काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
भिन्न ही प्रश्न है। परन्तु त्रिधातुवाद का स्वरूप कुछ भी हो यह निश्चित है कि यह सिद्धान्त प्राचीन एवं भारतीय ही है। इस प्रकार अत्यन्त प्राचीन वैदिक काल से परम्परागत त्रिदोषवाद को ग्रीस से भारत में आया हुआ मानना कोई युक्तिसंगत नहीं है। भारतीय चिकित्सा विज्ञान के प्रादुर्भाव के साथ ही सोम (चन्द्रमा), सूर्य तथा अनिल (वायु) के समान विसर्ग¹ आदान तथा विक्षेपरूप कार्य करने वाले शारीरिक अन्तस्तत्त्व वात, पित्त, श्लेष्म का उदय हुआ था। इस भारतीय प्राचीन विज्ञान का अन्य विज्ञानों के साथ अन्य देशों में भी जाना संभव हो सकता है। जे. जे.² मोदी ने लिखा है कि त्रिधातुवाद भारतीय सिद्धान्त ही है। हिपोक्रिटस ने भारत से ही इसे ग्रहण किया था।
पाञ्चभौतिकवाद भी प्राचीन भारतीय सिद्धान्त है। आयुर्वेद में भी आत्रेय, धन्वन्तरि तथा कश्यप आदि द्वारा इस शरीर को पञ्चभूतात्मक बताया गया है। इसीलिये इन पञ्चभूतों के समुदित अवस्था में न रहकर पृथक्-पृथक् हो जाने पर मृत्यु को पञ्चत्वं³ शब्द से भी कहा गया है। इन पांच भूतों में से आकाशतत्व को पृथक् रखकर चतुर्भूतवाद का सिद्धान्त लोकायत आदि मतों में प्राचीन भारत में भी मिलता है। हिपोक्रिटस⁴ ने चातुर्भौतिक वाद को एकीयमत (प्राचीन व्यक्तियों में से किसी एक के मत) के रूप में देकर उसमें अपनी रुचि प्रदर्शित नहीं की है। धार्मिक⁵ इतिहास में मिलता है कि ग्रीस देश में यह चतुर्भूतवाद सर्वप्रथम एम्पिडोक्लिस (Empedocles ई. पू. ४९५-४३५) नामक विद्वान् ने प्रारंभ किया था। इस एम्पिडोक्लिस का इरान, भारत आदि समीप के पूर्वदेशों में आगमन, वहां से दार्शनिक विषयों के ज्ञान तथा ग्रीस में दार्शनिक विषयों के प्रचार का उल्लेख⁶ मिलता है एम्पिडोक्लिस द्वारा उद्भूत इस पूर्ववाद (चतुर्भूत वाद) का खण्डन करते हुए हिपोक्रिटस के मस्तिष्क में प्राचीन भारतीय पाञ्चभौतिकवाद का सिद्धान्त साक्षात् अथवा परम्परास्वरूप से अवश्य उपस्थित था ऐसा प्रतीत होता है। पञ्चभूतों में से एकभूत को छोड़कर चार भूतों के द्वारा शरीरोत्पत्ति का वर्णन भारतीय प्राचीन सिद्धान्तों में मिलता है। भूत हेतु प्रत्याख्यानवाद (जिस सिद्धान्त में पंचभूतों का हेतुरूप में खण्डन किया गया है) भारत में प्राचीनकाल में नहीं मिलता है। यदि भारतीय चिकित्सा पर हिपोक्रिटस के विचारों का प्रभाव होता तो इस प्रत्याख्यानवाद (पंचभूतों के खण्डन का सिद्धान्त) को भी भारतीय वैद्यक में मिलना चाहिये था। इस प्रकार हिपोक्रिटस द्वारा प्रतिक्षिप्त पूर्ववाद (चतुर्भूतवाद) के भारत में मिलने तथा हिपोक्रिटस द्वारा नवोदित प्रत्याख्यान वाद के भारत में न मिलने को देखकर भी इनके पौर्वापर्य का निश्चय किया जा सकता है तथा यह भी कहा जा सकता है कि किसका किस पर प्रभाव है।
इसके अतिरिक्त आत्रेय संहिता⁷ के वातकलाकलीय अध्याय में पैरस्पर एक दूसरे के विचारों को जानने की इच्छा से एकत्र होकर विचार करते हुए महर्षियों में वातप्राधान्यवाद के रूप में कुश, भरद्वाज, काङ्कायन, भार्गव तथा वार्योविद के, पित्तप्राधान्यवादी मरीचि के तथा कफप्राधान्यवाद के रूप में काप्य के मतों को देखकर अन्त में पुनर्वसु आत्रेय ने ‘सर्व एव खलु वातपित्तश्लेष्माणः प्रकृतिभूताः पुरुषमायुषा महतोपपादयन्ति’ द्वारा तीनों के सम्मिलित प्राधान्यवाद
१. १, ३, ४, ६, ७ की टि.सं. उपो. पृ. ११९ में देखें।
२. यह यूनानी का (Pitnita या Bile) ही प्राचीन भारतीय आयुर्वेद का पित्त है। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि आयुर्वेद शरीर की तीन धातुओं अर्थात् वात, पित्त, कफ के सिद्धान्त पर आश्रित है और इस त्रिधातु के भारतीय सिद्धान्त को यूनानी वैद्य के जनक (पिता) हिपोक्रिटस ने रोगों के कारण की व्याख्या करने के लिये अपना लिया।
(Fourth all Indian Oriental Conference Vol. II P. 428.)
५. एम्पिडॉक्लियस ने चार तत्त्वों-अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी का सिद्धान्त स्थापित किया।
A History of Religions-Denis stuart P. 140.