषों के पाचन, शमन अथवा शोधन के द्वारा अपने स्थान में स्थित दोषों के नष्ट हो जाने से शुद्ध स्रोतों वाला मनुष्य ज्वर से मुक्त हो जाता है ॥५०॥
निर्दिष्टो दोषपाकादेरस्माद्धेतुत्रयात् परम् । अन्यत्र चैव नान्योऽस्ति हेतुर्ज्वरविमोक्षणे ॥५१॥
ज्वर से मुक्त होने का इन दोषपाक आदि तीन कारणों के अतिरिक्त और कहीं कोई कारण नहीं होता है ॥५१॥
कस्माद्दोषपरिक्षोभे प्रायशः शीतपूर्वकम् । निर्वर्तते ज्वरो जन्तोः पश्चाद्दाहः प्रवर्तते ॥५२॥
दोषों के प्रकुपित होने पर मनुष्य को ज्वर में पहले ठण्ड तथा बाद में गर्मी क्यों लगती है ? ॥५२॥
वायुर्व्यवायी विशदः शीतो रूक्षश्चलः खरः । पित्तमाग्नेयमुष्णं च तीक्ष्णमल्पं लघु द्रवम् ॥५३॥
सौम्यः शीतो गुरुः स्निग्धो बलवान् कफको बहु । कफो मन्दव्यवायी च चिरोत्थाननिवर्तनः ॥५४॥
वायुश्च शीतसामान्यात् कफस्यानुबलो बली ।
बलवान् हि गुणः सौम्य आग्नेयो दुर्बलः स्मृतः ॥५५॥
हेतुनाऽनेन महता श्लेष्मा हि बलवत्तरः । तस्मात् पूर्वं ज्वरे शीतं पश्चाद्दाहः प्रवर्तते ॥५६॥
उपर्युक्त प्रश्न का उत्तर—वायु व्यवायी, विशद, शीत, रूक्ष, चल तथा खर होता है। पित्त आग्नेय, उष्ण, तीक्ष्ण, अल्प, लघु एवं द्रव होता है। कफ, सौम्य, शीत, गुरु, स्निग्ध, अत्यन्त बलवान् एवं मन्दव्यवायी होता है तथा इसकी उत्पत्ति एवं निवृत्ति दोनों देर से होते हैं अर्थात् श्लैष्मिक रोग उत्पन्न भी देर में होते हैं तथा समाप्त भी देर में होते हैं। शीत की समानता से वायु भी कफ के समान ही बलवाला होता है। सौम्यगुण बलवान् होते हैं तथा आग्नेय गुण दुर्बल माने गये हैं। इस उपर्युक्त महान् हेतु के कारण कफ अधिक बलवान् होता है। इसीलिये ज्वर में पहले शीत लगती है तथा बाद में दाह होता है। विषमज्वर (मलेरिया) का जब आक्रमण होता है तब पहले Cold stage ही होती है। पीछे Hot stage आती है। अर्थात् पहले ठण्ड लगती है पीछे गरमी। G. E. Beaumont की Medicine में कहा है—He feels cold all over and may vomit. After a Varying period of about 2 hours the skin becomes hot and flushed and the beadache is more intense. This phase persists for 2 or 3 hours and is then followed by sweating and marked relief from the discomforts.
स्ववेगपरिणामाच्च क्रियाभिश्च यदा कफः । उष्णाभिः प्रशमं याति तदा पित्तं प्रकुप्यति ॥५७॥
परीणामक्रियाभिर्वा शान्ते तस्मिन् सुखी भवेत् । हेतुरुक्तो महानेष यथावच्छीतपूर्वके ॥५८॥
अपने वेग के परिणाम तथा उष्ण क्रियाओं के द्वारा जब कफ शान्त हो जाता है तब पित्त प्रकुपित होता है। तथा उसके बाद परिणाम एवं क्रियाओं के द्वारा जब पित्त शान्त हो जाता है तब मनुष्य स्वस्थ हो जाता है। ज्वर में प्रारम्भ में ठण्ड लगने का यह महान् हेतु बतलाया गया है ॥५७-५८॥
३५० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विषमज्वरनिदंशीयाध्याय ? ]
अथ कस्माज्ज्वरो जन्तोर्जायते दाहपूर्वकः । स एव हेतुरत्रापि बलीयस्त्वादुदाहृतः ।।५९।।
अत्युदीर्णं यदा पित्तं वायुनाऽल्पेन मूर्च्छितम् ।
अनुबद्धं रसस्थाने श्लेष्मणाऽल्पबलेन च ।।६०।।
दाहः पूर्वं तदा जन्तोः शीतमन्ते प्रवर्तते । सोद्वेपकः सप्रलापस्मृतिबुद्धिप्रमोहनः ।।६१।।
प्रश्न—अब अगला प्रश्न यह है कि मनुष्य को दाहपूर्वक (जिसमें प्रारम्भ में दाह होती है) ज्वर क्यों होता है ?
