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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

३२८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विशेषकल्पः ? ]

श्लेष्मनिग्रहेमेवादौ कुर्याद्व्याधौ त्रिदोषजे। निरस्ते श्लेष्मणि ह्यास्य स्रोतःसूद्धाटितेषु च। लाघवं जायते सद्यस्तृष्णा चैवोपशाम्यति।। शिरोहृदयकर्णस्य पार्श्वरुक् चोपशाम्यति। जिह्वागुरुजडत्वं च दृष्टिश्चैव प्रसीदति।। तस्मात् पुनः पुनः कुर्याच्छ्लेष्मकर्षणमौषधैः।

त्रिदोषज व्याधि (सन्निपात) में सर्वप्रथम श्लेष्मा (कफ) की ही चिकित्सा करनी चाहिये। कफ के निकल जाने पर अथवा शान्त हो जाने पर सब स्रोत खुल जाते हैं। शरीर शीघ्र ही लघु (हलका) हो जाता है। तृष्णा शान्त हो जाती है। शिर, हृदय, कान तथा पार्श्वों के रोग शान्त हो जाते हैं। जिह्वा गुरु (भारी) तथा जड़ हो जाती है और दृष्टि प्रसन्न हो जाती है। इसलिये ओषधियों से पुनः २ श्लेष्मा (कफ) का कर्षण करे। चरक चि. अ. ३ में भी सन्निपात ज्वर का निम्नचिकित्सा सूत्र दिया है—वर्धनेनैकदोषस्य क्षपणेनोच्छ्रितस्य वा। कफस्थानानुपूर्व्या वा सन्निपातज्वरे जयेत्॥ अर्थात् एक दोषकी वृद्धि तथा वृद्ध दोष को क्षीण करके सन्निपात की चिकित्सा करे अथवा कफ स्थान के अनुसार ही चिकित्सा करनी चाहिये। अर्थात् जब सन्निपात में दोष तरतम भेद से बढ़े हुए विद्यमान हों तो वृद्ध को बढ़ाये परन्तु साथ ही वृद्धतर तथा वृद्धतम दोषों को घटाने का प्रयत्न करना चाहिये। परन्तु यदि सन्निपात में तीनों दोष समावस्था में हों तो उस अवस्था में पहले कफ की ही चिकित्सा करनी चाहिये। अर्थात् सर्वप्रथम लङ्घन आदि के द्वारा कफ को शान्त करना चाहिये। परन्तु यह क्रम ज्वरों में ही होता है अन्य सन्निपातों में नहीं। वहां प्रायः पूर्व वात की ही चिकित्सा करनी चाहिये॥

उदीर्णदोषं प्रथमे दिवसे वामयेन्नरम्।। विशोषितं न वमयेदमेध्यं हि वमेत्तथा।

पहले दिन जिसके दोष उदीर्ण हुए हैं उस व्यक्ति को वमन कराये। जिसका शोषण हुआ है उसे वमन न कराये तथा अमेध्य (अपवित्र) वस्तु का ही वमन कराये॥

सर्वेषु सन्निपातेषु न क्षौद्रमवचारयेत्।। शीतोपचारि हि क्षौद्रं शीतं चात्र विरुध्यते।

सब प्रकार के सन्निपातों में मधु का प्रयोग नहीं कराना चाहिये। क्योंकि मधु शीतोपचारी (शीतल उपचार=चिकित्सा वाला) है तथा सन्निपात में शीतोपचार विरुद्ध माना गया है॥

उष्णोपचारी सततं सन्निपाती प्रशस्यते।। वर्जयेच्च दिवास्वप्नं धृति सत्त्वं च संश्रयेत्।

सन्निपात ज्वर में सदा उष्णोपचार (उष्ण चिकित्सा) प्रशस्त माना गया है। इसके साथ दिवास्वप्न का त्याग करना चाहिये तथा धैर्य एवं सत्त्व (मानसिक बल) को स्थिर रखना चाहिये॥

लङ्घनं स्वेदनं नस्यं मर्दनं कवलग्रहः।। एतान्यादौ प्रयुञ्जीत सन्निपातेषु युक्तिवित्।

युक्ति को जानने वाला वैद्य सन्निपात में प्रारम्भ में लङ्घन, स्वेदन, नस्य, मर्दन (मालिश) तथा कवलग्रह (सुखं संचार्र्यते या तु मात्रा स कवलग्रहः) का प्रयोग करे॥

वक्तव्य—लङ्घन का अर्थ अनशन के साथ निर्बल मनुष्यों के लिये लघु भोजन भी होता है। लङ्घन का लक्षण चरक में निम्न दिया है—शरीरलाघवकरं यद् द्रव्यं कर्म वा पुनः। तल्लङ्घ नमिति ज्ञेयम्॥

विशेषकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३२९

त्रिरात्रं पञ्चरात्रं वा दशरात्रमथापि वा ।।
लङ्घनं सन्निपाते तु कुर्याद्ध्याऽऽरोग्यदर्शनात् ।

सन्निपात में लङ्घन की मर्यादा—सन्निपात में तीन, पांच तथा दस दिन तक अथवा आरोग्य (स्वास्थ्य) की प्राप्ति पर्यन्त लङ्घन कराना चाहिये। अर्थात् जब तक शरीर स्वस्थ या रोगमुक्त न हो जाय जाय तब तक लङ्घन का प्रयोग करना चाहिये। चरक चि. अ. ३ में भी लङ्घन की मर्यादा दी है—प्राणाविरोधिना चैनं लङ्घनेनोपपादयेत्। बलाधिष्ठानमारोग्यं यदर्थोऽयं क्रियाक्रमः।। अर्थात् लंघन के द्वारा जब तक प्राण एवं बल की क्षीणता न हो तब तक लंघन किया जा सकता है। अष्टांगसंग्रह में लंघन का निम्न प्रयोजन दिया है—आमाशयस्थो हत्वाग्नि सामो मार्गान् पिधापयन्। विदधाति ज्वरं दोषस्तस्माल्लङ्घनमाचरेत्।। अर्थात् आमरस के द्वारा ही रोग उत्पन्न होते हैं। लङ्घन के द्वारा आमरस का शीघ्र ही पाचन हो जाता है जिससे ज्वर आदि रोग शान्त हो जाते हैं। चरक में भी कहा है—लङ्घनेन क्षयं नीते दोषे संधुक्षितेऽनले। विज्वरत्वं लघत्वं च क्षुच्चैवास्योपजायते।।

प्रकाङ्क्षा लाघवं ग्लानिः स्वच्छता संप्रसन्नता ।।
उपद्रवनिवृत्तिश्च सम्यग्लङ्घितलक्षणम् ।

सम्यक् लङ्घित के लक्षण—लंघन के सम्यक् प्रकार से हो जाने पर प्रकाकांक्षा (भोजन में रुचि), लघुता, ग्लानि, शरीर की स्वच्छता, प्रसन्नता तथा उपद्रवों की शान्ति ये लक्षण होते हैं। सृष्टमारुतविण्मूत्रं क्षुत्पिपासासहं लघुम्। प्रसन्नात्मेन्द्रियं क्षामं नरं विद्यात् सुलङ्घितम्।।

अग्लानिगौरवाश्रद्धाविकृतिश्चाविशोधिते ।।
संमोहक्षामशैथिल्यवातरूक् चातिलङ्घिते ।

अतिलङ्घित के लक्षण—लंघन के मात्रा से अधिक हो जाने पर ग्लानि का अभाव, शरीर की गुरुता (भारीपन), अश्रद्धा (भोजन में अरुचि), विकार, आवश्यकता से अधिक शोषण, संमोह (मूर्च्छा), कमजोरी, शिथिलता तथा अन्य वातिक रोग आदि हो जाते हैं।।

स्वेदाध्याये यथा प्रोक्ताः स्वेदाः सर्वाङ्गिकास्तथा ।।
तच्चास्य स्वेदयेत् प्रायो यत्र यत्रास्य वेदना ।

स्वेदाध्याय में जो सर्वाङ्गिक स्वेद गिनाये हैं—रोगी के शरीर में जहां २ पीडा हो प्रायः उनके द्वारा स्वेदन देना चाहिये। चरक चि. अ. ३ में भी कहा है—त्रयोदशविधः स्वेदाध्याये निदर्शितः। मात्राकालविदा युक्तः।।

कफो हि वायुना क्षिप्तो विष्टब्धः पार्श्वयोर्हृदि ।।
खरीकृतश्च पित्तेन शल्यवद्बाधते नरम् ।

वायु के द्वारा दूर हटाया गया तथा पार्श्व एवं हृदय में विष्टब्ध हुआ कफ पित्त के द्वारा खर (कठोर) होकर मनुष्य को शल्य (मनःशरीराबाधकराणि शल्यानि) की तरह कष्ट पहुँचाता है।।

तस्याशुष्कस्य लीनस्य विलग्नस्य कृशात्मनः ।।
दुःखनिर्हरणं कर्तुं तीक्ष्णादन्यन्न भेषजात् ।

उस अशुष्क, लीन (झुके हुए), विलग्न तथा कृश शरीर वाले रोगी का दुःख (कष्ट-रोग) दूर करने के लिये तीक्ष्ण ओषधियों के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है अर्थात् इस अवस्था में तीक्ष्ण ओषधियों का ही प्रयोग करना चाहिये।।

३३० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विशेषकल्पः? ]

तस्य तीक्ष्णानि नस्यानि तीक्ष्णाश्च कवलग्रहाः ।।
स्वेदं दिवाजागरणं विदध्यात् पार्श्वशूलिनः ।

उस व्यक्ति को यदि पार्श्वशूल हो तो उसे तीक्ष्ण नस्य, तीक्ष्ण कवलग्रह, स्वेद तथा दिन में जागरण (दिन में न सोना) इत्यादि का प्रयोग करना चाहिये ।।

मातुलुङ्गार्द्रकरसं कोष्णं त्रिलवणान्वितम् ।।
अन्यद्वा सिद्धिविहितं तीक्ष्णं नस्यं विधापयेत् ।

ईषदूष्ण (हलके गरम) बिजौरे तथा अदरक के रस में तीनों नमक (सैन्धव, सामुद्र तथा विडनमक) मिलाकर अथवा सिद्धि स्थान में कहे हुए अन्य तीक्ष्ण नस्यों का प्रयोग करना चाहिये ।।

तेन प्रभिद्यते श्लेष्मा प्रस्विन्नश्च प्रसिच्यते ।।
शिरोहृदयमन्यास्यं दृष्टिश्चास्य प्रसीदति । प्रमीलकस्तालुशोषः श्वासः कासश्च शाम्यति ।।
पुनः पुनश्च निद्रायां कटु नस्याञ्जनं हितम् ।

