भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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३३२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विशेषकल्पः ? ]

पित्त की अधिकता में पूर्व शर्करा एवं मधु सहित मुनक्का खाकर चीनी मिली हुई पेया का प्रयोग करना चाहिये ॥

न तु स्नेहान्नपानं वा गुरूण्यान्यानि वा भिषक् ।।
भोजयेत् संनिपातेषु तद्ध्यस्य विषभोजनम् ।

सन्निपात ज्वरों में वैद्य को स्नेहयुक्त अन्न-पान तथा अन्य गुरु भोजनों का प्रयोग नहीं कराना चाहिये। यह इसके लिये विषयुक्त भोजन के समान होता है ॥

पेयामरोचकार्ताय भिषग्दद्यात् सदाडिमाम् ।।
नात्युष्णां नातिलवणां फलाम्लां यूषमेव वा । प्रदोषे भोजयेच्चैनं भुक्तमात्रे यथा स्वपेत् ।।
गुप्ते निवातेऽग्निमति सुखप्रावरणास्तृते ।

यदि रोगी को अरुचि हो तो वैद्य दाडिमयुक्त पेया का प्रयोग कराये जो अत्यन्त उष्ण न हो तथा जिसमें अधिक लवण न पड़ा हो। अथवा अम्लफलों का यूष देना चाहिये। सायंकाल इसका भोजन कराये तथा भोजन करके रोगी सुरक्षित एवं निवात स्थान में अग्नियुक्त अर्थात् गरम तथा सुखकारी बिस्तरे पर सो जाये ॥

सप्ताहं भोजयेच्चैनमन्नबृद्ध्याऽल्पमल्पशः ।।
ततो विरसिकां दद्यात्तक्रदाडिमसाधिताम् । यथादोषं कषायांश्च सन्निपातज्वरापहान् ।।

धीरे २ अन्न की वृद्धि करके रोगी को सप्ताह भर तक इसी का भोजन कराये। तदनन्तर तक्र एवं अनारदाने से सिद्ध की हुई विरसिका का सेवन कराये तथा दोष के अनुसार सन्निपातज्वर को नष्ट करनेवाले कषायों का प्रयोग कराये। विरसिका—मुद्ग, तक्र तथा अम्ल से सिद्ध किये हुए यूष को विरसिका कहते हैं। इसी ग्रन्थ के खिलस्थान-यूषनिर्देशीयाध्याय में कहा है—'मुद्गतक्राम्लसिद्धस्तु यूषो विरसिका स्मृतः' ।।

सम्यक्परिणते चान्ने विदध्याज्जाङ्गलं रसम् । रूक्षोष्णव्योषलवणं तेन वा त्र्यहमाशयेत् ।।
ततो बदरमात्रस्तु स रसस्त्र्यहमिष्यते ।

इस अन्न के सम्यक् प्रकार से जीर्ण हो जाने पर रूक्ष (स्नेह रहित), उष्ण तथा त्रिकटु और लवणयुक्त जांगल मांलरस का तीन दिन तक बेर के प्रमाण में प्रयोग करना चाहिये ॥

दशमूलादिनिर्यूहे लावाद्यादानसंस्कृतः ।।
व्यक्ताम्ललवणस्नेहो रसः स्यादनिलोत्तरे ।

वात प्रधान रोग में दशमूल के क्वाथ में लाव (बटेर) आदि के द्वारा सिद्ध किया हुआ तथा जिसमें अम्ल, लवण एवं स्नेह पर्याप्त मात्रा में मिला हुआ है—ऐसा मांलरस डालकर प्रयोग कराना चाहिये ॥

सर्पिषा मुद्गनिर्यूहः प्रत्यादानेन संस्कृतः ।।
मन्दस्नेहाम्ललवणः कार्यः पित्तोत्तरे गदे ।

पित्त प्रधान रोग में मूंग के निर्यूह क्वाथ को घी के द्वारा संस्कृत करके तथा उसमें थोड़ा स्नेह, अम्ल एवं लवण डालकर प्रयोग कराना चाहिये ॥

तथा कुलत्थनिर्यूहे शशाद्यादानसंस्कृतः ।।
सबालमूलकव्योषः किञ्चित्स्नेहः कफोत्तरे ।