उत्तर—यहां भी वही कारण है। बलवान् होने के कारण जब उदीर्ण हुआ पित्त अल्प वायु तथा अल्प बलवाले श्लेष्मा के द्वारा मूर्च्छित हुआ रस के स्थान आमाशय में स्थित हो जाता है तब रोगी को प्रारम्भ में दाह होता है तथा बाद में ठण्ड लगती है। इस ज्वर में रोगी को कंपकंपी, प्रलाप (Detirium) तथा स्मृति एवं बुद्धि का व्याघात हो जाता है ।।५९-६१।।
तावेतौ शीतदाहादी ज्वरौ संसर्गसंभवौ । असाध्यः कृच्छ्रसाध्यो वा दाहपूर्वो ज्वरस्तयोः ।।६२।।
इस प्रकार सर्दी एवं गर्मी वाले ये दोनों ज्वर संसर्ग से उत्पन्न होते हैं। इनमें दाह पूर्व (जिसमें प्रारम्भ में गर्मी लगती है) ज्वर असाध्य अथवा कृच्छ्रसाध्य होता है ।।६२।।
प्रत्यनीकगुणाः सन्तो दोषा वातादयः कथम् ।
संभूय कुर्वते रोगानान्योऽन्यं शमयन्ति च ।।६३।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २०० तमं पत्रम्।)
प्रश्न—ये वातादिदोष विरोधी गुण वाले होते हुए भी परस्पर मिलकर किस प्रकार रोगों को उत्पन्न करते हैं तथा विरोधी होने के कारण ये दोष परस्पर एक दूसरे को शान्त क्यों नहीं करते हैं ।।६३।।
स्वभावाददूषणाद्दोषा नान्योन्यशमनाः स्मृताः । यस्मात्तस्माद्बहुविधाः संसृष्टाः कुर्वते गदान् ।।६४।।
विरुद्धा गुणतोऽन्योन्यं कार्यं सत्त्वादयो यथा ।
उत्तर—क्योंकि स्वभाव से तथा दूषित होते के कारण ये दोष परस्पर एक दूसरे को शान्त नहीं करते हैं इसीलिये ये मिलकर अनेक प्रकार के रोगों को उत्पन्न करते हैं। जिस प्रकार गुणों में विरुद्ध होते हुए सत्त्व आदि गुण परस्पर मिल-कर कार्य करते हैं ।।६४।।
शिरः संतप्यते कस्माज्ज्वरितस्य विशेषतः ।।६५।।
सति सर्वाङ्गतापे च शैत्यं भवति पादयोः ।
प्रश्न—ज्वर के रोगी का विशेष कर सिर क्यों गरम रहता है तथा सम्पूर्ण शरीर गरम होने पर भी पैर ठण्डे क्यों होते हैं ।।
दोषैरावृतमार्गत्वादूर्ध्वगत्वाच्च तेजसः ।।६६।।
बाहुल्यादिन्द्रियाणां च शिरः संतप्यतेऽधिकम् । तेजसाऽतिप्रवृद्धेन सोमधातुः प्रपीडितः ।।६७।।
अधः प्रपद्यते तेन शैत्यं भवति पादयोः ।।
उत्तर—दोषों के द्वारा मार्गों के बन्द होने से, तेज के ऊर्ध्वगति का स्वभाव होने से तथा इन्द्रियों की बहुलता (अधिकता) के कारण सिर अधिक सन्तप्त (गरम) रहता है। तथा अत्यन्त बढ़ी हुई तेजधातु के कारण पीडित हुआ सोमधातु नीचे की ओर आता है इसलिये रोगी के पैर ठण्डे रहते हैं ।।६६-६७।।
विषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ] खिलस्थानम् ३५१
ज्वरोष्मणाऽभिसंतप्ते प्रागुष्णादिक्रियाविधिः ॥६८॥ क्रियते नेतरः कस्माच्छीत उष्णस्य बाधकः । यथाऽग्न्यगारे संतप्ते कपाटपुटसंवृते ॥६९॥ भवत्यत्यधिकस्तूष्मा सर्वतः परितापनः । स एवोद्घाटितद्वारे मन्दीभवति तत्क्षणात् ॥७०॥ एवमावृतमार्गेषु दोषैः स्रोतःसु देहिनाम् । ज्वरोष्मा वर्धते देहे यथाहेतुबलाश्रयम् ॥७१॥ उद्घाटनार्थं तत्तेषामुष्णोपक्रम इष्यते । स्तम्भनो हि गुणः शीत उष्णो विलयनः स्मृतः ॥७२॥
ज्वर की उष्णता के द्वारा संतप्त हुए रोगी में सर्वप्रथम उष्ण विधि करनी चाहिये, शीत नहीं। क्योंकि, शीतविधि उष्णता की बाधक होती है। जिस प्रकार संतप्त हुए तथा बन्द दरवाजों वाले अग्न्यागार (अग्निकोष्ठक) में चारों ओर से गरमी पहुंचाने वाली उष्णता अत्यधिक होती है, वही उष्णता अग्न्यागार के दरवाजे खोल देने पर उसी क्षण मन्द हो जाती है। उसी प्रकार रोगियों के शरीर में दोषों के द्वारा बन्द मार्ग वाले स्रोतों में हेतु एवं बल के आश्रय के अनुसार ज्वर की ऊष्मा वृद्धि को प्राप्त होती है। उन बन्द स्रोतों को खोलने के लिये उष्ण चिकित्सा अभिप्रेत है। शीत गुण दोषों का स्तम्भन करने वाला है तथा उष्ण गुण दोषों का विलयन करने (पिघलाने) वाला है ॥६८-७२॥
तस्मादुष्णाम्बु पानाय ज्वरिताय प्रदीयते । तेनास्य दोषाः पच्यन्ते कायाग्निश्चाभिदीप्यते ॥७३॥ ज्वरोष्मा मार्दवं याति विबन्धश्च प्रशाम्यति । तृष्णा निवर्तते चाशु प्रकाङ्क्षा चोपजायते ॥७४॥
