काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 683, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंविशेषकल्पः ? ] कल्पस्थानम् ३२३
जन्तोः प्रकुप्यति ॥ तस्य शीतज्वरः स्वप्नगौरवालस्यतन्द्रिकाः । छर्दिमूर्च्छा तृषादाहतृष्णाारोचकहृद्ग्रहाः ॥ ष्ठीवनं मुखमाधुर्यं श्रोत्रवाग्दृष्टिनिग्रहः । श्लेष्मणो निग्रह चास्य यदा प्रकुरुते भिषक् ।। तदा तस्य भृशं पित्तं कुर्या सोपद्रवं ज्वरम् ।। निगृहीते तु पित्ते च भृशं वायुः प्रकुप्यति ।। निराहारस्य सोऽत्यर्थं मेदोमज्जास्थि बाधते । अथात्र स्नाति भुङ्क्ते वा त्रिरात्रं नैव जीवति ।। मेदोगतः सन्निपातो ह्युल्वणः परिकीर्तितः । कामान्मोहाच्च लोभाच्च भयाच्चापि प्रपद्यते ।। मध्यहीनाधिकैर्दोषैः सन्निपातो यदा भवेत् । तस्य रोगास्त एवोक्ताः प्रायो दोषबलाश्रयाः ।। अर्थात् इसमें द्वयुल्वण तथा एकोल्वण सन्निपात का वर्णन किया गया है। इनके पृथक् २ नाम भी दिये गये हैं। यथा—
वातपित्ताधिक सन्निपात—विभु ।
पित्तश्लेष्माधिक सन्निपात—फल्गु ।
कफवाताधिक सन्निपात—मकरी ।
वाताधिक सन्निपात—विस्फारक (विस्फुरक) ।
पित्ताधिक सन्निपात—शीघ्रकारी ।
श्लेष्माधिक सन्निपात—उल्वण (कफण) ।
इसके बाद एक दोष हीन, एक वृद्ध तथा एक मध्य के अनुसार ६ सन्निपात दिये हैं ।।३१।।
हीनाभिवृद्धमध्यैस्तु सन्निपातो यदा भवेत् । तस्य रोगास्त एवोक्ता यथादोषबलाश्रयात् ।।
सर्वस्त्रोतोभवं त्वस्य रक्तपित्तं प्रकुप्यति । विस्फोटैरग्निदग्धाभैश्चीयते च समन्ततः ।।
हृदयोदरमन्त्रं च यकृत्प्लीहाऽथ फुप्फुसम् । पच्यतेऽन्तः शरीरस्थमूर्ध्वाधः पूयमेति च ।।
शीर्णदन्तश्च मृत्युश्च तस्याप्येतद्विशेषणम् ।
जब एक (वात) हीन, एक (पित्त) वृद्ध तथा एक (कफ) मध्य दोष वाला (अर्थात् तरतम आदि भेद से) सन्निपात होता है तब दोष एवं बल के अनुसार उसके वे ही रोग होते हैं। उसके सब स्रोतों में स्थित रक्तपित्त प्रकुपित होता है। तथा सम्पूर्ण शरीर पर अग्निदग्ध के समान विस्फोटके हो जाते हैं। हृदय, उदरप्रदेश, आन्त्र, यकृत, प्लीहा तथा फुप्फुस का पाक हो जाता है। शरीर के अन्दर ऊर्ध्व एवं अधः भाग में पूय (पस-Suppuration) हो जाती है। उसके दांत झड़ने लगते हैं तथा अन्त में मृत्यु हो जाती है। ये विशेष लक्षण होते हैं ।।
मध्याभिवृद्धहीनैस्तु सन्निपातो यदा भवेत् ।।
तस्य रोगास्त एवोक्ता यथादोषबलाश्रयात् ।
स्तब्धाङ्गः स्तब्धदृष्टिश्च स तु शेते हतो यथा ।।
विरिच्यतेऽतिमात्रं च पुरीषं बह्वनश्नतः । सर्वेषां स्रोतसां पाक एकदत्र विशेषणम् ।।
जब एक (वात) मध्य, एक (पित्त) वृद्ध तथा एक (कफ) हीन दोष वाला सन्निपात प्रकुपित होता है तब उसे दोष एवं बल के अनुसार वे ही रोग हो जाते हैं। उसके अङ्ग एवं दृष्टि स्तब्ध हो जाती है तथा वह सोते (पेड़) हुए मृत व्यक्ति की तरह प्रतीत होता है। उसे भोजन का अधिक सेवन न करने पर भी मल अधिक मात्रा में आता है तथा उसके सम्पूर्ण स्रोतों का पाक हो जाता है। ये इसके विशेष लक्षण हैं ।।
वृद्धाभिहीनमध्यैस्तु सन्निपातो यदा भवेत् । तस्य रोगास्त एवोक्ता यथादोषबलाश्रयात् ।।
जृम्भाप्रजागरायामविप्रलापशिरोरुजः । मन्यास्तम्भेन मृत्युश्च तस्याप्येतद्विशेषणम् ।।
एषां त्रयाणां नामानि याम्यक्रकचपाकलाः ।