काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
३०६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
उल्लेख¹ से प्रतीत होता है कि भारत से भैषज्य विद्या को ले जाने वाले पाथागोरस के शिष्यों द्वारा ही हिपोक्रिटस पर भारतीय भैषज्य विद्या का प्रभाव पड़ा है। पोकाक (Pococke) कोलब्रुक आदि विद्वानों² का कहना है कि पाथागोरस (इंग्लिश) के ग्रीक शब्द 'पुथ्यगोरस' का संस्कृत मूलरूप बुद्धगुरु है। पाथागोरस के दर्शन तथा भारतीय बौद्धदर्शनों में परस्पर बहुत समानता³ है। केवल दर्शन में ही नहीं, अपितु थिबोट⁴ तथा विभूतिभूषणदत्त⁵ आदि के अनुसार उनके गणित में भी भारतीय प्राचीन शुल्वगणित (Geometry) का सादृश्य मिलता है। भारत से उस समय दर्शन तथा गणित आदि बहुत से विषयों का ग्रहण करते हुए सम्भवतः उसने लोकोपयोगी तथा चिरप्रतिष्ठित भैषज्य विद्या का भी ग्रहण किया हो। भारतीय भैषज्य विद्या के भी पाथागोरस द्वारा ग्रीस देश में ले जाये जाने के विषय में बेड्रो (Bedroe)⁶ सुश्रुत के अनुवाद की भूमिका में के. एल.⁷ भिषग् रत्न, गोण्डल के⁸ के ठाकुर तथा जी. एन.⁹ मुखोपाध्याय आदियों ने उल्लेख किया है। पाथागोरस के दार्शनिक अनुयायियों का हिपोक्रिटस के भैषज्य विज्ञान पर प्रभाव के दिखाई देने से प्रतीत होता है कि संभवतः पाथागोरस भी भैषज्य विज्ञान का वेत्ता था। कोटन नामक स्थान के अल्ममेइनो (Alcmaeon) नामक विद्वान् के पाथागोरस की संस्था का भी अनुयायी होने तथा वैद्यक विद्या में रुचि होने से हिपोक्रिटसीय सम्प्रदाय में भी उसके पूर्णरूप से प्रभाव के उल्लेखों¹⁰ मिलने से प्रतीत होता है कि पाथागोरस की भी कोई भैषज्य विद्या संबन्धी संस्था
१. ४-५ तक की टि. संस्कृत उपो. पृ. १२६ में देखें।
२. पाथागोरस को बुद्धगुरु से अभिन्न सिद्ध किया जाता रहा है। कोलब्रुक भी दोनों को अभिन्न ही मानते थे। संस्कृत का बुद्धगुरुस् (प्रथमा की सु विभक्ति)=पुथागोरस् (यूनानी)=Pythagoras (आंगलरूप)।
(India in Greece-Pococke P. 364)
३. गणित शास्त्र के इतिहास लिखने वाले कैन्टर को (Cantor) यूनानी रेखागणित और शुल्वसूत्रों का अत्यधिक सादृश्य देख कर बहुत आश्चर्य हुआ। उसने इससे जैसा कि नितान्त स्वाभाविक ही था यह परिणाम निकला कि शुल्वसूत्र सिकन्दरिया के हिरो प्रस्थान (२१५ ई. पू.) से प्रभावित है। शुल्वसूत्रों का काल लगभग आठवीं सदी ई. पू. ठहरता है। डॉ. थिबोट (Dr. Thibaut) ने दिखलाया है कि ४७ वें साध्य के प्रमेय को जो कि पाथागोरस के नाम पर परम्परा से चला जाता है हिन्दुओं ने पाथागोरस से २०० वर्ष पूर्व ही हल कर दिया था। इस प्रकार वी. श्रौडर का यह परिणाम पुष्ट होता है कि यूनानी तत्ववेत्ता (पाथागोरस) ने भारत से प्रेरणा पाई थी।
(History of Hindu Chemistry by Dr. P. C. Roy P. XLI)
६. महान् तत्ववेत्ता (पाथागोरस) ने अपने तान्त्रिक रहस्य और अध्यात्मवाद भारतीय ब्राह्मणों से प्राप्त किये थे। श्री पोकोक (Pococke) ने अपने 'यूनान में भारत' (India in Greece) नामक ग्रन्थ में उसे बुद्धगुरु या बुद्ध से अभिन्न सिद्ध किया है। यह बड़ी आसानी से अनुमान किया जा सकता है कि वह अपने भारतीय गुरुओं से प्राप्त अनेक आयुर्वेदिक नुस्खे यूनान ले गया होगा।
(The Origin and Growth of Healing Art-Bedroe P. 162)
७. की टि. सं. उपो. पृ. ९० का. १ में देखें।
८. यूनानियों में चिकित्सा शास्त्र के प्रतिष्ठापक पाथागोरस (५८२ ई. पू.) के सिद्धान्तं तत्वतः भारतीय थे। कहा जाता है उसने मिश्रियों से ज्ञान प्राप्त किया। हम आगे दिखायेंगे कि मिश्रियों ने चिकित्साशास्त्र भारत से सीखा। अपने ग्रन्थ 'History of Philosophy' में एनफील्ड ने दिखाया है कि पाथागोरस ने पूर्व के अर्थात् हिन्दु तत्ववेत्ताओं से अपने सिद्धान्त ग्रहण किये थे। उसकी शिक्षाओं की बुद्धकी शिक्षाओं से इतनी अधिक समता है कि श्रीयुत पोकोक ने अपने ग्रन्थ 'India in Greece' में पाथागोरस और बुद्धगुरु या बुद्ध को एक ही सिद्ध करने का यत्न किया है।
(Short History of Aryan Medical Science P. 190-191 by H. H. Bhagvat Sinhajee.)
९. की टि. सं. उपो. पृ. १२६ में देखें।
१०. पहले-पहले चिकित्सा शास्त्र में अभिरुचि दिखाने वाले तत्ववेत्ता पाथागोरस के अनुयायी ही थे। क्रोटन को अलेमेयन (पाथागोरस के वृद्धावस्था के दिनों का एक युवक शिष्य जिसकी दर्शन की अपेक्षा चिकित्सा शास्त्र में अधिक अभिरुचि थी) यद्यपि विशुद्ध रूप से पाथागोरस का अनुयायी नहीं था फिर भी उसके सम्प्रदाय से संबद्ध था। ऐसा जान पड़ता है कि हिपोक्रिटस के प्रस्थान (School) पर इसका काफी प्रभाव पड़ा। (Hippocrates Vol. I P. XI.)
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३०७
थी। पाथागोरस की विद्या के संबन्ध में अनुसन्धान करने पर मानवशरीर में मानसिक तथा शारीरिक रोगों की निवृत्ति के लिये संगीत आदि साधनों का उपयोग आकृति परीक्षा के द्वारा शरीर के आन्तरिक विकारों का ज्ञान, पशुमांसभक्षण अहितकारी होने से उसके न खाने में श्रेय, आरोग्य तथा पथ्य का महत्व, शारीरिक शक्तिवृद्धि के उपायों का अनुसन्धान, प्रत्येक व्यक्ति की प्रकृति के विषम होने से सबके लिये आहार व्यवस्था एक समान न होकर प्रकृति के अनुसार भिन्न-भिन्न होना, इत्यादि विषय¹ मिलते हैं। पाथागोरस के जितने भी आदेश मिलते हैं उनमें शरीर को स्वस्थ रखने के लिये अपने अनुकूल पथ्यसेवन आदि नियमों के पालन को विशेषस्थान दिया² गया है। पाथागोरस के सम्प्रदाय में रोग-निवृत्ति के लिये ओषधियों के प्रयोग की अपेक्षा पथ्य तथा आहार विहार के नियमों के पालन पर ध्यान दिया जाता था और यदि ओषधियों का प्रयोग किया भी जाता तो अन्त प्रयोग (Internal use) की अपेक्षा यथाशक्ति लेप आदि बाह्य शारीरिक उपचारों पर विशेष ध्यान³ दिया जाता था। ईस्वी पूर्व ५३० में पाथोगोरस के क्रोटन नामक स्थान में पहुंच कर उपदेश देने पर वहां के तीन सौ व्यक्तियों द्वारा उसके उपदेश के अनुसार औषधप्रयोग कोक छोड़ कर पथ्य तथा आहार विहार के पालन से स्वास्थ्य रक्षा करने को शपथ⁴ लेने का उल्लेख मिलता है। अनेक देशों में घूमते हुए मिश्र देश में पहुंचकर पाथागोरस ने वहां आगन्तुओं को चकित करनेवाले भेषज्यविद्या के विशेष प्रचार को देखकर बहुत आश्चर्य⁵ प्रकट किया, क्रोटन नामक प्रदेश में पाथागोरस के साथ विद्यमान पाथागोरस के सम्प्रदाय वाले मीलो नामक व्यक्ति के जंवाई डेमोकेडिस (Demokedes) द्वारा प्रवर्तित भैषज्यविषयक सम्प्रदाय के ईस्वी पूर्व तृतीय-चतुर्थ शताब्दी में प्रचलित⁶ होने के ग्रोट्स (Grotes) नामक विद्वान् द्वारा निर्देश होने के अनुसार भैषज्य शास्त्र संबन्धी उपदेशों को देने वाला, उसके उपदेशों को ग्रहण करने वाले व्यक्तियों द्वारा आदर किया जाने वाला, मिश्र में भैषज्य विद्या की उन्नति को देखकर प्रसन्न होने वाला तथा भैषज्य सम्प्रदाय के प्रवर्तक डेमोकेडिस को अपने शिष्यरूप में स्वीकार करनेवाला पाथागोरस भैषज्यविज्ञान का भी
१. पाथागोरस के प्रार्थना संघ, तापसोचित आत्मनिरीक्षण, असंयत वासनाओं को वश में करने के लिये संगीत प्रयोग, उसकी मुख की आकृति से विचारों और वासनाओं को ताड़ जाने की शक्ति उसका आहार संयम और शारीरिक शक्ति के प्रति उसकी अत्यधिक जागरूकता—ये सब प्रसिद्ध हैं। यह भी कहा जाता है कि वह पशुमांस भक्षण के छोड़ देने की शिक्षा देता था। इसका पुनर्जन्म के सिद्धान्त से गहरा संबन्ध है और हम मान सकते हैं कि उसने यह मन अपनाया होगा जैसा कि उसके बाद एम्पेडोक्लिस ने किया।
(History of Greece Vol. IV P. 322 by. Grotes.)
२. फिर भी दूसरी ओर यह भी सर्वथा संभव लगता है कि आहार, शिक्षण और अध्ययन के ये नियम संगठन के अन्य सदस्यों पर लागू नहीं होते थे। (History of Greece Vol. IV P. 322 Grotes.)
३. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १२७ में देखें।
४. पाथागोरस के कुछ खास शिष्यों ने-जो कि संख्या में तीन सौ के लगभग थे-एक प्रकार की प्रतिज्ञा से अपने को पाथागोरस के साथ और परस्पर एक दूसरे के साथ दृढ़ सम्बन्ध में बांध लिया। इस संगठन के चिह्न के रूप में उन्होंने विशिष्ट आहार, कर्मकाण्ड और व्रत अपना लिये थे। (History of Greece Vol. IV P. 329. Grotes)
५. पाथागोरस के समय मिश्र की वैद्यक की इतनी उन्नति हो गई थी कि एक जिज्ञासु यात्री का ध्यान आकृष्ट कर सके। उसके सिद्धान्तों का श्रेणीकरण और विभाजन हो गया था। उनके चिकित्सा व्यवसाय के नियम निर्धारित हो गये थे।
(Herodotus II 84, Aristotle politics III. 10. 4. History of Greece Vol. IV P. 325-Grotes).
