काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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से, उत्तरोत्तर देशदेशान्तरों के चिकित्सा विज्ञान के बढ़ने से तृतीय शताब्दी तक नये बने हुए ग्रन्थों का भी उसमें प्रवेश कर देने से, नवीन स्थापित रोम साम्राज्य के सहारे से, ईस्वी पश्चात् सप्तम शताब्दी में लैटिन^१ भाषा में भी इसका अनुवाद हो जाने से तथा यूरोप के कुछ देशों में भी इसके सम्प्रदाय का प्रचार हो जान से बाद में उसके नाम से प्रसिद्ध ग्रन्थों का जितना प्रचार हुआ है उतना ग्रीस में प्राचीन काल में नहीं था।
ग्वालन के समय तक भी पूर्व के असीरिया, पर्शिया, बेबिलोनिया आदि दूर देशों में उसके ग्रन्थ के न मिलने से वहां भी हिपोक्रिटसीय विद्या के न होने से मण्डूकप्लुति से भारत में उस विद्या का होना कैसे संभव हो सकता है।
ग्रीस तथा भारत की चिकित्सा में समानताएँ
कीथ^२ तथा मैकडोनल आदि विद्वान् हिपोक्रिटस के वैद्यक ग्रन्थों में निदान, ज्वर, आदि रोग, भैषज्य प्रक्रिया, भेषज आदि अनेक विषयों की भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सा से समानता बतलाते हैं। हमारी दृष्टि में भी बहुत सी समानताएं हैं। भारतीय ग्रन्थों में रोगों की उत्पत्ति, निवृत्ति तथा अरिष्ट लक्षणों के अनुसन्धान के लिये स्वप्नों के अध्याय मिलते हैं। असीरिया, बेबिलोनिया आदि देशों में भी असुरवनिपाल (६६८-६२६ ईस्वी पूर्व) नामक राजा के (यह शब्द संस्कृत के असुररावनिपाल शब्द से बना प्रतीत होता है) समय स्वप्नों के विषय में विचार करने की प्रवृत्ति थी। ग्रीस दर्शनों में भी उसी प्रकार के विचार पहले मिलते थे जो कि हिपोक्रिटस के लेख में भी दिखाई देते हैं तथा ईस्वी पूर्व चतुर्थशताब्दी तक भी विद्यमान थे। परन्तु पीछे से वे लुप्त हो गये प्रतीत होते हैं (E. R. E. Vol VI P. 542. E. Thramar)
१. अनुवाद की सबसे पुरानी पाण्डुलिपि, जो कि हमें उपलब्ध है—ईसा की सातवीं सदी की है। यह स्पष्टतः ही जाली डायनामीडिया (Dynamidia) का लातीनी (Latine) अनुवाद है। (E. B Vol XI P. 584.)
२. यूनानी तथा भारतीय चिकित्सा प्रणालियों में अनेक अंशों में जो अत्यधिक सादृश्य है वह बहुत पहले से मशहूर है। दोनों में हमें अनेक सादृश्य मिलते हैं 1 जैसे—त्रिदोषसिद्धान्त, वात, पित्त, कफ के प्रकोप से रोग होना, ज्वर की तीन अवस्थायें और अवान्तर रोग यूनानियों के Aveyia, Neyes, Kpiois, से मिलते जुलते हैं, रोहण (Healing) के साधनों का उष्ण और शीत अथवा शुष्क और स्निग्ध जाति में विभाजन, दो विरुद्ध प्रकृति की ओषधियों द्वारा रोग का उपशम, रोग की साध्यासाध्यता (Prognosis) पर हिपोक्रेटस का बहुत अधिक जोर देना, चिकित्सकों से शपथ लिवाना, शिष्ट व्यवहार के नियम तथा चिकित्सकों के लिये आचार व्यवहार संबन्धी नियम-जिनका रोगी पर बहुत प्रभाव पड़ता है तथा और भी अनेक बारीक समानताएं हैं। दोनों प्रणालियां स्वास्थ्य पर ऋतु के प्रभाव को बहुत महत्त्व देती हैं। भारतीय विश्वास के विपरीत हम कई बार तेज शराब को औषध के रूप में बहुत उपादेय समझते हैं। दैनिक (अन्येद्यु-Quotidian), तृतीयक (Tertian) तथा चातुर्थिक (Quarten) ज्वरों की मीमांसा की गई है, क्षय का विस्तृत विवेचन किया गया है जब कि हृद्रोगों का बहुत ही कम वर्णन किया गया है। भ्रूण विज्ञान सम्बन्धी सादृश्य भी है, सब अंगों की युगपत् वृद्धि स्वीकार की गई है। पुंलिंग का शरीर के दाहिने अंगों से सम्बन्ध माना गया है, जुडवां बच्चों के पैदा होने का दोनों में एक ही कारण बताया गया है। आठवें मास का भ्रूण जीने में समर्थ और सातवें मास का जीने में असमर्थ कहा गया है। मृतभ्रूण को गर्भ से निकालने के लिये भी सदृश उपाय बतलाये गये हैं। शल्यचिकित्सा में पथरी और अर्श के आपरेशन में रक्तमोक्षण, जोंको के प्रयोग, दागने की क्रिया और अनेक शल्योपकरण तथा नेत्रविज्ञान में दाहिनी आंख की चिकित्सा में बायें हाथ का प्रयोग करने की प्रथा भी सदृश है। यह नहीं कहा जा सकता है कि इन सादृश्यों में कितने यूनानी प्रभाव से आये हैं और कितने स्वतन्त्र विकास से उत्पन्न हुए हैं। त्रिधातु का सिद्धान्त जो साधारण दृष्टि से देखने पर एकदम यूनान से उधार लिया गया प्रतीत होता है—सांख्य के त्रिगुणवाद के अनुकूल है। त्रिगुणों में एक बात का वर्णन अथर्ववेद में भी मिलता है और कौशिक सूत्र के व्याख्याकार का दावा है कि सूत्रकार वातपित्त कफ के सिद्धान्त को मानता था।
(History of Sanskrit Literature P. 513 by A. B. Ketih).
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
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आयुर्वेद में रुद्र के कोप आदि से महामारी आदि संक्रामक रोगों के उत्पन्न होने का वर्णन मिलता है। होमर के लेख के अनुसार प्रतीत होता है कि ग्रीस में भी प्राचीन काल में इसी प्रकार दैव प्रकोप से रोग आदि की उत्पत्ति मानी जाती थी। हिपोक्रिटस के पूर्व पुरुष एस्क्लपियस (Asclepios) का भी यही विचार था।
इसी प्रकार भारत में प्राचीन वैद्यक के दार्शनिक विषयों से युक्त होने के समान ग्रीसदेश में हिपोक्रिटस से १०० वर्ष पूर्व तक विद्यमान चिकित्सा विज्ञान भी दार्शनिक विषयों से संबद्ध मिलता है। उसके बाद हिपोक्रिटस द्वारा उसमें से दार्शनिक विषयों को हटाकर¹ केवल भैषज्य विद्या के नये प्रारंभ किये जाने का उल्लेख मिलता है। इस प्रकार प्राचीन देशों में भारतीय प्राचीन सभ्यता के स्रोतों के समान ग्रीस में भी मिलने से प्रतीत होता है कि बाद में ग्रीस देश में प्राचीन स्रोतों को हटाकर हिपोक्रिटस के समय उसे नया स्वरूप दिया गया था। हिपोक्रिटस द्वारा नवोद्भावित भैषज्य विज्ञान का यदि भारत में भी प्रभाव होता तो आजकल भारत में भी उसी प्रकार का दार्शनिक विषयों से शून्य चिकित्सा विज्ञान दृष्टिगोचर होता। उसमें हिपोक्रिटस द्वारा नवोद्भावित विशेष विषय तथा उसी के शब्दों की छाया आदि भी दिखाई देनी चाहिये, परन्तु वैसा दिखाई नहीं देता है। इसके विपरीत भारतीय वैद्यक आज भी दार्शनिक विषयों से युक्त तथा उसी रूप में विद्यमान है। तथा भारतीय प्राचीन परम्परागत विषयों के हिपोक्रिटस की चिकित्सा में मिलने से प्रतीत होता है कि भारतीय वैद्यक की प्रतिष्ठा के बाद ही हिपोक्रिटस की चिकित्सा का प्रादुर्भाव हुआ था।
यह कहना कठिन है कि वात, पित्त, कफ आदि शारीरिक मूल तत्त्व ग्रीस देश से भारत में आये² हैं। पाश्चात्त्य विद्वान् त्रिधातुवाद को ग्रीस का नहीं मानते हैं अपितु इसका मूल मिश्र देश के मेतू (Metu) सम्प्रदाय³ को मानते हैं। भारतीय आयुर्वेद के विषय में कीथ नामक विद्वान् की उक्ति का पर्यालोचन करने पर ग्रीसवैद्यक में नैतिक उक्तियों के मिलने पर भी उपक्रम तथा उपसंहार की दृष्टि से आयुर्वेद के विषयों के मिलने से भारतीय वैद्यक को ग्रीस के वैद्यक से प्राचीन तथा उसका मूल माना है। ‘त्रिर्नो अश्विना’ इत्यादि आश्विन सूत्र में आये हुए ऋग्वेद के मन्त्र में त्रिधातु⁴ शब्द के द्वारा वात, कफ रूप तीन धातुओं का ग्रहण करके उनके शमन के द्वारा उत्पन्न सुख की प्रार्थना के मिलने से, अथर्ववेद में कफरोग के निदान तथा चिकित्सा के (६. १४. १-३) पित्त (१. २४. १, १८. ३. ५), भेषज तथा रोगों के निदान के रूप में वात (४. १३. २) तथा वरुणपुत्र, अर्चि, शोचि आदि शब्दों के द्वारा श्लेष्म, वात तथा पित्तज्वरों का निर्देश मिलने से भारतीय वैद्यक में श्लेष्म, वात तथा पित्तरूप त्रिधातुवाद वैदिक काल से ही चला आ रहा प्रतीत होता है। कीथ का कहना है कि कौशिकसूत्र⁵ में भी त्रिदोष का उल्लेख हैं। महाभारत⁶ में भी इसका उल्लेख मिलता है। शारीरिक वात, पित्त, कफ आदि तत्व कौन से हैं इस विषय में मत्थु⁷ आदि बहुत से विद्वानों के मत दिये हुए हैं। यह तो एक
१. रोमनिवासी सेल्सस् (Celsus) ने तथाकथित हिपोक्रिटस के ग्रन्थों की भूमिका में कहा है कि हिपोक्रिटस ने ही चिकित्सा को दर्शनशास्त्र से पृथक् किया। (Hippocrates Val I P. XV, E. B. Vol XI P. 584)
२. त्रिधातुओं का सिद्धान्त प्रथम दृष्टि में सर्वथा यूनान से उधार लिया गया प्रतीत होता है। (Hist. of Sons. Lit. by keith p. 513)
३. मिश्रियों का मेतू का सिद्धांत यूनानियों में (Humours) (त्रिधातु) के सिद्धान्त के रूप में आज तक विद्यमान है।
(E. R. E. Vol. VI P. 541)
४. ४-६ की टि. सं. उपो. पृ. ११८ में देखें।
७. ये त्रिधातु हैं:-वात-नाडी संस्थान, पित्त-पाचक संस्थान तथा उष्णता उत्पादन, कफ-उष्णता संतुलन तथा श्लेष्मा एवं ग्रन्थिस्राव। (The Antiquity of Medicine David C. Muthu P. 21.)
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भिन्न ही प्रश्न है। परन्तु त्रिधातुवाद का स्वरूप कुछ भी हो यह निश्चित है कि यह सिद्धान्त प्राचीन एवं भारतीय ही है। इस प्रकार अत्यन्त प्राचीन वैदिक काल से परम्परागत त्रिदोषवाद को ग्रीस से भारत में आया हुआ मानना कोई युक्तिसंगत नहीं है। भारतीय चिकित्सा विज्ञान के प्रादुर्भाव के साथ ही सोम (चन्द्रमा), सूर्य तथा अनिल (वायु) के समान विसर्ग¹ आदान तथा विक्षेपरूप कार्य करने वाले शारीरिक अन्तस्तत्त्व वात, पित्त, श्लेष्म का उदय हुआ था। इस भारतीय प्राचीन विज्ञान का अन्य विज्ञानों के साथ अन्य देशों में भी जाना संभव हो सकता है। जे. जे.² मोदी ने लिखा है कि त्रिधातुवाद भारतीय सिद्धान्त ही है। हिपोक्रिटस ने भारत से ही इसे ग्रहण किया था।
पाञ्चभौतिकवाद भी प्राचीन भारतीय सिद्धान्त है। आयुर्वेद में भी आत्रेय, धन्वन्तरि तथा कश्यप आदि द्वारा इस शरीर को पञ्चभूतात्मक बताया गया है। इसीलिये इन पञ्चभूतों के समुदित अवस्था में न रहकर पृथक्-पृथक् हो जाने पर मृत्यु को पञ्चत्वं³ शब्द से भी कहा गया है। इन पांच भूतों में से आकाशतत्व को पृथक् रखकर चतुर्भूतवाद का सिद्धान्त लोकायत आदि मतों में प्राचीन भारत में भी मिलता है। हिपोक्रिटस⁴ ने चातुर्भौतिक वाद को एकीयमत (प्राचीन व्यक्तियों में से किसी एक के मत) के रूप में देकर उसमें अपनी रुचि प्रदर्शित नहीं की है। धार्मिक⁵ इतिहास में मिलता है कि ग्रीस देश में यह चतुर्भूतवाद सर्वप्रथम एम्पिडोक्लिस (Empedocles ई. पू. ४९५-४३५) नामक विद्वान् ने प्रारंभ किया था। इस एम्पिडोक्लिस का इरान, भारत आदि समीप के पूर्वदेशों में आगमन, वहां से दार्शनिक विषयों के ज्ञान तथा ग्रीस में दार्शनिक विषयों के प्रचार का उल्लेख⁶ मिलता है एम्पिडोक्लिस द्वारा उद्भूत इस पूर्ववाद (चतुर्भूत वाद) का खण्डन करते हुए हिपोक्रिटस के मस्तिष्क में प्राचीन भारतीय पाञ्चभौतिकवाद का सिद्धान्त साक्षात् अथवा परम्परास्वरूप से अवश्य उपस्थित था ऐसा प्रतीत होता है। पञ्चभूतों में से एकभूत को छोड़कर चार भूतों के द्वारा शरीरोत्पत्ति का वर्णन भारतीय प्राचीन सिद्धान्तों में मिलता है। भूत हेतु प्रत्याख्यानवाद (जिस सिद्धान्त में पंचभूतों का हेतुरूप में खण्डन किया गया है) भारत में प्राचीनकाल में नहीं मिलता है। यदि भारतीय चिकित्सा पर हिपोक्रिटस के विचारों का प्रभाव होता तो इस प्रत्याख्यानवाद (पंचभूतों के खण्डन का सिद्धान्त) को भी भारतीय वैद्यक में मिलना चाहिये था। इस प्रकार हिपोक्रिटस द्वारा प्रतिक्षिप्त पूर्ववाद (चतुर्भूतवाद) के भारत में मिलने तथा हिपोक्रिटस द्वारा नवोदित प्रत्याख्यान वाद के भारत में न मिलने को देखकर भी इनके पौर्वापर्य का निश्चय किया जा सकता है तथा यह भी कहा जा सकता है कि किसका किस पर प्रभाव है।
इसके अतिरिक्त आत्रेय संहिता⁷ के वातकलाकलीय अध्याय में पैरस्पर एक दूसरे के विचारों को जानने की इच्छा से एकत्र होकर विचार करते हुए महर्षियों में वातप्राधान्यवाद के रूप में कुश, भरद्वाज, काङ्कायन, भार्गव तथा वार्योविद के, पित्तप्राधान्यवादी मरीचि के तथा कफप्राधान्यवाद के रूप में काप्य के मतों को देखकर अन्त में पुनर्वसु आत्रेय ने ‘सर्व एव खलु वातपित्तश्लेष्माणः प्रकृतिभूताः पुरुषमायुषा महतोपपादयन्ति’ द्वारा तीनों के सम्मिलित प्राधान्यवाद
१. १, ३, ४, ६, ७ की टि.सं. उपो. पृ. ११९ में देखें।
२. यह यूनानी का (Pitnita या Bile) ही प्राचीन भारतीय आयुर्वेद का पित्त है। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि आयुर्वेद शरीर की तीन धातुओं अर्थात् वात, पित्त, कफ के सिद्धान्त पर आश्रित है और इस त्रिधातु के भारतीय सिद्धान्त को यूनानी वैद्य के जनक (पिता) हिपोक्रिटस ने रोगों के कारण की व्याख्या करने के लिये अपना लिया।
(Fourth all Indian Oriental Conference Vol. II P. 428.)