इसलिये ज्वर रोग वाले व्यक्ति को पीने के लिये उष्ण जल देना चाहिये। इससे उसके दोषों का पाक हो जाता है तथा जाठराग्नि प्रदीप्त हो जाती है। ज्वर की उष्णता कम हो जाती है तथा विबन्ध (मलबन्ध) दूर हो जाता है। प्यास शीघ्र ही शान्त हो जाती है तथा भोजन में रुचि उत्पन्न हो जाती है। चरक वि. अ. ३ में भी कहा है-ज्वरितस्य कायसमुत्थानदेशकालानभिसमीक्ष्य पाचनार्थं पानीयमुष्णं प्रयच्छन्ति भिषजः, ज्वरो ह्यामाशयसमुत्थः, प्रायो भेषजानि चामाशयसमुत्थानां विकाराणां पाचनवमनापतर्पणसमर्थानि भवन्ति, पाचनार्थं च पानीयमुष्णं, तस्मादेतज्ज्वरितेभ्यः प्रयच्छन्ति भिषजो भूयिष्ठं, तद्धीयेषां पीतं वातमनुलोमयति, अग्निमुदर्यमुदीरयति, क्षिप्रं जरां गच्छति, श्लेष्माणं च परिशोषयति, स्वल्पमपि च पीतं तृष्णाप्रशमनायोपपद्यते ॥७३-७४॥
ऋते पित्तज्वरादुष्णो विधिः सर्वो ज्वरापहः । तत्राप्यनुष्णाशीतादिरुपचारो विधीयते ॥७५॥
पित्त ज्वर के अतिरिक्त सम्पूर्ण ज्वरों को नष्ट करने के लिये उष्ण विधि का प्रयोग करना चाहिये तथा पित्त ज्वर में भी ऐसा उपचार करना चाहिये जो न उष्ण हो और न शीत हो ॥
इति सप्त यथाप्रश्नं निर्दिष्टा विषमज्वराः । वक्ष्ये सततकादीनां चिकित्सां शृण्वतः परम् ॥७६॥
इस प्रकार प्रश्न के अनुसार सात विषम ज्वरों का निर्देश किया गया है। अब मैं सतत आदि विषय ज्वरों की चिकित्सा कहूँगा। उसे तू सुन ॥७६॥
उपक्रमैः परिक्लिष्टं क्षीणधातुबलौजसम् । ज्वरः पुराणो रूक्षत्वादनुबध्नाति देहिनम् ॥७७॥
चिकित्सा के द्वारा परिक्लिष्ट हुए तथा जिसके धातु, बल एवं ओज क्षीण हो गये हैं ऐसे व्यक्ति को रूक्ष होने के कारण पुराण ज्वर पकड़ लेता है ॥७७॥
तस्मादस्य बलाधाने प्रयतेत विचक्षणः । रम्यैर्विचित्रैराहारैर्हृद्यैः श्रद्धोपपादितैः ॥७८॥ सुराग्रपानैर्मांसानां वैष्किराणां च भक्षणैः । सर्पिषः पञ्चगव्यस्य पयसो लशुनस्य च ॥७९॥
४५ का.सं.
| ३५२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | विषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ] |
|---|
इसलिये बुद्धिमान् व्यक्ति रम्य, विचित्र, हृद्य (हृदय को अच्छे लगने वाले) तथा श्रद्धा (रुचि) उत्पन्न करने वाले आहारों, सुरापान, विष्किर जन्तुओं के मांस के भक्षण, पञ्चगव्य घृत, दूध तथा लशुन के द्वारा रोगी के बलाधान का प्रयत्न करे ॥
उपक्रमेच्चौषधानां प्रयोगैर्विषमज्वरम् । दैवतेज्योपहारैश्च धूपनाभ्यञ्जनाञ्जनैः ॥८०॥
इसके अतिरिक्त ओषधियों के प्रयोग, देवता तथा इज्या के उपहार, धूपन, मालिश, एवं अञ्जनों के द्वारा विषम ज्वर की चिकित्सा करनी चाहिये ॥८०॥
वातोत्तरं स्नेहपानैरभ्यङ्गैः सावगाहनैः । स्निग्धोष्णैरन्नपानैश्च बलिभिश्चाप्युपक्रमैः ॥८१॥
वातप्रधान विषमज्वर की स्नेहपान, अभ्यङ्ग (मालिश), अवगाहन (Tub baths), स्निग्ध एवं उष्ण अन्नपान तथा बलियों के द्वारा चिकित्सा करे ॥८१॥
पित्तोत्तरं तिक्तशीतैः शमनैः सविरेचनैः । पयसा सर्पिषा चैव शीतैश्चाभ्यञ्जनैर्जयेत् ॥८२॥
पित्त प्रधान विषमज्वर की तिक्त एवं शीतल शमन द्रव्य, विरेचन द्रव्य, दूध, घृत तथा शीतल अभ्यञ्जन (मालिशों) के द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये ॥८२॥
वमनैः पाचनीयैश्च लङ्घनैर्लघुभोजनैः । रूक्षोष्णैश्चाप्युपचरेत् कषायैश्च कफोत्तरम् ॥८३॥
कफ प्रधान ज्वर की वमन एवं पाचन द्रव्य, लङ्घन, लघुभोजन तथा रूक्ष एवं उष्ण कषायों के द्वारा चिकित्सा करे ॥
रोमहर्षोऽङ्गमर्दश्च वातपित्तोत्तरे ज्वरे । महाकल्याणकं सर्पिः पञ्चगव्यमथो पिबेत् ॥८४॥
पीत्वा वा महतीं मात्रां सर्पिषः पुनरुल्लिखेत् । तदहर्वा परेद्युर्वा पेयां समरिचां पिबेत् ॥८५॥
वात तथा पित्त प्रधान ज्वर में रोमहर्ष तथा अङ्गमर्द होता है। इसमें महाकल्याणक तथा पञ्चगव्य घृत पिलाना चाहिये। अथवा घृत की बड़ी मात्रा पिलाकर पुनः वमन कराना चाहिये। अथवा उसी दिन या अगले दिन मरिच युक्त पेया पिलानी चाहिये ॥८४-८५॥
राजमूलस्य वा क्वाथं पिबेत् प्रज्वरकं हविः । क्रितोयं ...... मयोगश्चतुर्थकमपोहति ॥८६॥