इसके प्रयोग से कफ का भेदन हो जाता है तथा भेदन होने के बाद वह कफ स्विन्न होकर शरीर से बाहर निकल जाता है। जिससे शिर, हृदय, मन्या, मुख तथा दृष्टि प्रसन्न हो जाती है। उसके प्रमीलक (मूढता), तालुशोष, श्वास तथा कास शान्त हो जाते हैं। निद्रा आने पर पुनः २ कटु नस्य तथा अञ्जन का प्रयोग करना चाहिये ।।

तीक्ष्णैर्द्रव्यैः सलवणैर्मातुलुङ्गरसद्रवैः ।।
द्रवाम्लयुक्तैरथवा कोष्णाः स्युः कवलग्रहाः ।

तीक्ष्ण द्रव्यों से बिजौरे के रस में लवण मिलाकर अथवा अम्ल द्रव्यों से युक्त ईषदूष्ण कवलग्रहों (गरारों) का प्रयोग कराना चाहिये ।।

आर्द्रकस्वरसोपेतं सैन्धवं सकटुकत्रिकम् ।।
आकर्षं धारयेदास्ये निष्ठीवेच्च पुनः पुनः ।

सैन्धव तथा त्रिकटु मिले हुए अदरक के स्वरस को जब तक कफ न निकले मुख में धारण करे तथा उसे बार २ थूक दे ।।

तेनास्य हृदयश्लेष्मा मन्यापार्श्वशिरोगलात् ।।
लीनो व्याकृष्यते शुष्के लाघवं चास्य जायते । पर्वभेदो ज्वरो निद्राश्वासकासगलामयाः ।।
मुखाक्षिगौरवं जाड्यमुत्क्लेशश्चोपशाम्यति । सकृद्द्वित्रिचतुः कुर्याद् दृष्ट्वा दोषबलाबलम् ।।
एतद्धि परमं प्राहुर्भेषजं सन्निपातिनः ।

इससे उसकी लीन हुई हृदयस्थित श्लेष्मा का मन्या, पार्श्व, शिर तथा गले से कर्षण हो जाता है। उस श्लेष्मा के शुष्क हो जाने पर शरीर में लघुता हो जाती है तथा पर्वभेद (सन्धियों में पीडा), ज्वर, निद्रा, श्वास, गले के रोग, मुख तथा आंखों का भारीपन, जड़ता तथा उत्क्लेश शान्त हो जाते हैं। दोष के बलाबल को देखकर इसका एक, दो, तीन अथवा चार बार आवश्यकतानुसार प्रयोग करना चाहिये। यह सन्निपात रोग की श्रेष्ठ ओषधि कही गई है ।।

श्लेष्मणा कृष्यमाणस्य सततं सन्निपातिनः ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १९४ तमं पत्रम् ।)

विशेषकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३३१

तृष्णा भवति शुष्कास्यहृत्कण्ठगलतालुनः।

निरन्तर श्लेष्मा के द्वारा कृश किये जाते हुए तथा जिसका मुख, हृदय, कण्ठ, गला तथा तालु सूख गया है ऐसे सन्निपात के रोगी को प्यास लगती है॥

तस्य तृष्णाप्रशमनं पानीयमुपदिश्यते।।
दीपनं कफवातघ्नं त्रिदोषघ्नमथापि वा।

उसकी तृष्णा को शान्त करने के लिये दीपन, कफवात नाशक तथा त्रिदोषशामक पानीय (पेय द्रव्य) का उपदेश किया जायया ॥

तेनास्य पच्यते श्लेष्मा पक्वः स्थानं विमुञ्चति ।।
कफे विमुक्ते च ततो याति वातोऽनुलोमताम् ।

इससे उसकी श्लेष्मा (कफ) पच जाती है तथा पकने के बाद अपने स्थान को छोड़ देती है। इस प्रकार कफ के अपने स्थान से हट जाने पर वायु की गति अनुलोम हो जाती है अर्थात् वायु ठीक प्रकार से नीचे की ओर गति करने लगता है ॥

कफानिलानुलोम्येन पित्तमल्पबलीकृतम् ।।
सुचिकित्स्यं भवत्यस्य तस्य ह्यनुबलः कफः।

इस प्रकार कफ तथा वायु के अनुलोम हो जाने से पित्त का बल भी कम हो जाता है तथा उसकी आराम से चिकित्सा की जा सकती है। क्योंकि इस सन्निपात ज्वर में कफ का अनुबन्ध होता है ॥

अथैनं लङ्घितं ज्ञात्वा स्वल्पाबाधं प्रकाङ्क्षितम् ।।
दीपनीयोदके सिद्धां पेयामस्योपहारयेत् । शालीनां षष्टिकानां वा पुराणानां तु तण्डुलैः ।।
भृष्टैस्त्रिः प्रस्रुता रूक्षा सुखोष्णा लवणैर्युता ।।
शस्यते नातिबहला नचैनं बहु भोजयेत् ।।
स चेज्जीर्यत्यविघ्नेन तं विद्याज्जीवितं नरम् ।

तदनन्तर रोगी का सम्यक् प्रकार से लङ्घन हुआ जानकर उसके कष्टों के कम हो जाने पर तथा भोजन में रुचि उत्पन्न हो जाने पर दीपनीय जल में सिद्ध की हुई शालि अथवा सांठी के पुराने तथा भुने हुए चावलों की पेया का प्रयोग कराना चाहिये। वह पेया तीन वार प्रस्रुत की हुई, रूक्ष (स्नेह रहित), ईषदुष्ण तथा लवणयुक्त होनी चाहिये और अतिसान्द्र नहीं होनी चाहिये अर्थात् अर्धद्रव होनी चाहिये। तथा यह अधिक मात्रा में नहीं खानी चाहिये। यह पेया यदि उस रोगी को बिना विघ्न (कष्ट) के जीर्ण हो जाय तो यह समझना चाहिये कि वह जीवित रहेगा।

मुद्गमण्डस्तु तत्रैव तोये श्लेष्माधिके हितः ।।
सहार्द्रकः समरिचः ससौवर्चलसैन्धवः ।

कफ की अधिकता होने पर उसी दीपनीय जल में मुद्ग (मूंग का) मण्ड सिद्ध करके उसमें अदरक, मरिच, सौवर्चल तथा सैन्धव मिलाकर देना चाहिये ॥

मृद्वीकां भक्षयित्वाऽग्रे शर्कराक्षौद्रसंयुताम् ।।
पित्ताधिके च ससितां पेयामेवावचारयेत् ।

३३२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विशेषकल्पः ? ]

पित्त की अधिकता में पूर्व शर्करा एवं मधु सहित मुनक्का खाकर चीनी मिली हुई पेया का प्रयोग करना चाहिये ॥

न तु स्नेहान्नपानं वा गुरूण्यान्यानि वा भिषक् ।।
भोजयेत् संनिपातेषु तद्ध्यस्य विषभोजनम् ।

सन्निपात ज्वरों में वैद्य को स्नेहयुक्त अन्न-पान तथा अन्य गुरु भोजनों का प्रयोग नहीं कराना चाहिये। यह इसके लिये विषयुक्त भोजन के समान होता है ॥

पेयामरोचकार्ताय भिषग्दद्यात् सदाडिमाम् ।।
नात्युष्णां नातिलवणां फलाम्लां यूषमेव वा । प्रदोषे भोजयेच्चैनं भुक्तमात्रे यथा स्वपेत् ।।
गुप्ते निवातेऽग्निमति सुखप्रावरणास्तृते ।

यदि रोगी को अरुचि हो तो वैद्य दाडिमयुक्त पेया का प्रयोग कराये जो अत्यन्त उष्ण न हो तथा जिसमें अधिक लवण न पड़ा हो। अथवा अम्लफलों का यूष देना चाहिये। सायंकाल इसका भोजन कराये तथा भोजन करके रोगी सुरक्षित एवं निवात स्थान में अग्नियुक्त अर्थात् गरम तथा सुखकारी बिस्तरे पर सो जाये ॥

सप्ताहं भोजयेच्चैनमन्नबृद्ध्याऽल्पमल्पशः ।।
ततो विरसिकां दद्यात्तक्रदाडिमसाधिताम् । यथादोषं कषायांश्च सन्निपातज्वरापहान् ।।

धीरे २ अन्न की वृद्धि करके रोगी को सप्ताह भर तक इसी का भोजन कराये। तदनन्तर तक्र एवं अनारदाने से सिद्ध की हुई विरसिका का सेवन कराये तथा दोष के अनुसार सन्निपातज्वर को नष्ट करनेवाले कषायों का प्रयोग कराये। विरसिका—मुद्ग, तक्र तथा अम्ल से सिद्ध किये हुए यूष को विरसिका कहते हैं। इसी ग्रन्थ के खिलस्थान-यूषनिर्देशीयाध्याय में कहा है—'मुद्गतक्राम्लसिद्धस्तु यूषो विरसिका स्मृतः' ।।

सम्यक्परिणते चान्ने विदध्याज्जाङ्गलं रसम् । रूक्षोष्णव्योषलवणं तेन वा त्र्यहमाशयेत् ।।
ततो बदरमात्रस्तु स रसस्त्र्यहमिष्यते ।

इस अन्न के सम्यक् प्रकार से जीर्ण हो जाने पर रूक्ष (स्नेह रहित), उष्ण तथा त्रिकटु और लवणयुक्त जांगल मांलरस का तीन दिन तक बेर के प्रमाण में प्रयोग करना चाहिये ॥

दशमूलादिनिर्यूहे लावाद्यादानसंस्कृतः ।।
व्यक्ताम्ललवणस्नेहो रसः स्यादनिलोत्तरे ।

वात प्रधान रोग में दशमूल के क्वाथ में लाव (बटेर) आदि के द्वारा सिद्ध किया हुआ तथा जिसमें अम्ल, लवण एवं स्नेह पर्याप्त मात्रा में मिला हुआ है—ऐसा मांलरस डालकर प्रयोग कराना चाहिये ॥

सर्पिषा मुद्गनिर्यूहः प्रत्यादानेन संस्कृतः ।।
मन्दस्नेहाम्ललवणः कार्यः पित्तोत्तरे गदे ।

पित्त प्रधान रोग में मूंग के निर्यूह क्वाथ को घी के द्वारा संस्कृत करके तथा उसमें थोड़ा स्नेह, अम्ल एवं लवण डालकर प्रयोग कराना चाहिये ॥

तथा कुलत्थनिर्यूहे शशाद्यादानसंस्कृतः ।।
सबालमूलकव्योषः किञ्चित्स्नेहः कफोत्तरे ।

विशेषकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३३३

कफ प्रधान रोग में कुलथी के क्वाथ में खरगोश के मांस द्वारा सिद्ध किये हुये कच्ची मूली के क्वाथ में त्रिकटु तथा थोड़ा सा स्नेह मिलाकर प्रयोग कराना चाहिये ।।