५. एम्पिडॉक्लियस ने चार तत्त्वों-अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी का सिद्धान्त स्थापित किया।
A History of Religions-Denis stuart P. 140.
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद २९९
को आत्रेय ने अपने मत के रूप में दिया है। हिपोक्रिटस$^१$ ने एक-एक प्राधान्यवाद को एकीय मत के रूप में देकर फिर समुच्चयवाद का निर्देश किया है। एकैकप्राधान्य वाद में नाम निर्देश किये हैं। समुच्चयवाद को भी अपने द्वारा उद्भावित सिद्धान्त के रूप में नहीं दिया है। आत्रेय ने भिन्न-भिन्न मतों को देकर अन्त में समुच्चयवाद को अपने सिद्धान्त के रूप में दिया है। इस प्रकार स्पष्ट प्रतीत होता है कि भारत में प्राचीन काल में प्रचलित एकैकवाद तथा समुच्चयवाद का अनुवाद किया गया है तथा समुच्चयवाद में हिपोक्रिटस ने अपनी रुचि प्रदर्शित की है।
इतना ही नहीं अपितु चरक तथा सुश्रुत में दन्तरोगों में पैत्तिक आदि भेद दिये हैं। हिपोक्रिटस ने भी दन्तशोथ तथा दन्तवेष्टन आदि रोगों के उल्लेख में Pituita (Bile) द्वारा पित्त का दोष के रूप में निर्देश किया है। इस प्रकार शब्द (Pituita) के अपभ्रंश से भी प्रतीत होता है कि यहां पैत्तिक दन्तरोगों के निदान के रूप में भारतीयों द्वारा वर्णित पित्त का ही संकेत है। इसी प्रकार वहां मुखदौर्गन्ध्य के प्रतिकार के लिये जिस ओषधि का निर्देश किया है। उसका Indian medicament (भारतीय औषध) शब्द से व्यवहार$^२$ किया है, ऐसा जे. जे$^३$ मोदी L. M. & S, L. D.S. (Eng) ने लिखा है।
उस रोग की उस ओषधि का भारत द्वारा ज्ञान होने पर ही भारतीय औषध के रूप में उसका उल्लेख करना संभव हो सकता है। यह एक पद ही उसके भारतीय ओषधियों के ज्ञान को सिद्ध करता है। इसके अतिरिक्त हिपोक्रिटस के मैटेरिया मैडिका (निघण्टु ग्रन्थ) में आये हुए जतमनसी (जटामांसी) जिञ्जिबेर (शृङ्गबेर), पिपरनिग्रम् (मरिच वा पिप्पली), पेपेरी (पिप्पली), पेपेरिस रिजा (पिप्पलीमूल), कोस्तस (कुष्ठ), कर्दमोमोस (कर्दम), सकरून (शर्करा) इत्यादि औषध वाचक शब्द स्पष्टरूप से भारतीय आयुर्वेद के अपभ्रंश प्रतीत$^४$ होते हैं। भारतीय तिल वाचक 'सिममं इण्डिकम्' (Sesamun indicum) तथा भारतीय करञ्ज वाचक 'ग्यालेडुपा इण्डिका' शब्दों में भारतवाचक 'इण्डिक' शब्द के प्रयोग से उसका भारत विषयक ज्ञान तथा भारतीय वस्तुओं का व्यवहार तथा उपादान साक्षात् प्रतीत होता है।
हिपोक्रास$^५$ (Hippocras) नामक योगौषधि में दालचीनी अदरक तथा शर्करा आदि भारतीय असाधारण ओषधियों
१. उनमें कुछ कहते हैं कि मनुष्य रक्तनिर्मित है, कई कहते हैं कि पित्त निर्मित है और कुछ लोगों का कहना है कि वह कफनिर्मित है। वास्तव में मनुष्य एक संधान है। विभिन्न विद्वानों ने अपने मतों के अनुसार उसे भिन्न-भिन्न नाम दिये हैं। (Hippocrates Vol IV P. 5)
२. २-३ तक की टि. सं. उपो. पृ. ११९ में देखें।
४. (a) ईसा से लगभग ५०० वर्ष पूर्व हिपोक्रिटस ने संस्कृत के ग्रन्थों में प्राचीन काल से वर्णित Sesamum Indicum (तिल) Nardostachys Jatamansi (जटामांसी), Boswellia thurifera (कुन्दुरु) Zingiber officinate (शृङ्गवेर) Piper Nigrum (मरिच) इत्यादि अनेक भारतीय वनस्पतियों का अपने मैटेरिया मैडिका में वर्णन किया है। ईसा की प्रथम शताब्दी में Dioscorides नामक ग्रीक वैद्य ने, उस समय यूरोप के बाजार में आनेवाली अनेक भारतीय वनस्पतियों के चिकित्सा सम्बन्धी गुणों का पूर्णरूप से अन्वेषण करके अपने विस्तृत मैटेरिया मैडिका में उन्हें सम्मलित किया था जो कि पीछे अनेक वर्षों तक एक प्रामाणिक ग्रन्थ माना जाता रहा है। (A short History of Aryan Medical Science P. 123 by H. H. Bhagvat Sin hajee.)
(b) ग्रीक तथा भारतीय ओषधियों के नामों में समानता है। उदाहरण के लिये—Pepero, Pepercosriza, Costns, Zigiberis, Kardamomois, Hakoros, Bdelion, Sakkaron इत्यादि ग्रीक ओषधियों के क्रमशः पिप्पली, पिप्पलीमूल, कुष्ठ, शृङ्गवेर, कर्दम, वासा, गुग्गुल तथा शर्करा आदि भारतीय नाम हैं।
(Hellenism in Ancient India P. 203 J. J. Jolly-Medicine)
५. हिपोक्रास—एक दीपक एवं हृद्य वैद्यकीय पेय-जो कि दालचीनी, अदरक आदि मसालों तथा शक्कर और शराब के योग से बनता है। (E. B. Vol XI P. 584)
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का प्रवेश दिखाई देता है। उस योगौषध का 'हिपोक्रास' नाम होने से प्रतीत होता है कि हिपोक्रिटस को उन वस्तुओं का निश्चित रूप से ज्ञान था। ईस्वी पूर्व ३५० में होनेवाले थियोफ्रेस्टस (Theophrastus) नामक विद्वान् ने भी 'फाइकस इण्डिका' (Ficus Indica) नामक ओषधि में इण्डिका शब्द का निर्देश किया है। बहुत सी भारतीय वानस्पतिक ओषधियों के ग्रीस देश में पहुंचने का पोकाक¹ आदि विद्वानों ने उल्लेख किया है जो ओषधियां भारत में ही उत्पन्न होती हैं तथा भारतीय वैद्यों द्वारा भिन्न-भिन्न रोगों में प्रयुक्त की जाती हैं-प्रत्यक्ष ज्ञान के बिना वे ओषधियां ग्रीक वैद्यों के हृदय में स्वयं उदित नहीं हो सकती। इसी दृष्टान्त से हिपोक्रिटस के चिकित्सा विज्ञान में मिलनेवाले रोग, निदान, औषध, उपचार आदि भारतीय चिकित्सा विषयों की समानता भी उसकी चिकित्सा को भारतीय विज्ञान के आधार पर स्थित हुई सिद्ध करती है। इसी प्रकार अनेक प्रमाणों के आधार पर डा. जे. जे. मोदी ने रायल एशियाटिक सोसायटी में 'Is Ayurveda a quackery' नामक लेख में यह सिद्ध किया है कि भारतीय आयुर्वेद ही सम्पूर्ण विदेशी चिकित्सा पद्धतियों का मूल² है। उसके वैद्य ग्रन्थ में भारत में ही उत्पन्न होनेवाली ऐसी अनेक वानस्पतिक ओषधियों का निर्देश मिलता है। इस प्रकार यह प्रतीत होता है कि हिपोक्रिटस को भारतीय वैद्यक का ज्ञान अवश्य था चाहे वह साक्षात् हो और चाहे परम्परा द्वारा हो।
म्याकडोनल³ नामक विद्वान् ने पहले यह लिखकर कि 'ग्रीस ने भारत से बहुत से विज्ञान लिये हैं परन्तु यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि ग्रीस ने भारत से चिकित्सा का ग्रहण किया है तथा भैषज्य विद्या पर भारत का प्रभाव पड़ा है या नहीं आगे लिखा है कि 'त्रिपिटक के अनुसार चरक के कनिष्क सामयिक होने से हिपोक्रिटस भारतीय वैद्यक से प्राचीन सिद्ध होता है इसलिये भारतीय चिकित्सा पर ग्रीस का प्रभाव पड़ा है' परन्तु यदि चरकाचार्य ही इस आत्रेयसंहिता का मूल आचार्य होता तो यह उपर्युक्त पौर्वापर्य क्रम ठीक कहा जा सकता था। चरकाचार्य, चरक नाम से प्रसिद्ध आत्रेय संहिता का निर्माता नहीं है अपितु केवल प्रतिसंस्कर्ता ही है। यह संहिता तो आत्रेय तथा अग्निवेश के समय की है, यह पहले ही कहा जा चुका है। काश्यप तथा भेड आदि का निर्देश करना भी इसी बात को सिद्ध करता है। आत्रेय का समय पहले ही उपनिषत्कालीन बताया जा चुका है। यदि तिब्बतीय गाथाओं का ही अवलम्बन किया जाय तो भी आत्रेय बुद्ध से अर्वाचीन सिद्ध नहीं होता है। इस पौर्वापर्य के अनुसार इसके विपरीत आत्रेय का ही प्रभाव हिपोक्रिटस की चिकित्सा पर प्रतीत होता है न कि हिपोक्रिटस का प्रभाव आत्रेय पर।
कुछ लोग कहते हैं कि हिपोक्रिटस से प्राचीन इम्पीड़ोक्लिस४ (Empedocles) नामक वैद्य ने अध्यात्म विद्या पूर्वदेश से प्राप्त की थी। भैषज्य विद्या भी संभवतः वहीं से प्राप्त की थी हिपोक्रिटस के भारत में आने का गोण्डल५ के ठाकुर ने निर्देश किया है। इम्पीड़ोक्लिस के भारत के समीप तक आने का प्रमाण मिलने पर भी हिपोक्रिटस के भारत आने के विषय में कोई प्रमाण मिलता है या नहीं यह कहना कठिन है। हिपोक्रिटस के न केवल अपने देश में अपितु
१. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १२० में देखें।
२. भारतीय ओषधियों के गुणों का केवल अपने देश में ही नहीं अपितु दूसरे देशों में भी ज्ञान था।
(History of Aryan Medical Science-Goudal)
३. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १२० में देखें।
४. यूनानी परम्पराओं के अनुसार ज्ञात होता है कि Jhales, Empedocles, Anaxagorns, Democritus तथा अन्य विद्वानों ने दर्शनशास्त्र के अध्ययन के लिये पूर्वी देशों की यात्रा की थी। इसलिये पर्शिया (इरान) के माध्यम द्वारा यूनानियों पर भारतीय विचारों का प्रभाव पड़ने की कम से कम ऐतिहासिक संभावना अवश्य है।
(History of Hindu Chemistry Vol. I P. 22 by Dr P. C. Roy)
५. कुछ विद्वानों की राय में हिपोक्रिटस ने भारत में चिकित्सा शास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया था।
(Short History of Aryan Medical Science P. 190 by H. H. Bhagvat Sinhajee)
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
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दूर-दूर देशों¹ में जाकर भिन्न-भिन्न विज्ञानों के संचय करने का विद्वानों द्वारा निर्देश मिलने से प्राचीन काल में भैषज्य विद्या में प्रतिष्ठित भारत या उसके आसपास भी उसका जाना संभव हो सकता है किन्तु इसका स्पष्ट उल्लेख न मिलने से भारत को विद्या प्रदान करने को तरह भारत द्वारा उसके साक्षात् विद्या ग्रहण के विषय में भी निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता।
यद्यपि प्रथम डेरियम नामक राजा के समय (ईस्वी पूर्व ५२१) डेमोकिडस नामक यूनानी शल्यचिकित्सक के इरान देश में आने का वृत्तान्त² मिलता है तथापि डेमोकिडसका समय हिपोक्रिटस से पूर्व होने कारण उसके द्वारा इरान देश की चिकित्सा पर हिपोक्रिटस सम्प्रदाय के प्रभाव की शंका नहीं हो सकती है। हिपोक्रिटस के समय के बाद टेरियस्³ नामक व्यक्ति का अर्दक्षीर मेमनून (Artoxereses Memnon ई. पू. ४०४-३५९) नामक राजा के समय ईस्वी पूर्व चतुर्थ शताब्दी में इरान तथा भारत के आसपास आने का तथा ईस्वी पूर्व चतुर्थ शताब्दी के अन्त में मेगस्थनीज⁴ का भारत में आने का वृत्तान्त मिलता है। परन्तु इन दोनों व्यक्तियों के हिपोक्रिटस के ही सम्प्रदाय के अनुयायी होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता है। टेरियस् द्वारा हिपोक्रिटस के आर्टीकुलेशन नामक ग्रन्थ का एक बार उल्लेख करने पर भी उसे प्रमाणों के अभाव में हिपोक्रिटस का अनुयायी नहीं कहा जा सकता। राजदूत होकर भारत में आये हुए मेगस्थनीज के ग्रीक वैद्य होने पर भी ग्रीक वैद्यक के उपदेश प्रचार तथा प्रयोग आदि का कहीं उल्लेख नहीं मिलता है। अपितु इसके विपरीत उसने भारतीय वैद्यों की प्रशंसा तथा उसके द्वारा विदेशियों की चिकित्सा का उल्लेख किया है। वैद्य होते हुए भी उनके द्वारा भारत वैद्यों का आदर किया जाना तथा उनके द्वारा चिकित्सा का उल्लेख किया जाना भारतीय चिकित्सा विज्ञान की समृद्धि तथा गौरव का सूचक है। भारत के समीप पहुँचे हुए टेरियस् नामक विद्वान् ने भी हिपोक्रिटस के सम्प्रदाय वाले अथवा किसी अन्य सम्प्रदायवाले ग्रीक वैद्य द्वारा भारत में प्रचार तथा उपदेश का उल्लेख न करने से तथा अपने 'इण्डिका' नामक ग्रन्थ में भी इसका उल्लेख न करने से उसके द्वारा भी भारत में ग्रीक प्रभाव की प्रतीति नहीं होती है। प्रत्यत उत्तर भारत में पहुँच कर वहां से लौटने के बाद उसने २३ ग्रन्थों के स्वरूपवाले अपने 'पर्सिका'⁵ नामक तथा 'इण्डिका' नामक ग्रंथों में भारत के विषय में बहुत कुछ लिखा है। इसमें भारतीय गज (हाथी), बन्दर, तोता, मैना, कीटरङ्ग (कीट विशेष) आदि के समान बहुत सी वनस्पतियों का भी वर्णन किया है। भारत में शिरोरोग, दन्तरोग, नेत्ररोग, नेत्ररोग, मुखव्रण तथा अस्थिव्रण आदि रोगों के न होने के उल्लेख⁶ मिलने से भारत में आये हुए इरान देश के राजा के राजवैद्य पद पर प्रतिष्ठित इस ग्रीक वैद्य द्वारा भारतीय विषयों के संग्रह में से भारत में प्राचीन काल से प्रतिष्ठित वैद्यक विद्या के अन्य विषयों का भी सम्भवतः संग्रह किया है।
प्राचीन ग्रीक वैद्यक सम्प्रदाय
हिपोक्रिटस के चिकित्सा विज्ञान का भारत पर संभवतः प्रभाव न हो, किन्तु हिपोक्रिटस से पूर्व भी ग्रीस में प्रिनोशन्स ऑ कास (Prenotions of cas) तथा फर्स्ट प्रिरेटिक⁷ (First prerrehetic) इम्प्पिडोक्लिस⁸ (Empedocles)
१. कहा जाता है कि हिपोक्रिटस ने बहुत दूर-दूर की यात्रायें की थीं। (E. B. Vol XI P. 584).