६. औषध विज्ञान तथा शल्यचिकित्सा में जब पाथागोरस के शिष्य मिलो का दामाद डिमोकेड्स प्रसिद्ध हो रहा था तब पाथागोरस् क्रोटन में विद्यमान था। (History of Greece Vol. IV P. 327-Grotes)
काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् ३०८
आदर करनेवाला, ज्ञाता तथा प्रवर्तक प्रतीत होता है। भारत से दार्शनिक विषयों के ग्रहण तथा मिश्र की भेषज्य विद्या के दर्शन का उल्लेख होने से भारत तथा मित्र में जानेवाले पाथागोरस को भेषज्य विद्या का ज्ञान मिश्र तथा भारत दोनों देशों से हुआ प्रतीत होता है। इस प्रकार ग्रोट्स द्वारा निर्दिष्ट उसके उपदेशों में दिये हुए स्वास्थ्य सम्बन्धी विषयों के भारतीय आयुर्वेद में मिलने से तथा हिपोक्रिटस के भेषज्य विज्ञान में भी भारतीय वैद्यक विषयों की समानता के दिखाई देने से प्रतीत होता है कि भारत के साथ अपने संबन्ध का वर्णन करने वाले पाथागोरस ने साक्षात् अथवा परम्परा से भारतीय विज्ञान के द्वारा ग्रीस देशीय भेषज्य विज्ञान को प्रारंभ किया था।
इसके अतिरिक्त हिपोक्रिटस से कुछ समय पूर्व ग्रीस में विद्यमान तीन चिकित्सा सम्प्रदायों में से एक सम्प्रदाय के प्रवर्तक एम्पीडोक्लिस का भी इरान तथा भारत के आसपास के प्रदेशों में जाने तथा भारतीय दार्शनिक विद्या को ग्रीस में ले जाने का पी. सी. १ राय ने वर्णन किया है। भारत में पाञ्चभौतिक तथा चातुर्भौतिकवाद भी प्रारम्भ से ही मिलते हैं। एम्पीडोक्लिस द्वारा ग्रीस में चतुर्भूतवाद का अभूतपूर्व नया प्रचार तथा नवीन भेषज्य सम्प्रदाय का भी प्रारंभ किया जाना मिलता है। हिपोक्रिटस द्वारा उस चातुर्भौतिक शरीरवाद का ही प्रत्याख्यान (खण्डन) मिलता है तथा उसके द्वारा प्राचीन तीनों सम्प्रदायों में आवापोद्वाप विधि तथा परिष्कार के द्वारा संस्कार करके अपने सम्प्रदाय का उद्भव प्रकट किया गया है। इस प्रकार हिपोक्रिटस के पूर्ववर्ती एम्पीडोक्लिस द्वारा भारत में आकर साक्षात् रूप से अथवा इरान देश के द्वारा भारतीय दर्शन विद्या के समान दार्शनिक विषयों से सम्मिश्रित भेषज्य विद्या का भी ग्रहण किया गया प्रतीत होता है। इसके द्वारा भी ग्रीस में पहुँचा हुआ भारतीय चिकित्सा विज्ञान हिपोक्रिटस के हृदय में सङ्क्रान्त हो सकता है। ऊपर लिखे हुए विद्वानों के नाम केवल उपलक्षणमात्र हैं। इसी प्रकार अन्य भी ऐसे कई ग्रीक विद्वान् हो सकते हैं जिनके द्वारा भारतीय विद्या साक्षात् रूप से अथवा इरान आदि देशों के मार्ग से होती हुई पाश्चात्य देशों में पहुँची हो। प्राचीन इतिहास में उनके नाम नहीं मिलते हैं इसलिये इस विषय में स्पष्ट उल्लेख के बिना कुछ नहीं कहा जा सकता।
पूर्वकाल में ही नहीं, अपितु हिपोक्रिटस के पश्चात् भी भारतीय व्यवहार के दर्शन के लिये आये हुए इविमेरस (Evemerus) का उदाहरण मिलने से प्रतीत होता है कि पूर्वपरम्परागत भारतीय सभ्यता का अध्ययन करने के लिये इससे पूर्व भी बहुत से ग्रीक विद्वान् भारत में आये होंगे तथा उनके द्वारा बहुत सी भारतीय सभ्यता उनके देश में पहुँची होगी।
भारतीय विद्वानों का ग्रीस में जाना
केवल ग्रीस देश वालों का ही प्राचीन भारत में आगमन का वर्णन नहीं मिलता है अपितु भारतीय विद्वान् एवं वैद्यों का भी पश्चात् देशों में जाने, उनसे ज्ञान ग्रहण करने, उनका आदर तथा उनको उपदेश देने के वृत्तान्त इतिहास में मिलते हैं। ईस्वी पूर्व ३३० सामयिक प्रसिद्ध गायक अरिष्टाटल के शिष्य अरिष्टोक्सेनस (Aristoxenus) नामक विद्वान् के लेख के अनुसार ग्रीसदेश की राजधानी एथेन्स में साक्रिटीज नामक (Socrates B. C. 469-399) प्रसिद्ध दार्शनिक के साथ अध्यात्म विषय में उनके सिद्धान्तों का उपहास के रूप में खण्डन करते हुए किसी भारतीय के अध्यात्म विषयक संभाषण के मिलने से तथा (Eusebius) नामक विद्वान् द्वारा भी किये गये इस संवाद के उल्लेख को देखकर प्रतीत होता है कि ईस्वी पूर्व चतुर्थ शताब्दी से पूर्व भी भारतीयों का यूनानियों (ग्रीकों) के साथ परिचय था। इस प्रकार H. G. Rawlinson^२ द्वारा प्रकाशित लेख से भी प्रतीत होता है कि अलेक्जेण्डर के भारत में आने से पूर्व भी भारतीय विद्वानों का ग्रीस में जाना, ग्रीस भाषा का ज्ञान तथा ग्रीक विद्वानें के साथ विचार विमर्श विद्यमान था।
१. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. १२८ में देखें। २. यूनानी और भारतीय दार्शनिक चिन्तन में जो अद्भुत सादृश्य मिलता है उसकी ओर ग्रेब आदि अनेक मनीषी बार-बार विद्वानों का ध्यान आकृष्ट करते रहे है। एलेटिक और सांख्य सम्प्रदायों तथा औरफिजम (Orphism) और बौद्धधर्म
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३०९
अलेक्जेण्डर द्वारा भारतीय विज्ञान का प्रसार
जो भी राष्ट्र उन्नति करना चाहता है वह विद्या आदि से समृद्ध तत्कालीन अन्य राष्ट्रों का दूर से अध्ययन करता है तथा अपने देश के गौरव को बढ़ाने के लिये उस देश के विज्ञानों को ग्रहण करने का प्रयत्न करता है। उन्नत देशों की विद्या के परिचय, भाषा-विज्ञान तथा उनके अनुभूत सफल प्रयोगों के बाद श्रद्धा तथा विश्वास की अधिकता होने पर उनके ग्रन्थों का ग्रहण किया जाता है, उनके विद्वानों का सम्मान किया जाता है तथा उनकी प्रक्रियाओं को भी स्वीकार कर लिया जाता है। उन्नत अवस्था में पहुंची हुई भारतीय चिकित्सा विज्ञान के श्रवण, आलोकन, ज्ञानपर्यालोचन तथा आदर से पूर्व भी ग्रहण करने के लिये ग्रीक आदि प्राचीन विद्वानों का भारत में आना देखकर हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये। विजिगीषु (विजय की इच्छा वाला) राष्ट्र जिन्हें जीतना चाहता है उन राष्ट्रों के बल, वीर्य तथा सभ्यता आदि की परिस्थितियों को पहले अच्छी प्रकार देखकर ही अपने पैर बढ़ाता है। इस सिद्धान्त के अनुसार अलेक्लेण्डर के आने से पूर्व भी संभवतः भारतीय परिस्थितियों का सम्यक् अध्ययन करने के लिये बहुत से ग्रीक विद्वान् भारत में आये हों अथवा भारत में रहने वाले यूनानियों ने भारत के विषय में यूनानियों को पूर्ण ज्ञान करा दिया हो। विजय की इच्छा से भारत में आकर तथा
के सादृश्य सच्चे हैं। B. J. Urwick ने अपने नवीन ग्रन्थ ‘Message of plato’ में दिखलाया है कि अफलातून की पुस्तकों में विशेषकर Republic-ऐसे सादृश्य बहुत अधिक हैं। Ideas का सिद्धान्त वेदान्त का ही सरलरूप है। १० वें अध्याय के अन्त में आने वाला 'पाम्फीलियन एड् का स्वप्न' बिलकुल ही भारतीय रंग में रंगा हुआ है। Republic में वर्णित समाज के तीन वर्ग-संरक्षक, व्यवस्थापक और व्यवसायी भारतीय स्मृतिकारों के तीन वर्ण-ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हैं। चन्द्रगुप्त के दरबार में स्थित यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने भी यही कहा है—अनेक बातों में हिन्दुओं के नीतिनियम यूनानियों से मिलते जुलते हैं। उदाहरणार्थ यह विश्वास कि विश्व की सृष्टि और प्रलय काल का निश्चित है, और यह कि पृथ्वी का आकार वर्तुल है, यह नियामक और निर्माता। परमात्मा ही इसकी व्याख्या कर सकता है, विश्व के प्रारम्भिक तत्व अनेक हैं लेकिन आप् (जल) तत्त्व ही पहला तत्व है जिससे विश्व की रचना हुई है, यह कि चार तत्वों के अलावा एक और तत्व है जिससे आकाश तारे आदि बने हैं, और यह कि पृथ्वी ब्राह्माण्ड के केन्द्र में स्थित है। इसी प्रकार जन्म तथा आत्मा एवं अन्य भी अनेक विषयों में भारतीयों के विचार यूनानी विचारों से मेल खाते हैं। अफलातून की तरह ही वे भी आत्मा की अमरता और परलोक में दिये जाने वाले दण्डों के अनेक किस्से कहते हैं। प्रायः इन सादृश्यों को दैवयोग अथवा विचारों का स्वतन्त्र विकास कहकर उनकी उपेक्षा की जाती रही है। हीरोडोट्स ने स्पष्ट ही कहा है कि यूनान में पुनर्जन्म का सिद्धान्त मिश्र से आया है लेकिन उस युग में भारत और यूनान का संबन्ध था यह सिद्ध करने वाला कोई समसामयिक प्रमाण अब तक नहीं मिल सका है। लेकिन यह प्रमाणाभाव की युक्ति बहुत ही निर्बल युक्ति है और अभी हाल में यूसेबियस (Eusebius) का एक महत्वपूर्ण संदर्भ मेरी दृष्टि में आया है जो J. A. M. Crindle द्वारा (जो कि Cambridge History of India Book I Chapter XVI के लेखक हैं) नजर अन्दाज कर दिया गया है। सन्दर्भ इस प्रकार है—
'गायक एरिष्टोजेनस् भारतीयों के विषय में यह कहानी कहता है। एक भारतीय 'अथेन्स' में सुकरात से मिला और उससे पूछने लगा कि तुम्हारे दर्शन का कार्य क्या है। सुकरात ने उत्तर दिया 'मानवीय चरित्र और कार्य को समझना'। इस पर भारतीय हँस पड़ा और कहने लगा कि कोई मनुष्य तब तक मानवीय प्रकृति और कार्य (Phenomena) को कैसे समझ सकता है जब तक कि उसे दैवीय चरित्र और कार्यों का ज्ञान न हो'।
इस कथा का भाव स्पष्ट है। यूसेबियस ने इसे प्रामाणिक कहा है। गायक एरिष्टोजेनिस् अरस्तू का शिष्य था और स्वरों के विषय में प्रामाणिक लेखक था। उसका काल ३३० ई. पू. है। इसलिये हम निःसंकोच मान सकते हैं कि ई. पू. चौथी सदी में भी अथेन्स में भारतीय थे जो यूनानी बोल लेते थे और जिन्होंने वस्तुतः सुकरात से दार्शनिक चर्चा की थी। इससे भारत और यूनान के पारस्परिक संबन्ध के विषय में हमें अपने विचारों में कुछ परिवर्तन करना होगा।
(Amrit Bazar Patrika, 1936.)