जातप्राणं तु दृष्ट्वैनमीषद्रोगावलम्बितम् ।।
विस्रंसनेन मृदुनाऽ भोज्य स्निग्धं विरेचयेत् । दोषशेषं तु तद्ध्वस्य विरिक्तस्योपशाम्यति ।।

इस प्रकार रोगी को जातप्राण (लब्धबल) जानकर रोग के अल्पमात्रा में शेष रहने पर विस्रंसन (विरेचन) एवं मृदु भोजन के द्वारा स्निग्ध विरेचन कराये। विरेचन होने के बाद इसके बचे हुए दोष भी शान्त हो जाते हैं ।।

इति क्रमः समुद्दिष्टः कषायानपि मे शृणु।

इस प्रकार सन्निपात रोगी के लिये यह भोजन का क्रम कहा गया है। अब तू मेरे से सन्निपात रोग के लिये कषायों को सुन ।।

पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरम् ।।
दीपनीयः स्मृतो वर्गः कफानिलगदापहः । रोचनो दीपनो हृद्यो लघुः सांग्राहिकः परः ।।

पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक तथा सोंठ—यह कफ तथा वात रोगों को नष्ट करने के लिये दीपनीय वर्ग कहा है। यह रुचिकारक, दीपक, हृद्य, लघु, एवं अत्यन्त संग्राहक होता है ।।

शटीपौष्करपिप्पल्यो बृहती कण्टकारिका । शुण्ठी कर्कटकी भार्गी दुरालम्भा यवानिका ।।
शूलानाहविबन्धघ्नं शट्याद्यं कफवातनुत् ।

शटी (कपूरकचरी), पुष्करमूल, पिप्पली, बृहती (बड़ी कटेरी), कण्टकारिका (कटेरी-रींगणी), सोंठ, काकड़ाशृंगी, भारंगी, दुरालभा, यवानिका (अजवायन)—यह शठ्यादि वर्ग शूल, आनाह, विबन्ध तथा कफ और वात रोगों को नष्ट करने वाला है।

मुस्तपर्पटकशीरदेवदारुमहौषधम् ।।
त्रिफला सदुरालम्भा नीली कम्पिल्लकस्त्रिवृत् । किराततिक्तकं पाठा वचा कटुकरोहिणी ।।
मधुकं पिप्पलीमूलं मुस्ताद्यो गण उच्यते । संशोधनः संशमनस्त्रिदोषघ्नोऽग्निदीपनः ।।
अष्टादशाङ्गमुदकमेतद्वा स्यात् सपर्वतम् । पित्तोत्तरे सन्निपाते प्रशस्तं तीर्थकर्तृभिः ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १९५ तमं पत्रम्)

नाग^१रमोथा, पित्त^२पापड़ा, खस^३, देवदा^४रु, सोंठ^५, त्रिफला (हर^६ड़, बहेड़ा^७, आंव^८ला), दुराल^९भा, नीली^१०, कमीला^११, त्रिवृत्^१२, चिरायता^१३, पाठा^१४, बच^१५, कटुरोहिणी^१६ (कटुकी), मुलहठी^१७ तथा पिप्पलीमूल^१८ । यह मुस्तादि गण कहलाता है। यह शोधक, शामक, त्रिदोषनाशक तथा अग्निदीपक है। पित्तोत्तर सन्निपात में आचार्यों ने इन उपर्युक्त १८ द्रव्यों का क्वाथ अथवा उसमें महानिम्ब (वक़ायन) मिलाकर प्रयोग करने को कहा है।

दीपनं पञ्चमूलं वा शट्याद्यं वा प्रकल्पितम् । सपञ्चदशमूलं वा शृतं पेयं लघूदकम् ।।

दीपन करने वाले पञ्चमूल अथवा शट्यादि कषाय का प्रयोग करना चाहिये। अथवा पञ्चमूल या दशमूल से सिद्ध लघु (थोड़े) जल का पान करना चाहिये ।।


१. समहानिम्बमित्यर्थः ।

३३४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विशेषकल्प: ? ]

सुखोष्णं वा भृशोष्णं वा दृष्ट्वा दोषबलाबलम् । पार्वत्याः पञ्चमूल्या वा शृतं तोयं सदीपनम् ।।

महानिम्ब अथवा पञ्चमूल द्वारा सिद्ध एवं दीपन जल का दोष और बल के अनुसार हल्के अथवा अधिक गरम रूप में प्रयोग करना चाहिये ।।

समुस्तकं पर्पटकम्थवा सदुरालभम् । पेयं पित्तोत्तरे व्याधौ कोष्णं सर्वं च शस्यते ।।

सम्पूर्ण पित्त प्रधान रोगों में नागरमोथा, पित्तपापड़ा अथवा दुरालभा का ईषदुष्ण कषाय पीना चाहिये ।।

पिप्पल्यादिर्वचादारुवयस्थासर(ला)न्वितः । पेयंः कफोत्तरे सामे सहिङ्गुक्षारसैन्धवः ।। दोषास्तेनाशु पच्यन्ते विबन्धश्चोपशाम्यति ।

आमयुक्त कफ प्रधान रोग में पिप्पल्यादि गण, वचा, देवदारु, वयस्था (गिलोय) तथा सरल (चीड़) के कषाय में हींग, क्षार तथा सेन्धा नमक मिलाकर देना चाहिये। इससे शीघ्र ही दोषों का पाक हो जाता है तथा मलबन्ध की शान्ति हो जाती है ।।

अभया कट्फलं भार्गी भूतीकं देवदारु च ।। वचा पर्पटकं मुस्तं धान्यकं विश्वभेषजम् । सहिङ्गमाक्षिकः पेयो व्याधौ वातकफोत्तरे ।।

वात तथा कफ प्रधान रोग में अभया (हरड़), कायफल, भारङ्गी, भूतीक (कत्तृण), देवदारु, वचा, पित्तपापड़ा, नागरमोथा, धनिया तथा सोंठ का कषाय हींग एवं मधु मिलाकर पिलाना चाहिये ।।

दुरालभा वचा दारु पिप्पली भद्ररोहिणी । महौषधं कर्कटकी बृहती कण्टकारिका ।। क्वाथः सलवणः पेयः सन्निपातज्वरापहः ।

सन्निपात ज्वर को नष्ट करने के लिये दुरालभा, वच, देवदारु, पिप्पली, भद्ररोहिणी, सोंठ, कर्कटकी (काकड़ाशृंगी), बृहती (बड़ी कटेरी) तथा कण्टकारी (रींगणी) के क्वाथ में लवण मिलाकर पीना चाहिये ।।

त्रिफला रोहिणी निम्बं पटोलं कटुकत्रयम् ।। पाठा गुडूची वेत्राग्रं सप्तपर्णं सवत्सकम् । किराततिक्तकं मुस्ता वचा चेत्येकतः शृतम् ।। कफोत्तरं निहन्येतत् पानादग्निं च दीपयेत् ।

त्रिफला, रोहिणी (कटुरोहिणी-कटुकी), नीम, पटोल, त्रिकटु (सोंठ, मरिच, पीपल), पाठा, गिलोय, बेंत का अग्रभाग, सप्तवर्ण, कुटज, चिरायता, नागरमोथा तथा बच आदि एक २ का क्वाथ पीने से कफ प्रधान व्याधि नष्ट होती है तथा जाठराग्नि प्रदीप्त होती है ।।

आरग्वधवचानिम्बपटोलोशीरत्सकम् ।। शार्ङ्गेष्टाऽतिविषा मूर्वा त्रिफला सदुरालभा । भद्रमुस्ता बला पाठा मधुकं भद्ररोहिणी ।। कषाय एष शमयेज्ज्वरमाशु त्रिदोषजम् । जाड्यं सशोफमाध्मानं गुरुत्वं चापकर्षति ।। मन्यास्तम्भमुरोघातमुरःपार्श्वशिरोरुजः ।

अमलतास, बच, नीम, परवल, खस, कुटज, शार्ङ्गेष्टा (काकजंघा अथवा काकमाची), अतीस, मरोड़फली, त्रिफला, दुरालभा, भद्रमुस्ता (मोथे का भेद), बला, पाठा, मुलहठी, भद्ररोहिणी-इनका कषाय शीघ्र ही त्रिदोषज (सन्निपात)

विशेषकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३३५

ज्वर को शान्त करता है। इसके प्रयोग से जडता, शोथ, आध्मान, गुरुता, मन्यास्तम्भ, उरोघात (उरःक्षत), उदरशूल, पार्श्वशूल एवं शिरःशूल आदि नष्ट होते हैं॥

उपनाहैः सलवणैर्भ्युष्णैरुपनाहयेत् ।।
चिरकालोपवासस्य नस्योष्णाकवलग्रहैः । हृदयं क्ष१ण्यते जन्तोः पार्श्वकण्ठौष्ठतालु च ।।
क्षतोरस्को घनं श्लेष्म सरक्तं ष्ठीवते ततः । ष्ट्यूते चायम्यते मूर्च्छास्तेन जन्तुर्विगच्छति ।।
दह्यते जठरं चास्य किञ्चिच्च परिकूजति । निद्रायते च पीत्वाऽऽशु जीर्णे जागर्ति चोदके ।।

उपर्युक्त रोग यदि चिरकालीन हों तो लवणयुक्त उष्ण उपनाहों (पुलटिसों) के द्वारा इसका उपनाह (स्वेदन) करना चाहिये। इसके विपरीत नस्य तथा उष्ण कवल ग्रहों के प्रयोग से रोगी का हृदय, पार्श्व, कण्ठ, ओष्ठ एवं तालु क्षतयुक्त हो जाते हैं। उसे उरःक्षत हो जाता है तथा उसके थूक के साथ रक्तयुक्त गाढ़ी श्लेष्मा निकलती है। रोगी बार २ थूकता है, वह थक जाता है तथा मूर्च्छित हो जाता है। रोगी के उदर में दाह होता हैं तथा कुछ गुड़गुड़ शब्द होते रहते हैं। इस कषाय के पीने के बाद रोगी को शीघ्र ही नींद आ जाती है तथा फिर कषाय के जीर्ण होने पर रोगी जागता है।।

लङ्घनोष्णोपचाराद्वा व्याधौ पित्तोत्तरे नृणाम् । तीक्ष्णौषधप्रयोगाच्च पित्तमस्य प्रकुप्यति ।।

पित्त प्रधान रोगों में लंघन, उष्णोपचार एवं तीक्ष्ण ओषधियों के प्रयोग से रोगी का पित्त प्रकुपित हो जाता है ।।

पित्तोत्तरं सन्निपातमेभिर्ज्ञात्वा तु कारणैः । मुस्तादिक्कथितं तोयं शीतं समधुशर्करम् ।।
पाययेदातुरं काले तेन शर्म लभेत सः । विस्रंस्यतेऽल्पमपि चेत्तेनैवाशु सुखी भवेत् ।।