२. २-५ तक की टि. सं. उपो. पृ. १२१ में देखें।
६. यह टि. सं. उपो. पृ. १२१-१२२ में देखें।
७. कॉस और पहले प्रिरेटिक (उत्तरकालीन-प्रिरेटिक पूर्वकालीन थे यद्यपि दोनों को हिपोक्रिटस से पहले का समझा जाता है) के पूर्व विचार यह प्रदर्शित करते हैं कि कॉस के चिकित्सा सम्प्रदाय में अधिक ध्यान रोगों के प्राकृतिक इतिहास विशेषतः घातक और अघातक परिणाम की संभावना पर दिया जाता था। (Hippocrates Vol. I P. XIII.)
८. इम्प्पिडोक्लिस-फिलालौस से कुछ पहले हुआ। वह वैद्य की अपेक्षा 'चिकित्सक' अधिक था। यद्यपि गैलन ने उसे इटली के चिकित्सा संप्रदाय का जन्मदाता कहा है। उसकी शिक्षाओं का चिकित्सा संबन्धी पहलू कुछ तो जादू और कुछ नीमहकीमी था। शारीरिक धातुओं पर उसका कार्य इटली और सिसली के चिकित्सा सम्प्रदाय के सदृश है जिसमें दार्शनिक ढंग की कुछ स्वयंसिद्ध मान्यताएं मान ली जाती हैं। (Hippocrates Vol. I Introduction P. 12-13)
| ३०२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् |
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तथा स्निडोस१ (Cnidos) नामक तीन सम्प्रदाय थे, जिनमें पाथागोरस के समकालीन डेमोकेडिस (Democedes) आदि बहुत से विद्वान् वैद्य२) थे। भारत पर उनके प्रभाव के विषय में भी कुछ नहीं कहा जा सकता। ये सम्प्रदाय भी हिपोक्रिटस से अधिक से अधिक सौ वर्ष पूर्व३ ही थे। इससे अधिक प्राचीन प्रतीत नहीं होते हैं। इन सम्प्रदायों में से भी एक तो वही मन्त्रप्रधान सम्प्रदाय ही प्रतीत होता है। शेष दोनों में दार्शनिक विषय मिला हुआ। भारत से ग्रीस में अध्यात्म विद्या ले जाने वाले पाथागोरस के समकालीन होने से, उसके साथ संबन्ध होने से तथा पाथागोरस के संबन्ध में वर्णन करने वाले उन दोनों पूर्व सम्प्रदायों में भी कहीं-कहीं भारतीय विषय का सम्पर्क दिखाई देने से उनमें ग्रीक प्रभाव तथा उतना विज्ञान का संबन्ध नहीं मिलता है। सुसानगर के कारागार में दासों के साथ बन्दी हुए डेमोकेडिस द्वारा घोड़े से गिरने से टूटी हुई इरानदेश के राजा की टांग को बिना शस्त्रों के ही यथास्थान जोड़कर अच्छा कर देने से भाग्य से यश४ के मिलने पर भी तद्विषयक वर्णन में शस्त्र आदि उपकरणों की पूर्णता के अभाव५ का उल्लेख होने से उस समय तक ग्रीस में शस्त्र क्रिया की अपूर्णता का ज्ञान होने से प्रतीत होता है कि उस समय ग्रीक वैद्यक अपनी प्रारंभिक अवस्था में थी। यदि ग्रीस में प्राचीन काल से ही चिकित्सा विज्ञान प्रौढ़रूप में विद्यमान होता तो उसके बाद हिपोक्रिटस को चिकित्सा विज्ञान के पिता (Father of Medicine) के पद पर आरूढ़ न किया जाता। हिपोक्रिटस को उस पद पर आरूढ़ करने से उस समय ग्रीक वैद्यक की शैशवावस्था प्रतीत होती है। उस समय ग्रीस देश में यदि भैषज्य विद्या उन्नत अवस्था में होती तो ग्रोटस६ नामक विद्वान् द्वारा मिश्र देश की भैषज्य विद्या के विषय में पाथागोरस के विस्मय का उल्लेख न होता। इसलिये पाथागोरस के विस्मय से यह सूचित होता है कि उस समय अन्य देशों के द्वारा कास आदि स्थानों में विज्ञानयुक्त भैषज्य विद्या के नवोत्थान के होने पर भी मिश्र देश के समान उन्नत अवस्था नहीं थी। प्रो. ओसलर७ (Osler) नामक विद्वान् का भी कहना है कि ग्रीस में विज्ञान युक्त चिकित्सा ईस्वी पूर्व छठी शताब्दी से ही प्रारम्भ हुआ है। हिपोक्रिटस से पूर्व के इन सम्प्रदायों में भी भारतीय चिकित्सा के समान दार्शनिक विषयों का सम्मिश्रण तथा भारतीय शब्दों की छाया आदि भारतीय विज्ञान के चिह्न मिलने हैं। मिश्र देश में ग्रीस देश से पूर्व चिकित्सा विज्ञान के मिलने से तथा ग्रीस देश पर मिश्र के प्रभाव का उल्लेख मिलने से प्रतीत होता है कि ग्रीसदेश ने चिकित्सा विज्ञान मिश्र८ से
१. इन दो सम्प्रदाओं के अतिरिक्त एक और भी प्रसिद्ध सम्प्रदाय स्निडोस में था। 'उग्ररूपों में पथ्य नामक हिपोक्रिटस की रचना में इसके सिद्धान्तों का खण्डन है। (Hipporates VoI. I Introduction p. 13)
२. २-३ तक की टि. सं. उपो. पृ. १२२ में देखें।
४. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १२२ में देखें।
५. यद्यपि वह शल्यक्रिया के साधनों (उपकरणों) से सम्पन्न नहीं था। फिर भी पहले वर्ष में ही वह इतना सफल हुआ कि उस द्वीप के निवासियों ने उससे समझौता कर लिया कि वह एक टेलेण्ट के वेतन पर वहां एक वर्ष तक रहेगा। (लगभग ३८३ स्टलिंग=एक इजिनियन टेलेन्ट) (History of Greece Vol. IV P. 180-181 Grotes.)
६. पाथागोरस के समय मिश्र की वैद्यक की इतनी उन्नति हो गई थी कि एक जिज्ञासु यात्री का ध्यान आकृष्ट कर सके। उसके सिद्धान्तों का श्रेणीकरण और विभाजन हो गया था। उनके चिकित्सा व्यवसाय के नियम निर्धारित हो गये थे।
(Herodotus II 84 History of Greece Vol. IV P. 395 by Grotes.)
७. शास्त्रीय ओषधियों का—जो कि धर्म और विज्ञान के संमिश्रण का परिणाम है—उद्गम छठी सदी ई. पू. के यूनानियों की प्रतिभा और सामाजिक अवस्था है। (Osler) देखिये—(The Surgical Instruments. of the Hindus
Vol. I P. 329. G. N. Mukhopadhyay.)
८. नील की घाटी और मेसोपोटमिया दोनों में ही चिकित्सा शास्त्र जादू टोने और विज्ञान का संमिश्रण था। इस प्रणाली का यूनान पर बहुत पूर्वकाल में ही प्रभाव पड़ गया था। (E. R. E. Vol. VI. P. 541 by E. Thramer
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
३०३
प्राप्त किया है। तथा भारतीय चिह्नों के मिलने से भारत का प्रभाव भी सूचित होता है। विद्वानों १ का विचार है कि ग्रीसदेश की चिकित्सा का प्राचीन स्रोत मिश्र के समान भारत भी है।
उत्तर की प्राचीन मूल सभ्यता के शाखा प्रशाखा भेद से सब और फैलने पर पूर्व शाखा द्वारा भारत के समान पश्चिम शाखा के द्वारा ग्रीस आदि देशों में भी भेषज्य विज्ञान प्राचीन काल से ही प्रवृत्त हुआ हो यह भी संभव नहीं है। ग्रीस के प्राचीन महाकवि होमर ओडिसी (Odyssey) नामक ग्रन्थ में देवबल से ही रोगों की उत्पत्ति तथा दैवप्रसाद—पूजा, यज्ञ, मन्त्र, उपासना आदि से रोगों की निवृत्ति का उल्लेख २ मिलता है। इसके इलियड (Iliad) ग्रन्थ में शस्त्रक्रिया की बहुत थोड़ी झलक मिलती है। तथा थ्रोमर ३ के मतानुसार वह भी वहां बेबिलोनिया के प्रभाव से ही आई प्रतीत होती है। उसके दोनों ग्रन्थों में कहीं भी रोग निवृत्ति के लिये ओषधियों का अन्तः प्रयोग (Internal use) नहीं मिलता है। प्राचीन काल की धारणा के अनुसार उसके लेख में रोगों के प्रतीकार के लिये देवों की उपासना तथा मन्त्र आदि का उल्लेख ४ मिलने से, उसीके लेख में देवप्रसाद से ही मिश्र देश द्वारा रोगों को शमन करनेवाली ओषधियों की प्राप्ति ५ के उल्लेख से तथा मिश्र देश के विषय में ही उपर्युक्त बातें लिखकर अपने देश के विषय में कुछ भी न लिखते हुए मौन अवलम्ब कर लेने से स्पष्ट है कि उस समय तक ग्रीस में वैज्ञानिक भेषज्य विद्या का उदय नहीं हुआ था तथा दूसरे देशों से उसकी प्राप्ति भी नहीं हुई थी।
ग्रीस देश की पौराणिक कथाओं (Classical History) में भेषज्य विद्या का वृत्तान्त मिलने पर भी वाइज ६ (Wise) नामक विद्वान् का कहना है कि उसमें आई हुई सम्पूर्ण भेषज्य विद्या प्राचीन स्रोत से ही निकली हुई नहीं है।
भारतीय वैद्यक तथा ग्रीकवैद्यक में मिलने वाली विषयों की बहुत सी समानताओं का पहले ही वर्णन किया जा चुका है। विभिन्न देशों के विद्वानों में केवल दो-तीन विषयों में विचारों की समानता तो आकस्मिक भी हो सकती है। परन्तु अनेक तथा असाधारण विषयों की समानता, एक का दूसरे पर प्रभाव हुए बिना तथा साक्षात् या परम्परा द्वारा परस्पर यातायात आदि के सम्पर्क के बिना संभव नहीं है। अपने को आर्य कहने वालों के प्राचीन मूल स्रोत के छायारूप शाखा उपशाखाओं में मान्त्रिक भेषज्य प्रक्रिया के प्रायः मिलने पर भी, शाखा तथा उपशाखाओं में विभक्त हुई वैज्ञानिक भेषज्य विद्या के भारत के समान ग्रीस में भी मिलने के प्रमाण होने से दोनों देशों के चिकित्सा विज्ञान में समानता को देखकर प्रतीत होता है कि साक्षात् अथवा दूसरे देशों के द्वारा विज्ञान का संक्रमण भारत से ग्रीस में अथवा ग्रीस से भारत में हुआ है। यदि भारतीय वैद्यक पर ग्रीस का प्रभाव होता तो ग्रीक-वैद्यक में आये हुए विषय, शब्द तथा प्रक्रियाएं न्यूनाधिक
१. (a) यूनानी चिकित्सकों द्वारा प्रयोग में लाये जाने वाले अनेक द्रव्य मिश्र से आते थे। यूनानी चिकित्सा के नीतिनियमों का आधार मिश्री चिकित्सा के नीति नियमों में निहित है।
(b) ईरानी और भारतीय चिकित्सा शास्त्रों से यूनानी को अनेक बातें प्राप्त हुईं।
२. इसी ओडिसी में कहा गया है कि रोग लोगों को देवताओं द्वारा बरपा किये जाते हैं (V 396 IV 411) इसलिये उनका इलाज भी वे ही कर सकते हैं (V. 397) इसलिये होमर के समय जादू टोने की चिकित्सा यूनानियों में प्रचलित थी—ऐसा असंदिग्धरूप में माना जा सकता है। (E. R. E. Vol. VI P. 540)
३. ३-४ की टि. सं. सं. उपो. पृ. १२३ में देखें।
५. होमर ने मिश्र को श्रद्धांजलि अर्पित की है क्योंकि उसका ही 'पितृदेवता' समस्त फेरियन जाति को चिकित्सा शास्त्र की शिक्षा देता है।
६. अतः वाइज महोदय निम्न टिप्पणी करते हैं—'चिकित्सा के प्राचीन इतिहास विषयक तथ्यों को केवल यूनान और रोम के प्रसिद्ध लेखकों में ही ढूंढ़ा गया है। और वे तथ्य इस ढंग से व्यवस्थित किये गये हैं कि वे उस परम्परागत सिद्धान्त के अनुकूल हों जिसके अनुसार यूनानी स्रोत से प्रादुर्भूत न होने वाली सभी पद्धतियों को अस्वीकार कर दिया जाता है। (The Surgical Instruments of the Hindus Vol. I. P. 330 by G.N. Mukhopadhyay.)
