काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 686, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें३२६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | विशेषकल्पः ? ]
प्रकृतेर्वा विपर्यासात् प्रकृत्या वा प्रकुप्यति ।। यथा यथोद्वलत्वं वा प्राप्नुवन्ति गदाधिपाः । तथैकद्वयुद्बलानाहुर्हीनमध्याधिकानपि ।। कूटस्थे तु समैर्दोषैर्जायते कूटपाकलः । एवमेते विनिर्देश्याः सन्निपातास्त्रयोदश ।।
अथवा प्रकृति के विपर्यास (विपरीतता) से या स्वभाव से ही दोष प्रकुपित होकर बल के अनुसार भिन्न २ रोगों को करते हैं जिससे एक तथा दो दोषों की प्रबलता वाले तथा हीन, मध्य एवं अधिक (तरतमाधिक्य के अनुसार) बलवान् दोषों वाले रोग उत्पन्न हो जाते हैं । तीनों समान दोषों के कूटस्थ (समावस्था) में होने पर कूटपाकल नामक सन्निपात होता है । इस प्रकार इन १३ सन्निपातों का निर्देश किया गया है । अष्टाङ्ग हृदय सू. अ. १२ में ये तेरह सन्निपात निम्नरूप से दिये हैं—त्रयोदश समस्तेषु षट् द्वयेकातिशयेन तु । एकं तुल्याधिकैः षट् च तारतम्यविकल्पनात् ।।
(क) द्वयुल्बण सन्निपात—
| १. वातवृद्ध | पित्तकफ अतिवृद्ध |
|---|---|
| २. पित्तवृद्ध | वातकफ अतिवृद्ध |
| ३. कफवृद्ध | वातपित्त अतिवृद्ध |
(ख) एकोल्वण सन्निपात—
| १. वातपित्त वृद्ध | कफ अतिवृद्ध |
|---|---|
| २. वातकफ वृद्ध | पित्त अतिवृद्ध |
| ३. पित्तकफ वृद्ध | वात अतिवृद्ध |
(ग) समसन्निपात—
| १. वातपित्तकफ | समवृद्ध |
|---|
(घ) हीनमध्याधिक (तरतमाधिक) सन्निपात—
| १. वात वृद्ध | पित्त वृद्धतर | कफ वृद्धतम |
|---|---|---|
| २. वात वृद्ध | कफ वृद्धतर | पित्त वृद्धतम |
| ३. पित्त वृद्ध | कफ वृद्धतर | वात वृद्धतम |
| ४. पित्त वृद्ध | वात वृद्धतर | कफ वृद्धतम |
| ५. कफ वृद्ध | वात वृद्धतर | पित्त वृद्धतम |
| ६. कफ वृद्ध | पित्त वृद्धतर | वात वृद्धतम |
इस प्रकार ये ३+३+१+६=१३ सन्निपात होते हैं ।।
विपन्नस्तु रसो योऽस्य धातून् यात्यनिलेरितः । विषादं गौरवं मूर्च्छा कुर्याच्चास्याङ्गवेदनाम् ।।
दूषित हुआ रोगी का रस वायु द्वारा प्रेरित हुआ धातुओं में पहुँचकर रोगी के शरीर में विषाद, गौरव (भारीपन), मूर्च्छा तथा अङ्गों में वेदना को उत्पन्न करता है ।।
स्वलक्षणेषु दोषाणां भिषक् प्राज्ञो न विभ्रमेत् । उदीरिता हि संसृष्टा दुर्बला एकदोषजाः ।।
प्रकुपित हुए दोषों के अनेक २ लक्षणों में बुद्धिमान् वैद्य को भ्रम में नहीं पड़ना चाहिये । उदीर्ण हुए संसृष्ट (द्विदोषज) तथा एकदोषज विकार दुर्बल होते हैं ।।