काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३०६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
उल्लेख¹ से प्रतीत होता है कि भारत से भैषज्य विद्या को ले जाने वाले पाथागोरस के शिष्यों द्वारा ही हिपोक्रिटस पर भारतीय भैषज्य विद्या का प्रभाव पड़ा है। पोकाक (Pococke) कोलब्रुक आदि विद्वानों² का कहना है कि पाथागोरस (इंग्लिश) के ग्रीक शब्द 'पुथ्यगोरस' का संस्कृत मूलरूप बुद्धगुरु है। पाथागोरस के दर्शन तथा भारतीय बौद्धदर्शनों में परस्पर बहुत समानता³ है। केवल दर्शन में ही नहीं, अपितु थिबोट⁴ तथा विभूतिभूषणदत्त⁵ आदि के अनुसार उनके गणित में भी भारतीय प्राचीन शुल्वगणित (Geometry) का सादृश्य मिलता है। भारत से उस समय दर्शन तथा गणित आदि बहुत से विषयों का ग्रहण करते हुए सम्भवतः उसने लोकोपयोगी तथा चिरप्रतिष्ठित भैषज्य विद्या का भी ग्रहण किया हो। भारतीय भैषज्य विद्या के भी पाथागोरस द्वारा ग्रीस देश में ले जाये जाने के विषय में बेड्रो (Bedroe)⁶ सुश्रुत के अनुवाद की भूमिका में के. एल.⁷ भिषग् रत्न, गोण्डल के⁸ के ठाकुर तथा जी. एन.⁹ मुखोपाध्याय आदियों ने उल्लेख किया है। पाथागोरस के दार्शनिक अनुयायियों का हिपोक्रिटस के भैषज्य विज्ञान पर प्रभाव के दिखाई देने से प्रतीत होता है कि संभवतः पाथागोरस भी भैषज्य विज्ञान का वेत्ता था। कोटन नामक स्थान के अल्ममेइनो (Alcmaeon) नामक विद्वान् के पाथागोरस की संस्था का भी अनुयायी होने तथा वैद्यक विद्या में रुचि होने से हिपोक्रिटसीय सम्प्रदाय में भी उसके पूर्णरूप से प्रभाव के उल्लेखों¹⁰ मिलने से प्रतीत होता है कि पाथागोरस की भी कोई भैषज्य विद्या संबन्धी संस्था
१. ४-५ तक की टि. संस्कृत उपो. पृ. १२६ में देखें।
२. पाथागोरस को बुद्धगुरु से अभिन्न सिद्ध किया जाता रहा है। कोलब्रुक भी दोनों को अभिन्न ही मानते थे। संस्कृत का बुद्धगुरुस् (प्रथमा की सु विभक्ति)=पुथागोरस् (यूनानी)=Pythagoras (आंगलरूप)।
(India in Greece-Pococke P. 364)
३. गणित शास्त्र के इतिहास लिखने वाले कैन्टर को (Cantor) यूनानी रेखागणित और शुल्वसूत्रों का अत्यधिक सादृश्य देख कर बहुत आश्चर्य हुआ। उसने इससे जैसा कि नितान्त स्वाभाविक ही था यह परिणाम निकला कि शुल्वसूत्र सिकन्दरिया के हिरो प्रस्थान (२१५ ई. पू.) से प्रभावित है। शुल्वसूत्रों का काल लगभग आठवीं सदी ई. पू. ठहरता है। डॉ. थिबोट (Dr. Thibaut) ने दिखलाया है कि ४७ वें साध्य के प्रमेय को जो कि पाथागोरस के नाम पर परम्परा से चला जाता है हिन्दुओं ने पाथागोरस से २०० वर्ष पूर्व ही हल कर दिया था। इस प्रकार वी. श्रौडर का यह परिणाम पुष्ट होता है कि यूनानी तत्ववेत्ता (पाथागोरस) ने भारत से प्रेरणा पाई थी।
(History of Hindu Chemistry by Dr. P. C. Roy P. XLI)
६. महान् तत्ववेत्ता (पाथागोरस) ने अपने तान्त्रिक रहस्य और अध्यात्मवाद भारतीय ब्राह्मणों से प्राप्त किये थे। श्री पोकोक (Pococke) ने अपने 'यूनान में भारत' (India in Greece) नामक ग्रन्थ में उसे बुद्धगुरु या बुद्ध से अभिन्न सिद्ध किया है। यह बड़ी आसानी से अनुमान किया जा सकता है कि वह अपने भारतीय गुरुओं से प्राप्त अनेक आयुर्वेदिक नुस्खे यूनान ले गया होगा।
(The Origin and Growth of Healing Art-Bedroe P. 162)
७. की टि. सं. उपो. पृ. ९० का. १ में देखें।
८. यूनानियों में चिकित्सा शास्त्र के प्रतिष्ठापक पाथागोरस (५८२ ई. पू.) के सिद्धान्तं तत्वतः भारतीय थे। कहा जाता है उसने मिश्रियों से ज्ञान प्राप्त किया। हम आगे दिखायेंगे कि मिश्रियों ने चिकित्साशास्त्र भारत से सीखा। अपने ग्रन्थ 'History of Philosophy' में एनफील्ड ने दिखाया है कि पाथागोरस ने पूर्व के अर्थात् हिन्दु तत्ववेत्ताओं से अपने सिद्धान्त ग्रहण किये थे। उसकी शिक्षाओं की बुद्धकी शिक्षाओं से इतनी अधिक समता है कि श्रीयुत पोकोक ने अपने ग्रन्थ 'India in Greece' में पाथागोरस और बुद्धगुरु या बुद्ध को एक ही सिद्ध करने का यत्न किया है।
(Short History of Aryan Medical Science P. 190-191 by H. H. Bhagvat Sinhajee.)
९. की टि. सं. उपो. पृ. १२६ में देखें।
१०. पहले-पहले चिकित्सा शास्त्र में अभिरुचि दिखाने वाले तत्ववेत्ता पाथागोरस के अनुयायी ही थे। क्रोटन को अलेमेयन (पाथागोरस के वृद्धावस्था के दिनों का एक युवक शिष्य जिसकी दर्शन की अपेक्षा चिकित्सा शास्त्र में अधिक अभिरुचि थी) यद्यपि विशुद्ध रूप से पाथागोरस का अनुयायी नहीं था फिर भी उसके सम्प्रदाय से संबद्ध था। ऐसा जान पड़ता है कि हिपोक्रिटस के प्रस्थान (School) पर इसका काफी प्रभाव पड़ा। (Hippocrates Vol. I P. XI.)