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रूप से भारतीय वैद्यक में अवश्य मिलनी चाहिये थीं, परन्तु ऐसा दिखाई नहीं देता है। प्रत्युत इसके विपरीत पूर्वोक्त वर्णन के अनुसार भारतीय असाधारण विषय, भारतीय शब्दों की छाया तथा कहीं-कहीं स्पष्टरूपेण भारतीय नाम से ही किये गये उल्लेख के प्राचीन ग्रीक वैद्यक में मिलने से भारतीय भैषज्य विज्ञान का थोड़ा बहुत आलोक प्राचीन ग्रीक वैद्यक पर अवश्य पड़ा प्रतीत होता है।
नालन्दा विश्वविद्यालय में अमुक रोगों में अमुक शस्त्र चिकित्सा की जाती थी—इस प्रकार प्रतिपादन करके (Dorothea¹ Chaplin) नामक विद्वान् लिखता है कि भारतीय आयुर्वेद के शरीरशास्त्र में कोई भी विदेशो शब्द नहीं मिलता है प्रत्युत पाश्चत्य वैद्यक में शारीरिक अवयवों के निर्देश करनेवाले बहुत से शब्दों में भारतीय प्राचीन शब्दों की छाया दिखाई देती है।
यवनों द्वारा भारतीय विषयों का ग्रहण
Encyclopedia² Britanica में लिखा है कि ‘ग्रीक चिकित्सा में उस देश की मिनोयन (Minoan) नामक जाति के स्वच्छता के नियमों के, मैसेपोटेमिया, असीरिया, मिश्र, इरान तथा भारत आदि देशों से शरीर रचना विज्ञान का, भूत प्रेत आदियों द्वारा रोगों की उत्पत्ति का ओषध निर्माण विद्या का, आयुर्वेद के समान अनेक ओषधियों का तथा शल्यसम्बन्धी शस्त्रविज्ञान के मिलने से उसकी उत्पत्ति के चार स्त्रोत थे, परन्तु इनमें से कितना अंश किसका है यह नहीं कहा जा सकता’। इस प्रकार इनमें कितना अंश किसका है, इसका ज्ञान न होने पर यह स्पष्ट है कि इरानी वैद्यक की तरह भारतीय वैद्यक के भी कुछ विषयों का ग्रीक वैद्यक में प्रतिसंक्रमण हुआ है।
ग्रीस देश में किस-किस समय, किस-किस देश से तथा भैषज्य विद्या सम्बन्धी किन-किन विषयों का प्रतिसंक्रमण हुआ है, इसका यथावत् निरूपण कर सकना दुष्कर होने पर भी भारत से इस विषय के ज्ञान के लिये जो संभावनाएं मिलती हैं उन पर हम प्रकाश डालेंगे।
हिपोक्रिटस से प्राचीन हेराक्लिटस³ (Heracleitus) नामक दार्शनिक द्वारा ईस्वी पूर्व ५०४ में लिखित पुस्तक
१. हमें अपनी चिकित्सा पद्धति अरब के द्वारा हिन्दुओं से मिली है। आयुर्वेद के ग्रन्थों में ऐसे नाम बिलकुल नहीं मिलते हैं जो किसी विदेशी अभिजन को सूचित करते हों....। १७ वीं सदी तक यूरोपीय चिकित्सा पद्धति हिन्दुओं की चिकित्सा पद्धति पर आधारित थी......। भारतीय (आयुर्वेदिक) और यूरोपीय शरीर रचना विज्ञान की पारिभाषिक शब्दावलि की तुलना करने से यह बात स्पष्ट हो जायेगी।
मस्तिष्क के विभाग—शिरोब्रह्म और शिरोविलोम।
तुलना कीजिये—
| शिरोब्रह्म | Cerebrum | (सैरीब्रम) |
|---|---|---|
| शिरोबिलोम | Cerebellum | (सैरोबेलम) |
| हृत् या हृद् | Heart | (हार्ट्) |
| महाफल | (महा-मेग्ना Magna) | मेग्नावेकी |
इस प्रकार हम देखते हैं कि आयुर्वेद न अपरिष्कृत शास्त्र है और न नीमहकीमी है। इसके विपरीत शायद वही संसार की सबसे प्राचीन और सबसे अधिक शास्त्रीय चिकित्सा पद्धति है। अब भी उसमें अनेक ऐसी जानकारियां हैं जो यूरोप के किसी भी अध्यवसायी चिकित्सक के लिये बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकती हो।
(Some Aspects of Hindu Medical Treatment by Darothea Chaplin P. 7-8)
२. यूनानी चिकित्सा के तीन स्रोत हैं—(१) मिनोयन जाति, (२) मेसोपोटामिया, (३) मिश्र। इरानी तथा भारतीय स्त्रोत भी यूनानी चिकित्सा के कुछ अंश में देन हैं। परन्तु यह देन किस मात्रा में है तथा उसका स्वरूप क्या है—इस विषय में अभी निश्चय-पूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता है।
(E. B. Vol. XV P. 198)
३. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १२५ में देखें।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३०५
में अनेक वार उल्लिखित पाथागोरस (Pythagoras) नामक ग्रीकविद्वान् ईस्वी पूर्व ५८२-४७० में ग्रीस में हुआ प्रतीत होता है। पोकाक (Pococke), स्त्रोदर (Schroeder) आदि पाश्चात्त्य तथा अनेक भारतीय विद्वानों द्वारा पाथागोरस के भारत में आगमन तथा भारत से आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विषयों का ग्रहण करके ग्रीस में उनके प्रचार का उल्लेख¹ किया गया है। भारत से भैषज्य विद्या के ग्रहण का स्पष्ट प्राचीन उल्लेख न मिलने पर भी ईस्वी पूर्व छठी शताब्दी में पाथागोरस² की संख्या के स्थापित होने, पाथागोरस सम्प्रदाय के अनुयायी तथा उसके दार्शनिक शिष्यों के द्वारा ही भैषज्य³ विज्ञान में सर्वप्रथम रुचि प्रदर्शित करने तथा हिपोक्रिटस के भैषज्यविज्ञान पर उनकी ही विद्या के प्रभाव पड़ने के
१. (a) डॉ. एनफील्ड का कथन है—हम देखते हैं कि ज्ञानोपार्जन के लिये पाथागोरस, अनाग्जरेकस् और पाइरो आदि अनेक विद्वानों ने भारत की यात्रा की थी। ये सब विद्वान् पीछे यूनान के महान् तत्ववेत्ता (दार्शनिक) कहलाये।
(Hindu Superiority P. 233, 234, 235 by H. B. Sarda)
(b) यह निश्चित है कि वह (पाथागोरस) भारत आया था। मेरा विश्वास है कि मैं इसे स्वतःसिद्ध साबित कर सकता हूँ।
(India in Greece, Pococke P. 353)
(c) महान् तत्ववेत्ता पाथागोरस सी बहुत सी प्रेरणा भारत से मिली थी।
(V. Schroeder-Pythagoras and die Inder P. 44-59)
(d) हिन्दुओं के मतानुसार किससे मानव प्रकृति का निर्माण होता है—इसकी समीक्षा करते हुए स्वीडन के काउन्ट ने लिखा है-इस विषय में अफलातून और अरस्तू भी पाथागोरस की धारणा को मानते हैं और धारणा शायद भारत से ली गई है जहां कि पाथागोरस अपना तत्वज्ञान समृद्ध करने के लिये गया था।
(Theogony of the Hindoos P. 77)
(e) शलीगल का कथन है—पुनर्जन्म का सिद्धान्त मूलतः भारतीय उद्गम का है और पाथागोरस ने उसका यूनान में प्रचार किया।
(History of Literature P. 109).
(f) श्रीयुत प्रिंसिप का कथन है—‘पाथागोरस ने अपने सिद्धान्त भारतीय स्त्रोत से लिये थे’—यह एक सर्वविदित तथ्य है। मिश्राङ्क के नाम से बौद्धधर्म के सिद्धान्त भी बहुत प्रचलित हुए हैं। (Indian wisdom P. 68)
(g) इस विषय में; जिसका अभी वर्णन किया गया है-सच्चाई चाहे कुछ भी क्यों न रही हो, लेकिन पाथागोरस भारतीय दर्शन और विज्ञान पर अवलम्बित था यह बात बहुत सीमा तक ठीक जान पड़ती है। धार्मिक, दार्शनिक या गणितसम्बन्धी जो सिद्धान्त उसके नाम से मिलते हैं लगभग वे सभी ६ ठी सदी ई. पू. के भारतीयों को ज्ञात थे। यदि इन्हें निरा दैवयोग ही समझा जाय तो ये दैवयोग भी इतने अधिक हैं कि उनका सम्मिलित वजन काफी हो जाता है। पाथागोरस का ही पुनर्जन्म संबन्धी सिद्धान्त अन्य सिद्धान्तों से असंबद्ध सा है और उसकी स्थापना की कोई प्रमाण श्रृंखला नहीं मिली उसके आधार पर उसकी व्याख्या की जा सके। इसीलिये यूनानी लोग भी उसे विदेशी उद्गम से आया हुआ समझते थे। पाथागोरस ने यह सिद्धान्त मिश्र से लिया हो यह संभव नहीं है क्योंकि पुराने मिश्रियों को उसका ज्ञान ही नहीं था। पीछे प्रचार में आई धारणाओं के बावजूद यह बहुत ही कम संभव है कि पाथागोरस भारत आया होगा। लेकिन उसकी भेंट भारतीयों से ईरान में हुई हो सकती है।
(History of Hindu Chemistry Vol. I P. 22-23. By Dr. P. C. Roy.)
२. पश्चिमी यूनान में ६ टी सदी ई. पू. में पाथागोरस के अनुयायियों का संगठन स्थापित हुआ।
(Hippocrates Vol. IV P. 452.)
३. पहले पहल चिकित्सा शास्त्र में अभिरुचि दिखाने वाले तत्ववेत्ता पाथागोरस के अनुयायी ही थे। क्रोटन का अलेमेयन (पाथागोरस के वृद्धावस्था के दिनों का एक युवक शिष्य जिसकी दर्शन की अपेक्षा चिकित्सा शास्त्र में अधिक अभिरुचि थी) यद्यपि विशुद्धरूप से पाथागोरस का अनुयायी नहीं था फिर भी उसके सम्प्रदाय से संबद्ध था। ऐसा जान पड़ता है कि हिपोक्रिटस के प्रस्थान (School) पर इसका काफी प्रभाव पड़ा। (Hippocrates Vol I Intro. P. XIII.)