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कुछ प्रदेश को जीत लेने पर भी यवनाधिपति अलेक्जेण्डर के शीघ्र भारत से लौट जाने में चिरकाल से थकी हुई अपनी सेना की अशान्ति ही केवल कारण प्रतीत नहीं होता है। अपितु जिस मार्ग से आये थे उसे छोड़कर नवीन समुद्र मार्ग से शीघ्र लौट जाने में मुद्राराक्षस की उक्ति के अनुसार कोई अन्य कारण भी प्रतीत होता है। भारत में आकर भी अलेक्जेण्डर के शीघ्र लौट जाने के उल्लेख से प्रतीत होता है कि चाणक्य नामक मन्त्री सहित चन्द्रगुप्त द्वारा शासित तथा समय-समय पर होने वाले आघातों को सहते हुए अपने पूर्व सम्प्रदाय की रक्षा में तत्पर भारत देश में उस समय यूनानियों का प्रभाव अधिक नहीं था।
विल ड्यूरण्ट¹ (Will Durant) नामक विद्वान् लिखता है कि ‘तक्षशिला, काशी, उज्जायिनी तथा विदर्भ आदि नगरों में भारतीय विश्वविद्यालय थे। अलेक्जेण्डर द्वारा तक्षशिला के आक्रमण के समय तक्षशिला सम्पूर्ण एशिया में सबसे उन्नत भारतीय विश्वविद्यालय था। वहां सम्पूर्ण कलाओं, सब विज्ञान, सैनिक विद्या तथा भैषज्य विद्या की शिक्षा देने वाले बहुत से बड़े-बड़े विद्वानों तथा देश देशान्तरों से आये हुए बहुत से विद्यार्थियों द्वारा समृद्ध महान् विश्वविद्यालय था। यह भारतीय विद्याओं के लिये अत्यन्त प्रसिद्ध स्थान हो गया था। अन्य सब विद्याओं की अपेक्षा भी इस विश्वविद्यालय की भैषज्य विद्या में विशेष प्रसिद्धि तथा प्रतिष्ठा थी’। एरियन (Arrian) नामक विद्वान् का भी कहना है कि ‘तक्षशिला अत्यन्त महान् तथा उन्नत नगरी थी’। स्मिथ² के अनुसार अलेक्जेण्डर का इतिहास लेखक एरियन (Arrian) नामक विद्वान् सिन्धु के समीपस्थ मूषक राज्य का वर्णन करते हुए लिखता है कि ‘उस देश के रहने वाले १३० वर्ष तक जीवित रहते थे। उनके इस दीर्घायुष्य का कारण परिमित आहार ही था। अन्य विद्याओं की अपेक्षा वे वैद्यक विद्या के अध्ययन में विशेष रुचि रखते थे’। मूषक प्रदेश में १३० वर्ष की आयु को असाधारण रूप में देकर, मूषक के उल्लेख द्वारा संभवतः अलेक्जेण्डर का सिन्धु प्रदेश तक आगमन सूचित किया है। स्ट्राबो³ (Strabo) नामक विद्वान् भी लिखता है कि (They do not persue accurate knowledge in any line except that of medicine' (अर्थात् उन्हें चिकित्सा विज्ञान के अतिरिक्त अन्य किसी भी विषय का सम्यक् ज्ञान नहीं था। पाथागोरस आदियों के इतिवृत्तों के द्वारा भारत में अध्यात्म आदि अन्य विद्याओं की भी उन्नति के स्पष्ट उल्लेख होने से, इस लेख से भी यही प्रकट होता है कि अन्य विद्याओं की अपेक्षा भैषज्य विद्या में भारतीय अधिक पूर्ण थे। अन्य साथ चलने की इच्छा वाले बहुत से भारतीय विद्वानों में से तक्षशिला से आदरपूर्वक साथ लाये हुए कल्याण (Plutarch reproduces as sphines but the Greeks called him Kalanos) नामक भारतीय विद्वान् का ग्रीसाधिपति अलेक्जेण्डर अन्य
१. (a) चन्द्रगुप्त के समय में उत्तरीय भारत के दो सौ प्राचीनतम नगरों में एक तक्षशिला था। एरियन ऐतिहासिक लिखता है कि ‘यह एक विशाल और समृद्ध नगर था। स्ट्राबो लिखता है कि यह बहुत विस्तृत नगर है तथा यहां के कानून बहुत अच्छे हैं’। यह नगर सेना और विद्या का केन्द्र था। ....... तत्कालीन भारत के कई एक विश्वविद्यालयों में यह सबसे अधिक विख्यात था। जिस प्रकार मध्ययुग में पेरिस में छात्रगण एकत्र होते थे उसी प्रकार तक्षशिला में बहुत से विद्यार्थी एकत्र हुआ करते थे। छात्र यहां के प्रसिद्ध गुरुओं के पास सभी प्रकार की कलाएं और ज्ञान विज्ञान सीखा करते थे। यहां का आयुर्वेद शिक्षालय सारे पूर्वीय जगत् में खूब प्रतिष्ठित और प्रसिद्ध था (पृष्ठ ४४१-४४२)
(b) सिकन्दर के आक्रमण के समय तक्षशिला नगर विद्या के प्रमुख केन्द्र के रूप में समस्त एशिया में सर्वविदित था। अपने आयुर्वेद विद्यालय के लिये तो यह और भी अधिक प्रसिद्ध था।
(Story of Civilization-Will Durant P. 557)
२. वहां के निवासी एक सौ तीस वर्ष की उमर तक पहुंचते थे। उनका दीर्घायुष्य उनके सुस्वास्थ्य का परिणाम था जो कि आहार विषयक संयम से प्राप्त किया जाता था। (Early History of India-V. Smilt P. 105)
३. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १३० में देखें।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३११
सब दार्शनिक विद्वानों की अपेक्षा अधिक सम्मान करता था। पीछे देह त्याग की इच्छा से चिता पर आरूढ़ होने पर ग्रीसाधिपति ने उसका अत्यन्त गौरव के साथ अन्तिम सम्मान किया था। राप्सन$^१$ (Rapson) नामक विद्वान् ने लिखा है कि इस भारतीय विद्वान् का वर्णन एरियन तथा स्ट्राबो नामक विद्वानों ने भी किया है। मैक्समूलर के कथनानुसार वह कल्याण$^२$ नामक विद्वान् ग्रीस तक भी गया था। यह एक उदाहरण ही भारत के तात्कालिक गौरव को सूचित करता है।
अलेक्जेण्डर द्वारा अपनी सेना में ग्रीक वैद्यों के होते हुए भी उनको सर्पविषचिकित्सा का ज्ञान न होने से सर्पविष की चिकित्सा के लिये भारतीय वैद्यों के रखने, अन्य रोगों की चिकित्सा$^३$ में भी प्रवीण होने से अलेक्जेण्डर द्वारा अपने शिविर में भारतीय वैद्यों को रखने, स्वदेश को लौटते हुए ग्रीसाधिपति द्वारा भारतीय वैद्यों को आदर संहित अपने साथ$^४$ ले जाने के तथा अपने देश की लौटते हुए मार्ग में भी भारतीय चिकित्सक द्वारा सर्पदष्ट की चिकित्सा के उल्लेख मिलने से भारतीय आयुर्वेद का प्रभाव पीछे भी ग्रीसदेश में दिखाई देता है।
१. १-२ की सं. उपो. पृ. १३०-१३१ में देखें। ३. यह (भारतीय चिकित्सा) विज्ञान यूनानियों के भारत में आगमन पर्यन्त (३२७ ई. पू. तक) निरन्तर बढ़ता रहा। यूनानी इतिहास लेखक एरियन ने सिकन्दर के आक्रमण के समय भारत की अवस्था का वर्णन करते हुए एक विचित्र तथ्य का उल्लेख किया है जिससे तात्कालीन हिन्दू चिकित्सकों के गौरव का परिचय मिलता है। वह कहता है कि सिकन्दर की सेना के साथ यद्यपि अनेक कुशल यूनानी चिकित्सक विद्यमान थे परन्तु उन्होंने सर्पदंश (जो कि पंजाब में प्रायः होते हैं) के प्रति अपनी असमर्थता प्रकट कर दी थी। इसलिये सिकन्दर को इस विषय में भारतीय वैद्यों को बुलाना पड़ता था जो कि सर्पदंश की सफलतापूर्वक चिकित्सा करते थे। मैसीडोनिया का राजा इनके हस्तकौशल से इतना प्रभावित हो गया था कि निर्याकस के अनुसार उसने अपने शिविर में बहुत से अच्छे भारतीय वैद्यों को नियुक्त कर रखा था तथा अपने साथियों को उसने सर्पदंश अथवा अन्य भी दारुण रोगों में इन भारतीय वैद्यों से सलाह लेने को कह रखा था। एक ओर जब कि यूरोपीय विषविज्ञान के पण्डित आजतक भी सर्पविष के लिये किसी विशिष्ट (Specific) ओषधि की तलाश में लगे हुए हैं, भारतीय चिकित्सकों को लगभग २२०० वर्ष पूर्व इस कुशलता का गौरव प्राप्त था। इसीलिये संभवतः अलेक्जेण्डर जिसे भारत में सिकन्दर कहा जाता है—यहां से लौटते हुए अपने साथ कुछ भारतीय चिकित्सा शास्त्र के अध्यापकों को अपने देश ले गया था। यूनानी चिकित्सा शास्त्र के प्रारंभिक इतिहास से भी इस अनुमान अथवा कल्पना की कुछ पुष्टि होती है। (Short History of Aryan Medical Science. P. 189-190. by H. H. Bhagvatsinhajee.) ४. 'E. J. Rapson रचित Cambridge History of India' नामक ग्रन्थ के प्रथम भाग पृ. ४०६ पर निर्याकस के नाम से उद्धरण दिया है कि—'भारत में चिकित्सकों के लिये सर्पदष्ट रोगियों की चिकित्सा के अतिरिक्त और कोई कार्य नहीं था, क्योंकि जैसा कि यूनानी लोग समझते थे, भारतीयों को रोग बहुत कम होते थे'। तथा इसके विपरीत 'Arrian's Indica' नामक ग्रन्थ में निर्याकस का निम्न उद्धरण दिया है—सिकन्दर के पास चिकित्सा कार्य में अत्यन्त निपुण बहुत से भारतीय व्यक्ति थे। उसने अपने सारे शिबिर में यह घोषणा कर रखी थी कि यदि किसी व्यक्ति को सांप काटले तो उसकी शाही शिबिर में चिकित्सा कराई जाय। परन्तु ये ही व्यक्ति अन्य रोगों एवं कष्टों को भी दूर करने में समर्थ थे—पृ. २२३। इस लेख के अनुसार वे केवल आजकल के सपेरों के सदृश ही नहीं थे अपितु आयुर्वेद के आठ प्रस्थानों में आये हुए विषतन्त्र के समान वे अन्य चिकित्सा विज्ञान के भी ज्ञाता थे। इसीप्रकार के भारतीय वैद्यों को सिकन्दर ने अपने पास रखा था तथा उन्हें अपने देश में ले गया प्रतीत होता है। इसप्रकार 'Cambridge History of India' में निर्याकस का 'But these very same men were able to cure other diseases and pains also' यह वाक्य न मिलना तथा उन्हें केवल सपेरों के समान ही बताना—आश्चर्यजनक है।
२१ का.सं.
