भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 688

३२८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विशेषकल्पः ? ]

श्लेष्मनिग्रहेमेवादौ कुर्याद्व्याधौ त्रिदोषजे। निरस्ते श्लेष्मणि ह्यास्य स्रोतःसूद्धाटितेषु च। लाघवं जायते सद्यस्तृष्णा चैवोपशाम्यति।। शिरोहृदयकर्णस्य पार्श्वरुक् चोपशाम्यति। जिह्वागुरुजडत्वं च दृष्टिश्चैव प्रसीदति।। तस्मात् पुनः पुनः कुर्याच्छ्लेष्मकर्षणमौषधैः।

त्रिदोषज व्याधि (सन्निपात) में सर्वप्रथम श्लेष्मा (कफ) की ही चिकित्सा करनी चाहिये। कफ के निकल जाने पर अथवा शान्त हो जाने पर सब स्रोत खुल जाते हैं। शरीर शीघ्र ही लघु (हलका) हो जाता है। तृष्णा शान्त हो जाती है। शिर, हृदय, कान तथा पार्श्वों के रोग शान्त हो जाते हैं। जिह्वा गुरु (भारी) तथा जड़ हो जाती है और दृष्टि प्रसन्न हो जाती है। इसलिये ओषधियों से पुनः २ श्लेष्मा (कफ) का कर्षण करे। चरक चि. अ. ३ में भी सन्निपात ज्वर का निम्नचिकित्सा सूत्र दिया है—वर्धनेनैकदोषस्य क्षपणेनोच्छ्रितस्य वा। कफस्थानानुपूर्व्या वा सन्निपातज्वरे जयेत्॥ अर्थात् एक दोषकी वृद्धि तथा वृद्ध दोष को क्षीण करके सन्निपात की चिकित्सा करे अथवा कफ स्थान के अनुसार ही चिकित्सा करनी चाहिये। अर्थात् जब सन्निपात में दोष तरतम भेद से बढ़े हुए विद्यमान हों तो वृद्ध को बढ़ाये परन्तु साथ ही वृद्धतर तथा वृद्धतम दोषों को घटाने का प्रयत्न करना चाहिये। परन्तु यदि सन्निपात में तीनों दोष समावस्था में हों तो उस अवस्था में पहले कफ की ही चिकित्सा करनी चाहिये। अर्थात् सर्वप्रथम लङ्घन आदि के द्वारा कफ को शान्त करना चाहिये। परन्तु यह क्रम ज्वरों में ही होता है अन्य सन्निपातों में नहीं। वहां प्रायः पूर्व वात की ही चिकित्सा करनी चाहिये॥

उदीर्णदोषं प्रथमे दिवसे वामयेन्नरम्।। विशोषितं न वमयेदमेध्यं हि वमेत्तथा।

पहले दिन जिसके दोष उदीर्ण हुए हैं उस व्यक्ति को वमन कराये। जिसका शोषण हुआ है उसे वमन न कराये तथा अमेध्य (अपवित्र) वस्तु का ही वमन कराये॥

सर्वेषु सन्निपातेषु न क्षौद्रमवचारयेत्।। शीतोपचारि हि क्षौद्रं शीतं चात्र विरुध्यते।

सब प्रकार के सन्निपातों में मधु का प्रयोग नहीं कराना चाहिये। क्योंकि मधु शीतोपचारी (शीतल उपचार=चिकित्सा वाला) है तथा सन्निपात में शीतोपचार विरुद्ध माना गया है॥

उष्णोपचारी सततं सन्निपाती प्रशस्यते।। वर्जयेच्च दिवास्वप्नं धृति सत्त्वं च संश्रयेत्।

सन्निपात ज्वर में सदा उष्णोपचार (उष्ण चिकित्सा) प्रशस्त माना गया है। इसके साथ दिवास्वप्न का त्याग करना चाहिये तथा धैर्य एवं सत्त्व (मानसिक बल) को स्थिर रखना चाहिये॥

लङ्घनं स्वेदनं नस्यं मर्दनं कवलग्रहः।। एतान्यादौ प्रयुञ्जीत सन्निपातेषु युक्तिवित्।

युक्ति को जानने वाला वैद्य सन्निपात में प्रारम्भ में लङ्घन, स्वेदन, नस्य, मर्दन (मालिश) तथा कवलग्रह (सुखं संचार्र्यते या तु मात्रा स कवलग्रहः) का प्रयोग करे॥

वक्तव्य—लङ्घन का अर्थ अनशन के साथ निर्बल मनुष्यों के लिये लघु भोजन भी होता है। लङ्घन का लक्षण चरक में निम्न दिया है—शरीरलाघवकरं यद् द्रव्यं कर्म वा पुनः। तल्लङ्घ नमिति ज्ञेयम्॥