भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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विशेषकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३३३

कफ प्रधान रोग में कुलथी के क्वाथ में खरगोश के मांस द्वारा सिद्ध किये हुये कच्ची मूली के क्वाथ में त्रिकटु तथा थोड़ा सा स्नेह मिलाकर प्रयोग कराना चाहिये ।।

जातप्राणं तु दृष्ट्वैनमीषद्रोगावलम्बितम् ।।
विस्रंसनेन मृदुनाऽ भोज्य स्निग्धं विरेचयेत् । दोषशेषं तु तद्ध्वस्य विरिक्तस्योपशाम्यति ।।

इस प्रकार रोगी को जातप्राण (लब्धबल) जानकर रोग के अल्पमात्रा में शेष रहने पर विस्रंसन (विरेचन) एवं मृदु भोजन के द्वारा स्निग्ध विरेचन कराये। विरेचन होने के बाद इसके बचे हुए दोष भी शान्त हो जाते हैं ।।

इति क्रमः समुद्दिष्टः कषायानपि मे शृणु।

इस प्रकार सन्निपात रोगी के लिये यह भोजन का क्रम कहा गया है। अब तू मेरे से सन्निपात रोग के लिये कषायों को सुन ।।

पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरम् ।।
दीपनीयः स्मृतो वर्गः कफानिलगदापहः । रोचनो दीपनो हृद्यो लघुः सांग्राहिकः परः ।।

पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक तथा सोंठ—यह कफ तथा वात रोगों को नष्ट करने के लिये दीपनीय वर्ग कहा है। यह रुचिकारक, दीपक, हृद्य, लघु, एवं अत्यन्त संग्राहक होता है ।।

शटीपौष्करपिप्पल्यो बृहती कण्टकारिका । शुण्ठी कर्कटकी भार्गी दुरालम्भा यवानिका ।।
शूलानाहविबन्धघ्नं शट्याद्यं कफवातनुत् ।

शटी (कपूरकचरी), पुष्करमूल, पिप्पली, बृहती (बड़ी कटेरी), कण्टकारिका (कटेरी-रींगणी), सोंठ, काकड़ाशृंगी, भारंगी, दुरालभा, यवानिका (अजवायन)—यह शठ्यादि वर्ग शूल, आनाह, विबन्ध तथा कफ और वात रोगों को नष्ट करने वाला है।

मुस्तपर्पटकशीरदेवदारुमहौषधम् ।।
त्रिफला सदुरालम्भा नीली कम्पिल्लकस्त्रिवृत् । किराततिक्तकं पाठा वचा कटुकरोहिणी ।।
मधुकं पिप्पलीमूलं मुस्ताद्यो गण उच्यते । संशोधनः संशमनस्त्रिदोषघ्नोऽग्निदीपनः ।।
अष्टादशाङ्गमुदकमेतद्वा स्यात् सपर्वतम् । पित्तोत्तरे सन्निपाते प्रशस्तं तीर्थकर्तृभिः ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १९५ तमं पत्रम्)

नाग^१रमोथा, पित्त^२पापड़ा, खस^३, देवदा^४रु, सोंठ^५, त्रिफला (हर^६ड़, बहेड़ा^७, आंव^८ला), दुराल^९भा, नीली^१०, कमीला^११, त्रिवृत्^१२, चिरायता^१३, पाठा^१४, बच^१५, कटुरोहिणी^१६ (कटुकी), मुलहठी^१७ तथा पिप्पलीमूल^१८ । यह मुस्तादि गण कहलाता है। यह शोधक, शामक, त्रिदोषनाशक तथा अग्निदीपक है। पित्तोत्तर सन्निपात में आचार्यों ने इन उपर्युक्त १८ द्रव्यों का क्वाथ अथवा उसमें महानिम्ब (वक़ायन) मिलाकर प्रयोग करने को कहा है।

दीपनं पञ्चमूलं वा शट्याद्यं वा प्रकल्पितम् । सपञ्चदशमूलं वा शृतं पेयं लघूदकम् ।।

दीपन करने वाले पञ्चमूल अथवा शट्यादि कषाय का प्रयोग करना चाहिये। अथवा पञ्चमूल या दशमूल से सिद्ध लघु (थोड़े) जल का पान करना चाहिये ।।


१. समहानिम्बमित्यर्थः ।