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भारतीय आलोक के प्रसार में अशोक के शिलालेख का स्थान
न केवल प्राचीन काल में अपितु अशोक$^१$ के समय उसके तेरह शिलालेखों$^२$ के अनुसार अन्तियोक (योन) नामक ग्रीक राजा (Antiochos Theos B. C. 261-246 King of Syria), तुर्मयस (Ptolemaeos Philadelphos, King of Egypt 285-247 B. C.), अन्तिकोन (Antigonos Gonates of Macedonia 278-239 B. C.), मगस (Magas of Cyrene to the West of Egypt-मृत्यु-258 B. C.) तथा अलीकसुन्दर (अलेक्जेण्डर- Alexander of Epirus 272-258 B. C. तथा मतान्तर से Alexander of Corinth 252-244 B. C.) के देशों तथा यवन, कम्बोज, नील, चोल, पाण्ड्य, ता पर्णी, दरदविष, वज्रनाभक, नाभप्रान्त, भोज, पित्ति, निकि, आन्ध्र तथा पुलिन्द आदि आठ सौ योजन के अन्तर से फैले हुए देशों में भी अशोक की धर्मविजय तथा धर्म के चिह्न मिलते हैं। इस लेख से ज्ञात होता है कि भारत के भिन्न-भिन्न प्रदेशों के समान सीरिया, मिश्र, मैसीडोनिया, पश्चिमी मिश्र, एपिरस, यवन, कम्बोज आदि दूर के देशों में भी अशोक ने भारतीय धर्म की प्रतिष्ठा की थी। विमलप्रभा$^३$ की कालचक्र नामक व्याख्या में भी बुद्ध के निर्वाण के बाद उन-उन देशों की उन-उन भाषाओं में यानत्रय, पिटकत्रय आदि बौद्धग्रन्थों के अनुवाद होने से धर्मप्रचार का निर्देश मिलता है। उसमें भी पारसीक देश तथा नील नदी के उत्तर में रुक्म देश का उल्लेख मिलता है। अशोक ने केवल धर्मविजय ही नहीं किया था अपितु उसके शाहावाज गडी नामक स्थान में मिले हुए—
'सर्वत्र विजिते देवानां प्रियस्य ..... मनुष्याणाम्' मूल उपोद्धात पृ. १३२ देखें।
इस द्वितीय$^४$ शिलालेख में अशोक द्वारा भारत के भिन्न-भिन्न प्रदेशों के समान भारत से बाहर अन्तियोक नामक ग्रीस राजा के तथा उसके आसपास के अन्य राजाओं के देशों में भी पशुओं तथा मनुष्यों के लिये पृथक्-पृथक् दो प्रकार के चिकित्सालय प्रारम्भ किये थे तथा उनमें पशुओं तथा मनुष्यों के उपयोगी ओषधियों की भी व्यवस्था की थी। आवश्यकतानुसार ओषधि, फल तथा मूलों के वृक्ष भी सब स्थानों पर लगाये जाने के उल्लेख से प्रतीत होता है कि उस समय तक भारत के समान भारत से बाहर अन्तियोक आदि के देशों में भी भारतीय चिकित्सापद्धति तथा ओषधियों की अपेक्षा (आवश्यकता) प्रवृत्ति तथा प्रचार था। तेरहवें धर्मविजय शिलालेख में अन्तियोक के साथ तुर्मया, अन्तिकोन, मग तथा अलीकसुन्दर आदि चारों राजाओं का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। वहां इन राजाओं के देशों के आठ सौ योजन तक फैले हुए होने का निर्देश है। दूसरे शिलालेख में अन्तियोक$^५$ नामक यवनाधिपति का तो नामपूर्वक ग्रहण किया गया है। अन्य राजाओं का 'ये चान्ये तस्यान्तियोकस्य सामन्ता राजानः' के द्वारा उनके समीपवर्ती होने से सामान्यरूप से उल्लेख होने पर भी अन्तियोक के साहचर्य से, भौगोलिक दृष्टि से सीरिया प्रदेश के चारों ओर स्थित होने से तथा सामन्त शब्द के औचित्य के कारण सम्भवतः ये वे ही तुर्मय, अन्तिकोन, मग तथा अलीकसुन्दर आदि राजा हैं जिनका तेरहवें$^६$ शिलालेख में अन्तियोक के साथ निर्देश किया गया है। ग्रीसाधिपति अलेक्जेण्डर के अशोक से प्राचीन होने के कारण अशोक के समकालीन अन्य राजाओं के साथ होना सम्भव न होने पर भी भारत में आने के कारण परिचित हुए अलेक्जेण्डर के पूर्वकालिक सम्बन्ध को लक्ष्य करके अलीकसुन्दर शब्द से प्रसिद्ध ग्रीसाधिपति अलेक्जेण्डर का ग्रहण करके ग्रीसदेश में भी भारतीय प्रभाव समझा जा सकता है। परन्तु ऐतिहासिक विद्वान् समय की विभिन्नता के कारण तथा अन्य राजाओं के अशोक के समकालीन होने से यहां अलीकसुन्दर शब्द से ग्रीसाधिपति अलेक्जेण्डर का ग्रहण न करके अशोक के समकालीन एपिरस प्रदेश के तथा कुछ विद्वानों के मत से कोरिन्थ प्रदेश के, अलेक्जेण्डर का ग्रहण करते
१. १-४ तक की टि. सं. उपो. पृ. १३२ में देखें।
५. इन दूसरे तथा तेरहवें शिलालेखों में सीरियाधिपति अन्तियोक का ही यवनराज के रूप में निर्देश है, अलीकसुन्दर का नहीं। इससे ज्ञात होता है कि प्राचीनकाल में सीरिया देश की जाति के लिये ही यवन शब्द का व्यवहार होता था। परन्तु आजकल तो यवन शब्द से ग्रीस वालों का ही ग्रहण होता है। यह विचारणीय प्रश्न है।
६. की टि. सं. उपो. पृ. १३२ में देखें।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३१३
हैं। ‘राजान:’ इस पद के कारण यह अशोक सामयिक अलेक्जेण्डर ही प्रतीत होता है। यह सब होते हुए भी आठ सौ योजन तक के देशों में धार्मिक प्रभाव के होने से, सीरिया के आसपास के देशों में भारतीय चिकित्सापद्धति का भी विशेष प्रभाव होने से, इन दोनों शिलालेखों में ग्रीस के प्राचीन स्त्रोत के रूप में उल्लिखित मिश्र में भी भारतीय प्रभाव एवं आलोक के मिलने से, ग्रीस के मिश्र तथा सीरिया के समीप ही होने से, एपिरस तथा कोरिन्य प्रदेशों के भी ग्रीस में सम्मिलित होने से, ग्रीस द्वारा भारत तथा उसकी विद्या के परिचय की प्राप्ति के उल्लेख से, ग्रीस की आध्यात्मिक विद्या में भारतीय दर्शनों का प्रभाव मिलने से, हिपोक्रिटस के नाम से उत्तरोत्तर ग्रन्थों के संकलन से तथा उसके ग्रन्थों में आयुर्वेदीय विषयों की समानता मिलने से दार्शनिक तथा धार्मिक विषयों के समान चिकित्सा विज्ञान में भी अशोक के समय ग्रीस में भारतीय प्रभाव का परिचय मिलता है। इससे उस समय भी पाश्चात्त्य देशों में भारतीय आयुर्वेद विद्या, भारतीय चिकित्सापद्धति, भारतीय ओषधियों, भारतीय वैद्यों तथा भारतीय वैद्यक ग्रन्थों का कितना आलोक तथा गौरव था, इसका पर्याप्त ज्ञान हो जाता है।
ग्रीस तथा भारत का प्राचीन काल से सम्बन्ध
आजतक विशेष प्रमाणों के न मिलने पर भी प्राचीन काल में ग्रीस तथा भारत के पारस्परिक यातायात तथा वाणिज्य के सम्बन्ध को देखकर यह कहा जा सकता है कि भारतीय वैद्यक ग्रीस में पहुंची हुई थी। $^१$बक (Buck) नाम विद्वान् का कहना है कि अलेक्जेण्डर के काल से बहुत समय तक ग्रीस तथा भारत के घनिष्ठ संबन्ध के मिलने से तथा हिपोक्रिटस, डिओसकोराइडास (Dioscorides) तथा ग्यालन आदि के लेखों के अनुसन्धान से प्रतीत होता है कि भारतीय वैद्यों द्वारा व्यवहृत की जाने वाली बहुत सी ओषधियों तथा चिकित्सापद्धतियों का अभ्यास करने वाले ग्रीक वैद्यों ने ग्रहण किया हुआ था।
‘भारतीय तथा ग्रीसदेशीय प्राचीन वैद्यक विज्ञान में बहुत सी समानताएं मिलती हैं। ग्रीस के चिकित्साविज्ञान पर भारतीय प्रभाव को कुछ लोग जो नहीं मानते हैं तथा कुछ लोग संदिग्ध मानते हैं उसे देखकर हमें आश्चर्य होता है। हस्तलिखित प्राचीन पुस्तकों के मिलने से पूर्व प्रसिद्ध प्राचीन भारतीय ग्रन्थों का कालनिर्णय अत्यन्त कठिन था। परन्तु भारतीय विज्ञान की बहुत सी शाखाओं में स्वतन्त्ररूप से विचार तथा उनमें अन्यदेशीय विज्ञान के आलोक का अनादर मिलता है। भारतीय भैषज्य विषयों के अन्वेषण में आजकल बहुत से लोग भारतीय विषयों का भारतीय होना ही मानते$^२$
१. बक ने अपने ग्रन्थ ‘The Growth of Medicine from the Earliest Time to 1800’ में आधुनिक चिकित्साशास्त्र के उद्गम यूनानी चिकित्साशास्त्र पर भारतीय वैद्यक के प्रभाव को बहुत कम स्वीकार किया था। लेकिन इतिहास का अधिक परिशीलन करने के बाद उसे अपने विचारों में परिवर्तन कर यह कहना पड़ा कि ‘यह समझना अनुचित नहीं है कि दोनों देशों के व्यापारिक सम्बन्ध के द्वारा भारतीय वैद्यों के अनेक चिकित्सा कार्य प्राचीन यूनानियों को भी ज्ञात हुए होंगे। यद्यपि अबतक इस संबन्ध में कोई पुष्ट प्रमाण तो नहीं मिलता है। दूसरी ओर इतिहास के कुछ अधिक अर्वाचीन युग में अर्थात् सिकन्दर के भारत पर आक्रमण के बाद दोनों देशों में घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित हुआ जो कि कई सदियों तक अटूट रहा। इस युग के प्रारम्भिक हिस्से में यूनानी चिकित्सकों ने भारतीय वैद्यों द्वारा बरती जाने वाली अनेक ओषधियां और चिकित्सा की प्रक्रियाएं अपनाली थीं—ऐसा हिपोक्रिटस, डायस्कोरिडस और गेलन के लेखों से ज्ञात होता है।
(Fourth Oriental Conference Vol. II Pp. 425-426)
२. न्यूबर्गर कहते हैं—इस युग की भारतीय और यूनानी चिकित्सा शास्त्रों की रूपरेखा और अनेक विवरणों में इतना अधिक साम्य है कि यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि कितनी ही बार भारतीय चिकित्साशास्त्र की मौलिकता सन्देह की दृष्टि से देखी गई और कई बार तो अस्वीकार कर दी गई। इसका विशेष कारण यह है कि महत्वपूर्ण भारतीय ग्रन्थों में से अधिकांश का कालनिर्णय बहुत मुश्किल से हो पाया था और अभी हाल में अनेक पाण्डुलिपियों के प्रकाश में आने से पहले तक वह भी सर्वथा संदिग्ध था। आधुनिक खोजों के पीछे विज्ञान और कलाओं के क्षेत्र में भारतीयों की प्रमुख सफलताओं के विषय में विद्वानों का झुकाव उनकी मौलिकता को स्वीकार करने की ओर है।
(Neuberger. History of Medicine Vol. I P. 45)
३१४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
हैं तथा भारतीय प्राचीन भैषज्य विद्या की आलोचना करते हुए तथा उसके गूढ़विचार, सूक्ष्मबुद्धि का विकास तथा लेख-सौष्ठव आदि के अनुसन्धान में उसका स्थान अत्यन्त ऊंचा होने का परिचय मिलता है' ऐसा¹ न्यूबर्गर (Neuberger) नामक विद्वान् का कहना है।
हेरोडोटस तथा फीलोष्ट्रेटस आदि प्राचीन पाश्चात्त्य विद्वानों का भी कहना है कि भारत का प्राचीन काल से ही पाश्चात्त्य देशों के साथ परिचय, सम्पर्क तथा व्यवहार था। प्रथम शताब्दी में होने वाले प्लेनी² नामक ग्रीक विद्वान् के लेख से भी भारतीयों द्वारा वानस्पतिक एवं योगौषधियों (Prepared Medicines) को विक्रय के लिये ग्रीसदेश में ले जाने का उल्लेख मिलता है। ग्रीस तथा भारत के प्राचीन काल में पारस्परिक संबन्ध को तथा पक्षाघात, अम्लपित्त आदि रोगों में भारतीयों द्वारा किये जाने वाले धतूरे के प्रयोग का यूरोपवालों द्वारा भी ग्रहण किये जाने का उल्लेख करता हुआ रॉयल्³ (Royle) नामक विद्वान् पाश्चात्त्य देशों में भी भारतीय प्रभाव का वर्णन करता है। हैमिल्टन⁴ नामक विद्वान् का भी मत है कि प्राचीन ग्रीक वैद्यक में भारतीय आयुर्वेद को कुछ अंशों में प्रभाव था तथा भारतीय और ग्रीक चिकित्सा प्रणाली में समानता दिखाई देती है। इस विषय में बनर्जी⁵ की भी यही सम्मति है। श्रीयुत रमेशचन्द्रदत्त ने भी अपनी पुस्तक⁶
१. न्यूबर्गर का कथन है कि 'भारतीयों का वैद्यकशास्त्र भले ही वह भारतीयों की अन्य विशिष्ट सफलताओं की समता न कर सकता हो तो भी लगभग उतना ही महत्वपूर्ण है। और अपनी ज्ञानसमृद्धि, गम्भीरचिन्तन एवं क्रमबद्ध विवेचन के कारण पौरस्त्य चिकित्सा शास्त्रों में उसका विशिष्ट स्थान है।
(Neuberger. History of Medicine Translated by Playfair Vol. I P. 437.)