उपर्युक्त कारणों (हेतुओं) के द्वारा पित्तप्रधान सन्निपात को जानकर रोगी यथासमय मुस्तादि क्वाथ को ठण्डा करके उसमें मधु एवं शर्करा मिलाकर पिलाना चाहिये। इससे रोगी को शान्ति मिलती है। यदि इससे रोगी को थोड़ा भी विरेचन हो जाय तो उसे शीघ्र ही शान्ति मिल जाती है ।।

त्रिफला पिप्पली श्यामा केसरं शर्करा त्रिवृत् । सक्षौद्रो मोदको ह्येष पित्तोत्तरमपोहति ।।

त्रिफला, पिप्पली, श्यामा (काली त्रिवृत्), नागकेशर, शर्करा तथा अरुण त्रिवृत् के मधु के साथ मोदक (लड्डू) बनाकर प्रयोग करने से पैत्तिक रोग नष्ट हो जाते हैं ।।

यवकोलकुलत्थानां पञ्चमूलद्वयस्य च । त्रिफलायाश्च निष्क्वाथे सर्पिर्धीरो विपाचयेत् ।।
संह२त्य कल्कानेतांश्च सुपिष्टान् भागकल्पितान् ।
मुस्ता पाठा वचा शुण्ठी रोहिणी चव्यचित्रकौ ।।
शृङ्गी दुरालभा शिग्रुः कैरातो रजनीद्वयम् । तेजोवती सोमवल्कः सप्तपर्णः सकेबुकः ।।
वयस्था पिप्पलीमूलं पिप्पली गजपिप्पली । छिन्नरुहा चातिविषा पत्रं निम्बपटोलयोः ।।
कण्डोपपुष्पी गोडिह्वा नक्तमालफलानि च । तुम्बुरुं पौष्करं मूलं मूलं च मदनार्कयोः ।।
क्षाराः सपञ्चलवणा हिङ्गुमात्रासमन्वितम् ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १९६ तमं पत्रम्।)
सिद्धमेतैर्यथान्यायं सर्पिः कटुकसंज्ञितम् ।।
पाययेन्मात्रया काले सन्निपातज्वरार्दितम् ।


१. क्षतयुक्तं भवतीत्यर्थः।
२. समाहृत्य एकीकृत्येति यावत्।

४४ का.सं.

३३६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विशेषकल्पः ? ]

कटुसर्पि—यव (जौ), कोल (बेर), कुलथी, दोनों (लघु एवं बृहत्) पञ्चमूल तथा त्रिफला के क्वाथ में धीर व्यक्ति घृत का पाक करे। इसमें नागरमोथा, पाठा, वच, सोंठ, रोहिणी (कटुकी), चव्य, चित्रक, काकड़ाशृंगी, दुरालभा, सहिजना, चिरायता, हरिद्रा, दारुहरिद्रा, तेंजोवती (तेजबल), सोमवल्क (श्वेतखदिर), सप्तपर्ण, केबुक (कन्दशाक-फूलगोभी-Cabbage), वयस्था (हरड़), पिप्पलीमूल, पिप्पली, गजपिप्पली, छिन्नरुहा (गिलोय), अतीस, तेजपत्र, नीम, पटोल, (परवल), कण्डोपपुष्पी (?), गाजवा, अमलतास की फलियां, तुम्बुरु (धनिया), पुष्करमूल, मैनफल तथा आक की जड़—इनका अच्छी प्रकार पीसकर तथा उचित मात्रा में कल्क लेकर और इसमें सर्जक्षार, पांचों नमक तथा हींग की उचित मात्रा डालकर यथाविधि सिद्ध किया हुआ घृत कटुसर्पि कहलाता है। सन्निपात ज्वर से पीड़ित रोगी में मात्रा एवं काल के अनुसार इस घृत का प्रयोग कराना चाहिये॥

लीनदोषावशेषं च विषमज्वरपीडितम् ।।
हद्रोगं ग्रहणीदोषं वातगुल्मं प्लीहोदरम् । श्वासं कासं च शमयेद्वलमग्नेश्च दीपयेत् ।।

इसके सेवन से विषमज्वर से पीड़ित रोगी के लीन एवं अवशिष्ट दोष, हृद्रोग, ग्रहणी दोष, वातगुल्म, प्लीहोदर, श्वास तथा कास आदि शान्त होते हैं तथा जाठराग्नि प्रदीप्त होती है॥

सन्निपातेषु भूयिष्ठं निवृत्तोपद्रवेष्वपि । श्लेष्मा च पार्श्वशूलं च निवर्तेत समग्रतः ।।

सन्निपात रोगों में पुनः उपद्रवों को शान्त हो जाने के बाद भी इसका सेवन करने से श्लेष्मा तथा पार्श्वशूल शान्त हो जाते हैं॥

तस्याग्निं चिरकारित्वाद्विषक् संदीपयेत् पुनः ।

बहुत देर हो जाने के बाद भी वैद्य को चाहिये कि उस सन्निपात के रोगी की जाठराग्नि को प्रदीप्त करे॥

न चातिविश्वसेद्वैद्यो जितो व्याधिर्मयेति ह ।।
कृशे विरुद्धसेवित्वाच्चिराद्दोषः प्रकुप्यति । व्यावृत्तश्च पुनर्हन्ति सन्निपातो यथा विषम् ।।

वैद्य पूर्ण रूप से विश्वास न कर ले कि मैंने रोग को जीत लिया है क्योंकि कृश व्यक्ति में विरुद्ध आहार आदि के सेवन से कुछ देर के बाद भी दोष पुनः प्रकुपित हो जाता है। इस प्रकार दोबारा हुआ (Relapsed) सन्निपात विष के समान रोगी को मार देता है।

वक्तव्य—ज्वर आदि में (Relapse) प्रायः भोजन के दोष से ही होता है। अधिक अथवा विषम भोजन से इसके होने की अधिक संभावना रहती है। (G. E. Beaumont) की (Medicine) में भी कहा है—‘Relapses are more commen after a high caloric diet has been given’

सन्निपातात् समुत्तीर्णो यदि जीवति मानवः । क्षीणौजोबलमांसात्मा शीर्णश्मश्रुशिरोरुहः ।।
स्वरस्मृतिपरिभ्रष्टः क्षीणशुक्रो हतेन्द्रियः । अव्यक्तवाग्विवर्णश्च मन्दाग्निश्च भवत्यसौ ।।

सन्निपात ज्वर से पार हुआ या बचा हुआ रोगी यदि किसी प्रकार जीवित रहता भी है तो उसके ओज, बल, मांस एवं आत्मा क्षीण हो जाती है, दाढ़ी-मूँछ तथा सिर के बाल झड़ने लगते हैं, उसका स्वर तथा स्मृति शक्ति कमजोर हो जाती है, वीर्य क्षीण हो जाता है, सब इन्द्रियों की शक्ति नष्ट हो जाती है, उसकी वाणी एवं वर्ण अस्पष्ट हो जाता है तथा उसकी अग्नि मन्द हो जाती है॥

सन्निपातेन मुक्तस्तु चिरादाप्यायते नरः । दृष्ट्वा संभोजनीयश्च पुनर्जन्म हि तस्य तत् ।।

विशेषकल्प: ? ] कल्पस्थानम् ३३७

सन्निपात ज्वर से छुटकारा पाने के बाद रोगी बहुत देर में पुष्ट होता है। उसे देखकर (ध्यानपूर्वक) भोजन कराना चाहिये क्योंकि वह उसका पुनर्जन्म होता है। अर्थात् सन्निपात ज्वर के बाद यह समझा जाता है कि मृत्यु के मुख से वापिस आया है। अतः उसका पुनर्जन्म हुआ समझना चाहिये॥

तदवस्थो व्यभिचरेद्यदि रोगानवाप्नुते। ज्वरशोषारुचिप्लीहयक्ष्मपाण्डून्न जीवति ।।

इस अवस्था में रोगी यदि इस भोजन क्रम का उल्लंघन करे अर्थात् भोजन व्यवस्था का ठीक प्रकार पालन न करे तो उसे ज्वर, शोष, अरुचि, प्लीहावृद्धि, यक्ष्मा तथा पाण्डु आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं॥

सर्वलक्षणसंपन्नः सर्वोपद्रवसंयुतः। त्रिरात्रोपेक्षितश्चापि सन्निपातो न सिद्ध्यति ।।

सब लक्षणों एवं सब उपद्रवों से युक्त सन्निपात रोग की यदि तीन दिन भी उपेक्षा की जाय तो फिर वह ठीक नहीं होता॥

सन्निपाते निवृत्ते तु यो व्याधिरवलम्बते। सोपद्रवाँस्ताँश्चिकित्सेद्यथास्वैः स्वैश्चिकित्सितैः ।।

सन्निपात रोग के अच्छा हो जाने के बाद पीछे से जो रोग हो जाते हैं उन्हें उपद्रव कहते हैं। इन उपद्रवों की अपनी २ चिकित्सा के अनुसार चिकित्सा करनी चाहिये।

एकाहारब्रह्मचर्यलघुपानारन्नसेवनम्। अकर्मण्यमनायासः सुखशय्यासनस्थितिः ।।
दिवाजागरणं सद्भिः सुहृद्भिश्च सहासनम्। अभ्यङ्गाच्छादने चित्रं कदाचित् स्नेहमेव तु ।।
जाङ्गलाँश्च रसानुष्णान् कुलत्थरससाधितान्। वास्तुकं तण्डुलीयं च संस्कृतं बालमूलकम् ।।
सेवेत विधिवच्चैव द्वौ मासौ जीवितार्थिकः। त्रीन्मासाँश्चतुरो वाऽपि जिहात्वादस्य यक्ष्मणः ।।

सन्निपात रोग के बाद रोगी को दिन में एक समय भोजन करना चाहिये, ब्रह्मचर्यपूर्वक रहना चाहिये, तथा लघु अन्न-पान का सेवन करना चाहिये। उसे सहसा अधिक कार्य नहीं करना चाहिये, उसे सुखपूर्वक सोना तथा बैठना चाहिये। दिन में नहीं सोना चाहिये, सज्जन मित्रों के साथ बैठना चाहिये। नाना प्रकार के अभ्यङ्ग एवं आच्छादन का प्रयोग करना चाहिये। तथा कभी २ स्नेह का सेवन करना चाहिये। कुलथी के रस से सिद्ध किये हुए तथा उष्ण जांगल मांसरसों का प्रयोग करना चाहिये। बथुआ, चौलाई तथा संस्कार की हुई कच्ची मूली का सेवन करना चाहिये। इस प्रकार इस रोग के अत्यन्त कुटिल होने से जीवन को चाहने वाले रोगी को उपर्युक्त आहार-विहार का विधिपूर्वक दो, तीन अथवा चार मास तक सेवन करना चाहिये॥

