भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

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आयुर्वेद में रुद्र के कोप आदि से महामारी आदि संक्रामक रोगों के उत्पन्न होने का वर्णन मिलता है। होमर के लेख के अनुसार प्रतीत होता है कि ग्रीस में भी प्राचीन काल में इसी प्रकार दैव प्रकोप से रोग आदि की उत्पत्ति मानी जाती थी। हिपोक्रिटस के पूर्व पुरुष एस्क्लपियस (Asclepios) का भी यही विचार था।

इसी प्रकार भारत में प्राचीन वैद्यक के दार्शनिक विषयों से युक्त होने के समान ग्रीसदेश में हिपोक्रिटस से १०० वर्ष पूर्व तक विद्यमान चिकित्सा विज्ञान भी दार्शनिक विषयों से संबद्ध मिलता है। उसके बाद हिपोक्रिटस द्वारा उसमें से दार्शनिक विषयों को हटाकर¹ केवल भैषज्य विद्या के नये प्रारंभ किये जाने का उल्लेख मिलता है। इस प्रकार प्राचीन देशों में भारतीय प्राचीन सभ्यता के स्रोतों के समान ग्रीस में भी मिलने से प्रतीत होता है कि बाद में ग्रीस देश में प्राचीन स्रोतों को हटाकर हिपोक्रिटस के समय उसे नया स्वरूप दिया गया था। हिपोक्रिटस द्वारा नवोद्भावित भैषज्य विज्ञान का यदि भारत में भी प्रभाव होता तो आजकल भारत में भी उसी प्रकार का दार्शनिक विषयों से शून्य चिकित्सा विज्ञान दृष्टिगोचर होता। उसमें हिपोक्रिटस द्वारा नवोद्भावित विशेष विषय तथा उसी के शब्दों की छाया आदि भी दिखाई देनी चाहिये, परन्तु वैसा दिखाई नहीं देता है। इसके विपरीत भारतीय वैद्यक आज भी दार्शनिक विषयों से युक्त तथा उसी रूप में विद्यमान है। तथा भारतीय प्राचीन परम्परागत विषयों के हिपोक्रिटस की चिकित्सा में मिलने से प्रतीत होता है कि भारतीय वैद्यक की प्रतिष्ठा के बाद ही हिपोक्रिटस की चिकित्सा का प्रादुर्भाव हुआ था।

यह कहना कठिन है कि वात, पित्त, कफ आदि शारीरिक मूल तत्त्व ग्रीस देश से भारत में आये² हैं। पाश्चात्त्य विद्वान् त्रिधातुवाद को ग्रीस का नहीं मानते हैं अपितु इसका मूल मिश्र देश के मेतू (Metu) सम्प्रदाय³ को मानते हैं। भारतीय आयुर्वेद के विषय में कीथ नामक विद्वान् की उक्ति का पर्यालोचन करने पर ग्रीसवैद्यक में नैतिक उक्तियों के मिलने पर भी उपक्रम तथा उपसंहार की दृष्टि से आयुर्वेद के विषयों के मिलने से भारतीय वैद्यक को ग्रीस के वैद्यक से प्राचीन तथा उसका मूल माना है। ‘त्रिर्नो अश्विना’ इत्यादि आश्विन सूत्र में आये हुए ऋग्वेद के मन्त्र में त्रिधातु⁴ शब्द के द्वारा वात, कफ रूप तीन धातुओं का ग्रहण करके उनके शमन के द्वारा उत्पन्न सुख की प्रार्थना के मिलने से, अथर्ववेद में कफरोग के निदान तथा चिकित्सा के (६. १४. १-३) पित्त (१. २४. १, १८. ३. ५), भेषज तथा रोगों के निदान के रूप में वात (४. १३. २) तथा वरुणपुत्र, अर्चि, शोचि आदि शब्दों के द्वारा श्लेष्म, वात तथा पित्तज्वरों का निर्देश मिलने से भारतीय वैद्यक में श्लेष्म, वात तथा पित्तरूप त्रिधातुवाद वैदिक काल से ही चला आ रहा प्रतीत होता है। कीथ का कहना है कि कौशिकसूत्र⁵ में भी त्रिदोष का उल्लेख हैं। महाभारत⁶ में भी इसका उल्लेख मिलता है। शारीरिक वात, पित्त, कफ आदि तत्व कौन से हैं इस विषय में मत्थु⁷ आदि बहुत से विद्वानों के मत दिये हुए हैं। यह तो एक


१. रोमनिवासी सेल्सस् (Celsus) ने तथाकथित हिपोक्रिटस के ग्रन्थों की भूमिका में कहा है कि हिपोक्रिटस ने ही चिकित्सा को दर्शनशास्त्र से पृथक् किया। (Hippocrates Val I P. XV, E. B. Vol XI P. 584)
२. त्रिधातुओं का सिद्धान्त प्रथम दृष्टि में सर्वथा यूनान से उधार लिया गया प्रतीत होता है। (Hist. of Sons. Lit. by keith p. 513)
३. मिश्रियों का मेतू का सिद्धांत यूनानियों में (Humours) (त्रिधातु) के सिद्धान्त के रूप में आज तक विद्यमान है।
(E. R. E. Vol. VI P. 541)
४. ४-६ की टि. सं. उपो. पृ. ११८ में देखें।
७. ये त्रिधातु हैं:-वात-नाडी संस्थान, पित्त-पाचक संस्थान तथा उष्णता उत्पादन, कफ-उष्णता संतुलन तथा श्लेष्मा एवं ग्रन्थिस्राव। (The Antiquity of Medicine David C. Muthu P. 21.)

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