२. डायस्कोरिडस के समकालीन रोमन लेखन प्लिनि ने अनेक भारतीय जड़ी बूटियों और ओषधियों का उल्लेख किया है।
(Hindu Achievements in exact sciences B. K. Sarkar P. 50-51.) और देखिये—
(Intercourse between India and the Western World P. 102 by H. G. Rawlinsno)
३. दमें में धतूरे के पत्तों का धूम्रपान करना यूरोप में आधुनिक बात है लेकिन भारत में यह बहुत पुराने समय से प्रचलित है (Royle) देखिये—
(Hindu achievements in exact sciences by B. K. Sarkar. P. 49 Antiquity of Hindu Medicine)
४. जब हम यह भी देखते हैं कि पाथागोरस ने ब्राह्मण-पद्धति को प्रचलित किया ..... (तब हमें मानना पड़ता है कि) प्राचीन यूनानी वैद्यक पर भारतीय वैद्यक का कुछ प्रभाव अवश्य था। भारतीय और यूनानी वैद्यक की समानताएं इतनी अधिक है कि काकतालीय न्याय से उनकी व्याख्या नहीं की जा सकती।
(W. Hamilton. History of Medicine Vol. I P. 43) Hellenism in Ancient India P. 196 by G. N. Banerjee)
५. ऐसा नहीं जान पड़ता कि हिन्दुओं ने अपना वैद्यक का ज्ञान अपनी किसी पड़ौसी जाति से लिया हो। यूनानी ही ऐसे थे जिनसे वे यह ज्ञान ले सकते थे लेकिन दोनों देशों की दूरी बहुत अधिक थी तथा उनके परस्पर संबन्ध भी सतत नहीं बने रहते थे साथ ही विदेश यात्रा और विदेशी सम्पर्क के प्रति हिन्दुओं की बड़ी अरुचि थी। इन सब बातों पर विचार करने से यह धारणा कि हिन्दुओं ने यूनानियों से वैद्यक ज्ञान प्राप्त किया, बहुत ही अपुष्ट आधार पर स्थापित जान पड़ती है।
(Hellenism in Ancient India P. 191 G. Banerjee)
६. यूरोप में भारतीय वैद्यक की प्राचीनता अभी तक समझी और मानी नहीं गई है। और समग्र आर्यसंस्कृति का उद्गम यूनानी संस्कृति को समझने की प्रवृत्ति निष्पक्ष विवेचन में बहुत बड़ी बाधा है। जैसा कि डॉ. वाइज ने ठीक ही कहा है—वैद्यक के इतिहास संबन्धी तथ्यों का अन्वेषण अभी तक केवल यूनानी और रोमन लेखकों के ग्रन्थों में ही किया गया है, और यूनानी संस्कृति से भिन्न उद्गम से निकलने वाली प्रत्येक बात को अमान्य करने की परिपाटी के अनुकूल उन्हें आयोजित कर दिया गया है। बचपन से ही हम प्राचीन साहित्य से परिचित हैं और प्राचीन लेखकों की प्रतिभा की प्रभा से दीप्त उन घटनाओं को, जो हमारे चित्त पर अंकित हैं, स्मरण करना हमें बहुत पसन्द है। इस प्रभाव को मिटाने के लिये विषय का गम्भीर परिशीलन, नवीन प्रमाणों की जांच तथा निष्पक्षता की आवश्यकता है। ज्ञान पिपासा और सत्यप्रेम हमें नवीन ऐतिहासिक प्रमाणों का परिशीलन करने को प्रेरित करते हैं।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
३१५
में ऐसा ही लिखा है। पीछे भी मंक नामक किसी भारतीय वैद्य द्वारा अरब के राजा (खलीफा) हारुन अल रशीद के (A. D. 700) राजकुल में जाकर उसके रोग को दूर करने तथा चरक के विपतन्त्र का पर्शियन भाषा में अनुवाद करने का उल्लेख मिलता है। शल्य (Saleb) नामक भी कोई भारतीय वैद्य खलीफा हारुन अल रशीद के राजकुल में था। उसने फिलस्तीन तथा वहां से मिश्र जाकर वहीं प्राणत्याग किया—ऐसा अरब के इब्न असेव नामक विद्वान् ने निर्देश¹ किया है। इस प्रकार इससे पूर्व भी बहुत से भारतीय वैद्य एवं विद्वानों के दूर-दूर जाने की संभावना हो सकती है।
उपर्युक्त वर्णनों के अनुसार पाथागोरस आदि के समय से समय-समय पर अनेक ग्रीक विद्वानों के विद्याप्राप्ति के लिये भारत में आने, भारत तथा उसके आसपास के प्रदेशों से विद्या के ग्रहण करने, प्राचीन काल में कुछ भारतीय विद्वानों के भी ग्रीस में जाने, भारतीय विद्वानों के वहां आदर, भारत से लौटते हुए ग्रीसाधिपति अलेक्जेण्डर द्वारा अत्यन्त अनुसन्धान करके भारतीय वैद्यों को अपने देश में ले जाने, अशोक के शिलालेखों के अनुसार उसके समय भी पाश्चात्त्य देशों में भारतीय चिकित्सा विज्ञान के प्रचार के वृत्तान्त मिलने, हिपोक्रिटस के नाम से प्रसिद्ध सब ग्रन्थों के प्राचीन न होकर विद्वानों के मतानुसार पीछे से विकसित विज्ञानयुक्त लेखों के उनमें मिलने से तथा भारतीय वैद्यक में ग्रीक वैद्यक के असाधारण विषयों के न मिलने से, अपितु ग्रीक वैद्यक ने भारतीय वैद्यक की छाया अनेक स्थानों पर मिलने से प्रतीत होता है कि प्राचीन काल से ही परस्पर परिचित एवं यातायात करने वाले पाथागोरस आदियों अथवा भारतीयों द्वारा ग्रीक वैद्यक को बढ़ाने के लिये न्यूनाधिकरूप में समय-समय पर भारतीय वैद्यक विज्ञान वहां पहुँचाया गया हो। हिपोक्रिटस अथवा उससे भी प्राचीन वैज्ञानिकरूप में विकसित हुई ग्रीक चिकित्सा पर न्यूनाधिकरूप में मिश्र, बेविलोनिया आदि अन्य प्राचीन देशों के विज्ञान का भी प्रभाव पड़ा है किन्तु ग्रीक चिकित्सा विज्ञान अन्य देशों की तरह साक्षात् अथवा परम्परा से भारत का भी अवश्य ऋणी है। तथा यह भी निश्चित है कि पीछे से उदित हुई ग्रीक वैज्ञानिक चिकित्सा का पूर्व प्रतिष्ठित भारतीय आयुर्वेद विज्ञान पर नाम मात्र भी प्रभाव नहीं है।
हिपोक्रिटस नामक प्रकाण्ड पण्डित ने अन्य देशों एवं प्रक्रियाओं के चिकित्सा संबन्धी विषयों का निरीक्षण करने तथा अपने विचारों एवं अनुभवों के आधार पर उनमें से उपयोगी विषयों को छांटकर चिकित्सा के विषय में अत्युत्तम निबन्ध तैयार किये थे। इसलिये उसे पाश्चात्त्य चिकित्सा का पिता (Father of Medicine) कहा जाता है। हिपोक्रिटस
समग्र प्राचीन संस्कृति और विशेष कर वैद्यक शास्त्र का आदि निर्माता होने का दावा यूनानी मनीषियों ने स्वयं कभी नहीं किया है जो कि परवर्ती विद्वान् उनकी ओर से कर रहे हैं।
नियर्सकस (उर्फ एरियन) ने लिखा है कि सर्पदंश की कोई चिकित्सा यूनानी चिकित्सक नहीं जानते, लेकिन भारतीय वैद्य बड़ी खूबी के साथ कर लेते हैं। एरियन ने ही कहा है कि—‘अस्वस्थ होने पर यूनानी लोग ब्राह्मणों से चिकित्सा कराते हैं और वे भारतीय प्रत्येक साध्य रोग की अद्भुत और दैवीय विधि से चिकित्सा कर देते हैं।
डायसोराइडस (ईसा की पहली सदी) प्राचीन द्रव्यगुण विज्ञान का सबसे प्रमुख लेखक था। डॉ. रायल ने अत्यधिक खोजपूर्ण निबन्ध में दिखाया है कि डायसोराइडस पुराने भारतीय द्रव्यगुण विज्ञान का कितना ऋणी था। ई. पू. तीसरी सदी के थियोफ्रेस्टस पर भी यही बात लागू होती है। ई. पू. ५ वीं सदी के यूनानी चिकित्सक क्लासियस के लेखों में भी भारतीय द्रव्यों का विवरण मिला है। यह प्रमाण शृङ्खला वहां पूर्ण होती है जब यह सिद्ध कर दिया जाता है कि ‘चिकित्साशास्त्र के पिता’ कहे जाने वाले हिपोक्रिटस ने अपना द्रव्यगुण विज्ञान हिन्दुओं से प्राप्त ज्ञान के आधार पर बनाया। हम इस विषय में डॉ. रॉयल का अद्भुत निबन्ध पढ़ने की सम्मति पाठकों को देते हैं। रॉयल कहते हैं—‘विश्व की पहली चिकित्सा प्रणाली के लिये हम हिन्दुओं के ऋणी हैं’।\hfill (Civilisation in India Vol II P. 249.)