३०६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
उल्लेख¹ से प्रतीत होता है कि भारत से भैषज्य विद्या को ले जाने वाले पाथागोरस के शिष्यों द्वारा ही हिपोक्रिटस पर भारतीय भैषज्य विद्या का प्रभाव पड़ा है। पोकाक (Pococke) कोलब्रुक आदि विद्वानों² का कहना है कि पाथागोरस (इंग्लिश) के ग्रीक शब्द 'पुथ्यगोरस' का संस्कृत मूलरूप बुद्धगुरु है। पाथागोरस के दर्शन तथा भारतीय बौद्धदर्शनों में परस्पर बहुत समानता³ है। केवल दर्शन में ही नहीं, अपितु थिबोट⁴ तथा विभूतिभूषणदत्त⁵ आदि के अनुसार उनके गणित में भी भारतीय प्राचीन शुल्वगणित (Geometry) का सादृश्य मिलता है। भारत से उस समय दर्शन तथा गणित आदि बहुत से विषयों का ग्रहण करते हुए सम्भवतः उसने लोकोपयोगी तथा चिरप्रतिष्ठित भैषज्य विद्या का भी ग्रहण किया हो। भारतीय भैषज्य विद्या के भी पाथागोरस द्वारा ग्रीस देश में ले जाये जाने के विषय में बेड्रो (Bedroe)⁶ सुश्रुत के अनुवाद की भूमिका में के. एल.⁷ भिषग् रत्न, गोण्डल के⁸ के ठाकुर तथा जी. एन.⁹ मुखोपाध्याय आदियों ने उल्लेख किया है। पाथागोरस के दार्शनिक अनुयायियों का हिपोक्रिटस के भैषज्य विज्ञान पर प्रभाव के दिखाई देने से प्रतीत होता है कि संभवतः पाथागोरस भी भैषज्य विज्ञान का वेत्ता था। कोटन नामक स्थान के अल्ममेइनो (Alcmaeon) नामक विद्वान् के पाथागोरस की संस्था का भी अनुयायी होने तथा वैद्यक विद्या में रुचि होने से हिपोक्रिटसीय सम्प्रदाय में भी उसके पूर्णरूप से प्रभाव के उल्लेखों¹⁰ मिलने से प्रतीत होता है कि पाथागोरस की भी कोई भैषज्य विद्या संबन्धी संस्था
१. ४-५ तक की टि. संस्कृत उपो. पृ. १२६ में देखें।
२. पाथागोरस को बुद्धगुरु से अभिन्न सिद्ध किया जाता रहा है। कोलब्रुक भी दोनों को अभिन्न ही मानते थे। संस्कृत का बुद्धगुरुस् (प्रथमा की सु विभक्ति)=पुथागोरस् (यूनानी)=Pythagoras (आंगलरूप)।
(India in Greece-Pococke P. 364)
३. गणित शास्त्र के इतिहास लिखने वाले कैन्टर को (Cantor) यूनानी रेखागणित और शुल्वसूत्रों का अत्यधिक सादृश्य देख कर बहुत आश्चर्य हुआ। उसने इससे जैसा कि नितान्त स्वाभाविक ही था यह परिणाम निकला कि शुल्वसूत्र सिकन्दरिया के हिरो प्रस्थान (२१५ ई. पू.) से प्रभावित है। शुल्वसूत्रों का काल लगभग आठवीं सदी ई. पू. ठहरता है। डॉ. थिबोट (Dr. Thibaut) ने दिखलाया है कि ४७ वें साध्य के प्रमेय को जो कि पाथागोरस के नाम पर परम्परा से चला जाता है हिन्दुओं ने पाथागोरस से २०० वर्ष पूर्व ही हल कर दिया था। इस प्रकार वी. श्रौडर का यह परिणाम पुष्ट होता है कि यूनानी तत्ववेत्ता (पाथागोरस) ने भारत से प्रेरणा पाई थी।
(History of Hindu Chemistry by Dr. P. C. Roy P. XLI)
६. महान् तत्ववेत्ता (पाथागोरस) ने अपने तान्त्रिक रहस्य और अध्यात्मवाद भारतीय ब्राह्मणों से प्राप्त किये थे। श्री पोकोक (Pococke) ने अपने 'यूनान में भारत' (India in Greece) नामक ग्रन्थ में उसे बुद्धगुरु या बुद्ध से अभिन्न सिद्ध किया है। यह बड़ी आसानी से अनुमान किया जा सकता है कि वह अपने भारतीय गुरुओं से प्राप्त अनेक आयुर्वेदिक नुस्खे यूनान ले गया होगा।
(The Origin and Growth of Healing Art-Bedroe P. 162)
७. की टि. सं. उपो. पृ. ९० का. १ में देखें।
८. यूनानियों में चिकित्सा शास्त्र के प्रतिष्ठापक पाथागोरस (५८२ ई. पू.) के सिद्धान्तं तत्वतः भारतीय थे। कहा जाता है उसने मिश्रियों से ज्ञान प्राप्त किया। हम आगे दिखायेंगे कि मिश्रियों ने चिकित्साशास्त्र भारत से सीखा। अपने ग्रन्थ 'History of Philosophy' में एनफील्ड ने दिखाया है कि पाथागोरस ने पूर्व के अर्थात् हिन्दु तत्ववेत्ताओं से अपने सिद्धान्त ग्रहण किये थे। उसकी शिक्षाओं की बुद्धकी शिक्षाओं से इतनी अधिक समता है कि श्रीयुत पोकोक ने अपने ग्रन्थ 'India in Greece' में पाथागोरस और बुद्धगुरु या बुद्ध को एक ही सिद्ध करने का यत्न किया है।
(Short History of Aryan Medical Science P. 190-191 by H. H. Bhagvat Sinhajee.)
९. की टि. सं. उपो. पृ. १२६ में देखें।
१०. पहले-पहले चिकित्सा शास्त्र में अभिरुचि दिखाने वाले तत्ववेत्ता पाथागोरस के अनुयायी ही थे। क्रोटन को अलेमेयन (पाथागोरस के वृद्धावस्था के दिनों का एक युवक शिष्य जिसकी दर्शन की अपेक्षा चिकित्सा शास्त्र में अधिक अभिरुचि थी) यद्यपि विशुद्ध रूप से पाथागोरस का अनुयायी नहीं था फिर भी उसके सम्प्रदाय से संबद्ध था। ऐसा जान पड़ता है कि हिपोक्रिटस के प्रस्थान (School) पर इसका काफी प्रभाव पड़ा। (Hippocrates Vol. I P. XI.)
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३०७
थी। पाथागोरस की विद्या के संबन्ध में अनुसन्धान करने पर मानवशरीर में मानसिक तथा शारीरिक रोगों की निवृत्ति के लिये संगीत आदि साधनों का उपयोग आकृति परीक्षा के द्वारा शरीर के आन्तरिक विकारों का ज्ञान, पशुमांसभक्षण अहितकारी होने से उसके न खाने में श्रेय, आरोग्य तथा पथ्य का महत्व, शारीरिक शक्तिवृद्धि के उपायों का अनुसन्धान, प्रत्येक व्यक्ति की प्रकृति के विषम होने से सबके लिये आहार व्यवस्था एक समान न होकर प्रकृति के अनुसार भिन्न-भिन्न होना, इत्यादि विषय¹ मिलते हैं। पाथागोरस के जितने भी आदेश मिलते हैं उनमें शरीर को स्वस्थ रखने के लिये अपने अनुकूल पथ्यसेवन आदि नियमों के पालन को विशेषस्थान दिया² गया है। पाथागोरस के सम्प्रदाय में रोग-निवृत्ति के लिये ओषधियों के प्रयोग की अपेक्षा पथ्य तथा आहार विहार के नियमों के पालन पर ध्यान दिया जाता था और यदि ओषधियों का प्रयोग किया भी जाता तो अन्त प्रयोग (Internal use) की अपेक्षा यथाशक्ति लेप आदि बाह्य शारीरिक उपचारों पर विशेष ध्यान³ दिया जाता था। ईस्वी पूर्व ५३० में पाथोगोरस के क्रोटन नामक स्थान में पहुंच कर उपदेश देने पर वहां के तीन सौ व्यक्तियों द्वारा उसके उपदेश के अनुसार औषधप्रयोग कोक छोड़ कर पथ्य तथा आहार विहार के पालन से स्वास्थ्य रक्षा करने को शपथ⁴ लेने का उल्लेख मिलता है। अनेक देशों में घूमते हुए मिश्र देश में पहुंचकर पाथागोरस ने वहां आगन्तुओं को चकित करनेवाले भेषज्यविद्या के विशेष प्रचार को देखकर बहुत आश्चर्य⁵ प्रकट किया, क्रोटन नामक प्रदेश में पाथागोरस के साथ विद्यमान पाथागोरस के सम्प्रदाय वाले मीलो नामक व्यक्ति के जंवाई डेमोकेडिस (Demokedes) द्वारा प्रवर्तित भैषज्यविषयक सम्प्रदाय के ईस्वी पूर्व तृतीय-चतुर्थ शताब्दी में प्रचलित⁶ होने के ग्रोट्स (Grotes) नामक विद्वान् द्वारा निर्देश होने के अनुसार भैषज्य शास्त्र संबन्धी उपदेशों को देने वाला, उसके उपदेशों को ग्रहण करने वाले व्यक्तियों द्वारा आदर किया जाने वाला, मिश्र में भैषज्य विद्या की उन्नति को देखकर प्रसन्न होने वाला तथा भैषज्य सम्प्रदाय के प्रवर्तक डेमोकेडिस को अपने शिष्यरूप में स्वीकार करनेवाला पाथागोरस भैषज्यविज्ञान का भी
१. पाथागोरस के प्रार्थना संघ, तापसोचित आत्मनिरीक्षण, असंयत वासनाओं को वश में करने के लिये संगीत प्रयोग, उसकी मुख की आकृति से विचारों और वासनाओं को ताड़ जाने की शक्ति उसका आहार संयम और शारीरिक शक्ति के प्रति उसकी अत्यधिक जागरूकता—ये सब प्रसिद्ध हैं। यह भी कहा जाता है कि वह पशुमांस भक्षण के छोड़ देने की शिक्षा देता था। इसका पुनर्जन्म के सिद्धान्त से गहरा संबन्ध है और हम मान सकते हैं कि उसने यह मन अपनाया होगा जैसा कि उसके बाद एम्पेडोक्लिस ने किया।
(History of Greece Vol. IV P. 322 by. Grotes.)
२. फिर भी दूसरी ओर यह भी सर्वथा संभव लगता है कि आहार, शिक्षण और अध्ययन के ये नियम संगठन के अन्य सदस्यों पर लागू नहीं होते थे। (History of Greece Vol. IV P. 322 Grotes.)
३. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १२७ में देखें।
४. पाथागोरस के कुछ खास शिष्यों ने-जो कि संख्या में तीन सौ के लगभग थे-एक प्रकार की प्रतिज्ञा से अपने को पाथागोरस के साथ और परस्पर एक दूसरे के साथ दृढ़ सम्बन्ध में बांध लिया। इस संगठन के चिह्न के रूप में उन्होंने विशिष्ट आहार, कर्मकाण्ड और व्रत अपना लिये थे। (History of Greece Vol. IV P. 329. Grotes)
५. पाथागोरस के समय मिश्र की वैद्यक की इतनी उन्नति हो गई थी कि एक जिज्ञासु यात्री का ध्यान आकृष्ट कर सके। उसके सिद्धान्तों का श्रेणीकरण और विभाजन हो गया था। उनके चिकित्सा व्यवसाय के नियम निर्धारित हो गये थे।
(Herodotus II 84, Aristotle politics III. 10. 4. History of Greece Vol. IV P. 325-Grotes).
