भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २९९

को आत्रेय ने अपने मत के रूप में दिया है। हिपोक्रिटस$^१$ ने एक-एक प्राधान्यवाद को एकीय मत के रूप में देकर फिर समुच्चयवाद का निर्देश किया है। एकैकप्राधान्य वाद में नाम निर्देश किये हैं। समुच्चयवाद को भी अपने द्वारा उद्भावित सिद्धान्त के रूप में नहीं दिया है। आत्रेय ने भिन्न-भिन्न मतों को देकर अन्त में समुच्चयवाद को अपने सिद्धान्त के रूप में दिया है। इस प्रकार स्पष्ट प्रतीत होता है कि भारत में प्राचीन काल में प्रचलित एकैकवाद तथा समुच्चयवाद का अनुवाद किया गया है तथा समुच्चयवाद में हिपोक्रिटस ने अपनी रुचि प्रदर्शित की है।

इतना ही नहीं अपितु चरक तथा सुश्रुत में दन्तरोगों में पैत्तिक आदि भेद दिये हैं। हिपोक्रिटस ने भी दन्तशोथ तथा दन्तवेष्टन आदि रोगों के उल्लेख में Pituita (Bile) द्वारा पित्त का दोष के रूप में निर्देश किया है। इस प्रकार शब्द (Pituita) के अपभ्रंश से भी प्रतीत होता है कि यहां पैत्तिक दन्तरोगों के निदान के रूप में भारतीयों द्वारा वर्णित पित्त का ही संकेत है। इसी प्रकार वहां मुखदौर्गन्ध्य के प्रतिकार के लिये जिस ओषधि का निर्देश किया है। उसका Indian medicament (भारतीय औषध) शब्द से व्यवहार$^२$ किया है, ऐसा जे. जे$^३$ मोदी L. M. & S, L. D.S. (Eng) ने लिखा है।

उस रोग की उस ओषधि का भारत द्वारा ज्ञान होने पर ही भारतीय औषध के रूप में उसका उल्लेख करना संभव हो सकता है। यह एक पद ही उसके भारतीय ओषधियों के ज्ञान को सिद्ध करता है। इसके अतिरिक्त हिपोक्रिटस के मैटेरिया मैडिका (निघण्टु ग्रन्थ) में आये हुए जतमनसी (जटामांसी) जिञ्जिबेर (शृङ्गबेर), पिपरनिग्रम् (मरिच वा पिप्पली), पेपेरी (पिप्पली), पेपेरिस रिजा (पिप्पलीमूल), कोस्तस (कुष्ठ), कर्दमोमोस (कर्दम), सकरून (शर्करा) इत्यादि औषध वाचक शब्द स्पष्टरूप से भारतीय आयुर्वेद के अपभ्रंश प्रतीत$^४$ होते हैं। भारतीय तिल वाचक 'सिममं इण्डिकम्' (Sesamun indicum) तथा भारतीय करञ्ज वाचक 'ग्यालेडुपा इण्डिका' शब्दों में भारतवाचक 'इण्डिक' शब्द के प्रयोग से उसका भारत विषयक ज्ञान तथा भारतीय वस्तुओं का व्यवहार तथा उपादान साक्षात् प्रतीत होता है।

हिपोक्रास$^५$ (Hippocras) नामक योगौषधि में दालचीनी अदरक तथा शर्करा आदि भारतीय असाधारण ओषधियों


१. उनमें कुछ कहते हैं कि मनुष्य रक्तनिर्मित है, कई कहते हैं कि पित्त निर्मित है और कुछ लोगों का कहना है कि वह कफनिर्मित है। वास्तव में मनुष्य एक संधान है। विभिन्न विद्वानों ने अपने मतों के अनुसार उसे भिन्न-भिन्न नाम दिये हैं। (Hippocrates Vol IV P. 5)
२. २-३ तक की टि. सं. उपो. पृ. ११९ में देखें।
४. (a) ईसा से लगभग ५०० वर्ष पूर्व हिपोक्रिटस ने संस्कृत के ग्रन्थों में प्राचीन काल से वर्णित Sesamum Indicum (तिल) Nardostachys Jatamansi (जटामांसी), Boswellia thurifera (कुन्दुरु) Zingiber officinate (शृङ्गवेर) Piper Nigrum (मरिच) इत्यादि अनेक भारतीय वनस्पतियों का अपने मैटेरिया मैडिका में वर्णन किया है। ईसा की प्रथम शताब्दी में Dioscorides नामक ग्रीक वैद्य ने, उस समय यूरोप के बाजार में आनेवाली अनेक भारतीय वनस्पतियों के चिकित्सा सम्बन्धी गुणों का पूर्णरूप से अन्वेषण करके अपने विस्तृत मैटेरिया मैडिका में उन्हें सम्मलित किया था जो कि पीछे अनेक वर्षों तक एक प्रामाणिक ग्रन्थ माना जाता रहा है। (A short History of Aryan Medical Science P. 123 by H. H. Bhagvat Sin hajee.)
(b) ग्रीक तथा भारतीय ओषधियों के नामों में समानता है। उदाहरण के लिये—Pepero, Pepercosriza, Costns, Zigiberis, Kardamomois, Hakoros, Bdelion, Sakkaron इत्यादि ग्रीक ओषधियों के क्रमशः पिप्पली, पिप्पलीमूल, कुष्ठ, शृङ्गवेर, कर्दम, वासा, गुग्गुल तथा शर्करा आदि भारतीय नाम हैं।
(Hellenism in Ancient India P. 203 J. J. Jolly-Medicine)
५. हिपोक्रास—एक दीपक एवं हृद्य वैद्यकीय पेय-जो कि दालचीनी, अदरक आदि मसालों तथा शक्कर और शराब के योग से बनता है। (E. B. Vol XI P. 584)