\hfill (हिन्दू सभ्यता का इतिहास)
१. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. १३५ में देखें।
३१६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
के ग्रन्थों में जो विषय दिये हुए हैं वे संभवतः उसी के परिष्कृत विचारों से उत्पन्न हुए तथा उसी के मस्तिष्क की उपज हों किन्तु उनमें भारतीय आयुर्वेद के विषयों से समानता रखने वाले जो शब्द, विषय तथा विचार मिलते हैं वे साक्षात् अथवा परम्परा से भारतीय प्राचीन वैद्यक के ही प्रतिफल होने चाहिये। यदि प्राचीन भारतीय आचार्यों द्वारा अन्यदेशीय प्राचीन भैषज्य सम्प्रदायों का अनुसरण किया गया होता तो उन प्राचीन आचार्यों के ग्रन्थ भी अन्यदेशीय सम्प्रदायों के अनुरूप ही होने चाहिये थे। किन्तु ऐसा नहीं है। अपितु पूर्वोक्त वर्णनों के अनुसार (पृ. ६४-६५) एक ही मूषा में रखी हुई अनेक प्रतिमाओं के समान एक ही प्रकार के ये विभिन्न निबन्ध किसी एक ही प्राचीन आयुर्वेदिक आर्षस्रोत से निकले हुए प्रतीत होते हैं। इसलिये हिपोक्रिटस द्वारा प्रवर्तित अथवा उससे प्राचीन ग्रीक वैद्यक का प्रभाव, वैदिक काल से चले आने वाले तथा ऐतिहासिक और भूगर्भ की दृष्टि से भी उससे प्राचीन काल से प्रसिद्ध भारतीय आयुर्वेद विज्ञान पर पड़ा हो—यह कहना कठिन है।
यद्यपि पांच हजार वर्ष पूर्व ज्योतिष विद्या के प्रवर्तक भी भारतीय ही थे, ऐसा पाश्चात्त्य¹ विद्वान् भी कहते हैं। परन्तु ग्रीस देश में ज्योतिषविद्या की उन्नति के विषय में, द्वितीय शताब्दी में होने वाले किसी यवन (ग्रीक) विद्वान् का जातक ग्रन्थ, विचारों की विशिष्टता के कारण प्रसारित हुआ भारतीयों द्वारा भी आदर की दृष्टि से संस्कृत में अनूदित किया जाकर यवनजातक नाम से भारत में यावनज्योतिष विद्या का दिग्दर्शन कराता है। वराहमिहिर आदि बाद के ज्योतिषाचार्य भी यवनाचार्य का निर्देश करते हैं। इस प्रकार रोम का सिद्धान्त भी भारत में प्रसिद्ध हो गया। प्राचीन वैद्यक के विषय में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता है जिससे उसे यवनों द्वारा प्राप्त कहा जा सके। यदि वैद्यक के विषय में भी ऐसा कोई प्राचीन यवनों का सम्पर्क अथवा सहयोग होता तो भारतीय शरीरशास्त्र, शल्यप्रक्रिया, कायचिकित्सा, ओषधियों अथवा अन्य भी किसी वैद्यक प्रक्रिया के विषय में यवन प्रभाव का निर्देश प्राचीन भारतीय आयुर्वेद के ग्रन्थों में अवश्य मिलना चाहिये था।
आत्रेय कश्यप आदि प्राचीन आचार्य 'बाहीकभिषक्' 'वाहीकभिषजो वा' 'बाहीकास्त्वपरे' इत्यादि शब्दों द्वारा कांकायन का नामग्रहणपूर्वक तथा अन्य भी वाहीक देश के वैद्यों का सम्मानपूर्वक आचार्यरूप से निर्देश करते हैं। आत्रेय तथा कश्यप आदियों द्वारा भी उल्लिखित यह बाहीक देश ग्रीकों के आक्रमण से पूर्व बलख नाम से प्रसिद्ध इरानदेश था। उस समय उस देश में वैद्यक विद्या की उन्नति भी तथा वह भी आत्रेय आदि आचार्यों के साथ विमर्श करने वालों की श्रेणी में काङ्कायन का निर्देश होने से भारतीय वैद्यक प्रक्रिया से मिलती जुलती ही थी, उनमें साधारण विचार मात्र का ही अन्तर था। यदि सुश्रुत के व्याख्याकार के लेख को मूल (Original) रूप में माना जाय तो उसमें काङ्कायन का सुश्रुत के सतीर्थ्य (सहपाठी) के रूप में उल्लेख होने से 'बाहीकभिषजां वरः' द्वारा निर्दिष्ट काङ्कायन में भी वैद्यक विज्ञान का स्रोत भारतीय ही प्रतीत होता है।
यदि भारतीय वैद्यक ग्रीक आचार्यों द्वारा प्रभावित होता तो पक्षपात शून्य होकर अत्यन्त सम्मान के साथ विदेशी विद्वानों को भी आचार्यों की श्रेणी में रखने वाले गुणग्राही तथा कृतज्ञ कश्यप आत्रेय आदि भारतीय आचार्य इसका अवश्य उल्लेख करते।
१. ज्योतिषशास्त्र के प्रवर्तक हिन्दू लोग थे। आधुनिक सभी ज्योतिषशास्त्री उनके समीक्षण की अतिप्राचीनता को स्वीकार करते हैं। कासिनी, बेली और प्लेफेयर आदि विद्वान् हमें बताते हैं कि हिन्दू ज्योतिषशास्त्रियों के ईसा से तीन हजार वर्ष पूर्व के निरीक्षण अभीतक तथा उस काल में उक्त विद्या के बीच में की गई उनकी प्रगति को सिद्ध करते हैं। भारत के प्राचीन ज्योतिषी पंचाग का निर्माण करते थे, वे ग्रहणों का निरीक्षण और उनके समय की घोषणा करते थे, उन्हें चन्द्र की कलाओं और उनके ग्रहों की गति का ज्ञान था। कोलब्रुक का मत है कि उनके अयन गति संबन्धी मन्तव्य टोलेमी की धारणा से कहीं अधिक ठीक थे।
(Short History of the Aryan Medical Science
Pp. 13-14 by H. H. Bhagvat sinhaee)
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३१७
ग्रीसदेश में शस्त्रचिकित्सा का बाद में प्रचार
यद्यपि जिस प्रकार प्राणियों की स्वास्थ्य रक्षा के लिये प्रारंभ से ही न्यूनाधिकरूप में ओषधियां विद्यमान थीं उसी प्रकार राजनैतिक संबन्ध से भिन्न-भिन्न राजाओं में प्राचीन काल से ही परस्पर संघर्ष के परिणामस्वरूप आहत (घायल) व्यक्तियों के उपचार के लिये शल्यचिकित्सा भी किसी न किसी रूप में प्राचीन काल से विद्यमान होनी चाहिये। होमर के लेख से ग्रीस में भी शल्य चिकित्सा की कुछ झलक मिलती है तथापि यह निश्चित है कि भारतीय भेषज्य विज्ञान को विदेशों में पहुंचाने वाले पाथागोरस आदि पाश्चात्य विद्वानों ने जिस प्रकार कायचिकित्सा (Medical Section) की प्रारम्भ में स्थापना की थी उस प्रकार वैज्ञानिक शल्यचिकित्सा (Surgical Section) की स्थापना नहीं की थी। ग्रीस में इस शल्यचिकित्सा का प्रचार कायचिकित्सा के बाद समयान्तर से ही हुआ प्रतीत होता है। मिश्रदेश में वैज्ञानिक शस्त्रवैद्यक के ईस्वी पूर्व तृतीय शताब्दी में होने तथा ग्रीस देश द्वारा मित्र से शस्त्रचिकित्सा के ईस्वी पूर्व प्रथम शताब्दी में ग्रहण करने का उल्लेख¹ मिलता है। हिपोक्रिटस के लेख से भी प्रतीत होता है कि उस समय उसे शिरा, धमनी, अस्थि आदि का शारीरिक (Anatomical) ज्ञान बिलकुल नहीं था। ²जी. एन. बनर्जी का भी यही विचार है। ग्रोट्स नामक विद्वान् का भी कहता है कि लिटरे³ (Littre) के मत में हिपोक्रिटस को शारीरिक हित के लिये व्यायाम आदि बाह्य ज्ञान के अतिरिक्त आन्तरिक ज्ञान विशेष नहीं था। हिपाक्रिटस के ग्रन्थों में शरीर के विषय में बहुत कम ज्ञान मिलता है और वह भी उसने मिश्र के द्वारा प्राप्त किया था—ऐसा ग्रीस के इतिहास में मिलता ⁴है। कीथ नामक विद्वान् ⁵की राय में ग्रीस में अस्थि, धमनी आदि के ज्ञान की सूचना देने वाला कोई प्राचीन लेख नहीं मिलता है। बनर्जी⁶ का भी कहना है कि ग्रीस में प्राचीन काल में सुश्रुत के समान कोई प्राचीन शारीरिक ग्रन्थ नहीं था।
किसी विद्वान् की ऐसी भी सम्मति है कि प्राचीन काल में भारत के काशी आदि पूर्व देशों में शस्त्रचिकित्सा तथा तक्षशिला आदि पश्चिम देशों में कायचिकित्सा का विशेष प्रचार होने से पाश्चात्य देशवाले सर्वप्रथम सन्निकृष्ट पश्चिम विभाग से कायचिकित्सा का ज्ञान ही अपने देशों में ले गये हों तथा फिर समयान्तर से धीरे-धीरे पूर्व देशों में भी अपने प्रसार, सम्पर्क तथा परिचय आदि के होने पर बाद में वहा के शस्त्रवैद्यक के ज्ञान को भी वे अपने देश में ले गये हों। परन्तु शस्त्रचिकित्सा सम्प्रदाय के काशिराज दिवोदास द्वारा प्रारम्भ किये जाने से मुख्यरूप से काशी आदि पूर्वदेशों में ही मिलने पर भी आत्रेय भेड कश्यप आदियों द्वारा भी बहुवचनान्त ‘धान्वन्तरा’ आदि शब्दों से अन्य प्रस्थान के रूप में निर्देश होने से तथा अपने कायचिकित्सा प्रधान उपदेशों में भी शस्त्रचिकित्सा सम्बन्धी कुछ विषयों का निर्देश करने से प्रतीत होता है कि आत्रेय आदियों द्वारा प्रचलित कायचिकित्सा में प्रसिद्ध पश्चिम प्रदेश में भी शस्त्रचिकित्सा विज्ञान प्रचलित था तथा उस सम्प्रदाय के अनुयायी भी संख्या में बहुत थे। तक्षशिला में अध्ययन करके विशिष्ट विद्वत्ता को प्राप्त करने वाले जीवक
१. १ और ३ की टि. सं. पृ. १३७ में देखें।
२. इस बात का अबतक कोई निश्चित प्रमाण नहीं मिला है कि हिपोक्रिटस के समय या उसके पीछे की दो सदियों में यूनानी वैद्य शवच्छेद करते थे। (Hellenism in Ancient India G. N. Banerji P. 191.)
४. संग्रह में कई ग्रन्थ हैं जिनमें पहला ‘सिर के घाव’ ई. पू. ४थी सदी का है। इसकी कई मिश्री हस्तलिखित ग्रन्थों से समता है। हो सकता है कि इसका कुछ अंश मिश्री उद्गम का हो। (E. B. Vol XI P. 585.)
५. यूनानी शल्यचिकित्सा के ग्रन्थों में मानव शरीर की अस्थियों की प्रारम्भिक सूची के अभाव के कारण भारत तथा यूनान के परस्पर प्राचीन संबन्ध के विषय में किन्हीं निश्चित प्रमाणों का मिलना लगभग असम्भव है।
(History of Sans. Lit. A. B. Keith P. 514.)
६. अस्थिशास्त्रीय सिद्धान्तों का कोई संक्षिप्त संग्रह प्रारम्भिक यूनानी संहिताओं में नहीं मिलता जैसा कि चरक और सुश्रुत में मिलता है। (Hellenism in Ancient India. by G. N. Banerji P. 194.)
३१८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
के लिये महावग्ग आदि में शस्त्रचिकित्सा में कुशलता का उल्लेख होने से तक्षशिला में शस्त्रचिकित्सा विज्ञान की उन्नति भी स्पष्ट प्रतीत होती है। सुश्रुतसंहिता में दिवोदास के शिष्य सुश्रुत के सतीर्थ्य के रूप में अनेक देशवाले व्यक्तियों का परिचय मिलता है। उनमें से शल्य के विषय में विशेष तन्त्रों का निर्माण करने वाले चार¹ आचार्यों में पौष्कलावत का भी उल्लेख है। संभवतः यह पौष्कलावत प्राचीन गान्धार की राजधानी के रूप में ज्ञात पुष्कलावत् का रहने वाला हो। हो सकता है उसका भी सम्प्रदाय तक्षशिला के आसपास के प्रदेशों में प्रचलित हो। औपगव भी पश्चिम प्रदेश का रहने वाला आचार्य था तथा बाह्लीकभिषक् काङ्कायन के समान औरभ्र भी आधुनिक भारत से बाहर पश्चिमोत्तर प्रदेश (North western frontier Province) का रहने वाला था जिसकी कि हम आगे विवेचना विवेचना करेंगे। इस प्रकार सौश्रुतसम्प्रदाय के प्रसार के निर्देश न मिलने पर भी तक्षशिला तथा गान्धार आदि के आसपास का प्रदेश पश्चिम देशों में प्रसिद्ध इन पूर्वाचार्यों के सम्प्रदायों के उल्लेख के कारण शस्त्रचिकित्सा में भी उन्नत था—ऐसा प्रतीत होता है। जातक ग्रन्थों के अनुसार जीवक के तक्षशिला में अध्ययन के समय उसके गुरु द्वारा कपालभेदन करने के उल्लेख से तथा महावग्ग के अनुसार वहां से अध्ययन करके लौटने पर जीवक द्वारा भी कपालभेदन का उल्लेख मिलने से यह कहा जा सकता है कि उस समय तक्षशिला में ऊर्ध्वजत्रुविभागीय शालाक्य विज्ञान का भी प्रचार था।
३२७ ईस्वी पूर्व में अलेक्जेण्डर के भारत से लौटकर मृत्यु होने के बाद भी ३०४ ईस्वी पूर्व में मिश्र देश के अलेक्जेण्ड्रिया नगर में उद्घाटित संग्रहालय (Museum) में हिरोफिलस (Herophilus) तथा एरासिस्ट्रेटस (Erasistratus) नामक विद्वानों ने शारीरिक ज्ञान सम्बन्धी लेखों की स्थापना की थी जिनके ईस्वी पश्चात् द्वितीय शताब्दी में होने वाले ग्यालन नामक ग्रीक विद्वान् द्वारा ढूंढने पर भी उपलब्ध नहीं होने का उल्लेख ²मिलता है। ग्यालन ने भी मित्र से ही शरीरविज्ञान की प्राप्ति का उल्लेख किया है तथा उसके अन्य विषयों के अनुसन्धान से प्रतीत होता है कि मिश्र देश में तृतीय शताब्दी से शारीर तथा शस्त्रचिकित्सा का विशेष ज्ञान हुआ था। ग्रीस तथा मिश्रदेश के शस्त्रवैद्यक के शस्त्रों से भारतीय शस्त्रवैद्यक के शस्त्रों (Instruments) की समानता मिलती है। जी. एन ³मुखोपाध्याय भी कहते हैं कि ग्रीकवैद्यक के शस्त्र सुश्रुतोक्त शस्त्रों के अनुरूप थे। ⁴हार्नले नामक विद्वान् की भी यही राय है। इस समानता से भारतीय शस्त्रचिकित्सा का भी ग्रीकचिकित्सा पर कुछ थोड़े बहुत अंश में प्रभाव प्रतीत होता है।
भारत में इधर-उधर प्रौढ़रूप में विद्यमान अनेक विद्याओं तथा अन्य विद्याओं की अपेक्षा भी शल्य तथा कायचिकित्सा विभाग वाले भैषज्य विज्ञान की तक्षशिला आदि प्रदेशों में प्रसिद्धि को देखकर उन्हें अपने देश में पहुंचाने के लिये ग्रीस के राजा अलेक्जेण्डर महान् (Alexander the Great) द्वारा गान्धार के आचार्य पौष्कलावत तथा सुश्रुत के सम्प्रदायों से तक्षशिला, पुष्कलावत् तथा गान्धार आदि प्रदेशों में उन्नत वैज्ञानिक शस्त्रचिकित्सा का भी विशेषरूप से आदर तथा ग्रहण किया गया था। उसका प्रमाण यह है कि अलेक्जेण्डर के शिविर में भारतीय चिकित्सकों की नियुक्ति तथा उन्हें अपने देश में ले जाने का इतिवृत्त मिलता है। अपने देश में विद्या की वृद्धि के लिये तक्षशिला के राजा की सहायता
१. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १३७ में देखें।
२. (क) सिकन्दर महान् की मृत्यु और सिकन्दरिया के वस्तुसंग्रहालय की स्थापना (३०४ ई. पू.) तक एरासिस्ट्रेटस, हेरोफिलस आदि महान् शरीररचना विज्ञान वेत्ताओं ने अपने अन्वेषणों को लिपिबद्ध नहीं किया था। ग्यालन के समय उनकी कोई कृति विद्यमान नहीं थी। (Hellenism in Ancient India P. 192 G. N. Banerji)
(ख) हिपोक्रिटस के विषय में स्थिति चाहे कुछ भी क्यों न रही हो, लेकिन इतना तो असंदिग्ध है कि ई. पू. तीसरी सदी में हिरोफिलस और एरासिस्ट्रेटस के सिकन्दरिया के प्रतिष्ठानों में शवच्छेद प्रचलित था। (History of Sans, Lit. P. 514-A. B. Keith.)