अथवा ज्वर की प्रबलता होने पर राजमूल का क्वाथ पिलाना चाहिये तथा यज्ञ में ...... आहुति देनी चाहिये इससे चतुर्थक ज्वर दूर हो जाता है ॥८६॥
धारोष्णं वा पयः पीत्वा तद्वमेदिच्छया न वा ।
शीतं वा मधुनाऽशीतं निम्बपत्रोदकं पिबेत् ॥८७॥
अथवा धारोष्ण दूध पीकर स्वयमेव इच्छा से या अनिच्छा से वमन कर देना चाहिये अथवा मधु के साथ शीत या उष्ण निम्बपत्रोदक (नीम के पत्तों का कषाय) पिलाना चाहिये ॥
सर्पिर्वा माहिषं पीत्वा हिङ्गुस्तोकसमन्वितम् । तस्मिन् विदग्ध एवान्नं दध्ना भुञ्जीत केवलम् ॥८८॥
अथवा भैंस के घृत में थोड़ी हींग मिलाकर पिलाना चाहिये तथा इसके विदग्ध हो जाने पर दही के साथ केवल अन्न का सेवन करना चाहिये ॥८८॥
नीलस्यन्दशिफा वाऽपि सुपिष्टा तण्डुलाम्बुना ।
देया ज्वरतिथौ नस्ये मृगराजस्य वा वसा ॥८९॥
विषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ] खिलस्थानम् ३५३
ज्वर के आने के दिन चावलों के पानी के साथ नील अपराजिता की मूल को अच्छी तरह पीसकर अथवा मृगराज की वसा (चर्बी) नस्य के रूप में देनी चाहिये ॥८९॥
हरीतकी वचा कुष्ठं निम्बपत्रं पलङ्कषा ।
सिद्धार्थका यवाः सर्पिर्धूपो जीर्णज्वरापहः ॥९०॥
हरीतकी, वच, कूट, नीम के पत्ते, गूगल, सफेद सरसों, जौ तथा घी-इनका धूप जीर्ण ज्वर को नष्ट करता है ॥९०॥
मूलानि सहदेवायाः कटुका रोहिणी वचा । तण्डुलोदकपिष्टोऽयं देहो दाहज्वरापहः ॥९१॥
सहदेवी की जड़, कुटकी, रोहिणी तथा बच-इन्हें तण्डुलोदक के साथ पीसकर देने से दाहज्वर नष्ट होता है ॥९१॥
सुरया सर्वगन्धैश्च तैलमभ्यञ्जनं पचेत् । सर्षपा लसुनं हिङ्गु त्रिव्योषं रोचना वचा ॥९२॥
ऋक्षपित्तं बस्तमूत्रं करञ्जस्य फलानि च । ग्रहज्वराभिभूतानां नस्यकर्माञ्जनं हितम् ॥९३॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २०१ तमं पत्रम् ।)
सुरा तथा सर्वगन्ध की ओषधियों के द्वारा अभ्यङ्ग के लिये तैल का पाक करना चाहिये तथा सरसों, लहसुन, हींग, त्रिकटु, गोरोचन, वच, रीछ का पित्त, बकरे का मूत्र तथा करञ्ज के फल-ग्रह ज्वर से पीडित रोगी में नस्यकर्म तथा अञ्जन के लिये हितकर होते हैं ॥९२-९३॥
सन्निपातविबन्धे च व्यालदष्टे च शस्यते । अर्शःसु योनिशूले च प्रलेपोऽयमनुत्तमः ॥९४॥
उपर्युक्त ओषधियों का ही लेप सन्निपात ज्वर, मलबन्ध, सर्पदंश, अर्श तथा योनि शूल में हितकर होता है ॥९४॥
भीषणैर्हर्षणैश्चैव विचित्राद्भुतदर्शनैः । व्याक्षेपं मनसश्चास्य भिषक्कुर्याज्ज्वरागमे ॥९५॥
ज्वर हो जाने पर चिकित्सक को भीषण (भयंकर) तथा हर्षकारक विचित्र एवं अद्भुत दर्शनों के द्वारा रोगी के मन का परिवर्तन करना चाहिये ॥९५॥
पानं चैतत् प्रदातव्यं स्निग्धस्विन्नस्य देहिनः । त्रिभण्डीमजगन्धां च नीलिनीं कटुरोहिणीम् ॥९६॥
कल्कं वा कटुरोहिण्याः पिबेन्मूत्रसंप्लुतम् । चिकित्सायां च यत् प्रोक्तं तच्च कुर्याद्विधानवित् ॥९७॥
तथा स्निग्ध एवं स्विन्न (जिसे स्नेहन एवं स्वेदन दिया गया हो) रोगी को त्रिभण्डी (त्रिवृत्), अजगन्धा, नीलिनी तथा कटुरोहिणी का क्वाथ पिलाना चाहिये । अथवा कटुरोहिणी का कल्क गोमूत्र के साथ मिलाकर पिलाना चाहिये । इसके अतिरिक्त विधान को जानने वाला वैद्य चिकित्सा में अन्य भी जो कुछ कहा है उसका प्रयोग करे ॥९६-९७॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
(इति) खिलेषु विषमज्वरनिर्देशीयो (नाम प्रथमोऽध्यायः) ॥
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।
(इति) खिलेषु विषमज्वरनिर्देशीयो (नाम प्रथमोऽध्यायः) ॥
| ३५४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | विशेषनिर्देशीयाध्यायः २ ] |
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विशेषनिर्देशीयो नाम द्वितीयोऽध्यायः ।
अथातो विशेषनिर्देशीयं नामाध्यायं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम विशेषनिर्देशीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।१-२।।
महर्षिं कश्यपं वृद्धं वेदवेदाङ्गपारगम् । सुखोपविष्टमव्यग्रमपृच्छद् वृद्धजीवकः ।।३।।
