भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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३३६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विशेषकल्पः ? ]

कटुसर्पि—यव (जौ), कोल (बेर), कुलथी, दोनों (लघु एवं बृहत्) पञ्चमूल तथा त्रिफला के क्वाथ में धीर व्यक्ति घृत का पाक करे। इसमें नागरमोथा, पाठा, वच, सोंठ, रोहिणी (कटुकी), चव्य, चित्रक, काकड़ाशृंगी, दुरालभा, सहिजना, चिरायता, हरिद्रा, दारुहरिद्रा, तेंजोवती (तेजबल), सोमवल्क (श्वेतखदिर), सप्तपर्ण, केबुक (कन्दशाक-फूलगोभी-Cabbage), वयस्था (हरड़), पिप्पलीमूल, पिप्पली, गजपिप्पली, छिन्नरुहा (गिलोय), अतीस, तेजपत्र, नीम, पटोल, (परवल), कण्डोपपुष्पी (?), गाजवा, अमलतास की फलियां, तुम्बुरु (धनिया), पुष्करमूल, मैनफल तथा आक की जड़—इनका अच्छी प्रकार पीसकर तथा उचित मात्रा में कल्क लेकर और इसमें सर्जक्षार, पांचों नमक तथा हींग की उचित मात्रा डालकर यथाविधि सिद्ध किया हुआ घृत कटुसर्पि कहलाता है। सन्निपात ज्वर से पीड़ित रोगी में मात्रा एवं काल के अनुसार इस घृत का प्रयोग कराना चाहिये॥

लीनदोषावशेषं च विषमज्वरपीडितम् ।।
हद्रोगं ग्रहणीदोषं वातगुल्मं प्लीहोदरम् । श्वासं कासं च शमयेद्वलमग्नेश्च दीपयेत् ।।

इसके सेवन से विषमज्वर से पीड़ित रोगी के लीन एवं अवशिष्ट दोष, हृद्रोग, ग्रहणी दोष, वातगुल्म, प्लीहोदर, श्वास तथा कास आदि शान्त होते हैं तथा जाठराग्नि प्रदीप्त होती है॥

सन्निपातेषु भूयिष्ठं निवृत्तोपद्रवेष्वपि । श्लेष्मा च पार्श्वशूलं च निवर्तेत समग्रतः ।।

सन्निपात रोगों में पुनः उपद्रवों को शान्त हो जाने के बाद भी इसका सेवन करने से श्लेष्मा तथा पार्श्वशूल शान्त हो जाते हैं॥

तस्याग्निं चिरकारित्वाद्विषक् संदीपयेत् पुनः ।

बहुत देर हो जाने के बाद भी वैद्य को चाहिये कि उस सन्निपात के रोगी की जाठराग्नि को प्रदीप्त करे॥

न चातिविश्वसेद्वैद्यो जितो व्याधिर्मयेति ह ।।
कृशे विरुद्धसेवित्वाच्चिराद्दोषः प्रकुप्यति । व्यावृत्तश्च पुनर्हन्ति सन्निपातो यथा विषम् ।।

वैद्य पूर्ण रूप से विश्वास न कर ले कि मैंने रोग को जीत लिया है क्योंकि कृश व्यक्ति में विरुद्ध आहार आदि के सेवन से कुछ देर के बाद भी दोष पुनः प्रकुपित हो जाता है। इस प्रकार दोबारा हुआ (Relapsed) सन्निपात विष के समान रोगी को मार देता है।

वक्तव्य—ज्वर आदि में (Relapse) प्रायः भोजन के दोष से ही होता है। अधिक अथवा विषम भोजन से इसके होने की अधिक संभावना रहती है। (G. E. Beaumont) की (Medicine) में भी कहा है—‘Relapses are more commen after a high caloric diet has been given’

सन्निपातात् समुत्तीर्णो यदि जीवति मानवः । क्षीणौजोबलमांसात्मा शीर्णश्मश्रुशिरोरुहः ।।
स्वरस्मृतिपरिभ्रष्टः क्षीणशुक्रो हतेन्द्रियः । अव्यक्तवाग्विवर्णश्च मन्दाग्निश्च भवत्यसौ ।।

सन्निपात ज्वर से पार हुआ या बचा हुआ रोगी यदि किसी प्रकार जीवित रहता भी है तो उसके ओज, बल, मांस एवं आत्मा क्षीण हो जाती है, दाढ़ी-मूँछ तथा सिर के बाल झड़ने लगते हैं, उसका स्वर तथा स्मृति शक्ति कमजोर हो जाती है, वीर्य क्षीण हो जाता है, सब इन्द्रियों की शक्ति नष्ट हो जाती है, उसकी वाणी एवं वर्ण अस्पष्ट हो जाता है तथा उसकी अग्नि मन्द हो जाती है॥

सन्निपातेन मुक्तस्तु चिरादाप्यायते नरः । दृष्ट्वा संभोजनीयश्च पुनर्जन्म हि तस्य तत् ।।