काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २९६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् |
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से, उत्तरोत्तर देशदेशान्तरों के चिकित्सा विज्ञान के बढ़ने से तृतीय शताब्दी तक नये बने हुए ग्रन्थों का भी उसमें प्रवेश कर देने से, नवीन स्थापित रोम साम्राज्य के सहारे से, ईस्वी पश्चात् सप्तम शताब्दी में लैटिन^१ भाषा में भी इसका अनुवाद हो जाने से तथा यूरोप के कुछ देशों में भी इसके सम्प्रदाय का प्रचार हो जान से बाद में उसके नाम से प्रसिद्ध ग्रन्थों का जितना प्रचार हुआ है उतना ग्रीस में प्राचीन काल में नहीं था।
ग्वालन के समय तक भी पूर्व के असीरिया, पर्शिया, बेबिलोनिया आदि दूर देशों में उसके ग्रन्थ के न मिलने से वहां भी हिपोक्रिटसीय विद्या के न होने से मण्डूकप्लुति से भारत में उस विद्या का होना कैसे संभव हो सकता है।
ग्रीस तथा भारत की चिकित्सा में समानताएँ
कीथ^२ तथा मैकडोनल आदि विद्वान् हिपोक्रिटस के वैद्यक ग्रन्थों में निदान, ज्वर, आदि रोग, भैषज्य प्रक्रिया, भेषज आदि अनेक विषयों की भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सा से समानता बतलाते हैं। हमारी दृष्टि में भी बहुत सी समानताएं हैं। भारतीय ग्रन्थों में रोगों की उत्पत्ति, निवृत्ति तथा अरिष्ट लक्षणों के अनुसन्धान के लिये स्वप्नों के अध्याय मिलते हैं। असीरिया, बेबिलोनिया आदि देशों में भी असुरवनिपाल (६६८-६२६ ईस्वी पूर्व) नामक राजा के (यह शब्द संस्कृत के असुररावनिपाल शब्द से बना प्रतीत होता है) समय स्वप्नों के विषय में विचार करने की प्रवृत्ति थी। ग्रीस दर्शनों में भी उसी प्रकार के विचार पहले मिलते थे जो कि हिपोक्रिटस के लेख में भी दिखाई देते हैं तथा ईस्वी पूर्व चतुर्थशताब्दी तक भी विद्यमान थे। परन्तु पीछे से वे लुप्त हो गये प्रतीत होते हैं (E. R. E. Vol VI P. 542. E. Thramar)
१. अनुवाद की सबसे पुरानी पाण्डुलिपि, जो कि हमें उपलब्ध है—ईसा की सातवीं सदी की है। यह स्पष्टतः ही जाली डायनामीडिया (Dynamidia) का लातीनी (Latine) अनुवाद है। (E. B Vol XI P. 584.)
२. यूनानी तथा भारतीय चिकित्सा प्रणालियों में अनेक अंशों में जो अत्यधिक सादृश्य है वह बहुत पहले से मशहूर है। दोनों में हमें अनेक सादृश्य मिलते हैं 1 जैसे—त्रिदोषसिद्धान्त, वात, पित्त, कफ के प्रकोप से रोग होना, ज्वर की तीन अवस्थायें और अवान्तर रोग यूनानियों के Aveyia, Neyes, Kpiois, से मिलते जुलते हैं, रोहण (Healing) के साधनों का उष्ण और शीत अथवा शुष्क और स्निग्ध जाति में विभाजन, दो विरुद्ध प्रकृति की ओषधियों द्वारा रोग का उपशम, रोग की साध्यासाध्यता (Prognosis) पर हिपोक्रेटस का बहुत अधिक जोर देना, चिकित्सकों से शपथ लिवाना, शिष्ट व्यवहार के नियम तथा चिकित्सकों के लिये आचार व्यवहार संबन्धी नियम-जिनका रोगी पर बहुत प्रभाव पड़ता है तथा और भी अनेक बारीक समानताएं हैं। दोनों प्रणालियां स्वास्थ्य पर ऋतु के प्रभाव को बहुत महत्त्व देती हैं। भारतीय विश्वास के विपरीत हम कई बार तेज शराब को औषध के रूप में बहुत उपादेय समझते हैं। दैनिक (अन्येद्यु-Quotidian), तृतीयक (Tertian) तथा चातुर्थिक (Quarten) ज्वरों की मीमांसा की गई है, क्षय का विस्तृत विवेचन किया गया है जब कि हृद्रोगों का बहुत ही कम वर्णन किया गया है। भ्रूण विज्ञान सम्बन्धी सादृश्य भी है, सब अंगों की युगपत् वृद्धि स्वीकार की गई है। पुंलिंग का शरीर के दाहिने अंगों से सम्बन्ध माना गया है, जुडवां बच्चों के पैदा होने का दोनों में एक ही कारण बताया गया है। आठवें मास का भ्रूण जीने में समर्थ और सातवें मास का जीने में असमर्थ कहा गया है। मृतभ्रूण को गर्भ से निकालने के लिये भी सदृश उपाय बतलाये गये हैं। शल्यचिकित्सा में पथरी और अर्श के आपरेशन में रक्तमोक्षण, जोंको के प्रयोग, दागने की क्रिया और अनेक शल्योपकरण तथा नेत्रविज्ञान में दाहिनी आंख की चिकित्सा में बायें हाथ का प्रयोग करने की प्रथा भी सदृश है। यह नहीं कहा जा सकता है कि इन सादृश्यों में कितने यूनानी प्रभाव से आये हैं और कितने स्वतन्त्र विकास से उत्पन्न हुए हैं। त्रिधातु का सिद्धान्त जो साधारण दृष्टि से देखने पर एकदम यूनान से उधार लिया गया प्रतीत होता है—सांख्य के त्रिगुणवाद के अनुकूल है। त्रिगुणों में एक बात का वर्णन अथर्ववेद में भी मिलता है और कौशिक सूत्र के व्याख्याकार का दावा है कि सूत्रकार वातपित्त कफ के सिद्धान्त को मानता था।
(History of Sanskrit Literature P. 513 by A. B. Ketih).