६. औषध विज्ञान तथा शल्यचिकित्सा में जब पाथागोरस के शिष्य मिलो का दामाद डिमोकेड्स प्रसिद्ध हो रहा था तब पाथागोरस् क्रोटन में विद्यमान था। (History of Greece Vol. IV P. 327-Grotes)
काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् ३०८
आदर करनेवाला, ज्ञाता तथा प्रवर्तक प्रतीत होता है। भारत से दार्शनिक विषयों के ग्रहण तथा मिश्र की भेषज्य विद्या के दर्शन का उल्लेख होने से भारत तथा मित्र में जानेवाले पाथागोरस को भेषज्य विद्या का ज्ञान मिश्र तथा भारत दोनों देशों से हुआ प्रतीत होता है। इस प्रकार ग्रोट्स द्वारा निर्दिष्ट उसके उपदेशों में दिये हुए स्वास्थ्य सम्बन्धी विषयों के भारतीय आयुर्वेद में मिलने से तथा हिपोक्रिटस के भेषज्य विज्ञान में भी भारतीय वैद्यक विषयों की समानता के दिखाई देने से प्रतीत होता है कि भारत के साथ अपने संबन्ध का वर्णन करने वाले पाथागोरस ने साक्षात् अथवा परम्परा से भारतीय विज्ञान के द्वारा ग्रीस देशीय भेषज्य विज्ञान को प्रारंभ किया था।
इसके अतिरिक्त हिपोक्रिटस से कुछ समय पूर्व ग्रीस में विद्यमान तीन चिकित्सा सम्प्रदायों में से एक सम्प्रदाय के प्रवर्तक एम्पीडोक्लिस का भी इरान तथा भारत के आसपास के प्रदेशों में जाने तथा भारतीय दार्शनिक विद्या को ग्रीस में ले जाने का पी. सी. १ राय ने वर्णन किया है। भारत में पाञ्चभौतिक तथा चातुर्भौतिकवाद भी प्रारम्भ से ही मिलते हैं। एम्पीडोक्लिस द्वारा ग्रीस में चतुर्भूतवाद का अभूतपूर्व नया प्रचार तथा नवीन भेषज्य सम्प्रदाय का भी प्रारंभ किया जाना मिलता है। हिपोक्रिटस द्वारा उस चातुर्भौतिक शरीरवाद का ही प्रत्याख्यान (खण्डन) मिलता है तथा उसके द्वारा प्राचीन तीनों सम्प्रदायों में आवापोद्वाप विधि तथा परिष्कार के द्वारा संस्कार करके अपने सम्प्रदाय का उद्भव प्रकट किया गया है। इस प्रकार हिपोक्रिटस के पूर्ववर्ती एम्पीडोक्लिस द्वारा भारत में आकर साक्षात् रूप से अथवा इरान देश के द्वारा भारतीय दर्शन विद्या के समान दार्शनिक विषयों से सम्मिश्रित भेषज्य विद्या का भी ग्रहण किया गया प्रतीत होता है। इसके द्वारा भी ग्रीस में पहुँचा हुआ भारतीय चिकित्सा विज्ञान हिपोक्रिटस के हृदय में सङ्क्रान्त हो सकता है। ऊपर लिखे हुए विद्वानों के नाम केवल उपलक्षणमात्र हैं। इसी प्रकार अन्य भी ऐसे कई ग्रीक विद्वान् हो सकते हैं जिनके द्वारा भारतीय विद्या साक्षात् रूप से अथवा इरान आदि देशों के मार्ग से होती हुई पाश्चात्य देशों में पहुँची हो। प्राचीन इतिहास में उनके नाम नहीं मिलते हैं इसलिये इस विषय में स्पष्ट उल्लेख के बिना कुछ नहीं कहा जा सकता।
पूर्वकाल में ही नहीं, अपितु हिपोक्रिटस के पश्चात् भी भारतीय व्यवहार के दर्शन के लिये आये हुए इविमेरस (Evemerus) का उदाहरण मिलने से प्रतीत होता है कि पूर्वपरम्परागत भारतीय सभ्यता का अध्ययन करने के लिये इससे पूर्व भी बहुत से ग्रीक विद्वान् भारत में आये होंगे तथा उनके द्वारा बहुत सी भारतीय सभ्यता उनके देश में पहुँची होगी।
भारतीय विद्वानों का ग्रीस में जाना
केवल ग्रीस देश वालों का ही प्राचीन भारत में आगमन का वर्णन नहीं मिलता है अपितु भारतीय विद्वान् एवं वैद्यों का भी पश्चात् देशों में जाने, उनसे ज्ञान ग्रहण करने, उनका आदर तथा उनको उपदेश देने के वृत्तान्त इतिहास में मिलते हैं। ईस्वी पूर्व ३३० सामयिक प्रसिद्ध गायक अरिष्टाटल के शिष्य अरिष्टोक्सेनस (Aristoxenus) नामक विद्वान् के लेख के अनुसार ग्रीसदेश की राजधानी एथेन्स में साक्रिटीज नामक (Socrates B. C. 469-399) प्रसिद्ध दार्शनिक के साथ अध्यात्म विषय में उनके सिद्धान्तों का उपहास के रूप में खण्डन करते हुए किसी भारतीय के अध्यात्म विषयक संभाषण के मिलने से तथा (Eusebius) नामक विद्वान् द्वारा भी किये गये इस संवाद के उल्लेख को देखकर प्रतीत होता है कि ईस्वी पूर्व चतुर्थ शताब्दी से पूर्व भी भारतीयों का यूनानियों (ग्रीकों) के साथ परिचय था। इस प्रकार H. G. Rawlinson^२ द्वारा प्रकाशित लेख से भी प्रतीत होता है कि अलेक्जेण्डर के भारत में आने से पूर्व भी भारतीय विद्वानों का ग्रीस में जाना, ग्रीस भाषा का ज्ञान तथा ग्रीक विद्वानें के साथ विचार विमर्श विद्यमान था।
१. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. १२८ में देखें। २. यूनानी और भारतीय दार्शनिक चिन्तन में जो अद्भुत सादृश्य मिलता है उसकी ओर ग्रेब आदि अनेक मनीषी बार-बार विद्वानों का ध्यान आकृष्ट करते रहे है। एलेटिक और सांख्य सम्प्रदायों तथा औरफिजम (Orphism) और बौद्धधर्म
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३०९
अलेक्जेण्डर द्वारा भारतीय विज्ञान का प्रसार
जो भी राष्ट्र उन्नति करना चाहता है वह विद्या आदि से समृद्ध तत्कालीन अन्य राष्ट्रों का दूर से अध्ययन करता है तथा अपने देश के गौरव को बढ़ाने के लिये उस देश के विज्ञानों को ग्रहण करने का प्रयत्न करता है। उन्नत देशों की विद्या के परिचय, भाषा-विज्ञान तथा उनके अनुभूत सफल प्रयोगों के बाद श्रद्धा तथा विश्वास की अधिकता होने पर उनके ग्रन्थों का ग्रहण किया जाता है, उनके विद्वानों का सम्मान किया जाता है तथा उनकी प्रक्रियाओं को भी स्वीकार कर लिया जाता है। उन्नत अवस्था में पहुंची हुई भारतीय चिकित्सा विज्ञान के श्रवण, आलोकन, ज्ञानपर्यालोचन तथा आदर से पूर्व भी ग्रहण करने के लिये ग्रीक आदि प्राचीन विद्वानों का भारत में आना देखकर हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये। विजिगीषु (विजय की इच्छा वाला) राष्ट्र जिन्हें जीतना चाहता है उन राष्ट्रों के बल, वीर्य तथा सभ्यता आदि की परिस्थितियों को पहले अच्छी प्रकार देखकर ही अपने पैर बढ़ाता है। इस सिद्धान्त के अनुसार अलेक्लेण्डर के आने से पूर्व भी संभवतः भारतीय परिस्थितियों का सम्यक् अध्ययन करने के लिये बहुत से ग्रीक विद्वान् भारत में आये हों अथवा भारत में रहने वाले यूनानियों ने भारत के विषय में यूनानियों को पूर्ण ज्ञान करा दिया हो। विजय की इच्छा से भारत में आकर तथा
के सादृश्य सच्चे हैं। B. J. Urwick ने अपने नवीन ग्रन्थ ‘Message of plato’ में दिखलाया है कि अफलातून की पुस्तकों में विशेषकर Republic-ऐसे सादृश्य बहुत अधिक हैं। Ideas का सिद्धान्त वेदान्त का ही सरलरूप है। १० वें अध्याय के अन्त में आने वाला 'पाम्फीलियन एड् का स्वप्न' बिलकुल ही भारतीय रंग में रंगा हुआ है। Republic में वर्णित समाज के तीन वर्ग-संरक्षक, व्यवस्थापक और व्यवसायी भारतीय स्मृतिकारों के तीन वर्ण-ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हैं। चन्द्रगुप्त के दरबार में स्थित यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने भी यही कहा है—अनेक बातों में हिन्दुओं के नीतिनियम यूनानियों से मिलते जुलते हैं। उदाहरणार्थ यह विश्वास कि विश्व की सृष्टि और प्रलय काल का निश्चित है, और यह कि पृथ्वी का आकार वर्तुल है, यह नियामक और निर्माता। परमात्मा ही इसकी व्याख्या कर सकता है, विश्व के प्रारम्भिक तत्व अनेक हैं लेकिन आप् (जल) तत्त्व ही पहला तत्व है जिससे विश्व की रचना हुई है, यह कि चार तत्वों के अलावा एक और तत्व है जिससे आकाश तारे आदि बने हैं, और यह कि पृथ्वी ब्राह्माण्ड के केन्द्र में स्थित है। इसी प्रकार जन्म तथा आत्मा एवं अन्य भी अनेक विषयों में भारतीयों के विचार यूनानी विचारों से मेल खाते हैं। अफलातून की तरह ही वे भी आत्मा की अमरता और परलोक में दिये जाने वाले दण्डों के अनेक किस्से कहते हैं। प्रायः इन सादृश्यों को दैवयोग अथवा विचारों का स्वतन्त्र विकास कहकर उनकी उपेक्षा की जाती रही है। हीरोडोट्स ने स्पष्ट ही कहा है कि यूनान में पुनर्जन्म का सिद्धान्त मिश्र से आया है लेकिन उस युग में भारत और यूनान का संबन्ध था यह सिद्ध करने वाला कोई समसामयिक प्रमाण अब तक नहीं मिल सका है। लेकिन यह प्रमाणाभाव की युक्ति बहुत ही निर्बल युक्ति है और अभी हाल में यूसेबियस (Eusebius) का एक महत्वपूर्ण संदर्भ मेरी दृष्टि में आया है जो J. A. M. Crindle द्वारा (जो कि Cambridge History of India Book I Chapter XVI के लेखक हैं) नजर अन्दाज कर दिया गया है। सन्दर्भ इस प्रकार है—
'गायक एरिष्टोजेनस् भारतीयों के विषय में यह कहानी कहता है। एक भारतीय 'अथेन्स' में सुकरात से मिला और उससे पूछने लगा कि तुम्हारे दर्शन का कार्य क्या है। सुकरात ने उत्तर दिया 'मानवीय चरित्र और कार्य को समझना'। इस पर भारतीय हँस पड़ा और कहने लगा कि कोई मनुष्य तब तक मानवीय प्रकृति और कार्य (Phenomena) को कैसे समझ सकता है जब तक कि उसे दैवीय चरित्र और कार्यों का ज्ञान न हो'।
इस कथा का भाव स्पष्ट है। यूसेबियस ने इसे प्रामाणिक कहा है। गायक एरिष्टोजेनिस् अरस्तू का शिष्य था और स्वरों के विषय में प्रामाणिक लेखक था। उसका काल ३३० ई. पू. है। इसलिये हम निःसंकोच मान सकते हैं कि ई. पू. चौथी सदी में भी अथेन्स में भारतीय थे जो यूनानी बोल लेते थे और जिन्होंने वस्तुतः सुकरात से दार्शनिक चर्चा की थी। इससे भारत और यूनान के पारस्परिक संबन्ध के विषय में हमें अपने विचारों में कुछ परिवर्तन करना होगा।
(Amrit Bazar Patrika, 1936.)
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कुछ प्रदेश को जीत लेने पर भी यवनाधिपति अलेक्जेण्डर के शीघ्र भारत से लौट जाने में चिरकाल से थकी हुई अपनी सेना की अशान्ति ही केवल कारण प्रतीत नहीं होता है। अपितु जिस मार्ग से आये थे उसे छोड़कर नवीन समुद्र मार्ग से शीघ्र लौट जाने में मुद्राराक्षस की उक्ति के अनुसार कोई अन्य कारण भी प्रतीत होता है। भारत में आकर भी अलेक्जेण्डर के शीघ्र लौट जाने के उल्लेख से प्रतीत होता है कि चाणक्य नामक मन्त्री सहित चन्द्रगुप्त द्वारा शासित तथा समय-समय पर होने वाले आघातों को सहते हुए अपने पूर्व सम्प्रदाय की रक्षा में तत्पर भारत देश में उस समय यूनानियों का प्रभाव अधिक नहीं था।
विल ड्यूरण्ट¹ (Will Durant) नामक विद्वान् लिखता है कि ‘तक्षशिला, काशी, उज्जायिनी तथा विदर्भ आदि नगरों में भारतीय विश्वविद्यालय थे। अलेक्जेण्डर द्वारा तक्षशिला के आक्रमण के समय तक्षशिला सम्पूर्ण एशिया में सबसे उन्नत भारतीय विश्वविद्यालय था। वहां सम्पूर्ण कलाओं, सब विज्ञान, सैनिक विद्या तथा भैषज्य विद्या की शिक्षा देने वाले बहुत से बड़े-बड़े विद्वानों तथा देश देशान्तरों से आये हुए बहुत से विद्यार्थियों द्वारा समृद्ध महान् विश्वविद्यालय था। यह भारतीय विद्याओं के लिये अत्यन्त प्रसिद्ध स्थान हो गया था। अन्य सब विद्याओं की अपेक्षा भी इस विश्वविद्यालय की भैषज्य विद्या में विशेष प्रसिद्धि तथा प्रतिष्ठा थी’। एरियन (Arrian) नामक विद्वान् का भी कहना है कि ‘तक्षशिला अत्यन्त महान् तथा उन्नत नगरी थी’। स्मिथ² के अनुसार अलेक्जेण्डर का इतिहास लेखक एरियन (Arrian) नामक विद्वान् सिन्धु के समीपस्थ मूषक राज्य का वर्णन करते हुए लिखता है कि ‘उस देश के रहने वाले १३० वर्ष तक जीवित रहते थे। उनके इस दीर्घायुष्य का कारण परिमित आहार ही था। अन्य विद्याओं की अपेक्षा वे वैद्यक विद्या के अध्ययन में विशेष रुचि रखते थे’। मूषक प्रदेश में १३० वर्ष की आयु को असाधारण रूप में देकर, मूषक के उल्लेख द्वारा संभवतः अलेक्जेण्डर का सिन्धु प्रदेश तक आगमन सूचित किया है। स्ट्राबो³ (Strabo) नामक विद्वान् भी लिखता है कि (They do not persue accurate knowledge in any line except that of medicine' (अर्थात् उन्हें चिकित्सा विज्ञान के अतिरिक्त अन्य किसी भी विषय का सम्यक् ज्ञान नहीं था। पाथागोरस आदियों के इतिवृत्तों के द्वारा भारत में अध्यात्म आदि अन्य विद्याओं की भी उन्नति के स्पष्ट उल्लेख होने से, इस लेख से भी यही प्रकट होता है कि अन्य विद्याओं की अपेक्षा भैषज्य विद्या में भारतीय अधिक पूर्ण थे। अन्य साथ चलने की इच्छा वाले बहुत से भारतीय विद्वानों में से तक्षशिला से आदरपूर्वक साथ लाये हुए कल्याण (Plutarch reproduces as sphines but the Greeks called him Kalanos) नामक भारतीय विद्वान् का ग्रीसाधिपति अलेक्जेण्डर अन्य