सुशृतेन समश्नीयात् पयसाऽऽज्येन पैत्तिकः। शर्कराक्षौद्रयुक्तेन गवां क्षीरेण वा पुनः ।।

यदि पित्त की अधिकता हो तो रोगी के द्वारा अच्छी प्रकार सिद्ध किये हुए दूध का सेवन करना चाहिये। अथवा शुद्ध गाय का दूध खाण्ड तथा मधुमिश्रित करके सेवन करना चाहिये॥

कर्पूरचूर्णं तृष्णायां वदने धारयेत् सदा। तैलानि गन्धपुष्पाणि नित्यं मुख्यानि धारयेत् ।।

यदि रोगी को प्यास लगती हो तो मुख में सदा कर्पूर चूर्ण रखना चाहिये तथा नित्य तेल और गन्धयुक्त फूलों का धारण करना चाहिये॥

औदकानूपमांसानि माषपिष्टतिलोत्कृतम्। मन्दजातानि मद्यानि गुरूरायभिनवानि वा ।।
पायसं कृसरं चुक्रं शष्कुल्यो यावकं दधि। वर्जयेत्तानि सर्वाणि श्रद्धाभोजनमेव च ।।
अश्वव्यायामसंक्लेशं शीताम्बु मदिरासवम्। अवश्यायं पुरोवातमभ्युष्णं च विवर्जयेत् ।।

३३८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्संहिताकल्प: ? ]

सन्निपात में अपथ्य—इसमें औदक तथा आनूप मांस, उड़द की पिट्ठी तथा तिलों के प्रयोग, मन्दजात (जो ठीक तरह से बनी नहीं है), गुरु तथा नवीन मद्य, खीर, खिचड़ी, चुक्र (सिरका), जलेबियां, जौ के योग, दही तथा अत्यन्त स्वादु भोजन आदि का (अधिक स्वादु भोजन होने से जिह्वालौल्य वश अधिक खा जाता है) तथा घुड़सवारी एवं व्यायाम के क्लेश, शीतल जल, मदिरा एवं आसव, ओस (ओस में सोना या घूमना आदि), सामने की हवा तथा उष्ण पदार्थों के प्रयोग का त्याग कर देना चाहिये।

यानि तस्य प्रशस्यन्ते श्रद्धाभोज्यानि जीवक ! ।
पथ्यानि चान्नपानानि यथास्वं तानि मे शृणु ।।

हे जीवक ! इसके लिये जो २ श्रद्धा उत्पन्न करने वाले भोजन तथा पथ्यकारक अन्न-पान प्रशंसित माने गये हैं उनको यथाक्रम तू मेरे से सुन ।।

गुडसर्पिषि पिप्पल्यः संस्कृता दधिसाधिताः । तथा मुख्यं गुडकृतं भक्ष्या मुद्गमयाश्च ये ।।
यवगोधूमसंस्कारा दाधिकं शुष्कमूलकम् । मुद्गामलकयूषश्च तिक्तसूपश्च सर्पिषा ।।
एवं श्रद्धाविनयनं भिषक्कुर्यादरोचके । अप्रमादेन धर्मार्थी चिकित्सेन्मतिमान् भिषक् ।।

सन्निपात में पथ्य—गुड तथा घृत के साथ संस्कृत की हुई तथा दही में सिद्ध की हुई पिप्पली, मुख्य २ गुड के विकार या प्रयोग, मूंग के बने हुए भक्ष्य पदार्थ, जौ तथा गेहूं के संस्कार अर्थात् उनके बने हुए पदार्थ, दही के बने हुए पदार्थ, सूखी मूली, मूंग तथा आंवले का यूष (Juice), घृत मिला हुआ तिक्त पदार्थों का यूष आदि—इसके लिये पथ्य हैं। इस प्रकार अरुचि होने पर उपर्युक्त पदार्थों के द्वारा रोगी की भोजन में रुचि उत्पन्न करनी चाहिये । तथा धर्म की इच्छा करनेवाले एवं बुद्धिमान् चिकित्सक को इस रोगी की प्रमादरहित होकर चिकित्सा करनी चाहिये ।।

सूतिकोपक्रमाध्याये यच्च वक्ष्ये खिले मुने ! । तदिहापि प्रयोक्तव्यं सन्निपातचिकित्सितम् ।।

हे मुनि ! इसके अतिरिक्त खिलस्थान में सूतिका-सम्बन्धी चिकित्सा के अध्याय में जो विधान कहा जायगा, उस सबका यहां सन्निपात चिकित्सा में भी प्रयोग करना चाहिये ।।

इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
इति (कल्पस्थाने) विशेषकल्पः ।


ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।
इति (कल्पस्थाने) विशेषकल्पः ।


संहिताकल्पाध्यायः ।

अथातः संहिताकल्पं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम संहिता कल्प का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।१-२।।

संहिताकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३३९

संहिताध्ययने युक्तः शुचिः साधुर्जितेन्द्रियः । वैद्यो वैद्यकुले जातो ग्रन्थे चार्थे च निश्चितः ।। ३ ।।
स पृष्टोऽन्येन वैद्येन प्रब्रूयात् संहिताविधिम् ।

पवित्र, सज्जन, जितेन्द्रिय, वैद्यकुल में उत्पन्न हुए तथा ग्रन्थ एवं विषय में निष्ठा (विश्वास) रखने वाले वैद्य को संहिता के अध्ययन में तत्पर होना चाहिये। तथा दूसरे वैद्य के पूछने पर वह उसे संहिता की सम्पूर्ण विधि बताये ।।

कति स्थानमिदं तन्त्रं कस्मात्तन्त्रमिति स्मृतम् ।। ४ ।।
स्थानानां कानि नामानि कर्माध्यायानि यानि च ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १९७ तमं पत्रम्)
स्थानानामानुपूर्वीं च श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।। ५ ।।

भगवन् ! मैं ठीक प्रकार से सुनना चाहता हूँ कि इस तन्त्र में कितने स्थान हैं ? इसे तन्त्र क्यों कहा है ? स्थानों के क्या २ नाम हैं ? उनमें कर्म (विषय) एवं अध्याय कौन से हैं ? तथा इसमें उपर्युक्त स्थानों के क्या क्रम हैं ? इत्यादि विषयों को मैं तत्वपूर्वक सुनना चाहता हूँ ।।४-५।।

अष्टौ स्थानानि वाच्यानि ततोऽतस्तन्त्रमुच्यते ।
अध्यायानां शतं विंशं योऽधीते स तु पारगः ।। ६ ।।

इस संहिता में आठ स्थान हैं इस लिये इसे तन्त्र कहते हैं। इन आठ स्थानों में १२० अध्याय हैं। जो इस संहिता का अध्ययन करता है वह इस भवसागर से पार हो जाता है ।।

सूत्रस्थाननिदानानि विमानान्यात्मनिश्चयः । इन्द्रियाणि चिकित्सा च सिद्धिः कल्पाश्च संहिता ।। ७ ।।
इस संहिता में सूत्र, निदान, विमान, शारीर, इन्द्रिय, चिकित्सा, सिद्धि तथा कल्प-ये आठ स्थान हैं ।।७।।

सूत्रस्थानं चिकित्सा च त्रिंशदध्यायके उभे ।
निदानानि विमानाश्च शारीराण्राष्टकानि तु ।। ८ ।।
सिद्धयो द्वादशाध्यायाः कल्पाश्चैवेन्द्रियाणि च । खिलान्यशीतिरध्यायास्तन्त्रं सखिलमुच्यते ।। ९ ।।

सूत्र एवं चिकित्सा स्थान इन दोनों में तीस २ अध्याय हैं। निदान, विमान एवं शारीर स्थान में आठ २ अध्याय हैं। सिद्धि, कल्प एवं इन्द्रिय स्थान में बारह २ अध्याय हैं। खिलस्थान में ८० अध्याय हैं। इस प्रकार खिलस्थान सहित यह सम्पूर्ण तन्त्र कहलाता है ।।८-९।।

धारणं ह्यस्य तन्त्रस्य वेदानां धारणं यथा । पुण्यं मङ्गल्यमायुष्यं दुःस्वप्नकलिनाशनम् ।। १० ।।
धर्मार्थकाममोक्षाणां धर्म्यायतनं महत् । सुखप्रदं नृणां शश्वद्धनमानयशस्करम् ।। ११ ।।

वेदों के धारण के समान इस तन्त्र का धारण करना पुण्य एवं मंगलकारक, आयुष्य का देने वाला, दुःस्वप्न एवं कलि (पापों) का नाश करने वाला, धर्म, अर्थ काम तथा मोक्ष का देने वाला, धर्म का महान् आयतन, तथा प्राणियों को निरन्तर सुख, धन, मान, एवं यश का देने वाला है ।।१०।।

नाधार्मिको न चापुत्रो नाविद्वान्न च गर्हितः । नापूजितो नाविदितो लोके भवति पारगः ।। १२ ।।
जो व्यक्ति धार्मिक, पुत्रवान् (पुत्र युक्त), विद्वान्, अनिन्दित, पूजा (आदर) युक्त तथा ज्ञानी नहीं है वह इस संसार सागर से पार नहीं हो सकता है ।।१२।।

सततं चाप्यधीयानः सम्यगध्यापयन् भिषक् । इह लोके यशः प्राप्य शक्रलोके महीयते ।। १३ ।।

३४० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् संहिताकल्प: ? ]

निरन्तर इस शास्त्र का अध्ययन करने एवं सम्यक् प्रकार से अध्यापन करने से वैद्य इस लोक में यश को प्राप्त करके इन्द्रलोक (परलोक) में प्रतिष्ठा को प्राप्त करता है ॥१३॥

दक्षयज्ञे वधत्रापाद्देवर्षीणां पलायताम् । रोगाः सर्वे समुत्पन्नाः संतापाद्देहचेतसोः ॥१४॥

प्रजापति दक्ष के यज्ञ में (रुद्र द्वारा यज्ञ के ध्वंस करने पर) मृत्यु के डर से पलायन करते (दौड़ते) हुए देवता और ऋषियों के देह (शरीर) एवं मन के सन्ताप से सम्पूर्ण रोग उत्पन्न हुए ॥१४॥

ज्वरो गुरुत्वाद् गुल्मस्तु धावतां प्लवनात् प्लीहा । भ्रमो विषादाद्विद्भेदो धावतां वेगधारणात् ॥१५॥
तृष्णा च रक्तपित्तं च श्रमादुष्णे च धावताम् ।
हिक्काश्वासौ कफाधिक्याद्धावतां पिबतां जलम् ॥१६॥
प्रागुत्पत्तिस्तथाऽन्येषां रोगाणां परिकीर्तिता । कृतत्रेतान्तरत्वेन प्रादुर्भूता यथा नृणाम् ॥१७॥
धर्मार्थकाममोक्षेषु विद्याबलयशोहराः ।

