काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 689, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंविशेषकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३२९
त्रिरात्रं पञ्चरात्रं वा दशरात्रमथापि वा ।।
लङ्घनं सन्निपाते तु कुर्याद्ध्याऽऽरोग्यदर्शनात् ।
सन्निपात में लङ्घन की मर्यादा—सन्निपात में तीन, पांच तथा दस दिन तक अथवा आरोग्य (स्वास्थ्य) की प्राप्ति पर्यन्त लङ्घन कराना चाहिये। अर्थात् जब तक शरीर स्वस्थ या रोगमुक्त न हो जाय जाय तब तक लङ्घन का प्रयोग करना चाहिये। चरक चि. अ. ३ में भी लङ्घन की मर्यादा दी है—प्राणाविरोधिना चैनं लङ्घनेनोपपादयेत्। बलाधिष्ठानमारोग्यं यदर्थोऽयं क्रियाक्रमः।। अर्थात् लंघन के द्वारा जब तक प्राण एवं बल की क्षीणता न हो तब तक लंघन किया जा सकता है। अष्टांगसंग्रह में लंघन का निम्न प्रयोजन दिया है—आमाशयस्थो हत्वाग्नि सामो मार्गान् पिधापयन्। विदधाति ज्वरं दोषस्तस्माल्लङ्घनमाचरेत्।। अर्थात् आमरस के द्वारा ही रोग उत्पन्न होते हैं। लङ्घन के द्वारा आमरस का शीघ्र ही पाचन हो जाता है जिससे ज्वर आदि रोग शान्त हो जाते हैं। चरक में भी कहा है—लङ्घनेन क्षयं नीते दोषे संधुक्षितेऽनले। विज्वरत्वं लघत्वं च क्षुच्चैवास्योपजायते।।
प्रकाङ्क्षा लाघवं ग्लानिः स्वच्छता संप्रसन्नता ।।
उपद्रवनिवृत्तिश्च सम्यग्लङ्घितलक्षणम् ।
सम्यक् लङ्घित के लक्षण—लंघन के सम्यक् प्रकार से हो जाने पर प्रकाकांक्षा (भोजन में रुचि), लघुता, ग्लानि, शरीर की स्वच्छता, प्रसन्नता तथा उपद्रवों की शान्ति ये लक्षण होते हैं। सृष्टमारुतविण्मूत्रं क्षुत्पिपासासहं लघुम्। प्रसन्नात्मेन्द्रियं क्षामं नरं विद्यात् सुलङ्घितम्।।
अग्लानिगौरवाश्रद्धाविकृतिश्चाविशोधिते ।।
संमोहक्षामशैथिल्यवातरूक् चातिलङ्घिते ।
अतिलङ्घित के लक्षण—लंघन के मात्रा से अधिक हो जाने पर ग्लानि का अभाव, शरीर की गुरुता (भारीपन), अश्रद्धा (भोजन में अरुचि), विकार, आवश्यकता से अधिक शोषण, संमोह (मूर्च्छा), कमजोरी, शिथिलता तथा अन्य वातिक रोग आदि हो जाते हैं।।
स्वेदाध्याये यथा प्रोक्ताः स्वेदाः सर्वाङ्गिकास्तथा ।।
तच्चास्य स्वेदयेत् प्रायो यत्र यत्रास्य वेदना ।
स्वेदाध्याय में जो सर्वाङ्गिक स्वेद गिनाये हैं—रोगी के शरीर में जहां २ पीडा हो प्रायः उनके द्वारा स्वेदन देना चाहिये। चरक चि. अ. ३ में भी कहा है—त्रयोदशविधः स्वेदाध्याये निदर्शितः। मात्राकालविदा युक्तः।।
कफो हि वायुना क्षिप्तो विष्टब्धः पार्श्वयोर्हृदि ।।
खरीकृतश्च पित्तेन शल्यवद्बाधते नरम् ।
वायु के द्वारा दूर हटाया गया तथा पार्श्व एवं हृदय में विष्टब्ध हुआ कफ पित्त के द्वारा खर (कठोर) होकर मनुष्य को शल्य (मनःशरीराबाधकराणि शल्यानि) की तरह कष्ट पहुँचाता है।।
तस्याशुष्कस्य लीनस्य विलग्नस्य कृशात्मनः ।।
दुःखनिर्हरणं कर्तुं तीक्ष्णादन्यन्न भेषजात् ।
उस अशुष्क, लीन (झुके हुए), विलग्न तथा कृश शरीर वाले रोगी का दुःख (कष्ट-रोग) दूर करने के लिये तीक्ष्ण ओषधियों के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है अर्थात् इस अवस्था में तीक्ष्ण ओषधियों का ही प्रयोग करना चाहिये।।