काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविशेषकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३२७
सन्निपातेषु दाहार्तं यः सिञ्चेच्छीतवारिणा ।
(इति ताडपत्रपुस्तके १९३ तमं पत्रम् ।)
आतुरः स कथं जीवेद्भिषग्वा स कथं भवेत् ।।
सन्निपात रोगों में दाह से पीडित रोगी का यदि शीतल जल से सिंचन किया जाय तो वह रोगी किस प्रकार जीवित रह सकता है तथा उसे वैद्य भी कैसे कहा जा सकता है ।।
सन्निपातेषु कम्पन्तं विलपन्तं च यो घृतम् । पाययेद्भोजयेद्वाऽपि तौ च स्यातामुभौ कथम् ।।
सन्निपात रोग में कांपते हुए तथा विलाप करते हुए रोगी को यदि घृत का पान अथवा भोजन कराया जाय तो वह रोगी किस प्रकार जीवित रह सकता है तथा उसे वैद्य भी कैसे कहा जा सकता है ।।
सन्निपातेषु तृप्यन्तं पार्श्वरुक्तालुशोषणम् । यः पाययेज्जलं शीतं स मृत्युर्नरविग्रहः ।।
सन्निपात रोग में प्यास, पार्श्वशूल और तालुशोष से युक्त रोगी में यदि शीतल जल का पान कराया जाय तो वह रोगी में यदि शीतल जल का पान कराया जाय तो वह रोगी मृत्यु से आक्रान्त हो जाता है ।।
समुद्रतरणं ह्येतद्वदन्ति भिषजोऽश्मना । मृत्युना सह योद्धव्यं सन्निपातं चिकित्सता ।।
सन्निपात की चिकित्सा करने को वैद्य लोग पत्थर के द्वारा समुद्र को तैरना तथा मृत्यु के साथ युद्ध करना मानते हैं ।।
सन्निपातारर्णवे मग्नं योऽभ्युद्धरति देहिनम् ।
कस्तेन न कृतो धर्मः कां च पूजां स नार्हति ।।
सन्निपातरूपी समुद्र में डूबते हुए रोगी का जो उद्धार करता है, उसने कौन सा धर्म नहीं किया है ? तथा वह किस पूजा के योग्य नहीं है ? अर्थात् इससे बढ़कर कोई धर्म नहीं है तथा उसकी सब प्रकार से पूजा करनी चाहिये ।।
सन्निपाते समुत्पन्ने किमादावभ्युपक्रमेत् । एतत् प्रश्नमतश्चोर्ध्वं चिकित्सोपक्रमं शृणु ।।
अब यह प्रश्न उपस्थित होता है कि सन्निपात रोग के उत्पन्न होने पर प्रारंभ में क्या उपक्रम करना चाहिये अर्थात् प्रारंभ में किस दोष की चिकित्सा करनी चाहिये । इस लिये अब इसकी चिकित्सा का उपक्रम सुन ।।
संमोहमत्र भूयिष्ठं भिषजो यान्त्यनिश्चिताः । अग्रे मूले च भेषज्यं कुर्वन्तो घ्नन्ति मानवान् ।।
निश्चय के अभाव के कारण वैद्य अत्यन्त मोह को प्राप्त होते हैं तथा कभी प्रारंभ की एवं कभी अन्त की चिकित्सा करते हुए प्राणियों को मार देते हैं । अर्थात् निश्चयाभाव से कभी किसी दोष की तथा कभी किसी दोष की चिकित्सा करने से रोगी को मार देते हैं ।।
यं दोषामुद्गलं पश्येत् सन्निपाते स्वलक्षणैः । तस्याग्रे निग्रहं कुर्यादित्यन्तभि विदुः ।।
कुछ वैद्य कहते हैं कि सन्निपात में अपने लक्षणों के द्वारा जिस दोष को बढ़ा हुआ देखे प्रारम्भ में उसकी चिकित्सा करे ।।
वृद्धजीवक ! नैवं तु वयं कुर्मश्चिकित्सितम् । असम्यग्दर्शिनस्ते तु य एवं भिषजो विदुः ।।
हे वृद्धजीवक ! हम इस प्रकार से चिकित्सा नहीं करते हैं । जो वैद्य ऐसा कहते हैं वे असम्यक्दर्शी होते हैं अर्थात् उन्हें यथावत् ज्ञान नहीं होता है ।।