वेद वेदाङ्ग के पण्डित, ज्ञान में वृद्ध, व्यग्रता से रहित तथा सुखपूर्वक बैठे हुए महर्षि कश्यप से वृद्धजीवक ने प्रश्न किया ।।३।।
विषमाणां ज्वराणां ते सविकल्पं सविस्तरम् । यद्यथावच्च यावच्च प्रोक्तं वक्तव्यमादितः ।।४।।
पहले आपने विषम ज्वरों के विषय में जो भी तथा जितना भी वक्तव्य है वह विकल्प (भेद) एवं विस्तार सहित सब कह दिया है ।।४।।
सामान्येनापि सर्वेषां ज्वराणां विगतज्वर ! । वक्तुमर्हसि कार्त्स्न्येन परिशेषमतः परम् ।।५।।
हे विगतज्वर ! (जिसका ज्वर-सन्ताप नष्ट हो गया है) अब आप सामान्य रूप से सब ज्वरों के विषय में जो कुछ वक्तव्य है उसका विस्तारपूर्वक उपदेश करें ।।५।।
इति संचोदितः प्राह प्रजापतिरिदं वचः । समासाभिहितं यच्च (यच्च) नाभिहितं हितम् ।।६।।
ज्वरितानां ज्वराणां च भूयो वक्ष्यामि तच्छृणु । अवस्था लक्षणोद्देशविशेषोपक्रमे क्रमात् ।।७।।
इस प्रकार प्रश्न किया जाने पर प्रजापति कश्यप ने निम्न वचन कहा—ज्वरयुक्त व्यक्तियों तथा ज्वरों के विषय में पहले जो संक्षेप से कहा है तथा जो बिलकुल नहीं कहा है वह मैं क्रमशः अवस्था, लक्षण, उद्देश तथा विशेष उपक्रम के अनुसार अब पुनः कहूँगा। उसे तू सुन ।।६-७।।
भैषज्यमनवस्थायां पथ्यमप्यवचारितम् । गुणं न किञ्चित् कुरुते दोषायैव तु कल्पते ।।८।।
विपरीत अवस्था में प्रयुक्त की हुई ओषधि तथा पथ्य कुछ भी गुण नहीं करते हैं इसके विपरीत वे दोषों को ही करते हैं। वे ही अनुकूल अवस्थाओं में प्रयुक्त करने पर अमृत के समान गुणकारी होते हैं ।।८।।
प्रयुक्तं तदवस्थायाममृतत्वाय कल्पते । वाताद्वाह्यादभिघातात् क्रोधाच्छोकाद्भयात् क्षयात् ।।९।।
श्रमाद् ग्रहाभिषङ्गाच्च वेगानां च विधारणात् । समुत्पन्ने ज्वरे जन्तोर्वमनं न प्रयोजयेत् ।।१०।।
प्रयुक्तं कुरुते क्षिप्रं तीव्रं सोपद्रवं ज्वरम् ।
वायु, बाह्य आघात (चोट आदि), क्रोध, शोक, भय, क्षय, परिश्रम, ग्रहों के आक्रमण तथा वेगों के धारण करने से उत्पन्न हुए ज्वर में रोगी को वमन नहीं कराना चाहिये। उस अवस्था में प्रयुक्त कराया गया वमन शीघ्र ही तीव्र उपद्रवयुक्त ज्वर को उत्पन्न कर देता है ।।९-१०।।
पूरणात्तु समुत्पन्ने ज्वरे ह्यामात्रया श्रयेत् ।।११।।
दोषे वृद्धेऽतिमात्रा च समुत्क्लिष्टे तथैव च । सन्निपातज्वरभयात्त्वरितं वामयेद्भिषक् ।।१२।।
वामितं लङ्घनाद्येन क्रमेणोपक्रमेत्ततः ।
विषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ] खिलस्थानम् ३५५
संतर्पणजन्य ज्वर में अल्पमात्रा में वमन का प्रयोग करे। दोषों की वृद्धि तथा उत्क्लेश होने पर सन्निपात ज्वर का भय होने से रोगी को शीघ्र ही अधिक मात्रा में वमन कराना चाहिये। वमन कराने के बाद रोगी की लङ्घन आदि के क्रम से चिकित्सा करे। अष्टाङ्ग हृदय चि. अ. १ में कहा है—तत्रोत्क्लिष्टे समुत्क्लिष्टे कफप्रायेचले मले। सहल्लासप्रसेकान्नद्वषकासविषूचिके ।। सद्योभुक्तस्य सञ्जाते ज्वरे सामे विशेषतः। वमनं वमनार्हस्य शस्तम् ।।११-१२।।
वमनानन्तरं चास्य कुर्याच्छीर्षविरेचनम् ।।१३।।
तथाऽऽशु शिरसः शूलं गौरवं चोपशाम्यति । विबन्धश्चक्षुरादीनामरुचिश्च निवर्तते ।।१४।।
वमन के बाद उसे शिरोविरेचन (नस्य) देवे। इससे उसके सिर का शूल तथा भारीपन शीघ्र ही शान्त हो जाता है। तथा विबन्ध और चक्षु आदियों की अरुचि दूर हो जाती है ।।१३-१४।।
जीर्णज्वरेऽप्यथैतेषु विकारेषु प्रदापयेत् । बहुदोषे बलवती मध्यदोषेषु मध्यमा ।।१५।।
अल्पदोषे ज्वरे मृद्वी क्रिया कार्या विजानता।
जीर्ण ज्वर में भी इन विकारों के होने पर शिरोविरेचन देना चाहिये। बुद्धिमान् व्यक्ति को ज्वर में दोषों के अधिक होने पर बलवान्, दोषों के मध्य होने पर मध्यम तथा दोषों के अल्प होने पर मृदु क्रिया करनी चाहिये ।।१५।।
स्वानि रूपाणि कार्त्स्न्येन यदा व्याधौ विशेषतः ।।१६।।
तीव्राणि व्यथितत्वं च शरीरस्योपलक्षयेत् । बहुदोषं तदा विद्यादल्पदोषमतोऽन्यथा ।।१७।।
तथा मध्यबलेष्वेषु मध्यदोषं विभावयेत् ।
जब रोग में अपने २ सम्पूर्ण लक्षण तीव्र अवस्था में दिखाई दें तथा शरीर व्यथित मालूम पड़े तब दोष अधिक मात्रा में जानने चाहिये। इसके विपरीत दोष अल्प समझने चाहिये। जब रोगों का बल मध्यम हो तब दोष मध्यम समझने चाहिये ।।१६-१७।।