३. ३-४ की टि. सं. उपो. पृ. १३८ में देखें।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
३१९
से विषयवासनाओं से विरक्त होकर वानप्रस्थवृत्ति को धारण करने वाले आध्यात्मिक विद्वान् कल्याण (Kalanos) को ले जाने वाला अलेक्जेण्डर बहुत से लोकोपयोगी तथा विशेषकर रात दिन संघर्ष करने वाले राजाओं द्वारा अपेक्षणीय शस्त्रचिकित्सों तथा कायचिकित्सकों को भी अपने देश में अवश्य ले गया होगा। अलेक्जेण्डर के इतिवृत्त में भी इसका उल्लेख मिलता है तथा—ईस्वी पूर्व ३२७ में भारत में पहुंचकर अलेक्जेण्डर के लौटते हुए मृत्यु के उपरान्त अलेक्जेण्ड्रिया में उद्घाटित वैज्ञानिक शस्त्रचिकित्सा के प्रदर्शन में भी दिखाई देने वाला भारतीय प्रभाव इसी बात को प्रकट करता है।
ईरान देश में मिश्रदेश के चिकित्सकों द्वारा प्रथम डेरियस नामक राजा की चिकित्सा के वृत्तान्त के मिलने से मिश्रदेश में ईस्वी पूर्व तृतीय शताब्दी से पूर्व भी शस्त्रचिकित्सा के होने की यद्यपि प्रतीति होती है तथापि उसमें उनकी असफलता के भी वृत्तान्त मिलने से उस शस्त्रचिकित्सा की अवस्था भी प्रकट होती है। मिश्र में प्राचीन काल में शारीरिक विज्ञान का उदाहरण नहीं मिलता है। और यदि मिलता भी है तो उसपर भारतीय प्रभाव था जिसका कि इस आगे वर्णन करेंगे।
ग्रीसदेश में उपलब्ध प्राचीन मूर्तियों में मांसपेशियों के यथावत् चित्रण के दर्शन से भी यह नहीं कहा जा सकता कि उन्हें प्राचीन काल में विशेष शारीरिक ज्ञान था। मूर्तियों में मांसपेशियों का चित्रण तो भारत, सुमेरिया, बेविलोनिया आदि देशों में भी प्राचीन काल से ही मिलता है। मूर्तियों में बाह्यपेशियों के चित्रण में अच्छाई या बुराई से तो केवल चित्रकला की कुशलता अथवा अकुशलता का ही परिचय मिलता है। इसमें किसी का मतभेद नहीं है कि आन्तरिक शारीरिक अवयवों का ज्ञान होने पर भी चित्रकला में उसे बढ़ाकर दिखाया जा सकता है। परन्तु चित्र में यथावत् अङ्कन के दर्शनमात्र से आन्तरिक शारीरिक अवयवों के विशेषज्ञान की कल्पना नहीं की जा सकती। वास्तव में शस्त्रवैद्यक के लिये उपयोगी शारीरिक ज्ञान तो आन्तरिक, सूक्ष्म एवं बहुत विषयों से युक्त भिन्न ही वस्तु है। आजकल भी बहुत से ऐसे व्यक्ति मिल सकते हैं जो चित्रकला में निष्णात होते हुए भी आन्तरिक शारीरिक ज्ञान से शून्य हैं तथा आन्तरिक शारीरिक ज्ञान में पूर्ण होते हुए भी चित्रकला में एकदम कोरे होते हैं। इसप्रकार बाह्य एवं आन्तरिक ज्ञान बिलकुल भिन्न-भिन्न वस्तुएं हैं। इसलिये एक विषय में ज्ञान होने से दूसरे विषय में ज्ञान होना आवश्यक नहीं है। भारत में साकेत (अयोध्या) तक पहुंचकर बाद में बौद्ध धर्म ग्रहण करने वाले ग्रीस देश के मिलाण्डर (Melander) के वृत्तान्त संबन्धी मिलिन्द प्रश्न नामक बौद्ध पाली ग्रन्थ में ग्रीस के राजा मिलाण्डर के प्रति उपदेश तथा धन्वन्तरि¹ आदि के उल्लेख का पहले ही वर्णन किया जा चुका है। उसमें लिखा है कि बाण² द्वारा विद्ध व्रण में मांस की विकृति से त्रिदोष की वृद्धि होकर ज्वर आदि हो जाने पर शस्त्रचिकित्सक व्रण को शस्त्र से ठीक करके, क्षार आदि द्वारा शोधन करके तथा लेपों से शोथ को हटाकर उपचार करते हैं। ऐसा करने में वे कोई पाप नहीं करते हैं अपितु इसमें लोकोपकार की ही भावना
१. नारद, धन्वन्तरि, अंगिरा और कपिल आदि विद्वान् रोगों की सम्प्राप्ति, कारण, स्वरूप, प्रगति और उपचार आदि को भली प्रकार जानते थे। इनमें से प्रत्येक ने अपनी-अपनी संहिताएं (ग्रन्थ) लिखी हैं।
मिलिन्द प्रश्न
(T. W. Rhys Davids (द्वारा सम्पादित Vol XXXVI)
२. कल्पना करो कि एक व्रण की चिकित्सा करते हुए......एक अनुभवी वैद्य और शल्यचिकित्सक तेज गन्ध वाली और काटने वाली खुरदरी मल्हम का लेप कर देते हैं और उससे व्रण की शोथ दूर हो जाती है........। कल्पना करो कि वे उसे नश्तर से चीर देते हैं और कास्टिक से जला देते हैं। इसके बाद वे उसे किसी क्षारीय द्रव से धुलवाकर एक लेप लगा देते हैं जिससे अन्त में घावं भर जाता है और वह व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है। अब हे राजन्! बतलाओ, क्या चिकित्सक ने मल्हम का लेप, नश्तर से चीर-फाड़, कास्टिक स्पर्श और क्षारीय जल से प्रक्षालन—यह सब हिंसा से प्रेरित होकर किया था।
(The Questions of King Milinda)
(Translated by T. W. Rhys Davids Vol. XXXV.)
३२० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
होती है। उपर्युक्त दृष्टान्त से उसमें व्रणोपचार, शस्त्रचालन तथा व्रणबन्ध आदि में उसके सूक्ष्म विचारों तथा स्थान-स्थान पर विवेचन, रोगोत्पत्ति, निदान, औषधप्रयोग आदि बहुत से वैद्यक विषयों का उल्लेख मिलता है।
हार्नले$^१$ (Hoernle) के अनुसार ईस्वी पूर्व ६०० से पूर्व भी भारतीय चिकित्सा विज्ञान के अत्यन्त उन्नत होने, शस्त्रचिकित्सा, अस्थि आदियों का ज्ञान तथा शारीरज्ञान के होने, प्राचीन भारतीय वैद्यक ग्रन्थों में शरीर विज्ञान के विशेष विवरण को देखकर सबके विस्मय, हिपोक्रिटस के सम्प्रदाय में शवच्छेदन विद्या (Dissection) के न मिलने, टेरियस का भारत में आगमन, भारतीय शारीर विज्ञान के ग्रीसदेश के शारीर विज्ञान के मूल होने के खण्डन न हो सकने इत्यादि बहुत से भारतीय वैद्यक के गौरव के उल्लेख मिलते हैं।
इसी प्रकार डायज$^२$ (Diag), डॉ. हर्षबर्ग (Dr. Hirschberg) डॉ. हुइलेट (Dr. Huillet) डॉ. वाइज (Dr. Wise) तथा विट्नी (Whitney) आदि विद्वान् भी इसी का समर्थन करते हैं।
१. हम यह मानलें कि हिपोक्रिटस के समय शवच्छेद के प्रचलन का कोई पुष्ट प्रमाण नहीं मिलता है और हम यह जानते ही हैं कि लगभग ई. पू. ४०० में टेरियस भारत आया था। तब इस बात का प्रत्याख्यान सुगमता से नहीं किया जा सकता कि यूनानियों का शरीररचना विज्ञान भारतीय शरीररचना विज्ञान पर अवलम्बित है।
भारतीय ग्रन्थों में निहित शरीररचना शास्त्रीय जानकारी को प्रकाश में लाया जाय तो शायद बहुतों को बड़ा आश्चर्य होगा, मुझे भी ऐसा ही हुआ था। उसका विस्तार और सन्दर्भशुद्धि आश्चर्यजनक है। आवश्यकता इस बात की है कि उन पर विचार करते हुए ध्यान में रखा जाये कि वे बहुत प्राचीन (सम्भवतः ई. पू. ६ठी सदी) है और परिभाषा करने की उनकी अपनी ही शैली है।
(Medicine of Ancient India P. III Vol I by Hoernle)
२. कोनिसबर्ग विश्वविद्यालय के उपाध्याय डायज ने यूनानी चिकित्सा प्रणाली में से भारतीय सिद्धान्तों को स्पष्ट ढूंढ निकाला है।
बर्लिन के डॉ. हर्षबर्ग कहते हैं कि भारतीय विद्वानों के कौशलपूर्ण विधियों का ज्ञान हो जाने से यूरोप की सम्पूर्ण प्लास्टिक सर्जरी पर नवीन प्रकाश पड़ता है। संज्ञायुक्त त्वचा के एक हिस्से को दूसरे स्थान पर लगाने (Skin grafting) की विधि भी पूर्णरूप से भारतीय है। यही उपर्युक्त लेखक मोतियाबिन्द के आपरेशन के अन्वेषण का यश भी भारतीयों को ही देता है। इसका यूनानी, ईरानी अथवा अन्य किसी भी देश वालों को बिलकुल ज्ञान नहीं था। कई शारीरिक शल्यक्रियाओं के विषय में उन्होंने अपने एक विद्वत्तापूर्ण निबन्ध में लिखा है कि भारतीयों को शल्यक्रिया का अच्छा ज्ञान था और वे प्रवीणता से यह कार्य करते थे। यूनानी चिकित्सक इन क्रियाओं से सर्वथा अनभिज्ञ थे। इस सदी के प्रारंभ में हमने भी उनकी जानकारी पाकर बड़ा विस्मय प्रकट किया। (पृ. १७८-१९३)
पाण्डीचेरी के डॉ. हूलेट हमें विश्वास दिलाते हैं कि धन्वन्तरि को-जो कि हिपोक्रिटस से पूर्ववर्ती थे (Vaccination) का ज्ञान था।
डॉ. वाइज का कथन है-कि हिन्दुओं को शरीररचना शास्त्र और शरीरक्रियाविज्ञान का ज्ञान था। हिन्दू तत्ववेत्ताओं (दार्शनिकों) को इस बात का श्रेय है कि उन्होंने मृत शरीर की जीवित शरीर के लिये उपयोगिता स्वीकार की, हालांकि उन्हें इस विषय में कदम-कदम पर पूर्वग्राहियों का विरोध सहना पड़ा। हिन्दू ही वैद्यकशास्त्र की सबसे महत्वपूर्ण शाखा-शरीर रचना विज्ञान के सर्वप्रथम वैज्ञानिक ज्ञाता और प्रतिपादक थे। (पृ. १७९) आंख की तथा प्रसवसंबन्धी अन्य शल्यक्रियायें भारत में मुद्दत तक की जाती रही हैं और हमारे आधुनिक शल्यचिकित्सक हिन्दुओं से ही नाक की प्लास्टिक शल्यक्रिया जान सके हैं।
ह्विटनी कहता है—‘यद्यपि ओषधियों और उसके साथ विनियुक्त मन्त्रों के पाठ के रूप में आयुर्वेद का मूल वेदों में मिलता है तो भी वह (आयुर्वेद) बहुत कम महत्व की चीज है और उसका वाङ्मय (साहित्य) बहुत पीछे का है।
(Introduction to Whitney's Sanskrit Grammer P. XXII)
