काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविशेषकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३३५
ज्वर को शान्त करता है। इसके प्रयोग से जडता, शोथ, आध्मान, गुरुता, मन्यास्तम्भ, उरोघात (उरःक्षत), उदरशूल, पार्श्वशूल एवं शिरःशूल आदि नष्ट होते हैं॥
उपनाहैः सलवणैर्भ्युष्णैरुपनाहयेत् ।।
चिरकालोपवासस्य नस्योष्णाकवलग्रहैः । हृदयं क्ष१ण्यते जन्तोः पार्श्वकण्ठौष्ठतालु च ।।
क्षतोरस्को घनं श्लेष्म सरक्तं ष्ठीवते ततः । ष्ट्यूते चायम्यते मूर्च्छास्तेन जन्तुर्विगच्छति ।।
दह्यते जठरं चास्य किञ्चिच्च परिकूजति । निद्रायते च पीत्वाऽऽशु जीर्णे जागर्ति चोदके ।।
उपर्युक्त रोग यदि चिरकालीन हों तो लवणयुक्त उष्ण उपनाहों (पुलटिसों) के द्वारा इसका उपनाह (स्वेदन) करना चाहिये। इसके विपरीत नस्य तथा उष्ण कवल ग्रहों के प्रयोग से रोगी का हृदय, पार्श्व, कण्ठ, ओष्ठ एवं तालु क्षतयुक्त हो जाते हैं। उसे उरःक्षत हो जाता है तथा उसके थूक के साथ रक्तयुक्त गाढ़ी श्लेष्मा निकलती है। रोगी बार २ थूकता है, वह थक जाता है तथा मूर्च्छित हो जाता है। रोगी के उदर में दाह होता हैं तथा कुछ गुड़गुड़ शब्द होते रहते हैं। इस कषाय के पीने के बाद रोगी को शीघ्र ही नींद आ जाती है तथा फिर कषाय के जीर्ण होने पर रोगी जागता है।।
लङ्घनोष्णोपचाराद्वा व्याधौ पित्तोत्तरे नृणाम् । तीक्ष्णौषधप्रयोगाच्च पित्तमस्य प्रकुप्यति ।।
पित्त प्रधान रोगों में लंघन, उष्णोपचार एवं तीक्ष्ण ओषधियों के प्रयोग से रोगी का पित्त प्रकुपित हो जाता है ।।
पित्तोत्तरं सन्निपातमेभिर्ज्ञात्वा तु कारणैः । मुस्तादिक्कथितं तोयं शीतं समधुशर्करम् ।।
पाययेदातुरं काले तेन शर्म लभेत सः । विस्रंस्यतेऽल्पमपि चेत्तेनैवाशु सुखी भवेत् ।।
उपर्युक्त कारणों (हेतुओं) के द्वारा पित्तप्रधान सन्निपात को जानकर रोगी यथासमय मुस्तादि क्वाथ को ठण्डा करके उसमें मधु एवं शर्करा मिलाकर पिलाना चाहिये। इससे रोगी को शान्ति मिलती है। यदि इससे रोगी को थोड़ा भी विरेचन हो जाय तो उसे शीघ्र ही शान्ति मिल जाती है ।।
त्रिफला पिप्पली श्यामा केसरं शर्करा त्रिवृत् । सक्षौद्रो मोदको ह्येष पित्तोत्तरमपोहति ।।
त्रिफला, पिप्पली, श्यामा (काली त्रिवृत्), नागकेशर, शर्करा तथा अरुण त्रिवृत् के मधु के साथ मोदक (लड्डू) बनाकर प्रयोग करने से पैत्तिक रोग नष्ट हो जाते हैं ।।
यवकोलकुलत्थानां पञ्चमूलद्वयस्य च । त्रिफलायाश्च निष्क्वाथे सर्पिर्धीरो विपाचयेत् ।।
संह२त्य कल्कानेतांश्च सुपिष्टान् भागकल्पितान् ।
मुस्ता पाठा वचा शुण्ठी रोहिणी चव्यचित्रकौ ।।
शृङ्गी दुरालभा शिग्रुः कैरातो रजनीद्वयम् । तेजोवती सोमवल्कः सप्तपर्णः सकेबुकः ।।
वयस्था पिप्पलीमूलं पिप्पली गजपिप्पली । छिन्नरुहा चातिविषा पत्रं निम्बपटोलयोः ।।
कण्डोपपुष्पी गोडिह्वा नक्तमालफलानि च । तुम्बुरुं पौष्करं मूलं मूलं च मदनार्कयोः ।।
क्षाराः सपञ्चलवणा हिङ्गुमात्रासमन्वितम् ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १९६ तमं पत्रम्।)
सिद्धमेतैर्यथान्यायं सर्पिः कटुकसंज्ञितम् ।।
पाययेन्मात्रया काले सन्निपातज्वरार्दितम् ।
१. क्षतयुक्तं भवतीत्यर्थः।
२. समाहृत्य एकीकृत्येति यावत्।
४४ का.सं.