विबन्धारुचितृण्मूर्च्छा गात्रभेदः शिरोरुजा ।।१८।।
प्रलापालस्यहल्लासतन्द्रीदाहश्रमभ्रमाः । मूत्रप्रचुरता ग्लानिः पुरीषस्याविपक्वता ।।१९।।
उत्क्लेशो गुरुकोष्ठत्वं लिङ्गान्यामज्वरे वदेत् ।
आमज्वर के लक्षण—विबन्ध, अरुचि, तृष्णा, मूर्च्छा, गात्रभेद (शरीर का टूटना), शिर की पीडा, प्रलाप, आलस्य, हल्लास (जी मचलाना), तन्द्रा, दाह, श्रम (थकावट), भ्रम, मूत्र की अधिकता, ग्लानि, मल का अपक्व होना, उत्क्लेश (दोषों की ऊर्ध्वगति होना) तथा कोष्ठ का भारी होना—ये आमज्वर के लक्षण होते हैं। चरक चि.अ. ३ में कहा है—अरुचिश्चाविपाकश्च गुरुत्वमुदरस्य च । हृदयस्याविशुद्धिश्च तन्द्रा चालस्यमेव च ।। ज्वरोऽविसर्गी बलवान् दोषाणामप्रवर्तनम्। लालाप्रसेको हल्लासो क्षुन्नाशो विरसं मुखम् ।। स्तब्धसुप्तगुरुत्वं च गात्राणां बहुमूत्रता । न विड्जीर्णा न च ग्लानिर्ज्वरस्यामस्य लक्षणम् ।।
निवृत्तौ प्रायशश्चैषां संजाते ज्वरमार्दवे ।।२०।।
लघुत्वं चाप्तरात्रे च निरामज्वरमादिशेत् ।
निराम ज्वर के लक्षण—उपर्युक्त लक्षणों के प्रायः दूर हो जाने पर, ज्वर के मृदु हो जाने पर तथा आठ दिन में शरीर के लघु हो जाने पर निरामज्वर कहलाता है। चरक चि. अ. ३ में कहा है—क्षुत्क्षामता लघुत्वं च गात्राणां ज्वरमार्दवम् । दोषप्रवृत्ति ष्टाहो निरामज्वरलक्षणम् ।। अन्यत्र भी कहा है—सप्ताहेनैव पच्यन्ते सप्तधातुगता मलाः । निरामश्चाप्यतः प्रोक्तो ज्वरः प्रायोऽष्टमेऽहनि ।। यहां आठवां दिन उपलक्षण मात्र है—इससे पूर्व अथवा पश्चात् भी निरामता
३५६ कश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विषमज्वरनिदेशीयोऽध्याय ? ]
हो सकती है। इसी लिये कहा है—न च निःसप्ततैवैका निरामज्वरलक्षणम्। चिरादपि हि पच्यन्ते सन्निपातज्वरे मलाः ॥ सप्तरात्रातिवृद्धिंश्च ह्यामतादिस्वलक्षणम्। तस्मादेतद् द्वयं दृष्ट्वा निरामज्वरमादिशेत् ॥ यहां आठवां दिन इसी लिये कहा गया है कि इस समय ज्वर में मुख्य ओषधि दी जा सकती है। यदि आठवां दिन होने पर भी भूख लगना आदि लक्षण उपस्थित न हों तो मुख्य ओषधि न देकर पाचन ओषधि का ही प्रयोग करना चाहिये। यदि आठवां दिन भी हो तथा भूख आदि भी लगे तो शमन ओषधि देनी चाहिये। यदि दोषों का पाचन आठ दिन से पूर्व ही हो जाय तो मुख्य ओषधि उससे पूर्व भी दी जा सकती है। दोषों का पाचन ही मुख्य उद्देश्य है। आठवां दिन तो सामान्यरूप से कह दिया गया है। इसी लिये सुश्रुत में कहा है—अचिरज्वरितस्यापि देयं स्याद्दोषपाकतः ॥२०॥
आपातलक्ष्यः स्यादूष्मा तत्क्षणादेति मार्दवम् ॥२१॥
अन्तर्लघुत्वमुत्साहो दोषपक्तिः प्रसन्नता । तृष्णादीनां मृदुत्वं च बहिर्मार्गगते ज्वरे ॥२२॥
तत्राभ्यङ्गान् प्रदेहांश्च परिषेकांश्च कारयेत्।
बहिर्मार्गगत ज्वर के लक्षण—सर्वशरीरसंचारी एवं प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाली ऊष्मा उसी क्षण मृदु हो जाती है, शरीर के अन्तः अवयव लघु हो जाते हैं, शरीर में उत्साह होता है, दोष पक जाते हैं, शरीर प्रसन्न रहता है तथा तृष्णा आदि मृदु हो जाती है—ये बहिर्मार्गगत ज्वर के लक्षण हैं। बहिर्मार्गगत से बहिर्वेग ज्वर का अभिप्राय है। इसके लक्षण चरक चि. अ. ३ में निम्न दिये हैं—सन्तापोऽभ्यधिको बाह्यस्तृष्णादीनां च मार्दवम्। बहिर्वेगस्य लिङ्गानि सुखसाध्यत्वमेव च ॥ इस बहिर्मार्गगत ज्वर में अभ्यङ्ग, प्रदेह तथा परिषेक आदि करे ॥२१-२२॥
अविपक्वा विपक्वा वा दोषा यस्य न निर्हृताः ॥२३॥
न च व्याधेरुपशमो न चोत्साहो न लाघवम्।
ग्लानिकाश्यें न चात्यर्थं न च्छन्दोऽशनं प्रति ॥२४॥
अप्रकृष्टे (प्रकृष्टे) वा स काले दोषदुर्बलः । अतो विपर्ययाद्देही भवेद्दौषधदुर्बलः ॥२५॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २०२ तमं पत्रम्)