शरीर के गुरु होने से ज्वर, उनके दौड़ने से गुल्म, प्लवन (तैरने) से प्लीहा (प्लीहावृद्धि-Enlargement of spleen), विषाद से भ्रम, दौड़ते हुए के वेगों को धारण करने से विड्भेद (अतिसार), दौड़ते हुए लोगों के उष्णकाल में श्रम (थकावट) से तृष्णा एवं रक्तपित्त, कफ की अधिकता एवं दौड़ते हुए जल पीने से हिक्का एवं श्वासयोग तथा अन्य भी धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, विद्या, बल एवं यश को नष्ट करने वाले रोग सत्ययुग तथा त्रेतायुग के मध्य में जिस प्रकार उत्पन्न हुए हैं, उनकी पूर्व उत्पत्ति का वर्णन किया गया है ॥१५-१७॥

ततो हितार्थं लोकानां कश्यपेन महर्षिणा ॥१८॥
पितामह्नियोगाच्च दृष्ट्वा च ज्ञानचक्षुषा । तपसा निर्मितं तन्त्रमृषयः प्रतिपेदिरे ॥१९॥
जीवको निर्गततमा ऋचीकतनयः शुचिः । जगृहेऽग्रे महातन्त्रं संचिक्षेप पुनः स तत् ॥२०॥
नाभ्यनन्दन्त तत् सर्वे मुनयो बालभाषितम् ।

तब लोक कल्याण के लिये महर्षि कश्यप ने पितामह ब्रह्मा के नियोग एवं अपने ज्ञानचक्षुओं से देखकर तपस्या के प्रभाव से तन्त्र का निर्माण किया । तथा ऋषियों ने उसका प्रतिपादन किया । उसके बाद सर्वप्रथम तम (अज्ञान) से शून्य, पवित्र एवं ऋचीक के पुत्र जीवक ने इस महान् तन्त्र को ग्रहण करके संक्षिप्त किया । परन्तु सब ऋषियों ने बालभाषित (बालक का वचन) कहकर उसकी प्रशंसा नहीं की ॥१८-२०॥

ततः समक्षं सर्वेषामृषीणां जीवकः शुचिः ॥२१॥
गङ्गाह्रदे कनखले निमग्नः पञ्चवार्षिकः । वलीपलितविग्रस्त उन्ममज्ज मुहूर्त्तकात् ॥२२॥

तब उस पांच वर्ष की आयु वाले एवं पवित्र जीवक ने सब ऋषियों के समक्ष कनखल स्थित गङ्गा के कुण्ड में डुबकी लगाई । तथा क्षणभर में झुर्रियों एवं सफेद बालों से युक्त होकर बाहर निकल आया ॥२१-२२॥

ततस्तदद्भुतं दृष्ट्वा मुनयो विस्मयं गताः । वृद्धजीवक इत्येव नाम चक्रुः शिशोरपि ॥२३॥
प्रत्यगृह्णन्त तन्त्रं च भिषक्च्छ्रेष्ठं च चक्रिरे ।

तब इस अद्भुत घटना को देखकर सम्पूर्ण मुनियों को बड़ा आश्चर्य हुआ तथा उस बालक का नाम भी उन्होंने वृद्ध जीवक रखदिया । तथा उसके तन्त्र को स्वीकार करके उसे श्रेष्ठ वैद्य मान लिया ॥२३॥

ततः कलियुगे नष्टं तन्त्रमेतद्यदृच्छया ॥२४॥

संहिताकल्प: ? ] कल्पस्थानम् ३४१

अनायासेन यक्षेण धारितं लोकभूतये। वृद्धजीवकवंशयेन ततो वात्स्येन धीमता ।।
अनायामं प्रसाद्याथ लब्धं तन्त्रमिदं महत्।

उसके बाद सहसा नष्ट हुए इस तन्त्र को लोककल्याण के लिये कलियुग में अनायास नामक यक्ष ने धारण किया। तब वृद्ध जीवक के वंश वाले बुद्धिमान् वात्स्य ने अनायास नामक यज्ञ को प्रसन्न करके इस महान तन्त्र को प्राप्त किया ॥

ऋग्यजुःसामवेदाँस्त्रीनधीत्याङ्गानि सर्वशः ।।२६।।
शिवकश्यपयक्षांश्च प्रसाद्य तपसा धिया। संस्कृतं तत् पुनस्तन्त्रं वृद्धजीवकनिर्मितम् ।।२७।।
धर्मकीर्तिसुखार्थाय प्रजानामभिवृद्धये।

ऋक्, यजु, साम आदि तीनों वेदों एवं शिक्षा, व्याकरण आदि छओं अङ्गों का अध्ययन करके तथा अपनी तपस्या एवं बुद्धि के कारण शिव, कश्यप और यक्षों को प्रसन्न करके धर्म, कीर्ति तथा सुख एवं लोकसमृद्धि के लिये उसने वृद्धजीवक के बनाये हुए उस तन्त्र का संस्कार किया ॥२६-२७॥

स्थानेष्वष्टसु शाखायां यद्यन्नोक्तं प्रयोजनम् ।।२८।।
तत्तद्भूयः प्रवक्ष्यामि खिलेषु निखिलेन ते।

इस संहिता के आठों स्थानों तथा शाखाओं में जो २ विषय नहीं कहा गया है उसका मैं पुनः खिलस्थान में उपदेश करूँगा ॥२०॥

(इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।)
(इति) वृद्धजीवकीये तन्त्रे कौमारभृत्ये वात्स्यप्रतिसंस्कृते कल्पेषु संहिताकल्पो नाम द्वादशः ।।
समाप्तं च कल्पस्थानम् ।। संमाप्ता चेयं सहिता ।।
अतः परं खिलस्थानं भवति ।।

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।
इति कल्पस्थानंसमाप्तम् ।

अथ नवमं खिलस्थानम्। ..................................

विषमज्वरनिर्देशीयाध्यायः प्रथमः।

अथातो विषमज्वरनिर्देशीयं नामाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम विषमज्वरनिर्देशीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥

कश्यपं सर्वशास्त्रज्ञं सर्वलोकगुरुं गुरुम्। भार्गवः परिपप्रच्छ संशयं संश्रितव्रतः ॥३॥
सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता, सब लोकों के गुरु तथा महान् कश्यप से व्रत का धारण करने वाले भार्गव (वृद्धजीवक) ने संशय युक्त प्रश्न को पूछा ॥३॥

प्रोक्तं ज्वरचिकित्सायां विषमज्वरभेषजम्। न निर्दिष्टं भगवता विषमत्वस्य कारणम् ॥४॥
आपने ज्वर चिकित्सा में विषम ज्वर की ओषधि का वर्णन किया था परन्तु वहां आपने विषमता का कारण नहीं बतलाया ॥४॥

युक्तं सततकादीनां वैषम्यं विषमागतेः। अविसर्गी ज्वरः कस्मात् संततो विषमः स्मृतः ॥५॥
(इति ताडपत्रपुस्तके १९८ तमं पत्रम्)
प्रेतज्वरो ग्रहोत्थश्च विषमः केन हेतुना।

विषम गति वाले सतत आदि ज्वरों की विषमता तो युक्तियुक्त है परन्तु अविसर्गी (निरन्तर रहने वाले) सन्तत ज्वर को विषम कहने का क्या अर्थ है ? इसी प्रकार प्रेतज्वर एवं ग्रहोत्थ ज्वर को विषम मानने का क्या कारण है ? ॥५॥

तदिदानीं यथाकालं वक्तव्योऽवयवाद्यथा ॥६॥
वक्तुमर्हसि तत्त्वेन सविशेषं सविस्तरम्।
अब आप यथासमय पृथक् २ तथा विस्तार पूर्वक इन सबों का वर्णन करने की कृपा करें ॥६॥

इति पृष्टः स शिष्येण प्रश्नं प्रोवाच कश्यपः ॥७॥
इस प्रकार शिष्य द्वारा प्रश्न पूछा जाने पर महर्षि कश्यप ने उत्तर दिया ॥७॥

अल्पहेतुर्बहिर्मार्गो वैकृतो निरुपद्रवः। एकाश्रयः सुखोपायो लघुपाकः समो ज्वरः ॥८॥
समज्वर के लक्षण—स्वल्प कारणों वाला अर्थात् अल्प कारणों से उत्पन्न होने वाला, बहिर्मार्ग अर्थात् बहिर्वेगो बाला, वैकृत (विकारों से उत्पन्न होने वाला), उपद्रव रहित, एक आश्रय वाला (चरक चि. अ. ३ में—ज्वर के रस,

विषमज्वरनिदंशीयाध्याय ? ] खिलस्थानम् ३४३

रक्त, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा, शुक्र आदि ७ आश्रय दिये हैं—इनमें से जो केवल एक को ही आश्रित करके हो), सुखपूर्वक जिसकी चिकित्सा की जा सके तथा जो लघुपाक वाला होता है वह समज्वर कहलाता है। बहिर्वेग ज्वर के चरक चि.अ. ३ में निम्न लक्षण दिये हैं—सन्तापोऽभ्यधिको बाह्यस्तृष्णादीनां च मार्दवम्। बहिर्वेगस्य लिङ्गानि सुखसाध्यत्वमेव च॥ यह सुखसाध्य माना गया है ॥८॥

विषमस्तद्विपर्यस्तस्तीक्ष्णत्वात् संततो मतः । तद्वत् प्रेतग्रहोत्था ये चत्वारो विषमागमात् ।।९।।

इसके विपरीत तीक्ष्ण होने के कारण सन्ततज्वर तथा प्रेत एवं ग्रहों से उत्पन्न होने वाले सतत आदि चारों ज्वर भी विषम गति के कारण विषमज्वर कहलाते हैं ॥९॥

दुर्जयत्वा(दुर्ग्रहत्वा)दुग्रग्रहपरिग्रहात् । वैषम्यं संततादीनां दारुणत्वादुदाहृतम् ।।१०।।

दुर्जय (दुर्ग्रह) होने के कारण, उग्र ग्रहों द्वारा गृहीत होने तथा दारुण (भयंकर) होने के कारण सन्तत आदि को विषमज्वर कहा गया है ॥१०॥

तथा सततकादीनां चतुर्णां कालकारितम् । विषमत्वं प्रवक्ष्यामि ज्वराणां जायते यथा ।।११।।

इसी प्रकार सतत आदि चारों प्रकार के ज्वर भी काल के अनुसार जिस प्रकार विषम होते हैं उनका मैं वर्णन करूंगा ।।

