काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३०० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
का प्रवेश दिखाई देता है। उस योगौषध का 'हिपोक्रास' नाम होने से प्रतीत होता है कि हिपोक्रिटस को उन वस्तुओं का निश्चित रूप से ज्ञान था। ईस्वी पूर्व ३५० में होनेवाले थियोफ्रेस्टस (Theophrastus) नामक विद्वान् ने भी 'फाइकस इण्डिका' (Ficus Indica) नामक ओषधि में इण्डिका शब्द का निर्देश किया है। बहुत सी भारतीय वानस्पतिक ओषधियों के ग्रीस देश में पहुंचने का पोकाक¹ आदि विद्वानों ने उल्लेख किया है जो ओषधियां भारत में ही उत्पन्न होती हैं तथा भारतीय वैद्यों द्वारा भिन्न-भिन्न रोगों में प्रयुक्त की जाती हैं-प्रत्यक्ष ज्ञान के बिना वे ओषधियां ग्रीक वैद्यों के हृदय में स्वयं उदित नहीं हो सकती। इसी दृष्टान्त से हिपोक्रिटस के चिकित्सा विज्ञान में मिलनेवाले रोग, निदान, औषध, उपचार आदि भारतीय चिकित्सा विषयों की समानता भी उसकी चिकित्सा को भारतीय विज्ञान के आधार पर स्थित हुई सिद्ध करती है। इसी प्रकार अनेक प्रमाणों के आधार पर डा. जे. जे. मोदी ने रायल एशियाटिक सोसायटी में 'Is Ayurveda a quackery' नामक लेख में यह सिद्ध किया है कि भारतीय आयुर्वेद ही सम्पूर्ण विदेशी चिकित्सा पद्धतियों का मूल² है। उसके वैद्य ग्रन्थ में भारत में ही उत्पन्न होनेवाली ऐसी अनेक वानस्पतिक ओषधियों का निर्देश मिलता है। इस प्रकार यह प्रतीत होता है कि हिपोक्रिटस को भारतीय वैद्यक का ज्ञान अवश्य था चाहे वह साक्षात् हो और चाहे परम्परा द्वारा हो।
म्याकडोनल³ नामक विद्वान् ने पहले यह लिखकर कि 'ग्रीस ने भारत से बहुत से विज्ञान लिये हैं परन्तु यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि ग्रीस ने भारत से चिकित्सा का ग्रहण किया है तथा भैषज्य विद्या पर भारत का प्रभाव पड़ा है या नहीं आगे लिखा है कि 'त्रिपिटक के अनुसार चरक के कनिष्क सामयिक होने से हिपोक्रिटस भारतीय वैद्यक से प्राचीन सिद्ध होता है इसलिये भारतीय चिकित्सा पर ग्रीस का प्रभाव पड़ा है' परन्तु यदि चरकाचार्य ही इस आत्रेयसंहिता का मूल आचार्य होता तो यह उपर्युक्त पौर्वापर्य क्रम ठीक कहा जा सकता था। चरकाचार्य, चरक नाम से प्रसिद्ध आत्रेय संहिता का निर्माता नहीं है अपितु केवल प्रतिसंस्कर्ता ही है। यह संहिता तो आत्रेय तथा अग्निवेश के समय की है, यह पहले ही कहा जा चुका है। काश्यप तथा भेड आदि का निर्देश करना भी इसी बात को सिद्ध करता है। आत्रेय का समय पहले ही उपनिषत्कालीन बताया जा चुका है। यदि तिब्बतीय गाथाओं का ही अवलम्बन किया जाय तो भी आत्रेय बुद्ध से अर्वाचीन सिद्ध नहीं होता है। इस पौर्वापर्य के अनुसार इसके विपरीत आत्रेय का ही प्रभाव हिपोक्रिटस की चिकित्सा पर प्रतीत होता है न कि हिपोक्रिटस का प्रभाव आत्रेय पर।
कुछ लोग कहते हैं कि हिपोक्रिटस से प्राचीन इम्पीड़ोक्लिस४ (Empedocles) नामक वैद्य ने अध्यात्म विद्या पूर्वदेश से प्राप्त की थी। भैषज्य विद्या भी संभवतः वहीं से प्राप्त की थी हिपोक्रिटस के भारत में आने का गोण्डल५ के ठाकुर ने निर्देश किया है। इम्पीड़ोक्लिस के भारत के समीप तक आने का प्रमाण मिलने पर भी हिपोक्रिटस के भारत आने के विषय में कोई प्रमाण मिलता है या नहीं यह कहना कठिन है। हिपोक्रिटस के न केवल अपने देश में अपितु
१. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १२० में देखें।
२. भारतीय ओषधियों के गुणों का केवल अपने देश में ही नहीं अपितु दूसरे देशों में भी ज्ञान था।
(History of Aryan Medical Science-Goudal)
३. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १२० में देखें।
४. यूनानी परम्पराओं के अनुसार ज्ञात होता है कि Jhales, Empedocles, Anaxagorns, Democritus तथा अन्य विद्वानों ने दर्शनशास्त्र के अध्ययन के लिये पूर्वी देशों की यात्रा की थी। इसलिये पर्शिया (इरान) के माध्यम द्वारा यूनानियों पर भारतीय विचारों का प्रभाव पड़ने की कम से कम ऐतिहासिक संभावना अवश्य है।
(History of Hindu Chemistry Vol. I P. 22 by Dr P. C. Roy)
५. कुछ विद्वानों की राय में हिपोक्रिटस ने भारत में चिकित्सा शास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया था।
(Short History of Aryan Medical Science P. 190 by H. H. Bhagvat Sinhajee)