जिसके अविपक्व तथा पक्व दोषों का निर्हरण नहीं हुआ हो, व्याधि की शान्ति न हुई हो, शरीर में उत्साह तथा लघुता न हो, ग्लानि तथा कृशता बहुत अधिक न हो तथा भोजन के प्रति रुचि न हो-अधिक अथवा थोड़े समय में उस व्यक्ति को दोषों से दुर्बल हुआ समझा जाता है। इससे विपरीत रोगी को औषध के कारण दुर्बल हुआ समझना चाहिये ॥२३-२५॥
पाचनैरविपक्वानां दोषाणां दोषदुर्बले। सम्यक्कुर्यादुपशमं पक्वानां च विरेचनैः ॥२६॥
दोषों से दुर्बल हुए व्यक्ति में अपक्व दोषों को पाचक द्रव्यों तथा पक्व दोषों को विरेचनों के द्वारा शान्त करना चाहिये ॥२६॥
इतरस्यामयावेक्षं बलाप्यायनमिष्यते । समुदीर्णेषु सहसा दोषेष्वभिनवेषु च ॥२७॥
इनमें से दूसरे अर्थात् औषध से दुर्बल हुए व्यक्ति में सहसा उदीर्ण हुए तथा नवीन दोषों में बल की वृद्धि करनी चाहिये ॥२७॥
बलवद् दुर्बले वाऽपि कषायं वाऽपि भेषजम् । संरक्षन् धर्मयशसी न प्रयुञ्ज्यात् कदाचन ॥२८॥
धर्म तथा यश की रक्षा करते हुए व्यक्ति को दुर्बल रोगी में बलवान् कषाय अथवा अन्य ओषधि का कभी प्रयोग नहीं करना चाहिये। चरक चि. अ. ३ में कषाय निषेध में निम्न हेतु दिया है—स्तभ्यन्ते न विपच्यन्ते कुर्वन्ति विषमज्वरम्।
| विषमज्वरनिदर्शनीयाध्याय ? ] | खिलस्थानम् | ३५७ |
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दोषा बद्धाः कषायेण स्तम्भित्वात्तरुणे ज्वरे ।। अर्थात् कषाय रस प्रधान ओषधि नवज्वर में निषिद्ध है क्योंकि कषाय के स्तम्भक (Astringent) होने से दोष देह में स्तब्ध हो जाते हैं—उनका पाक नहीं हो पाता ॥२८॥
यथा शरत्सु महतोः क्रुद्धयोर्भिषक्तयोः। न धत्ते दुर्बला वेगं हस्तिनोरग्रवारणी ॥२९॥ तथा बलं बलवतोस्तद्दोषौषधयोर्द्वयोः। संक्षुब्धयोर्न सहते संतप्ता देहिनस्त¹तः ॥३०॥
जिस प्रकार शरद् ऋतु में मद से मस्त हुए महान् एवं क्रुद्ध हाथियों के वेग को दुर्बल हथिनी सहन नहीं कर सकती उसी प्रकार बलवान् तथा क्षुभित दोष और औषध दोनों के वेग को पीडित प्राणी सहन नहीं कर सकते हैं ॥२९-३०॥
पुष्णाति दुर्बलं दोषाः कषायः स्तम्भयत्यतः। भूयोऽभिवृद्धास्ते प्राणाञ्छिनन्त्याशु शरीरिणः ॥३१॥ कषायेणाकुलीभूताश्चिरं संक्लेशयन्ति वा।
दोष दुर्बल रोगी को पुष्ट करते हैं तथा कषाय उन दोषों का स्तम्भन करता है अर्थात् कषाय के द्वारा दोष शरीर में जड़वत् स्तब्ध हो जाते हैं। तथा फिर बढ़े हुए वे दोष शीघ्र ही मनुष्य के प्राणों को नष्ट कर देते हैं अथवा कषाय के द्वारा व्याकुल हुए दोष बहुत देर तक क्लेश पहुंचाते हैं। चरक में भी कहा है—न कषायं प्रयुञ्जीत नराणां तरुणे ज्वरे। कषायेणाकुलीभूता दोषा जेतुं सुदुष्कराः ॥३१॥
भग्नवेगेषु दोषेषु विधिना लङ्घनादिना ॥३२॥ काले प्रयुक्तं भेषज्यं स्याद्विकारोपशान्तये ।
दोषों का वेग नष्ट हो जाने पर लङ्घन आदि विधि के द्वारा उचितकाल में प्रयुक्त की हुई औषध विकारों को शान्त करती है ॥३२॥
लङ्घनं स्वेदनं पेया त्रिविधा दीपमान्विता। ओदनस्त्रिविधो यूषः कषायस्त्रिविधो रसः ॥३३॥ सर्पिरभ्यञ्जनं बस्तिः प्रदेहः सावगाहनः। ज्वरापहः समुद्दिष्टो लङ्घनादिरयं क्रमः ॥३४॥
लङ्घन आदि क्रम—लङ्घन, स्वेदन, तीन प्रकार की दीपन पेया, ओदन, तीन प्रकार का यूष, कषाय, तीन प्रकार का रस, घृत, अभ्यङ्ग, बस्ति, प्रदेह, अवगाहन—यह ज्वर को नष्ट करने वाला लङ्घन आदि क्रम कहा गया है ॥३३-३४॥
पच्यन्ते सप्तरात्रेण दोषाः सप्तसु धातुषु । तस्मात् कषायं सप्ताहे पाचनीयं विधापयेत् ॥३५॥ शमनं स्त्रंसनीयं वा यथावस्थमतः परम् ।
सात दिन में सातों धातुओं में स्थित दोषों का पाचन हो जाता है। इसलिये सात दिन के बाद अर्थात् आठवें दिन पाचन कषाय पिलाना चाहिये। पाचन से अभिप्राय अपक्व आहार, रस तथा दोषों के परिपाक से है। च. चि. अ. ३ में भी कहा है—प्राचनं शमनीयं वा कषायं पाययेत्तु तम्। ज्वरितं षडहेऽतीते लघ्वन्नप्रतिभोजितम् ॥ छठे दिन के व्यतीत हो जाने पर अर्थात् सातवें दिन जिसने लघु अन्न खाया हो उसे पाचन तथा शमनीय कषाय देना चाहिये। ज्वर की तरुणता नष्ट होने के बाद ही कषाय के देने का विधान है। यह तरुणता प्रायः ७ दिन होती है। यहां ज्वर के प्रारंभ होने के दिन का परिगणन न करते हुए ही कहा गया है इसी लिये सामान्य रूप से ही छठे दिन के व्यतीत होने पर कहा गया है। यदि ज्वर का प्रारंभ दिन गिना जाय तो सातवें दिन के व्यतीत होने पर अर्थात् आठवें दिन होगा। इसलिये इस संहिता