समस्ता द्वन्द्वशो वाऽपि धमनी रसवाहिनीः । दोषाः प्रपन्नाः कुर्वन्ति विषमा विषमज्ज्ववम् ।।१२।।

सम्पूर्ण अथवा दो २ दोष रसवाहिनियों धमनियों में पहुंच कर विषम हुए विषमज्वर को उत्पन्न करते हैं ॥१२॥

ज्वरितो मुच्यमानो वा मुक्तमात्रश्च यो नरः । व्यायामगुर्वसात्म्यान्नमत्तिमात्रमथो जलम् ।।१३।। पायसं कृशरां पिष्टं पललं दधि मन्दकम् । पिण्याकमाषविकृतीर्ग्राम्यानूपं तथाऽऽमिषम् ।।१४।। एवं विधानि चान्यानि विरुद्धानि गुरूणि च । सेवते च दिवास्वप्नमजीर्णाध्यशनानि च ।।१५।। ज्वरोऽभिवर्धते तस्य विषमो वाऽऽशु जायते ।

जो व्यक्ति ज्वरयुक्त अवस्था में, जो ज्वर से मुक्त होने की अवस्था में तथा जो ज्वर से मुक्त होने के बाद तुरन्त व्यायाम, गुरु एवं असात्म्य अन्न तथा अधिक मात्रा में जल, खीर, खिचड़ी, उड़द की पिट्ठी के बने हुए पदार्थ, मांस, अपूर्ण जमा हुआ दही, खल, उड़द के बने हुए पदार्थ, ग्राम्य तथा आनूप मांस तथा इसी प्रकार अन्य विरुद्ध एवं गुरु पदार्थों का तथा दिवास्वप्न, अजीर्ण एवं अध्यशन का सेवन करता है—उसका ज्वर बढ़ जाता है तथा वह शीघ्र ही विषम ज्वर का रूप धारण कर लेता है ॥१३-१५॥

दोषेष्वपरिपक्वेषु कषायं यश्च सेवते ।।१६।। लौल्याद्वा स्नेहपानानि क्षीरं संतर्पणानि वा । दैवतानामभिध्यानाद् ग्रहसंस्पर्शनादपि ।।१७।। सद्यो वान्तो विरिक्तो वा स्नेहपीतोऽनुवासितः । शीतोपचारं गुर्वन्नं व्यवायं यश्च सेवते ।।१८।। तस्यापि सहसा वायुरस्थिमज्जान्तरं गतः । कुपितः कोपयत्याशु श्लेष्माणं पित्तमेव च ।।१९।। ततोऽस्य धातुवैषम्याद्विषमो जायते ज्वरः । संततोऽन्येद्युको वाऽपि तृतीयः सचतुर्थकः ।।२०।।

दोषों के न पचने पर ही अर्थात् आमावस्था या ज्वर की तरुण अवस्था में ही जो कषाय का सेवन करता है अथवा जिह्वालौल्य के कारण जो व्यक्ति स्नेहपान, क्षीर अथवा सन्तर्पण (बृंहण) द्रव्यों का सेवन करता है, जो देवताओं द्वारा

३४४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् विषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ]

आक्रान्त तथा ग्रहों द्वारा स्पर्श किया जाता है अथवा वमन, विरेचन, स्नेहपान या अनुवासन का प्रयोग करने के बाद तुरन्त जो व्यक्ति शीत उपचार, गुरु अन्न तथा मैथुन का सेवन करता है—उस व्यक्ति के भी अस्थियों की मज्जा के अन्दर का वायु कुपित होकर शीघ्र ही कफ एवं पित्त को प्रकुपित कर देता है। इस प्रकार धातुओं के विषम हो जाने से उसे सतत, अन्येद्युक, तृतीयक तथा चतुर्थक नामक विषम ज्वर हो जाते हैं।

वक्तव्य—कषाय—यहां कषाय शब्द से कसैले द्रव्यों का अथवा पांच प्रकार की कषायकल्पनाओं में से किसी भी कषाय रस प्रधान रस प्रधान कल्पना का ग्रहण किया जाता है। क्योंकि कषाय रस स्तम्भक (Astringent) होने से दोषों की प्रवृत्ति नहीं होने देता इसीलिये दोषों की अपरिपक्वावस्था अथवा तरुण ज्वर में इसका निषेध किया गया है तथा स्वरस आदि पांचों कल्पनाओं में जो कषाय कल्पना है उसका भी त्याग करना चाहिये। कहा भी है—चतुर्भागावशिष्टस्तु यः षोडशगुणाम्भसा। स कषायः कषायः स्यात् स वर्ज्यस्तरुणज्वरे॥ कषायं यः प्रयुञ्जीत नराणां तरुणज्वरे। स सुप्तं कृष्णसर्पन्तु कराग्रेण परामृशेत्॥ तथा—न कषायं प्रयुञ्जीत नराणां तरुणे ज्वरे। कषायेणाकुलीभूता दोषा जेतुं सुदुष्कराः॥ इसी लिये चरक चि. अ. ३ में भी कहा है—नवज्वरे दिवास्वप्नस्नानाभ्यङ्गात्रमैथुनम्। क्रोधप्रवातव्यायामकषायांश्च विवर्जयेत् ॥१६-२०॥

न च नोपशमं याति न च भूयो न कुप्यति। शमप्रकोपयोः कालं न चायमतिवर्तते ॥२१॥

ये विषमज्वर शान्त न होते हों या पुनः प्रकुपित न होते हों—ऐसी बात नहीं है अर्थात् ये शान्त हो कर पुनः प्रकुपित हो जाते हैं। तथा इनका शमन एवं प्रकुपित होने के समय का उल्लंघन नहीं होता अर्थात् ये लगभग निश्चित समय पर शान्त होते हैं तथा निश्चित समय पर ही पुनः प्रकुपित होते हैं ॥२१॥

न च स्वभावोपशमं गच्छत्यनुशयात्मकः। न हि स्वभावशान्तानां भावानामस्ति संभवः ॥२२॥

अनुशय होने के कारण इनका स्वभाव शान्त नहीं होता। स्वभाव के शान्त हो जाने पर पदार्थों की पुनः उत्पत्ति नहीं होती है अर्थात् इनका स्वभाव नष्ट नहीं होता है इसलिये ये पूर्णरूप नष्ट नहीं हो पाते हैं तथा बार २ ये ज्वर अपना रूप प्रकट करते हैं ॥२२॥

ज्वरप्रवेगोपरमे देही मुक्त इवेक्ष्यते। तथाऽप्यस्यामवस्थायामेभिर्लिङ्गैर्न मुच्यते ॥२३॥
मुखवैरस्यकटुक्यमाधुर्यादिभिरल्पशः। नात्यन्नलिप्साग्लानिभ्यां शिरसो गौरवेण च ॥२४॥

ज्वर के वेग के शान्त हो जाने पर रोगी ज्वर से यद्यपि मुक्त हुआ प्रतीत होता है तथापि इस अवस्था में भी (अर्थात् वेग के शान्त होने पर भी) रोगी मुखवैरस्य (मुख की विरसता) तथा थोड़ा २ मुख का कड़वापन एवं मधुरता, अन्न की अधिक रुचि न होना, ग्लानि तथा सिर का भारी होना—इत्यादि लक्षणों से मुक्त नहीं हो पाता है ॥२३-२४॥

पुनः पुनर्यथा चैष जायते तन्निबोध मे। निरुद्धमार्गों दोषेण विषमज्वरहेतुना ॥२५॥
वायुस्तद्दोषकोपान्ते लब्धमार्गों यथाक्रमम्। दोषशेषं तमादाय यथास्थानं प्रपद्यते ॥२६॥
स दोषशेषः. स्वे स्थाने लीनः कालबलाश्रयात्।
रसस्थानमुपागम्य भूयो जनयति ज्वरम् ॥२७॥

यह विषमज्वर बार २ किस कारण से हो जाता है—वह अब तू मेरे से सुन—विषमज्वर को उत्पन्न करने वाले दोषों के द्वारा जिसका मार्ग रुक गया है ऐसा वायु उस दोष के प्रकोप के अन्त में मार्ग को प्राप्त करके क्रमशः उस बचे हुए दोष को लेकर यथास्थान पहुंच जाता है जिससे अपने स्थान पर लीन (स्थित) हुआ अवशिष्ट दोष काल एवं बल

विषमज्वरनिदंशीयाध्याय ? ] खिलस्थानम् ३४५

के आश्रय से रसस्थान (आमाशय) में पहुंच कर पुनः ज्वर को कर देता है। अष्टाङ्ग संग्रह चि. अ. १ में कहा है—आमाशयस्थो हत्वाग्निं सामो मार्गान् पिधापयन्। विदधाति ज्वरं दोषः ........।। अर्थात् आमाशय में आम रस के साथ मिलकर दोष शरीर में स्रोतों के मुखों को बन्द कर देते हैं। इससे जाठराग्नि मन्द हो जाती है तथा भोजन का पाक नहीं हो पाता है। जितना ही भोजन किया जायगा उतनी ही शरीर में आमरस की उत्पत्ति होगी—जिससे ज्वर की वृद्धि होगी ।।२५-२७।।

उपक्रमविशेषेण स्वबलस्य व्ययेन च। क्षयं प्राप्नोति वृद्धिं च समानगुणसंश्रयात् ।।२८।।

चिकित्सा की विशेषता के कारण अथवा ज्वर के बल के कम होने के कारण समान गुण के आश्रित होने से ज्वर क्षय अथवा वृद्धि को प्राप्त करता है ।।२८।।

सोऽयं निवृत्तिं संप्राप्य यथा दीपः स्वभावतः ।
पुनः पुनः प्रज्वलति क्षीणतैलेन्धनोऽपि सन् ।।२९।।
स्वमधिष्ठानमाश्रित्य शान्तः शान्तस्तथा ज्वरः।
काले बलं दर्शयति क्षीणदोषेन्धनोऽपि सन् ।।३०।।

जिस प्रकार निवृत्ति को प्राप्त होने पर दीपक तैल रूपी इन्धन के क्षीण होने पर स्वभाव से ही पुनः २ प्रज्वलित होता रहता है, उसी प्रकार यह ज्वर अपने अधिष्ठान (आमाशय) में पहुंच कर शान्त हुआ भी दोषरूपी इन्धन के क्षीण होने पर स्वयमेव समय पर अपने बल को प्रकट करता है अर्थात् दोषों के क्षीण हो जाने पर स्वभाव के नष्ट न होने से पुनः ज्वर को प्रकट करता है ।।२९-३०।।

स्वहेतुदोषमाश्रित्य नियतो नियमेन यः । अहोरात्रे दर्शयति कालहेतुकृतं बलम् ।।३१।।
द्विकालं स यथादोषं ज्वरः सततकः स्मृतः । स्थानमामाशयस्तस्य यं समाश्रित्य वर्तते ।।३२।।

