काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 684, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें३२४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | विशेषकल्पः ? ]
जब एक (वात) वृद्ध, एक (पित्त) हीन तथा एक (कफ) मध्य दोष वाला सन्निपात प्रकुपित होता है तब उसे दोष एवं बल के अनुसार वे ही रोग हो जाते हैं। उसे जंभाई, जागरण, आयाम (अन्तः एवं बाह्य), प्रलाप, शिरोरोग तथा मन्यास्तम्भ (Stiff neck-Torticolis) होकर मृत्यु हो जाती है। ये इसके विशेष लक्षण हैं। इन उपर्युक्त तीनों सन्निपातों के नाम क्रमशः याम्य, क्रकच तथा पाकल होते हैं। चरक चि. अ. ३ में भी १३ सन्निपात दिये हैं। वातपित्त तथा कफ आदि तीनों दोषों के समानरूप से प्रकुपित होने पर जो सन्निपात होता है उसके अतिरिक्त १२ सन्निपातों के लक्षण निम्न प्रकार से दिये हैं—भ्रमः पिपासा दाहश्च गौरवं शिरसोऽतिरुक् । वातपित्तोल्वणे विद्याल्लिङ्गं मन्दकफे ज्वरे ॥ शैत्यं कासोऽरुचिस्तन्द्रा पिपासादाहरुग्व्यथाः । वातश्लेष्मोल्वणे व्याधौ लिङ्गं पित्तावरे विदुः ॥ छर्दिः शैत्यं मुहुर्दाहस्तृष्णा मोहोऽस्थिवेदना । मन्दवाते व्यवस्यन्ते लिङ्गं पित्तकफोल्वणे ॥ सन्ध्यस्थिशिरसः शूलं प्रलापो गौरवं भ्रमः । वातोल्वणे स्याद् द्वयनुगे तृष्णा कण्ठास्यशोषता ॥ रक्तविण्मूत्रता दाहः स्वेदस्तृड्बलसंक्षयः । मूर्च्छा चेति त्रिदोषे स्याल्लिङ्गं पित्तं गरीयसि ॥ आलस्यारुचिहृल्लासदाहवम्यरतिभ्रमैः । कफोल्वणं सन्निपातं तन्द्राकासेन चादिशेत् ॥ प्रतिश्या च्छर्दिरालस्य तन्द्राऽरुच्यग्निमार्दवम् । हीनवाते पित्तमध्ये चिह्नं श्लेष्माधिके मतम् ॥ हारिद्रमूत्रनेत्रत्वं दाहस्तृष्णा भ्रमोऽरुचिः । हीनवाते मध्यकफे लिङ्गं पित्ताधिके मतम् ॥ शिरोरुग्वेपथुः श्वासः प्रलापश्चर्द्दिरोचकौ । हीनपित्ते मध्यकफे लिङ्गं वाताधिके मतम् ॥ शीतको गौरवं तन्द्रा प्रलापोऽस्थिशिरोतिरुक् । हीनपित्ते वातमध्ये लिङ्गं श्लेष्माधिके मतम् । श्वासकासप्रतिश्याय । मुखशोषोऽतिपार्श्वरूक् । कफहीने पित्तमध्ये लिङ्गं वाताधिके मतम् ॥ पर्वभेदोऽग्निमान्द्यं च तृष्णा दाहोऽरुचिर्भ्रमः । कफहीने वातमध्ये लिङ्गं पित्ताधिके विदुः ॥' इन १२ सन्निपातों के लक्षणों का पाठ काश्मीर से उपलब्ध चरक संहिता में दिया है अन्यत्र नहीं। इसे टीकाकार आर्ष नहीं मानते हैं। ये लक्षण प्रकृति समसमवाय से हैं। प्राचीन आचार्यों की शैली प्रकृति समसमवाय से विस्तार से लक्षणों को देने की नहीं है। भिन्न २ दोषों से उत्पन्न ज्वरों के लक्षण कह देने पर सन्निपातों में प्रकृति समसमवाय से उत्पन्न लक्षणों को स्वयं समझा जा सकता है। उन सबको पृथक् २ पढ़ने की आवश्यकता नहीं होती है। इसके अतिरिक्त एक बार सन्निपातज उच्यते' कहकर पुनः 'सन्निपातज्वरस्योर्ध्वम्' आदि का दोबारा कहना भी विशेष अर्थ नहीं रखता है। इस लिये यह पाठ अनार्ष माना जाता है ॥
समैर्दोषैः प्रकुपितं सन्निपातं निबोध मे ।।
त्रयाणामत्र दोषाणां सर्वरूपाणि लक्षयेत् ।
अब वात, पित्त, कफ आदि तीनों दोषों के समानरूप से प्रकुपित होने पर जो सन्निपात होता है उसके लक्षण तू मेरे से सुन। इसमें तीनों दोषों के सब लक्षण दिखाई देते हैं॥
त्रिदण्डवत् समबलान्यथो आहुस्त्रिपादवत् ।।
यानि ज्वरचिकित्सायां रूपाण्युक्तानि तानि च । कूटपाकल इत्येष सन्निपातः सुदारुणः ।।
इसमें तिपाई की तरह तीनों दोषों के सब लक्षण समान बल वाले होते हैं इस लिये त्रिपाद (तीन पर वाला) कहते हैं। तथा ज्वर चिकित्सा में जो लक्षण कहे हैं वे सब इसमें होते हैं। इस सन्निपात का नाम कूटपाकल है तथा यह अत्यन्त भयंकर होता है॥
व्याधिभ्यो दारुणेभ्यश्च वज्रशस्त्राग्नितो यदा । सद्यो हन्ता महाव्याधिर्जायते कूटपाकलः ।।
दारुण व्याधियों एवं वज्र, शस्त्र, अग्नि आदि के द्वारा शीघ्र प्राणघातक कूटपाकल नाम की महाव्याधि उत्पन्न होती है॥
कूटपाकलविग्रस्तो न श्रृणोति न पश्यति । न स्पन्दते न ब्रवीति नाभिष्ठौति न निन्दति ।।