१. शरदि मदेन मिथो व्यतिषक्तयोः क्रुद्धयोर्हस्तिनोर्वेगं दुर्बला हस्तिनी न सहते तथैव बलवतोर्दोषौषधयोर्वेगं पीडिता देहिनः सोढुं न शक्नुवन्ति, तेन दोषवृद्धयवस्थायां दुर्बले रोगिणि प्रबलं कषायमपि न प्रयुञ्जीतेत्यर्थः ।
३५८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विषमज्वरनिर्दशीयाध्याय ? ]
तथा चरक के वचनों में परस्पर विरोध नहीं है केवल थोड़ा सा शब्दों का ही अन्तर है । इसी लिये कहा है—आसप्तरात्रं तरूणं ज्वरमाहुर्मनीषिणः । इसी लिये पहले इसी अध्याय में सात दिन के बाद दोषों के पक जाने पर ज्वर की निरामता बताते हुए भी आठवें दिन का परिगणन किया गया है—लघुत्वं चाष्टरात्रे च निरामज्वरमादिशेत् । इसलिये तरुण ज्वर में साधारणतया आठवें दिन ही कषायरूप मुख्य औषध का सेवन कराना चाहिये, इसके बाद अवस्थानुसार शमन तथा स्त्रंसन कषाय का प्रयोग करना चाहिये ॥३५॥
मन्दोष्मत्वात् स्थिरत्वाच्च गुरुत्वाच्च कफज्वरः ।। ३६ ।। परिपाकं चिरादेति तस्मादस्यौषधक्रमः । अष्टाहात् परतो वाऽपि यथापाकं विधीयते ।। ३७ ।।
ऊष्मा (उष्णता) के कम होने से, स्थिर होने से तथा गुरु होने से कफ ज्वर का देर में पाक होता है अतः पाक के अनुसार आठवें दिन के बाद उसके कषाय रूप मुख्य ओषधि का क्रम प्रारंभ किया जाता है ॥३६-३७॥
पक्वावशेषस्तेनाशु पच्यतेऽग्निश्च दीप्यते । दोषपक्त्याऽग्निदीप्त्या च ज्वरस्यापचयो ध्रुवम् ।। ३८ ।।
इससे पचने से बचे हुए दोषों का शीघ्र ही पाक हो जाता है तथा जाठराग्नि प्रदीप्त होती है । इसी प्रकार दोषों के पाक तथा अग्नि के प्रदीप्त होने से ज्वर निश्चित रूप से शान्त हो जाता है ॥३८॥
तद्युक्तस्नेहसंस्कारान् रसानत्रावचारयेत् । ततः संशमनं कुर्याद्व्याधिशेषोपशान्तये ।। ३९ ।।
फिर बचे हुए रोग की शान्ति के लिये उचित स्नेह के संस्कारों से युक्त रसों का प्रयोग करे तथा उसके बाद दोषों का शमन करे ॥३९॥
प्रसादनार्थं धातूनां बलस्याप्यायनाय च । देशदोषाग्निसात्म्यर्तुयुक्तं चात्र प्रशोषणम् ।। ४० ।। त्र्यहं चतुरहं वाऽपि नातिमात्रमतः परम् । रूक्षत्वाज्ज्वर्यमाणाय देयं सर्पिर्ज्वरापहम् ।। ४१ ।। ज्वरितोऽनेन निर्वाति प्रदीप्तं चाम्बुना गृहम् ।
धातुओं के प्रसाद तथा बल की प्राप्ति के लिये देश, दोष, जाठराग्नि, सात्म्य तथा ऋतु के अनुसार तीन या चार दिन दोषों का शोषण करना चाहिये, इससे अधिक नहीं । तथा इसके बाद रूक्ष होने के कारण ज्वर रोगी को स्वल्प मात्रा में ज्वरनाशक घृत का प्रयोग कराना चाहिये । जिस प्रकार जलता हुआ घर जल के द्वारा बुझ जाता है उसी प्रकार ज्वर का रोगी घृत के प्रयोग से शान्ति को प्राप्त करता है । चरक चि. अ. ३ में घृतपान का निम्न अवस्था में प्रयोग करने का विधान दिया है—अत ऊर्ध्वं कफे मन्दे वातपित्तोत्तरे ज्वरे । परिपक्वेषु दोषेषु सर्पिष्पानं यथाऽमृतम् ॥ अर्थात् दोषों के पूर्णतया पक जाने पर घृत का पान कराना चाहिये ॥४०-४१॥
सर्पिः पित्तं शमयति शैत्यात् स्नेहाच्च मारुतम् ।। ४२ ।। समानगुणमप्येतत् संस्काराज्जीयते कफम् ।
शीतल गुण वाला होने के कारण घृत पित्ता का तथा स्निग्ध होने के कारण वायु का शमन करता है । तथा समान गुण वाला होते हुए भी यह संस्कार के द्वारा कफ को शान्त करता है । चरक नि. अ. १ में भी कहा है—जीर्णज्वरेषु तु सर्वेष्वेव सर्पिषः पानं प्रशस्यते यथास्वौषधसिद्धस्य, सर्पिर्हि स्नेहाद्वातं शमयति संस्कारात्कफं, शैत्यात्पित्तमूष्माणं च । स्नेहाद्वातं शमयति शैत्यात्पित्तं नियच्छति । घृतं तुल्यगुणं दोषं संस्कारात्तु जयेत्कफम् ॥४२॥
अथ चेद्बहुदोषत्वात् कृतेऽपि शमने सति ।। ४३ ।। पक्वाशयगुरुत्वं च स्तिमितत्वं च लक्ष्यते । स्वेदो विण्मूत्ररागश्च भक्तस्यानभिनन्दनम् ।। ४४ ।। स्निग्धाय क्षामदेहाय दद्यात्तत्र विरेचनम् ।