१. (a) चन्द्रगुप्त के समय में उत्तरीय भारत के दो सौ प्राचीनतम नगरों में एक तक्षशिला था। एरियन ऐतिहासिक लिखता है कि ‘यह एक विशाल और समृद्ध नगर था। स्ट्राबो लिखता है कि यह बहुत विस्तृत नगर है तथा यहां के कानून बहुत अच्छे हैं’। यह नगर सेना और विद्या का केन्द्र था। ....... तत्कालीन भारत के कई एक विश्वविद्यालयों में यह सबसे अधिक विख्यात था। जिस प्रकार मध्ययुग में पेरिस में छात्रगण एकत्र होते थे उसी प्रकार तक्षशिला में बहुत से विद्यार्थी एकत्र हुआ करते थे। छात्र यहां के प्रसिद्ध गुरुओं के पास सभी प्रकार की कलाएं और ज्ञान विज्ञान सीखा करते थे। यहां का आयुर्वेद शिक्षालय सारे पूर्वीय जगत् में खूब प्रतिष्ठित और प्रसिद्ध था (पृष्ठ ४४१-४४२)
(b) सिकन्दर के आक्रमण के समय तक्षशिला नगर विद्या के प्रमुख केन्द्र के रूप में समस्त एशिया में सर्वविदित था। अपने आयुर्वेद विद्यालय के लिये तो यह और भी अधिक प्रसिद्ध था।
(Story of Civilization-Will Durant P. 557)
२. वहां के निवासी एक सौ तीस वर्ष की उमर तक पहुंचते थे। उनका दीर्घायुष्य उनके सुस्वास्थ्य का परिणाम था जो कि आहार विषयक संयम से प्राप्त किया जाता था। (Early History of India-V. Smilt P. 105)
३. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १३० में देखें।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३११
सब दार्शनिक विद्वानों की अपेक्षा अधिक सम्मान करता था। पीछे देह त्याग की इच्छा से चिता पर आरूढ़ होने पर ग्रीसाधिपति ने उसका अत्यन्त गौरव के साथ अन्तिम सम्मान किया था। राप्सन$^१$ (Rapson) नामक विद्वान् ने लिखा है कि इस भारतीय विद्वान् का वर्णन एरियन तथा स्ट्राबो नामक विद्वानों ने भी किया है। मैक्समूलर के कथनानुसार वह कल्याण$^२$ नामक विद्वान् ग्रीस तक भी गया था। यह एक उदाहरण ही भारत के तात्कालिक गौरव को सूचित करता है।
अलेक्जेण्डर द्वारा अपनी सेना में ग्रीक वैद्यों के होते हुए भी उनको सर्पविषचिकित्सा का ज्ञान न होने से सर्पविष की चिकित्सा के लिये भारतीय वैद्यों के रखने, अन्य रोगों की चिकित्सा$^३$ में भी प्रवीण होने से अलेक्जेण्डर द्वारा अपने शिविर में भारतीय वैद्यों को रखने, स्वदेश को लौटते हुए ग्रीसाधिपति द्वारा भारतीय वैद्यों को आदर संहित अपने साथ$^४$ ले जाने के तथा अपने देश की लौटते हुए मार्ग में भी भारतीय चिकित्सक द्वारा सर्पदष्ट की चिकित्सा के उल्लेख मिलने से भारतीय आयुर्वेद का प्रभाव पीछे भी ग्रीसदेश में दिखाई देता है।
१. १-२ की सं. उपो. पृ. १३०-१३१ में देखें। ३. यह (भारतीय चिकित्सा) विज्ञान यूनानियों के भारत में आगमन पर्यन्त (३२७ ई. पू. तक) निरन्तर बढ़ता रहा। यूनानी इतिहास लेखक एरियन ने सिकन्दर के आक्रमण के समय भारत की अवस्था का वर्णन करते हुए एक विचित्र तथ्य का उल्लेख किया है जिससे तात्कालीन हिन्दू चिकित्सकों के गौरव का परिचय मिलता है। वह कहता है कि सिकन्दर की सेना के साथ यद्यपि अनेक कुशल यूनानी चिकित्सक विद्यमान थे परन्तु उन्होंने सर्पदंश (जो कि पंजाब में प्रायः होते हैं) के प्रति अपनी असमर्थता प्रकट कर दी थी। इसलिये सिकन्दर को इस विषय में भारतीय वैद्यों को बुलाना पड़ता था जो कि सर्पदंश की सफलतापूर्वक चिकित्सा करते थे। मैसीडोनिया का राजा इनके हस्तकौशल से इतना प्रभावित हो गया था कि निर्याकस के अनुसार उसने अपने शिविर में बहुत से अच्छे भारतीय वैद्यों को नियुक्त कर रखा था तथा अपने साथियों को उसने सर्पदंश अथवा अन्य भी दारुण रोगों में इन भारतीय वैद्यों से सलाह लेने को कह रखा था। एक ओर जब कि यूरोपीय विषविज्ञान के पण्डित आजतक भी सर्पविष के लिये किसी विशिष्ट (Specific) ओषधि की तलाश में लगे हुए हैं, भारतीय चिकित्सकों को लगभग २२०० वर्ष पूर्व इस कुशलता का गौरव प्राप्त था। इसीलिये संभवतः अलेक्जेण्डर जिसे भारत में सिकन्दर कहा जाता है—यहां से लौटते हुए अपने साथ कुछ भारतीय चिकित्सा शास्त्र के अध्यापकों को अपने देश ले गया था। यूनानी चिकित्सा शास्त्र के प्रारंभिक इतिहास से भी इस अनुमान अथवा कल्पना की कुछ पुष्टि होती है। (Short History of Aryan Medical Science. P. 189-190. by H. H. Bhagvatsinhajee.) ४. 'E. J. Rapson रचित Cambridge History of India' नामक ग्रन्थ के प्रथम भाग पृ. ४०६ पर निर्याकस के नाम से उद्धरण दिया है कि—'भारत में चिकित्सकों के लिये सर्पदष्ट रोगियों की चिकित्सा के अतिरिक्त और कोई कार्य नहीं था, क्योंकि जैसा कि यूनानी लोग समझते थे, भारतीयों को रोग बहुत कम होते थे'। तथा इसके विपरीत 'Arrian's Indica' नामक ग्रन्थ में निर्याकस का निम्न उद्धरण दिया है—सिकन्दर के पास चिकित्सा कार्य में अत्यन्त निपुण बहुत से भारतीय व्यक्ति थे। उसने अपने सारे शिबिर में यह घोषणा कर रखी थी कि यदि किसी व्यक्ति को सांप काटले तो उसकी शाही शिबिर में चिकित्सा कराई जाय। परन्तु ये ही व्यक्ति अन्य रोगों एवं कष्टों को भी दूर करने में समर्थ थे—पृ. २२३। इस लेख के अनुसार वे केवल आजकल के सपेरों के सदृश ही नहीं थे अपितु आयुर्वेद के आठ प्रस्थानों में आये हुए विषतन्त्र के समान वे अन्य चिकित्सा विज्ञान के भी ज्ञाता थे। इसीप्रकार के भारतीय वैद्यों को सिकन्दर ने अपने पास रखा था तथा उन्हें अपने देश में ले गया प्रतीत होता है। इसप्रकार 'Cambridge History of India' में निर्याकस का 'But these very same men were able to cure other diseases and pains also' यह वाक्य न मिलना तथा उन्हें केवल सपेरों के समान ही बताना—आश्चर्यजनक है।
२१ का.सं.
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भारतीय आलोक के प्रसार में अशोक के शिलालेख का स्थान
न केवल प्राचीन काल में अपितु अशोक$^१$ के समय उसके तेरह शिलालेखों$^२$ के अनुसार अन्तियोक (योन) नामक ग्रीक राजा (Antiochos Theos B. C. 261-246 King of Syria), तुर्मयस (Ptolemaeos Philadelphos, King of Egypt 285-247 B. C.), अन्तिकोन (Antigonos Gonates of Macedonia 278-239 B. C.), मगस (Magas of Cyrene to the West of Egypt-मृत्यु-258 B. C.) तथा अलीकसुन्दर (अलेक्जेण्डर- Alexander of Epirus 272-258 B. C. तथा मतान्तर से Alexander of Corinth 252-244 B. C.) के देशों तथा यवन, कम्बोज, नील, चोल, पाण्ड्य, ता पर्णी, दरदविष, वज्रनाभक, नाभप्रान्त, भोज, पित्ति, निकि, आन्ध्र तथा पुलिन्द आदि आठ सौ योजन के अन्तर से फैले हुए देशों में भी अशोक की धर्मविजय तथा धर्म के चिह्न मिलते हैं। इस लेख से ज्ञात होता है कि भारत के भिन्न-भिन्न प्रदेशों के समान सीरिया, मिश्र, मैसीडोनिया, पश्चिमी मिश्र, एपिरस, यवन, कम्बोज आदि दूर के देशों में भी अशोक ने भारतीय धर्म की प्रतिष्ठा की थी। विमलप्रभा$^३$ की कालचक्र नामक व्याख्या में भी बुद्ध के निर्वाण के बाद उन-उन देशों की उन-उन भाषाओं में यानत्रय, पिटकत्रय आदि बौद्धग्रन्थों के अनुवाद होने से धर्मप्रचार का निर्देश मिलता है। उसमें भी पारसीक देश तथा नील नदी के उत्तर में रुक्म देश का उल्लेख मिलता है। अशोक ने केवल धर्मविजय ही नहीं किया था अपितु उसके शाहावाज गडी नामक स्थान में मिले हुए—
'सर्वत्र विजिते देवानां प्रियस्य ..... मनुष्याणाम्' मूल उपोद्धात पृ. १३२ देखें।
इस द्वितीय$^४$ शिलालेख में अशोक द्वारा भारत के भिन्न-भिन्न प्रदेशों के समान भारत से बाहर अन्तियोक नामक ग्रीस राजा के तथा उसके आसपास के अन्य राजाओं के देशों में भी पशुओं तथा मनुष्यों के लिये पृथक्-पृथक् दो प्रकार के चिकित्सालय प्रारम्भ किये थे तथा उनमें पशुओं तथा मनुष्यों के उपयोगी ओषधियों की भी व्यवस्था की थी। आवश्यकतानुसार ओषधि, फल तथा मूलों के वृक्ष भी सब स्थानों पर लगाये जाने के उल्लेख से प्रतीत होता है कि उस समय तक भारत के समान भारत से बाहर अन्तियोक आदि के देशों में भी भारतीय चिकित्सापद्धति तथा ओषधियों की अपेक्षा (आवश्यकता) प्रवृत्ति तथा प्रचार था। तेरहवें धर्मविजय शिलालेख में अन्तियोक के साथ तुर्मया, अन्तिकोन, मग तथा अलीकसुन्दर आदि चारों राजाओं का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। वहां इन राजाओं के देशों के आठ सौ योजन तक फैले हुए होने का निर्देश है। दूसरे शिलालेख में अन्तियोक$^५$ नामक यवनाधिपति का तो नामपूर्वक ग्रहण किया गया है। अन्य राजाओं का 'ये चान्ये तस्यान्तियोकस्य सामन्ता राजानः' के द्वारा उनके समीपवर्ती होने से सामान्यरूप से उल्लेख होने पर भी अन्तियोक के साहचर्य से, भौगोलिक दृष्टि से सीरिया प्रदेश के चारों ओर स्थित होने से तथा सामन्त शब्द के औचित्य के कारण सम्भवतः ये वे ही तुर्मय, अन्तिकोन, मग तथा अलीकसुन्दर आदि राजा हैं जिनका तेरहवें$^६$ शिलालेख में अन्तियोक के साथ निर्देश किया गया है। ग्रीसाधिपति अलेक्जेण्डर के अशोक से प्राचीन होने के कारण अशोक के समकालीन अन्य राजाओं के साथ होना सम्भव न होने पर भी भारत में आने के कारण परिचित हुए अलेक्जेण्डर के पूर्वकालिक सम्बन्ध को लक्ष्य करके अलीकसुन्दर शब्द से प्रसिद्ध ग्रीसाधिपति अलेक्जेण्डर का ग्रहण करके ग्रीसदेश में भी भारतीय प्रभाव समझा जा सकता है। परन्तु ऐतिहासिक विद्वान् समय की विभिन्नता के कारण तथा अन्य राजाओं के अशोक के समकालीन होने से यहां अलीकसुन्दर शब्द से ग्रीसाधिपति अलेक्जेण्डर का ग्रहण न करके अशोक के समकालीन एपिरस प्रदेश के तथा कुछ विद्वानों के मत से कोरिन्थ प्रदेश के, अलेक्जेण्डर का ग्रहण करते
१. १-४ तक की टि. सं. उपो. पृ. १३२ में देखें।
५. इन दूसरे तथा तेरहवें शिलालेखों में सीरियाधिपति अन्तियोक का ही यवनराज के रूप में निर्देश है, अलीकसुन्दर का नहीं। इससे ज्ञात होता है कि प्राचीनकाल में सीरिया देश की जाति के लिये ही यवन शब्द का व्यवहार होता था। परन्तु आजकल तो यवन शब्द से ग्रीस वालों का ही ग्रहण होता है। यह विचारणीय प्रश्न है।
६. की टि. सं. उपो. पृ. १३२ में देखें।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३१३
हैं। ‘राजान:’ इस पद के कारण यह अशोक सामयिक अलेक्जेण्डर ही प्रतीत होता है। यह सब होते हुए भी आठ सौ योजन तक के देशों में धार्मिक प्रभाव के होने से, सीरिया के आसपास के देशों में भारतीय चिकित्सापद्धति का भी विशेष प्रभाव होने से, इन दोनों शिलालेखों में ग्रीस के प्राचीन स्त्रोत के रूप में उल्लिखित मिश्र में भी भारतीय प्रभाव एवं आलोक के मिलने से, ग्रीस के मिश्र तथा सीरिया के समीप ही होने से, एपिरस तथा कोरिन्य प्रदेशों के भी ग्रीस में सम्मिलित होने से, ग्रीस द्वारा भारत तथा उसकी विद्या के परिचय की प्राप्ति के उल्लेख से, ग्रीस की आध्यात्मिक विद्या में भारतीय दर्शनों का प्रभाव मिलने से, हिपोक्रिटस के नाम से उत्तरोत्तर ग्रन्थों के संकलन से तथा उसके ग्रन्थों में आयुर्वेदीय विषयों की समानता मिलने से दार्शनिक तथा धार्मिक विषयों के समान चिकित्सा विज्ञान में भी अशोक के समय ग्रीस में भारतीय प्रभाव का परिचय मिलता है। इससे उस समय भी पाश्चात्त्य देशों में भारतीय आयुर्वेद विद्या, भारतीय चिकित्सापद्धति, भारतीय ओषधियों, भारतीय वैद्यों तथा भारतीय वैद्यक ग्रन्थों का कितना आलोक तथा गौरव था, इसका पर्याप्त ज्ञान हो जाता है।
ग्रीस तथा भारत का प्राचीन काल से सम्बन्ध
