भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 690, कुल 942 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 690

३३० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विशेषकल्पः? ]

तस्य तीक्ष्णानि नस्यानि तीक्ष्णाश्च कवलग्रहाः ।।
स्वेदं दिवाजागरणं विदध्यात् पार्श्वशूलिनः ।

उस व्यक्ति को यदि पार्श्वशूल हो तो उसे तीक्ष्ण नस्य, तीक्ष्ण कवलग्रह, स्वेद तथा दिन में जागरण (दिन में न सोना) इत्यादि का प्रयोग करना चाहिये ।।

मातुलुङ्गार्द्रकरसं कोष्णं त्रिलवणान्वितम् ।।
अन्यद्वा सिद्धिविहितं तीक्ष्णं नस्यं विधापयेत् ।

ईषदूष्ण (हलके गरम) बिजौरे तथा अदरक के रस में तीनों नमक (सैन्धव, सामुद्र तथा विडनमक) मिलाकर अथवा सिद्धि स्थान में कहे हुए अन्य तीक्ष्ण नस्यों का प्रयोग करना चाहिये ।।

तेन प्रभिद्यते श्लेष्मा प्रस्विन्नश्च प्रसिच्यते ।।
शिरोहृदयमन्यास्यं दृष्टिश्चास्य प्रसीदति । प्रमीलकस्तालुशोषः श्वासः कासश्च शाम्यति ।।
पुनः पुनश्च निद्रायां कटु नस्याञ्जनं हितम् ।

इसके प्रयोग से कफ का भेदन हो जाता है तथा भेदन होने के बाद वह कफ स्विन्न होकर शरीर से बाहर निकल जाता है। जिससे शिर, हृदय, मन्या, मुख तथा दृष्टि प्रसन्न हो जाती है। उसके प्रमीलक (मूढता), तालुशोष, श्वास तथा कास शान्त हो जाते हैं। निद्रा आने पर पुनः २ कटु नस्य तथा अञ्जन का प्रयोग करना चाहिये ।।

तीक्ष्णैर्द्रव्यैः सलवणैर्मातुलुङ्गरसद्रवैः ।।
द्रवाम्लयुक्तैरथवा कोष्णाः स्युः कवलग्रहाः ।

तीक्ष्ण द्रव्यों से बिजौरे के रस में लवण मिलाकर अथवा अम्ल द्रव्यों से युक्त ईषदूष्ण कवलग्रहों (गरारों) का प्रयोग कराना चाहिये ।।

आर्द्रकस्वरसोपेतं सैन्धवं सकटुकत्रिकम् ।।
आकर्षं धारयेदास्ये निष्ठीवेच्च पुनः पुनः ।

सैन्धव तथा त्रिकटु मिले हुए अदरक के स्वरस को जब तक कफ न निकले मुख में धारण करे तथा उसे बार २ थूक दे ।।

तेनास्य हृदयश्लेष्मा मन्यापार्श्वशिरोगलात् ।।
लीनो व्याकृष्यते शुष्के लाघवं चास्य जायते । पर्वभेदो ज्वरो निद्राश्वासकासगलामयाः ।।
मुखाक्षिगौरवं जाड्यमुत्क्लेशश्चोपशाम्यति । सकृद्द्वित्रिचतुः कुर्याद् दृष्ट्वा दोषबलाबलम् ।।
एतद्धि परमं प्राहुर्भेषजं सन्निपातिनः ।

इससे उसकी लीन हुई हृदयस्थित श्लेष्मा का मन्या, पार्श्व, शिर तथा गले से कर्षण हो जाता है। उस श्लेष्मा के शुष्क हो जाने पर शरीर में लघुता हो जाती है तथा पर्वभेद (सन्धियों में पीडा), ज्वर, निद्रा, श्वास, गले के रोग, मुख तथा आंखों का भारीपन, जड़ता तथा उत्क्लेश शान्त हो जाते हैं। दोष के बलाबल को देखकर इसका एक, दो, तीन अथवा चार बार आवश्यकतानुसार प्रयोग करना चाहिये। यह सन्निपात रोग की श्रेष्ठ ओषधि कही गई है ।।

श्लेष्मणा कृष्यमाणस्य सततं सन्निपातिनः ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १९४ तमं पत्रम् ।)