सतत ज्वर—ज्वरोत्पादक हेतु एवं दोष का आश्रय करके जो नियमपूर्वक दिन रात (२४ घण्टे) में दो बार निश्चित समय पर काल एवं हेतु कृत बल को प्रकट करता है उसे सतत ज्वर कहते हैं। इसका स्थान आमाशय होता है इसके आश्रित होकर यह बढ़ता है। चरक चि. अ. ३ में इसकी सम्प्राप्ति निम्न प्रकार बताई है—रसधात्वाश्रयः प्रायो दोषः सततकं ज्वरम्। सप्रत्यनीकः कुरुते कालवृद्धिक्षयात्मकम् ।। अहोरात्रे सततको द्वौ कालावनुवर्तते । कालप्रकृतिदूष्याणां प्राप्यैवान्यतमाद्बलम् ।।३१-३२।।

उरस्त्वन्येद्युकस्थानमहोरात्रादुरश्च्युतः । दोषो रसं समासाद्य यदा दर्शयते बलम् ।।३३।।
तदाऽनुषङ्गी स्वे काले जायतेऽन्येद्युको ज्वरः ।

अन्येद्युक ज्वर—अन्येद्युक ज्वर का स्थान उर (छाती) माना गया है। अहोरात्र (२४ घण्टे) में छाती से यह दोष आमाशयस्थित रस में पहुंच कर अपने बल को प्रकट करता है तथा यह अनुषङ्गी हुआ प्रतिदिन अपने समय पर होता है इसे अन्येद्युक ज्वर कहते हैं। चरक चि. अ. ३ में कहा है—दोषो मेदोवहा रुद्ध्वा नाडीरन्येद्युकं ज्वरम्। सप्रत्यनीकः कुरुते एक कालमहर्निशि ।। अर्थात् २४ घण्टे में इसका वेग एक बार होता है ।।३३।।

कण्ठस्तृतीयकस्थानमहोरात्राच्च्युतस्ततः ।।३४।।
(इति ताडपत्रपुस्तके १९९ तमं पत्रम् ।)

उरः प्रपद्यतेऽन्यस्मादहोरात्राद्यथाक्रमम् । रसधात्वाश्रितो दोष ऊष्मणा सह मूर्च्छितः ।।३५।।

तृतीयेऽहनि निर्वृत्तिं जनयेत् स तृतीयकः ।

३४६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्विषमज्वरनिर्दशीयाध्याय ? ]

तृतीयेऽहनि निर्वृत्तिं जनयेत् स तृतीयकः ।

तृतीयक ज्वर—तृतीयक ज्वर का स्थान कण्ठ होता है। प्रथम अहोरात्र (२४ घण्टे) में दोष कण्ठ से च्युत होकर उर (छाती) में पहुंचता है तथा दूसरे अहोरात्र में वह यथाक्रम रसधातु (आमाशय स्थित) में पहुंचकर ऊष्मा (उष्णता) के साथ मूर्च्छित हुआ तीसरे दिन पुनः प्रकट होता है। उसे तृतीयक ज्वर कहते हैं। अर्थात् दोष अपने स्थान कण्ठ से क्रमशः प्रथम दिन छाती में पहुंचता है तथा वहां से अगले दिन आमाशय में पहुंचता है आमाशय में पहुंचकर पूर्वोक्तानुसार दोष रसवाहिनियों के मार्गों को बन्द कर देता है तब ज्वर की उत्पत्ति होती है। इसलिये तृतीयक ज्वर एक दिन छोड़कर अर्थात् तीसरे दिन (४८ घण्टे में एकबार) उत्पन्न होता है ॥३४-३५॥

शिरश्चतुर्थकस्थानं चतुर्थं समुदाहृतम् ।।३६।।
अहोरात्राच्च्युतः स्थानाद्दोषः कण्ठेऽवतिष्ठते । ततः पुनरहोरात्रादुरसि प्रतिपद्यते ।।३७।।
तृतीये चाप्यहोरात्रे रसधातौ प्रकुप्यति । चतुर्थकः स विज्ञेयश्चिरस्थायी महाज्वरः ।।३८।।
गम्भीरस्थानसंभूतो धातुसंकरदूषितः । दर्शयित्वा बलं काले जन्तोः शिरसि लीयते ।।३९।।
त्रिदोषसंभवत्वाच्च भूतसंस्पर्शनादपि । दुश्चिकित्स्यतमो ह्येष तस्माद्यत्नेनमुपक्रमेत् ।।४०।।

चतुर्थक ज्वर—चौथा चतुर्थक ज्वर होता है इसका स्थान शिर माना गया है। प्रथम अहोरात्र में अपने स्थान शिर से च्युत होकर दोष कण्ठ में पहुंचता है। अगले अहोरात्र में वह उर (छाती) में पहुंचता है तथा तृतीय अहोरात्र में वह दोष आमाशय स्थित रस धातु में पहुँचकर प्रकुपित होता है इसे चतुर्थक ज्वर कहते हैं। यह महाज्वर चिरस्थायी होता है अर्थात् यह अत्यन्त कठिनता से ठीक होता है। गंभीर स्थान में उत्पन्न होकर तथा अनेक धातुओं से दूषित हुआ यह अपने समय पर बलको प्रकट करके अर्थात् चतुर्थ दिन (७२ घंटे में एक बार) प्रकुपित होकर पुनः शिर में लीन हो जाता है अर्थात् वहां स्थित हो जाता है। त्रिदोष से उत्पन्न होने तथा भूतों का संसर्ग होने के कारण यह दुश्चिकित्स्य होता है इसलिये निम्न उपायों के द्वारा इसकी चिकित्सा करे। अर्थात् तीन अहोरात्र के बाद दोष अपने स्थान सिरसे यथाक्रम आमाशय में पहुंचता है इसलिये चतुर्थ दिन प्रकुपित होकर यह चतुर्थक ज्वर को करता है। तृतीयक तथा चतुर्थक ज्वर के लिये चरक चि. अ. ३ में कहा है—दोषोऽस्थिमज्जगः कुर्यात्तृतीयकचतुर्थकौ। अर्थात् अस्थि और मज्जा में पहुंचा हुआ दोष क्रमशः तृतीयक और चतुर्थक ज्वर को करता है। वहीं इन ज्वरों की गतियां निम्न प्रकार से कही गई हैं—गतिद्वयकान्तरान्येद्युर्दोषस्योक्ताऽन्यथा परैः । रक्तमेवाभिसंसृज्य कुर्यादन्येद्युकं ज्वरम् ।। मांसस्रोतांस्यनुसृतो जनयेत्तु तृतीयकम् । ज्वरं दोषः संसृतो हि मेदोमार्गं चतुर्थकम् ।। अर्थात् दोषों की गतियां क्रमशः प्रतिदिन, एक दिन छोड़कर अथवा दो दिन छोड़कर कही गई हैं। जब प्रतिदिन एक बार गति होती है तब अन्येद्युक ज्वर होता है। जब एक दिन के अन्तर से होती है तब तृतीयक और जब दो दिन के अन्तर से होती है तब चतुर्थक ज्वर होता है। सुश्रुत उ. अ. ३९ में ये गतियां निम्न प्रकार दी गई हैं—सन्ततं रसरक्तस्थः सोऽन्येद्युः पिशिताश्रितः । मेदोगतस्तृतीयेऽह्नि त्वस्थिमज्जगतः पुनः ।। कुर्याच्चतुर्थकं घोरमन्तकं रोगसङ्करम् ।।३६-४०।।

बलिभिः शान्तिहोमैश्च सिद्धैर्मन्त्रपदैस्तथा । पापापहरणं चास्य कर्तव्यं सिद्धिरिच्छता ।।४१।।
भूतेश्वरं नीलकण्ठं प्रपद्येत वृषध्वजम् ।

सिद्धि को चाहने वाले वैद्य को बलि, शान्ति, होम (शान्ति के निमित्त किये जाने वाले यज्ञ) तथा सिद्ध मन्त्रों के द्वारा इसके पाप का निराकरण करना चाहिये। नीलकण्ठ (नीले कण्ठ वाले) तथा वृषध्वज (जिसकी ध्वजा पर वृष-बैल का चिह्न हो) भूतेश्वर महादेव की उपासना करनी चाहिये ॥४१॥

विषमज्वरनिर्देशीयाध्याय ? ] खिलस्थानम् ३४७

चिरानुबन्धी विषमो यथाकालं विवर्धते ।।४२।।
एकाहाच्च द्व्यहाच्चैव त्र्याहाच्चतुरहात्तथा ।

चिरानुबन्धी (चिरकालीन अनुबन्ध वाला-जीर्ण) विषमज्वर यथासमय एक, दो, तीन तथा चार दिन बाद वृद्धि को प्राप्त होता है।

**वक्तव्य—**आधुनिक विज्ञान के अनुसार हम विषमज्वर को Malarial fever कह सकते हैं। पाश्चात्य विज्ञान मलेरिया को एक Specific protozoon (Malarial parasite) द्वारा उत्पन्न हुआ मानता है। मादा Anopheline नामक मच्छर के काटने से इसका संक्रमण मनुष्यों में होता है। इस पराश्रयी (Parasite) के दो Life cycles होते हैं। १. मनुष्य में Asexual cycle तथा २. मच्छर में Sexual cycle । सर्वप्रथम मच्छर के काटने से मनुष्य के अन्दर Sporozoite प्रविष्ट हो जाता है। वह रक्तकणों में प्रविष्ट होकर धीरे २ बढ़ता जाता है तथा अन्त में Merozoites के रूप में आजाता है। इस प्रकार Parasite का Asexual cycle मनुष्य में पूर्ण हो जाता है। अब जब मनुष्य को पुनः मच्छर काटता है तब ये मच्छर के आमाशय में पहुंचकर फिर वृद्धि को प्राप्त होते हैं तथा धीरे २ बढ़कर पुनः Sporozoites की अवस्था में मच्छर की लालाग्रन्थियों में पहुंच जाते हैं। इस प्रकार Parasite का Sexual cycle मच्छर में पूर्ण हो जाता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि Parasite के दो Life cycle हैं। इसे हम निम्न तालिका से प्रकट कर सकते हैं—

                     Macrogametocyte       Microgametocyte
                            │                     │
                     Macrogamete           Microgamete
                            └───┬─────────────┘
Sexual cycle                    │
(मच्छर में)                  Zygote
                                │
                              Oocyst
                                │
                           Sporozoites
                                │
                     Sporozoite मच्छर के काटनेसे प्रविष्ट
                                │
Asexual cycle              Trophozoite
(मनुष्य में)                    │
                            Schizont
                                │
                           Merozoites

Malarial Parasite तीन प्रकार के होते हैं—

  1. Plasmodium Vivex 2. P. Malarial 3. P. Falsiparum.