काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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सुखोष्णं वा भृशोष्णं वा दृष्ट्वा दोषबलाबलम् । पार्वत्याः पञ्चमूल्या वा शृतं तोयं सदीपनम् ।।
महानिम्ब अथवा पञ्चमूल द्वारा सिद्ध एवं दीपन जल का दोष और बल के अनुसार हल्के अथवा अधिक गरम रूप में प्रयोग करना चाहिये ।।
समुस्तकं पर्पटकम्थवा सदुरालभम् । पेयं पित्तोत्तरे व्याधौ कोष्णं सर्वं च शस्यते ।।
सम्पूर्ण पित्त प्रधान रोगों में नागरमोथा, पित्तपापड़ा अथवा दुरालभा का ईषदुष्ण कषाय पीना चाहिये ।।
पिप्पल्यादिर्वचादारुवयस्थासर(ला)न्वितः । पेयंः कफोत्तरे सामे सहिङ्गुक्षारसैन्धवः ।। दोषास्तेनाशु पच्यन्ते विबन्धश्चोपशाम्यति ।
आमयुक्त कफ प्रधान रोग में पिप्पल्यादि गण, वचा, देवदारु, वयस्था (गिलोय) तथा सरल (चीड़) के कषाय में हींग, क्षार तथा सेन्धा नमक मिलाकर देना चाहिये। इससे शीघ्र ही दोषों का पाक हो जाता है तथा मलबन्ध की शान्ति हो जाती है ।।
अभया कट्फलं भार्गी भूतीकं देवदारु च ।। वचा पर्पटकं मुस्तं धान्यकं विश्वभेषजम् । सहिङ्गमाक्षिकः पेयो व्याधौ वातकफोत्तरे ।।
वात तथा कफ प्रधान रोग में अभया (हरड़), कायफल, भारङ्गी, भूतीक (कत्तृण), देवदारु, वचा, पित्तपापड़ा, नागरमोथा, धनिया तथा सोंठ का कषाय हींग एवं मधु मिलाकर पिलाना चाहिये ।।
दुरालभा वचा दारु पिप्पली भद्ररोहिणी । महौषधं कर्कटकी बृहती कण्टकारिका ।। क्वाथः सलवणः पेयः सन्निपातज्वरापहः ।
सन्निपात ज्वर को नष्ट करने के लिये दुरालभा, वच, देवदारु, पिप्पली, भद्ररोहिणी, सोंठ, कर्कटकी (काकड़ाशृंगी), बृहती (बड़ी कटेरी) तथा कण्टकारी (रींगणी) के क्वाथ में लवण मिलाकर पीना चाहिये ।।
त्रिफला रोहिणी निम्बं पटोलं कटुकत्रयम् ।। पाठा गुडूची वेत्राग्रं सप्तपर्णं सवत्सकम् । किराततिक्तकं मुस्ता वचा चेत्येकतः शृतम् ।। कफोत्तरं निहन्येतत् पानादग्निं च दीपयेत् ।
त्रिफला, रोहिणी (कटुरोहिणी-कटुकी), नीम, पटोल, त्रिकटु (सोंठ, मरिच, पीपल), पाठा, गिलोय, बेंत का अग्रभाग, सप्तवर्ण, कुटज, चिरायता, नागरमोथा तथा बच आदि एक २ का क्वाथ पीने से कफ प्रधान व्याधि नष्ट होती है तथा जाठराग्नि प्रदीप्त होती है ।।
आरग्वधवचानिम्बपटोलोशीरत्सकम् ।। शार्ङ्गेष्टाऽतिविषा मूर्वा त्रिफला सदुरालभा । भद्रमुस्ता बला पाठा मधुकं भद्ररोहिणी ।। कषाय एष शमयेज्ज्वरमाशु त्रिदोषजम् । जाड्यं सशोफमाध्मानं गुरुत्वं चापकर्षति ।। मन्यास्तम्भमुरोघातमुरःपार्श्वशिरोरुजः ।
अमलतास, बच, नीम, परवल, खस, कुटज, शार्ङ्गेष्टा (काकजंघा अथवा काकमाची), अतीस, मरोड़फली, त्रिफला, दुरालभा, भद्रमुस्ता (मोथे का भेद), बला, पाठा, मुलहठी, भद्ररोहिणी-इनका कषाय शीघ्र ही त्रिदोषज (सन्निपात)