काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 691, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंविशेषकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३३१
तृष्णा भवति शुष्कास्यहृत्कण्ठगलतालुनः।
निरन्तर श्लेष्मा के द्वारा कृश किये जाते हुए तथा जिसका मुख, हृदय, कण्ठ, गला तथा तालु सूख गया है ऐसे सन्निपात के रोगी को प्यास लगती है॥
तस्य तृष्णाप्रशमनं पानीयमुपदिश्यते।।
दीपनं कफवातघ्नं त्रिदोषघ्नमथापि वा।
उसकी तृष्णा को शान्त करने के लिये दीपन, कफवात नाशक तथा त्रिदोषशामक पानीय (पेय द्रव्य) का उपदेश किया जायया ॥
तेनास्य पच्यते श्लेष्मा पक्वः स्थानं विमुञ्चति ।।
कफे विमुक्ते च ततो याति वातोऽनुलोमताम् ।
इससे उसकी श्लेष्मा (कफ) पच जाती है तथा पकने के बाद अपने स्थान को छोड़ देती है। इस प्रकार कफ के अपने स्थान से हट जाने पर वायु की गति अनुलोम हो जाती है अर्थात् वायु ठीक प्रकार से नीचे की ओर गति करने लगता है ॥
कफानिलानुलोम्येन पित्तमल्पबलीकृतम् ।।
सुचिकित्स्यं भवत्यस्य तस्य ह्यनुबलः कफः।
इस प्रकार कफ तथा वायु के अनुलोम हो जाने से पित्त का बल भी कम हो जाता है तथा उसकी आराम से चिकित्सा की जा सकती है। क्योंकि इस सन्निपात ज्वर में कफ का अनुबन्ध होता है ॥
अथैनं लङ्घितं ज्ञात्वा स्वल्पाबाधं प्रकाङ्क्षितम् ।।
दीपनीयोदके सिद्धां पेयामस्योपहारयेत् । शालीनां षष्टिकानां वा पुराणानां तु तण्डुलैः ।।
भृष्टैस्त्रिः प्रस्रुता रूक्षा सुखोष्णा लवणैर्युता ।।
शस्यते नातिबहला नचैनं बहु भोजयेत् ।।
स चेज्जीर्यत्यविघ्नेन तं विद्याज्जीवितं नरम् ।
तदनन्तर रोगी का सम्यक् प्रकार से लङ्घन हुआ जानकर उसके कष्टों के कम हो जाने पर तथा भोजन में रुचि उत्पन्न हो जाने पर दीपनीय जल में सिद्ध की हुई शालि अथवा सांठी के पुराने तथा भुने हुए चावलों की पेया का प्रयोग कराना चाहिये। वह पेया तीन वार प्रस्रुत की हुई, रूक्ष (स्नेह रहित), ईषदुष्ण तथा लवणयुक्त होनी चाहिये और अतिसान्द्र नहीं होनी चाहिये अर्थात् अर्धद्रव होनी चाहिये। तथा यह अधिक मात्रा में नहीं खानी चाहिये। यह पेया यदि उस रोगी को बिना विघ्न (कष्ट) के जीर्ण हो जाय तो यह समझना चाहिये कि वह जीवित रहेगा।
मुद्गमण्डस्तु तत्रैव तोये श्लेष्माधिके हितः ।।
सहार्द्रकः समरिचः ससौवर्चलसैन्धवः ।
कफ की अधिकता होने पर उसी दीपनीय जल में मुद्ग (मूंग का) मण्ड सिद्ध करके उसमें अदरक, मरिच, सौवर्चल तथा सैन्धव मिलाकर देना चाहिये ॥
मृद्वीकां भक्षयित्वाऽग्रे शर्कराक्षौद्रसंयुताम् ।।
पित्ताधिके च ससितां पेयामेवावचारयेत् ।