काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 697, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंविशेषकल्प: ? ] कल्पस्थानम् ३३७
सन्निपात ज्वर से छुटकारा पाने के बाद रोगी बहुत देर में पुष्ट होता है। उसे देखकर (ध्यानपूर्वक) भोजन कराना चाहिये क्योंकि वह उसका पुनर्जन्म होता है। अर्थात् सन्निपात ज्वर के बाद यह समझा जाता है कि मृत्यु के मुख से वापिस आया है। अतः उसका पुनर्जन्म हुआ समझना चाहिये॥
तदवस्थो व्यभिचरेद्यदि रोगानवाप्नुते। ज्वरशोषारुचिप्लीहयक्ष्मपाण्डून्न जीवति ।।
इस अवस्था में रोगी यदि इस भोजन क्रम का उल्लंघन करे अर्थात् भोजन व्यवस्था का ठीक प्रकार पालन न करे तो उसे ज्वर, शोष, अरुचि, प्लीहावृद्धि, यक्ष्मा तथा पाण्डु आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं॥
सर्वलक्षणसंपन्नः सर्वोपद्रवसंयुतः। त्रिरात्रोपेक्षितश्चापि सन्निपातो न सिद्ध्यति ।।
सब लक्षणों एवं सब उपद्रवों से युक्त सन्निपात रोग की यदि तीन दिन भी उपेक्षा की जाय तो फिर वह ठीक नहीं होता॥
सन्निपाते निवृत्ते तु यो व्याधिरवलम्बते। सोपद्रवाँस्ताँश्चिकित्सेद्यथास्वैः स्वैश्चिकित्सितैः ।।
सन्निपात रोग के अच्छा हो जाने के बाद पीछे से जो रोग हो जाते हैं उन्हें उपद्रव कहते हैं। इन उपद्रवों की अपनी २ चिकित्सा के अनुसार चिकित्सा करनी चाहिये।
एकाहारब्रह्मचर्यलघुपानारन्नसेवनम्। अकर्मण्यमनायासः सुखशय्यासनस्थितिः ।।
दिवाजागरणं सद्भिः सुहृद्भिश्च सहासनम्। अभ्यङ्गाच्छादने चित्रं कदाचित् स्नेहमेव तु ।।
जाङ्गलाँश्च रसानुष्णान् कुलत्थरससाधितान्। वास्तुकं तण्डुलीयं च संस्कृतं बालमूलकम् ।।
सेवेत विधिवच्चैव द्वौ मासौ जीवितार्थिकः। त्रीन्मासाँश्चतुरो वाऽपि जिहात्वादस्य यक्ष्मणः ।।
सन्निपात रोग के बाद रोगी को दिन में एक समय भोजन करना चाहिये, ब्रह्मचर्यपूर्वक रहना चाहिये, तथा लघु अन्न-पान का सेवन करना चाहिये। उसे सहसा अधिक कार्य नहीं करना चाहिये, उसे सुखपूर्वक सोना तथा बैठना चाहिये। दिन में नहीं सोना चाहिये, सज्जन मित्रों के साथ बैठना चाहिये। नाना प्रकार के अभ्यङ्ग एवं आच्छादन का प्रयोग करना चाहिये। तथा कभी २ स्नेह का सेवन करना चाहिये। कुलथी के रस से सिद्ध किये हुए तथा उष्ण जांगल मांसरसों का प्रयोग करना चाहिये। बथुआ, चौलाई तथा संस्कार की हुई कच्ची मूली का सेवन करना चाहिये। इस प्रकार इस रोग के अत्यन्त कुटिल होने से जीवन को चाहने वाले रोगी को उपर्युक्त आहार-विहार का विधिपूर्वक दो, तीन अथवा चार मास तक सेवन करना चाहिये॥
सुशृतेन समश्नीयात् पयसाऽऽज्येन पैत्तिकः। शर्कराक्षौद्रयुक्तेन गवां क्षीरेण वा पुनः ।।
यदि पित्त की अधिकता हो तो रोगी के द्वारा अच्छी प्रकार सिद्ध किये हुए दूध का सेवन करना चाहिये। अथवा शुद्ध गाय का दूध खाण्ड तथा मधुमिश्रित करके सेवन करना चाहिये॥
कर्पूरचूर्णं तृष्णायां वदने धारयेत् सदा। तैलानि गन्धपुष्पाणि नित्यं मुख्यानि धारयेत् ।।
यदि रोगी को प्यास लगती हो तो मुख में सदा कर्पूर चूर्ण रखना चाहिये तथा नित्य तेल और गन्धयुक्त फूलों का धारण करना चाहिये॥
औदकानूपमांसानि माषपिष्टतिलोत्कृतम्। मन्दजातानि मद्यानि गुरूरायभिनवानि वा ।।
पायसं कृसरं चुक्रं शष्कुल्यो यावकं दधि। वर्जयेत्तानि सर्वाणि श्रद्धाभोजनमेव च ।।
अश्वव्यायामसंक्लेशं शीताम्बु मदिरासवम्। अवश्यायं पुरोवातमभ्युष्णं च विवर्जयेत् ।।