आजतक विशेष प्रमाणों के न मिलने पर भी प्राचीन काल में ग्रीस तथा भारत के पारस्परिक यातायात तथा वाणिज्य के सम्बन्ध को देखकर यह कहा जा सकता है कि भारतीय वैद्यक ग्रीस में पहुंची हुई थी। $^१$बक (Buck) नाम विद्वान् का कहना है कि अलेक्जेण्डर के काल से बहुत समय तक ग्रीस तथा भारत के घनिष्ठ संबन्ध के मिलने से तथा हिपोक्रिटस, डिओसकोराइडास (Dioscorides) तथा ग्यालन आदि के लेखों के अनुसन्धान से प्रतीत होता है कि भारतीय वैद्यों द्वारा व्यवहृत की जाने वाली बहुत सी ओषधियों तथा चिकित्सापद्धतियों का अभ्यास करने वाले ग्रीक वैद्यों ने ग्रहण किया हुआ था।
‘भारतीय तथा ग्रीसदेशीय प्राचीन वैद्यक विज्ञान में बहुत सी समानताएं मिलती हैं। ग्रीस के चिकित्साविज्ञान पर भारतीय प्रभाव को कुछ लोग जो नहीं मानते हैं तथा कुछ लोग संदिग्ध मानते हैं उसे देखकर हमें आश्चर्य होता है। हस्तलिखित प्राचीन पुस्तकों के मिलने से पूर्व प्रसिद्ध प्राचीन भारतीय ग्रन्थों का कालनिर्णय अत्यन्त कठिन था। परन्तु भारतीय विज्ञान की बहुत सी शाखाओं में स्वतन्त्ररूप से विचार तथा उनमें अन्यदेशीय विज्ञान के आलोक का अनादर मिलता है। भारतीय भैषज्य विषयों के अन्वेषण में आजकल बहुत से लोग भारतीय विषयों का भारतीय होना ही मानते$^२$
१. बक ने अपने ग्रन्थ ‘The Growth of Medicine from the Earliest Time to 1800’ में आधुनिक चिकित्साशास्त्र के उद्गम यूनानी चिकित्साशास्त्र पर भारतीय वैद्यक के प्रभाव को बहुत कम स्वीकार किया था। लेकिन इतिहास का अधिक परिशीलन करने के बाद उसे अपने विचारों में परिवर्तन कर यह कहना पड़ा कि ‘यह समझना अनुचित नहीं है कि दोनों देशों के व्यापारिक सम्बन्ध के द्वारा भारतीय वैद्यों के अनेक चिकित्सा कार्य प्राचीन यूनानियों को भी ज्ञात हुए होंगे। यद्यपि अबतक इस संबन्ध में कोई पुष्ट प्रमाण तो नहीं मिलता है। दूसरी ओर इतिहास के कुछ अधिक अर्वाचीन युग में अर्थात् सिकन्दर के भारत पर आक्रमण के बाद दोनों देशों में घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित हुआ जो कि कई सदियों तक अटूट रहा। इस युग के प्रारम्भिक हिस्से में यूनानी चिकित्सकों ने भारतीय वैद्यों द्वारा बरती जाने वाली अनेक ओषधियां और चिकित्सा की प्रक्रियाएं अपनाली थीं—ऐसा हिपोक्रिटस, डायस्कोरिडस और गेलन के लेखों से ज्ञात होता है।
(Fourth Oriental Conference Vol. II Pp. 425-426)
२. न्यूबर्गर कहते हैं—इस युग की भारतीय और यूनानी चिकित्सा शास्त्रों की रूपरेखा और अनेक विवरणों में इतना अधिक साम्य है कि यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि कितनी ही बार भारतीय चिकित्साशास्त्र की मौलिकता सन्देह की दृष्टि से देखी गई और कई बार तो अस्वीकार कर दी गई। इसका विशेष कारण यह है कि महत्वपूर्ण भारतीय ग्रन्थों में से अधिकांश का कालनिर्णय बहुत मुश्किल से हो पाया था और अभी हाल में अनेक पाण्डुलिपियों के प्रकाश में आने से पहले तक वह भी सर्वथा संदिग्ध था। आधुनिक खोजों के पीछे विज्ञान और कलाओं के क्षेत्र में भारतीयों की प्रमुख सफलताओं के विषय में विद्वानों का झुकाव उनकी मौलिकता को स्वीकार करने की ओर है।
(Neuberger. History of Medicine Vol. I P. 45)
३१४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
हैं तथा भारतीय प्राचीन भैषज्य विद्या की आलोचना करते हुए तथा उसके गूढ़विचार, सूक्ष्मबुद्धि का विकास तथा लेख-सौष्ठव आदि के अनुसन्धान में उसका स्थान अत्यन्त ऊंचा होने का परिचय मिलता है' ऐसा¹ न्यूबर्गर (Neuberger) नामक विद्वान् का कहना है।
हेरोडोटस तथा फीलोष्ट्रेटस आदि प्राचीन पाश्चात्त्य विद्वानों का भी कहना है कि भारत का प्राचीन काल से ही पाश्चात्त्य देशों के साथ परिचय, सम्पर्क तथा व्यवहार था। प्रथम शताब्दी में होने वाले प्लेनी² नामक ग्रीक विद्वान् के लेख से भी भारतीयों द्वारा वानस्पतिक एवं योगौषधियों (Prepared Medicines) को विक्रय के लिये ग्रीसदेश में ले जाने का उल्लेख मिलता है। ग्रीस तथा भारत के प्राचीन काल में पारस्परिक संबन्ध को तथा पक्षाघात, अम्लपित्त आदि रोगों में भारतीयों द्वारा किये जाने वाले धतूरे के प्रयोग का यूरोपवालों द्वारा भी ग्रहण किये जाने का उल्लेख करता हुआ रॉयल्³ (Royle) नामक विद्वान् पाश्चात्त्य देशों में भी भारतीय प्रभाव का वर्णन करता है। हैमिल्टन⁴ नामक विद्वान् का भी मत है कि प्राचीन ग्रीक वैद्यक में भारतीय आयुर्वेद को कुछ अंशों में प्रभाव था तथा भारतीय और ग्रीक चिकित्सा प्रणाली में समानता दिखाई देती है। इस विषय में बनर्जी⁵ की भी यही सम्मति है। श्रीयुत रमेशचन्द्रदत्त ने भी अपनी पुस्तक⁶
१. न्यूबर्गर का कथन है कि 'भारतीयों का वैद्यकशास्त्र भले ही वह भारतीयों की अन्य विशिष्ट सफलताओं की समता न कर सकता हो तो भी लगभग उतना ही महत्वपूर्ण है। और अपनी ज्ञानसमृद्धि, गम्भीरचिन्तन एवं क्रमबद्ध विवेचन के कारण पौरस्त्य चिकित्सा शास्त्रों में उसका विशिष्ट स्थान है।
(Neuberger. History of Medicine Translated by Playfair Vol. I P. 437.)
२. डायस्कोरिडस के समकालीन रोमन लेखन प्लिनि ने अनेक भारतीय जड़ी बूटियों और ओषधियों का उल्लेख किया है।
(Hindu Achievements in exact sciences B. K. Sarkar P. 50-51.) और देखिये—
(Intercourse between India and the Western World P. 102 by H. G. Rawlinsno)
३. दमें में धतूरे के पत्तों का धूम्रपान करना यूरोप में आधुनिक बात है लेकिन भारत में यह बहुत पुराने समय से प्रचलित है (Royle) देखिये—
(Hindu achievements in exact sciences by B. K. Sarkar. P. 49 Antiquity of Hindu Medicine)
४. जब हम यह भी देखते हैं कि पाथागोरस ने ब्राह्मण-पद्धति को प्रचलित किया ..... (तब हमें मानना पड़ता है कि) प्राचीन यूनानी वैद्यक पर भारतीय वैद्यक का कुछ प्रभाव अवश्य था। भारतीय और यूनानी वैद्यक की समानताएं इतनी अधिक है कि काकतालीय न्याय से उनकी व्याख्या नहीं की जा सकती।
(W. Hamilton. History of Medicine Vol. I P. 43) Hellenism in Ancient India P. 196 by G. N. Banerjee)
५. ऐसा नहीं जान पड़ता कि हिन्दुओं ने अपना वैद्यक का ज्ञान अपनी किसी पड़ौसी जाति से लिया हो। यूनानी ही ऐसे थे जिनसे वे यह ज्ञान ले सकते थे लेकिन दोनों देशों की दूरी बहुत अधिक थी तथा उनके परस्पर संबन्ध भी सतत नहीं बने रहते थे साथ ही विदेश यात्रा और विदेशी सम्पर्क के प्रति हिन्दुओं की बड़ी अरुचि थी। इन सब बातों पर विचार करने से यह धारणा कि हिन्दुओं ने यूनानियों से वैद्यक ज्ञान प्राप्त किया, बहुत ही अपुष्ट आधार पर स्थापित जान पड़ती है।
(Hellenism in Ancient India P. 191 G. Banerjee)
६. यूरोप में भारतीय वैद्यक की प्राचीनता अभी तक समझी और मानी नहीं गई है। और समग्र आर्यसंस्कृति का उद्गम यूनानी संस्कृति को समझने की प्रवृत्ति निष्पक्ष विवेचन में बहुत बड़ी बाधा है। जैसा कि डॉ. वाइज ने ठीक ही कहा है—वैद्यक के इतिहास संबन्धी तथ्यों का अन्वेषण अभी तक केवल यूनानी और रोमन लेखकों के ग्रन्थों में ही किया गया है, और यूनानी संस्कृति से भिन्न उद्गम से निकलने वाली प्रत्येक बात को अमान्य करने की परिपाटी के अनुकूल उन्हें आयोजित कर दिया गया है। बचपन से ही हम प्राचीन साहित्य से परिचित हैं और प्राचीन लेखकों की प्रतिभा की प्रभा से दीप्त उन घटनाओं को, जो हमारे चित्त पर अंकित हैं, स्मरण करना हमें बहुत पसन्द है। इस प्रभाव को मिटाने के लिये विषय का गम्भीर परिशीलन, नवीन प्रमाणों की जांच तथा निष्पक्षता की आवश्यकता है। ज्ञान पिपासा और सत्यप्रेम हमें नवीन ऐतिहासिक प्रमाणों का परिशीलन करने को प्रेरित करते हैं।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
३१५
में ऐसा ही लिखा है। पीछे भी मंक नामक किसी भारतीय वैद्य द्वारा अरब के राजा (खलीफा) हारुन अल रशीद के (A. D. 700) राजकुल में जाकर उसके रोग को दूर करने तथा चरक के विपतन्त्र का पर्शियन भाषा में अनुवाद करने का उल्लेख मिलता है। शल्य (Saleb) नामक भी कोई भारतीय वैद्य खलीफा हारुन अल रशीद के राजकुल में था। उसने फिलस्तीन तथा वहां से मिश्र जाकर वहीं प्राणत्याग किया—ऐसा अरब के इब्न असेव नामक विद्वान् ने निर्देश¹ किया है। इस प्रकार इससे पूर्व भी बहुत से भारतीय वैद्य एवं विद्वानों के दूर-दूर जाने की संभावना हो सकती है।
उपर्युक्त वर्णनों के अनुसार पाथागोरस आदि के समय से समय-समय पर अनेक ग्रीक विद्वानों के विद्याप्राप्ति के लिये भारत में आने, भारत तथा उसके आसपास के प्रदेशों से विद्या के ग्रहण करने, प्राचीन काल में कुछ भारतीय विद्वानों के भी ग्रीस में जाने, भारतीय विद्वानों के वहां आदर, भारत से लौटते हुए ग्रीसाधिपति अलेक्जेण्डर द्वारा अत्यन्त अनुसन्धान करके भारतीय वैद्यों को अपने देश में ले जाने, अशोक के शिलालेखों के अनुसार उसके समय भी पाश्चात्त्य देशों में भारतीय चिकित्सा विज्ञान के प्रचार के वृत्तान्त मिलने, हिपोक्रिटस के नाम से प्रसिद्ध सब ग्रन्थों के प्राचीन न होकर विद्वानों के मतानुसार पीछे से विकसित विज्ञानयुक्त लेखों के उनमें मिलने से तथा भारतीय वैद्यक में ग्रीक वैद्यक के असाधारण विषयों के न मिलने से, अपितु ग्रीक वैद्यक ने भारतीय वैद्यक की छाया अनेक स्थानों पर मिलने से प्रतीत होता है कि प्राचीन काल से ही परस्पर परिचित एवं यातायात करने वाले पाथागोरस आदियों अथवा भारतीयों द्वारा ग्रीक वैद्यक को बढ़ाने के लिये न्यूनाधिकरूप में समय-समय पर भारतीय वैद्यक विज्ञान वहां पहुँचाया गया हो। हिपोक्रिटस अथवा उससे भी प्राचीन वैज्ञानिकरूप में विकसित हुई ग्रीक चिकित्सा पर न्यूनाधिकरूप में मिश्र, बेविलोनिया आदि अन्य प्राचीन देशों के विज्ञान का भी प्रभाव पड़ा है किन्तु ग्रीक चिकित्सा विज्ञान अन्य देशों की तरह साक्षात् अथवा परम्परा से भारत का भी अवश्य ऋणी है। तथा यह भी निश्चित है कि पीछे से उदित हुई ग्रीक वैज्ञानिक चिकित्सा का पूर्व प्रतिष्ठित भारतीय आयुर्वेद विज्ञान पर नाम मात्र भी प्रभाव नहीं है।
हिपोक्रिटस नामक प्रकाण्ड पण्डित ने अन्य देशों एवं प्रक्रियाओं के चिकित्सा संबन्धी विषयों का निरीक्षण करने तथा अपने विचारों एवं अनुभवों के आधार पर उनमें से उपयोगी विषयों को छांटकर चिकित्सा के विषय में अत्युत्तम निबन्ध तैयार किये थे। इसलिये उसे पाश्चात्त्य चिकित्सा का पिता (Father of Medicine) कहा जाता है। हिपोक्रिटस
समग्र प्राचीन संस्कृति और विशेष कर वैद्यक शास्त्र का आदि निर्माता होने का दावा यूनानी मनीषियों ने स्वयं कभी नहीं किया है जो कि परवर्ती विद्वान् उनकी ओर से कर रहे हैं।
नियर्सकस (उर्फ एरियन) ने लिखा है कि सर्पदंश की कोई चिकित्सा यूनानी चिकित्सक नहीं जानते, लेकिन भारतीय वैद्य बड़ी खूबी के साथ कर लेते हैं। एरियन ने ही कहा है कि—‘अस्वस्थ होने पर यूनानी लोग ब्राह्मणों से चिकित्सा कराते हैं और वे भारतीय प्रत्येक साध्य रोग की अद्भुत और दैवीय विधि से चिकित्सा कर देते हैं।
डायसोराइडस (ईसा की पहली सदी) प्राचीन द्रव्यगुण विज्ञान का सबसे प्रमुख लेखक था। डॉ. रायल ने अत्यधिक खोजपूर्ण निबन्ध में दिखाया है कि डायसोराइडस पुराने भारतीय द्रव्यगुण विज्ञान का कितना ऋणी था। ई. पू. तीसरी सदी के थियोफ्रेस्टस पर भी यही बात लागू होती है। ई. पू. ५ वीं सदी के यूनानी चिकित्सक क्लासियस के लेखों में भी भारतीय द्रव्यों का विवरण मिला है। यह प्रमाण शृङ्खला वहां पूर्ण होती है जब यह सिद्ध कर दिया जाता है कि ‘चिकित्साशास्त्र के पिता’ कहे जाने वाले हिपोक्रिटस ने अपना द्रव्यगुण विज्ञान हिन्दुओं से प्राप्त ज्ञान के आधार पर बनाया। हम इस विषय में डॉ. रॉयल का अद्भुत निबन्ध पढ़ने की सम्मति पाठकों को देते हैं। रॉयल कहते हैं—‘विश्व की पहली चिकित्सा प्रणाली के लिये हम हिन्दुओं के ऋणी हैं’।\hfill (Civilisation in India Vol II P. 249.)
\hfill (हिन्दू सभ्यता का इतिहास)
१. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. १३५ में देखें।