काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 319, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३०५
में अनेक वार उल्लिखित पाथागोरस (Pythagoras) नामक ग्रीकविद्वान् ईस्वी पूर्व ५८२-४७० में ग्रीस में हुआ प्रतीत होता है। पोकाक (Pococke), स्त्रोदर (Schroeder) आदि पाश्चात्त्य तथा अनेक भारतीय विद्वानों द्वारा पाथागोरस के भारत में आगमन तथा भारत से आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विषयों का ग्रहण करके ग्रीस में उनके प्रचार का उल्लेख¹ किया गया है। भारत से भैषज्य विद्या के ग्रहण का स्पष्ट प्राचीन उल्लेख न मिलने पर भी ईस्वी पूर्व छठी शताब्दी में पाथागोरस² की संख्या के स्थापित होने, पाथागोरस सम्प्रदाय के अनुयायी तथा उसके दार्शनिक शिष्यों के द्वारा ही भैषज्य³ विज्ञान में सर्वप्रथम रुचि प्रदर्शित करने तथा हिपोक्रिटस के भैषज्यविज्ञान पर उनकी ही विद्या के प्रभाव पड़ने के
१. (a) डॉ. एनफील्ड का कथन है—हम देखते हैं कि ज्ञानोपार्जन के लिये पाथागोरस, अनाग्जरेकस् और पाइरो आदि अनेक विद्वानों ने भारत की यात्रा की थी। ये सब विद्वान् पीछे यूनान के महान् तत्ववेत्ता (दार्शनिक) कहलाये।
(Hindu Superiority P. 233, 234, 235 by H. B. Sarda)
(b) यह निश्चित है कि वह (पाथागोरस) भारत आया था। मेरा विश्वास है कि मैं इसे स्वतःसिद्ध साबित कर सकता हूँ।
(India in Greece, Pococke P. 353)
(c) महान् तत्ववेत्ता पाथागोरस सी बहुत सी प्रेरणा भारत से मिली थी।
(V. Schroeder-Pythagoras and die Inder P. 44-59)
(d) हिन्दुओं के मतानुसार किससे मानव प्रकृति का निर्माण होता है—इसकी समीक्षा करते हुए स्वीडन के काउन्ट ने लिखा है-इस विषय में अफलातून और अरस्तू भी पाथागोरस की धारणा को मानते हैं और धारणा शायद भारत से ली गई है जहां कि पाथागोरस अपना तत्वज्ञान समृद्ध करने के लिये गया था।
(Theogony of the Hindoos P. 77)
(e) शलीगल का कथन है—पुनर्जन्म का सिद्धान्त मूलतः भारतीय उद्गम का है और पाथागोरस ने उसका यूनान में प्रचार किया।
(History of Literature P. 109).
(f) श्रीयुत प्रिंसिप का कथन है—‘पाथागोरस ने अपने सिद्धान्त भारतीय स्त्रोत से लिये थे’—यह एक सर्वविदित तथ्य है। मिश्राङ्क के नाम से बौद्धधर्म के सिद्धान्त भी बहुत प्रचलित हुए हैं। (Indian wisdom P. 68)
(g) इस विषय में; जिसका अभी वर्णन किया गया है-सच्चाई चाहे कुछ भी क्यों न रही हो, लेकिन पाथागोरस भारतीय दर्शन और विज्ञान पर अवलम्बित था यह बात बहुत सीमा तक ठीक जान पड़ती है। धार्मिक, दार्शनिक या गणितसम्बन्धी जो सिद्धान्त उसके नाम से मिलते हैं लगभग वे सभी ६ ठी सदी ई. पू. के भारतीयों को ज्ञात थे। यदि इन्हें निरा दैवयोग ही समझा जाय तो ये दैवयोग भी इतने अधिक हैं कि उनका सम्मिलित वजन काफी हो जाता है। पाथागोरस का ही पुनर्जन्म संबन्धी सिद्धान्त अन्य सिद्धान्तों से असंबद्ध सा है और उसकी स्थापना की कोई प्रमाण श्रृंखला नहीं मिली उसके आधार पर उसकी व्याख्या की जा सके। इसीलिये यूनानी लोग भी उसे विदेशी उद्गम से आया हुआ समझते थे। पाथागोरस ने यह सिद्धान्त मिश्र से लिया हो यह संभव नहीं है क्योंकि पुराने मिश्रियों को उसका ज्ञान ही नहीं था। पीछे प्रचार में आई धारणाओं के बावजूद यह बहुत ही कम संभव है कि पाथागोरस भारत आया होगा। लेकिन उसकी भेंट भारतीयों से ईरान में हुई हो सकती है।
(History of Hindu Chemistry Vol. I P. 22-23. By Dr. P. C. Roy.)
२. पश्चिमी यूनान में ६ टी सदी ई. पू. में पाथागोरस के अनुयायियों का संगठन स्थापित हुआ।
(Hippocrates Vol. IV P. 452.)
३. पहले पहल चिकित्सा शास्त्र में अभिरुचि दिखाने वाले तत्ववेत्ता पाथागोरस के अनुयायी ही थे। क्रोटन का अलेमेयन (पाथागोरस के वृद्धावस्था के दिनों का एक युवक शिष्य जिसकी दर्शन की अपेक्षा चिकित्सा शास्त्र में अधिक अभिरुचि थी) यद्यपि विशुद्धरूप से पाथागोरस का अनुयायी नहीं था फिर भी उसके सम्प्रदाय से संबद्ध था। ऐसा जान पड़ता है कि हिपोक्रिटस के प्रस्थान (School) पर इसका काफी प्रभाव पड़ा। (Hippocrates Vol I Intro. P. XIII.)