काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 685, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंविशेषकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३२५
केवलोच्छ्वासपरमः स्तब्धाङ्गः स्तब्धलोचनः । त्रिरात्रं परमं तस्य जन्तोर्भवति जीवितम् ।।
कूटपाकल नामक सन्निपात (सर्वदोषोल्बण सन्निपात) से पीड़ित रोगी न कुछ सुनता है, न देखता है, न हिलता है, न बोलता है, न किसी की प्रशंसा करता है और न निन्द्रा करता है। वह केवल श्वास-प्रश्वास लेता रहता है। उसके सम्पूर्ण अङ्ग तथा नेत्र स्तब्ध होते हैं। वह व्यक्ति अधिक से अधिक तीन दिन तक जीवित रहता है अर्थात् तीन दिन बाद उसकी मृत्यु हो जाती है ॥
तदवस्थं तु तं दृष्ट्वा मूढो व्याभाषते जनः । धर्षितो रक्षसा नूनमवेलायां चरन्निशि ।।
अन्वयं ब्रुवते चैके यक्षिण्या ब्रह्मराक्षसैः । पिशाचैर्गुह्यकैश्चैव तथाऽन्ये विषयोजितम् ।।
आक्रुष्टमभिशप्तं च तथाऽन्ये मस्तकाहतम् । कुलदेवाचार्विहतं धर्षितं गृहदैवतैः ।।
नक्षत्रपीडामपरे गरकर्माणि चापरे । वदन्ति सन्निपातं तु भिषजः कूटपाकलम् ।।
रोगी की यह अवस्था देखकर कूटपाकल नामक सन्निपात के विषय में कई मूर्ख वैद्य कहते हैं कि रात्रि में असमय में घूमने से इस पर राक्षसों ने आक्रमण कर दिया है। कुछ लोग इसे यक्ष एवं ब्रह्मराक्षसों, पिशाचों तथा गुह्यकों का आक्रमण मानते हैं। कोई इसे विष से पीड़ित कहते हैं। कोई इसे आक्रोश (निन्दा) एवं अभिशाप के कारण मानते हैं। कुछ लोग इस रोग को मस्तक पर आघात लगने से उत्पन्न मानते हैं। कुछ लोग इसे कुलदेवता तथा गृहदेवताओं द्वारा आक्रान्त कहते हैं। कुछ लोग इसे नक्षत्र की पीडा तथा अन्य कुछ लोग इसे संयोगज विष से उत्पन्न मानते हैं ॥
सद्यः स्वस्थस्य युगपद्यदा कुप्यन्ति ते त्रयः । तदा निर्वर्तते देहे पिडका विषसंज्ञिता ।।
सद्यः स्वस्थ व्यक्ति के जब तीनों दोष युगपत् प्रकुपित हो जाते हैं तब उसके शरीर में विषसंज्ञक पिडकाएं उत्पन्न हो जाती हैं ॥
विरुद्धभोजनात् कालात् परिणामाच्च कर्मणाम् । प्रकुप्यत्यनिलः शीघ्रं सोऽस्याग्निमुपहन्त्यनु ।।
विरुद्ध भोजन से तथा समयान्तर से कर्मों के परिणाम से प्रकुपित हुआ वायु शीघ्र ही मनुष्य की अग्नि को नष्ट कर देता है ॥
तस्योपहतकायाग्नेः पूर्ववत् पिबतोऽश्नतः । कफीभवति भूयिष्ठं यदादत्ते चतुर्विधम् ।।
कायाग्नि के नष्ट हो जाने से जब रोगी पहले के समान ही अन्न पान का सेवन करता है तब उसका खाया हुआ चतुर्विध अन्न (चर्व्य, चोष्य, लेह्य, पेय) विशेषरूप से कफ का रूप धारण कर लेता है ।
तं कफं वायुरादाय स्त्रोतांस्यस्य विधावति ।
तस्य स्त्रोतांसि सर्वाणि सूक्ष्माणि च महान्ति च ।।
पूरयित्वा पिधायास्ते संरुद्धः पवनस्ततः । पित्तं प्रकोपयत्यस्य तत् पित्तं मारुतेरितम् ।।
सर्वतः श्लेष्मणा रुद्धमन्योन्यमिथुनाश्रयात् । ज्वरं हल्लासमरुचिं पर्वभेदं विसूचिकाम् ।।
रोगान् नानाविधांश्चान्यान् कुर्वन्मृद्नाति देहिनम् ।
उस कफ को लेकर वायु उसके स्रोतों में गति करता है तथा वह वायु उसके सम्पूर्ण सूक्ष्म एवं महान् स्रोतों को पूर्ण करके उनके मार्ग को रोककर स्थित हो जाता है तथा पित्त को प्रकुपित कर देता है। फिर वायु द्वारा प्रेरित हुआ पित्त चारों ओर से श्लेष्मा से रुका हुआ होने से तथा परस्पर एक दूसरे के आश्रय से ज्वर, हल्लास, अरुचि, पर्वभेद, विसूचिका तथा अन्य भी नाना प्रकार के रोगों को उत्पन्न करके रोगी को कष्ट देता है।