काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 698, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३३८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | संहिताकल्प: ? ] |
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सन्निपात में अपथ्य—इसमें औदक तथा आनूप मांस, उड़द की पिट्ठी तथा तिलों के प्रयोग, मन्दजात (जो ठीक तरह से बनी नहीं है), गुरु तथा नवीन मद्य, खीर, खिचड़ी, चुक्र (सिरका), जलेबियां, जौ के योग, दही तथा अत्यन्त स्वादु भोजन आदि का (अधिक स्वादु भोजन होने से जिह्वालौल्य वश अधिक खा जाता है) तथा घुड़सवारी एवं व्यायाम के क्लेश, शीतल जल, मदिरा एवं आसव, ओस (ओस में सोना या घूमना आदि), सामने की हवा तथा उष्ण पदार्थों के प्रयोग का त्याग कर देना चाहिये।
यानि तस्य प्रशस्यन्ते श्रद्धाभोज्यानि जीवक ! ।
पथ्यानि चान्नपानानि यथास्वं तानि मे शृणु ।।
हे जीवक ! इसके लिये जो २ श्रद्धा उत्पन्न करने वाले भोजन तथा पथ्यकारक अन्न-पान प्रशंसित माने गये हैं उनको यथाक्रम तू मेरे से सुन ।।
गुडसर्पिषि पिप्पल्यः संस्कृता दधिसाधिताः । तथा मुख्यं गुडकृतं भक्ष्या मुद्गमयाश्च ये ।।
यवगोधूमसंस्कारा दाधिकं शुष्कमूलकम् । मुद्गामलकयूषश्च तिक्तसूपश्च सर्पिषा ।।
एवं श्रद्धाविनयनं भिषक्कुर्यादरोचके । अप्रमादेन धर्मार्थी चिकित्सेन्मतिमान् भिषक् ।।
सन्निपात में पथ्य—गुड तथा घृत के साथ संस्कृत की हुई तथा दही में सिद्ध की हुई पिप्पली, मुख्य २ गुड के विकार या प्रयोग, मूंग के बने हुए भक्ष्य पदार्थ, जौ तथा गेहूं के संस्कार अर्थात् उनके बने हुए पदार्थ, दही के बने हुए पदार्थ, सूखी मूली, मूंग तथा आंवले का यूष (Juice), घृत मिला हुआ तिक्त पदार्थों का यूष आदि—इसके लिये पथ्य हैं। इस प्रकार अरुचि होने पर उपर्युक्त पदार्थों के द्वारा रोगी की भोजन में रुचि उत्पन्न करनी चाहिये । तथा धर्म की इच्छा करनेवाले एवं बुद्धिमान् चिकित्सक को इस रोगी की प्रमादरहित होकर चिकित्सा करनी चाहिये ।।
सूतिकोपक्रमाध्याये यच्च वक्ष्ये खिले मुने ! । तदिहापि प्रयोक्तव्यं सन्निपातचिकित्सितम् ।।
हे मुनि ! इसके अतिरिक्त खिलस्थान में सूतिका-सम्बन्धी चिकित्सा के अध्याय में जो विधान कहा जायगा, उस सबका यहां सन्निपात चिकित्सा में भी प्रयोग करना चाहिये ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
इति (कल्पस्थाने) विशेषकल्पः ।
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।
इति (कल्पस्थाने) विशेषकल्पः ।
संहिताकल्पाध्यायः ।
अथातः संहिताकल्पं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम संहिता कल्प का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।१-२।।