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३२१
प्राचीन मिश्र में चिकित्सा विज्ञान
प्राचीन ग्रीस देश के तथा अन्य विद्वानों के लेखों का अनुसन्धान करने पर ग्रीसवैद्यक का मूल स्त्रोत मुख्यरूप से मिश्र प्रतीत होता है। ग्रीस में वैज्ञानिक चिकित्सा के प्रारंभ होने से पूर्व ही मिश्र में वैज्ञानिक चिकित्सा की प्रतिष्ठा हुई थी। देशों की समीपता से भी यह बात सङ्गत प्रतीत होती है। इस प्रकार ग्रीस में मिश्र के भैषज्य विज्ञान रूपी बीजों के नये अङ्कुर प्रादुर्भूत हुए प्रतीत होते हैं। मिश्र का भैषज्य विज्ञान भी किसी दूसरे देश के विज्ञान से अनुप्राणित हुआ है अथवा अपने ही देश में स्वयमेव ही प्रादुर्भूत होकर प्रतिष्ठित हुआ है, इसका निश्चय करने के लिये बहुत से प्रमाणों की आवश्यकता है। अशोक के शिलालेख से उस समय (B. C. 273-233) भारत से मिश्र में भी भैषज्य संस्थाओं तथा चिकित्सकों के जाने का स्पष्ट उल्लेख मिलने से तथा भारत से विद्वानों तथा वैद्यों को आदरपूर्वक अपने देश में ले जाने वाले अलेक्जेण्डर की मृत्यु के बाद (B. C. 323) उदित हुए भैषज्य विज्ञान में अनेक स्थानों पर भारतीय छाया का सम्पर्क दिखाई देने से प्रतीत होता है कि उस समय तक मिश्र में भी भारतीय चिकित्सा विज्ञान का प्रभाव था। भाण्डारकर की अशोक¹ नामक पुस्तक के अनुसार एपीफेनिस (Epiphanius) ने वर्णन किया है कि अशोक के शिलालेख में भी निर्दिष्ट मिश्र के तुरमय (Ptolemy Philadelphos) नामक राजा ने अलेक्जेण्ड्रिया के प्रसिद्ध पुस्तकालय की स्थापना अथवा उसकी वृद्धि की थी तथा उस पुस्तकालय का अध्यक्ष बहुत से भारतीय ग्रन्थों के अनुवाद के लिये उत्सुक था। इरान तथा ग्रीस के ईस्वी पूर्व ४७९ में हुए युद्ध में प्लेटिया के रणक्षेत्र में ग्रीस के सैनिकों के साथ पूर्व निर्दिष्ट (पृ. ७८) भारतीय सेना के संघर्ष का अनुसन्धान² करने पर इतना तो स्पष्ट ही है कि इरान का भारत के साथ घनिष्ठ मैत्री संबन्ध था। अभियातव्य (जिस पर आक्रमण किया जाय) ग्रीस को भारत तथा अभ्यायात (आक्रमण करने वाले) भारतीयों को ग्रीस द्वारा अवश्य जानने के कारण यह कहा जा सकता है कि हिपोक्रिटस से पूर्व भी ग्रीस तथा भारत का परस्पर परिचय अवश्य था। उस युद्ध में भारतीयों के समान मिश्र देश वालों के भी सहभाव का वृत्तान्त मिलने से मिश्र तथा भारत के भी परस्पर परिचय की संभावना हो सकती है। महाभारत तथा कौटिल्य के अनुसार युद्ध करने की इच्छा से दूसरे देशों में जाने वाली भारतीय सेना के साथ भारतीय वैद्यों को भी साथ अवश्य होना चाहिये। उस समय न केवल ग्रीसदेश वालों द्वारा अपितु सहयोगी मिश्रदेश वालों द्वारा भी भारतीय वैद्यों के साथ परिचय का अनुमान किया जाता है। परन्तु उससे पूर्व मिश्र देश की चिकित्सा स्वयमेव उन्नत हुई थी अथवा दूसरे देशों के सहारे से इसका निर्णय करने की आवश्यकता है।
मिश्रगत प्राचीन भैषज्य विज्ञान के स्वरूप के विषय में अनुसन्धान करने पर प्राचीन भैषज्य विज्ञान के चिह्नस्वरूप ऐबिरस पेपिरस (Ebers-Papyrus) नाम से प्रसिद्ध त्वक्पत्र उपलब्ध हुए हैं। जिनमें से काहुन पेपिरस का समय प्रायः ईस्वी पूर्व १८५०, एडविन स्मिथ द्वारा उपलब्ध त्वक्पत्रों का समय प्रायः ईस्वी पूर्व १६०० तथा एबिरस पेपिरस का समय प्रायः ईस्वी पूर्व १००० वर्ष पूर्व माना जाता है। परन्तु इन समयों के विषय में विद्वानों में मतभेद होने से थोड़ा बहुत अन्तर भी हो सकता है विद्वान्³ लोगों का कहना है कि काहुन पेपिरस पत्र में विवेचन आदि के विषय, रोग, परिज्ञान, प्रतिकार, उपयोग में आने वाली ओषधियों तथा रोगचिकित्सा प्रक्रिया और एबिरस पेपिरस पत्र में सर्पदंश से लेकर क्षयपर्यन्त १७० अथवा अन्य मत से ७०० रोगों का निर्देश किया गया है। विल्डूराण्ट (Will Durant) नामक विद्वान् का यह भी कहना हैं कि 'उनमें कुछ रोग प्रतीकारव्यवस्था पत्र भी प्राप्त हुए हैं जिनमें किसी में पल्लीरुधिर (Lizard-छिपकली-गुहेरे आदि का रक्त) सूअर के कान, दान्त, मांस तथा मेदा, कछुए के मस्तिष्क, सोई हुई स्त्री का दूध, ब्रह्मचारिणी स्त्री का मूत्र तथा मनुष्य गदहा, कुत्ता, सिंह, मर्जार तथा यूका (जूं) के शुक्र आदियों का औषधरूप में निर्देश
१. १-३ की टि. सं. उपो. पृ. १४०-१४१ में देखें।
३२२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
किया गया है। कुछ रोगों में मान्त्रिक प्रक्रिया का भी निर्देश मिलता है। वे लोग प्रायः मन्त्रप्रयोगों में विश्वास करते थे। बारहवें वंश के राजा के भूमि से निकले हुए शव के साथ चषक (Vases-पात्र) छोटी कड़छियां (Spoons), शुष्क ओषधियां तथा मूल ओषधियां भी उपलब्ध हुई हैं। इस वर्णन से प्रतीत होता है कि मिश्र में प्राचीन काल में भी चिकित्सा की ओर रुचि थी। मिश्र में भैषज्य विद्या संबन्धी लेख त्वक्पत्र (पेपरी) रूप¹ से मन्दिरों में रखे हुए हैं। राजकुल में भी भैषज्यरूप में मन्त्रप्रयोग तथा उसकी प्रतिष्ठा थी। कुछ लोग कहते हैं कि एबिरस पेपिरस नामक पत्र में मनुष्यों तथा देवताओं के आरोग्य को करने वाले के रूप में 'रा'² नामक देवता का निर्देश मिलता है। उनका यह 'रा' देवता भारत के 'रवि' के समान प्रतीत होता है।
असीरिया तथा बेबिलोनिया में प्राचीन काल में भैषज्य विषयक ज्ञान
असीरिया तथा बेबिलोनिया में भी प्राचीन भैषज्यसम्बन्धी विषय का वर्णन पहले (पृ. ७६ में) किया जा चुका है। बेबिलोनिया के हेमूर्वन् (Hammurabi B. C. 1900 तथा अन्य मतानुसार B. C. 2500) नामक प्राचीन राजा के समय के तेरह लेखों के उपलब्ध होने का वृत्तान्त मिलता है। जिनमें व्रण आदियों की ठीक प्रकार से चिकित्सा करने वालों को पारितोषिक तथा शस्त्रचिकित्सा में विपरीत (Wrong) कार्य करने वालों को दण्ड इत्यादि देने का वर्णन मिलता है। मनु³ आदि ने भी मिथ्या उपचार करने वालों को दण्ड की व्यवस्था की है। हेमूर्वन् राजा के समय का पूर्ण वृत्तान्त न मिलने से केवल इतने से उस समय की परिस्थिति का सम्यक् ज्ञान नहीं होता है। उसके बाद असुरवनिपाल⁴ नामक राजा के समय भैषज्य विद्या में कुछ उन्नति प्रतीत होती है जिससे पूर्व प्रचलित मान्त्रिक उपचारों में कुछ शिथिलता दिखाई देती है। परन्तु उस समय भी मान्त्रिक प्रक्रिया द्वारा उपचार विद्यमान अवश्य था। कुछ विद्वानों का विचार है कि भैषज्य के विषय में मिश्र का प्राचीन⁵ स्त्रोत बेबिलोनिया प्रतीत होता है।
मिश्र, बेबिलोनिया, चीन, इरान आदि देशों में भारतीय शब्दों का सादृश्य
मिश्र, बेबिलोनिया, असीरिया, चाल्डिया तथा सुमेरिया आदि प्राचीन देशों की सभ्यता का अनुसन्धान करने पर उनमें भारतीय शब्द एवं विषयों की समान छाया वाले शब्द तथा विषयों के स्थान-स्थान पर मिलने से तथा इक्ष्वाकु आदि प्राचीन भारतीय राजाओं के नामों के सुमेरिया देश के राजाओं में मिलने से इनमें समान सभ्यता का प्राचीन संबन्ध प्रतीत होता है तथा कहीं-कहीं भैषज्य संबन्धी विषय तथा शब्दों की भी समानता मिलती है जिनका कि पहले भी (पृ. ७३-८२ में) निर्देश किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त निम्न शब्दों में भी सादृश्य⁶ मिलता है—
| भारत | मिश्र | भारत | बेबिलोनिया |
|---|---|---|---|
| सूर्य (हरि) | होरस | अहि | ई |
| ईश्वर | ओसिरीस | सत्यव्रत | हसिसद्र |
| ईश्वरी | ईसिस् | अहिहन् | ईहन् |
| शिव | सेव | दहन | दगनु |
| शक्ति | सेखेत | चन्द्र | सिन |
| प्रकृति | पख्त | वायु | विन |
| श्वेत | सेत | मरुत् | मतु, मतु |
| मातृ | मेतेर | दिनेश | दियानिसु |
१. १-६ तक की सं. उपो. पृ. १४१-१४२ में देखें।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
३२३
| सूर्यवंशी | सूरियस | मार्डिक | मर्डूक |
|---|---|---|---|
| क्षत्रिय | खेत | अप् | अप्सु |
| अत्रि | अत्तिस् | तमस् | त्यामत |
| मित्र | मिश्र | पुरोहित | पटेसिस |
| शरद् | सरदी | श्रेष्ठि | सेठ |
| रवि | रा | तैमात | तियामत् |
भारत¹ के समान मिश्र में लिङ्गपूजन तथा बैल का आदर और बेबिलोनिया में पृथ्वी की पूजा इत्यादि बहुत से समान सभ्यता के संबन्ध मिलते हैं।
ईरान के प्राचीन मूलग्रन्थ जेन्दावस्ता के चार भागों में एक भाग वेन्दिदाद नामक है, उसमें भैषज्यसम्बन्धी विषय दिये हुए हैं। उसमें सामा वंशोत्पन्न थ्रित नाम का वैद्य सर्वप्रथम था। उसने रोगनिवृत्ति के लिये अपने अहुरोमज्डा नामक देवता की प्रार्थना करके सोम (चन्द्रमा) के साथ-साथ वृद्धि को प्राप्त होने वाली दस हजार ओषधियों को प्राप्त किया। हओम (सोम) वनस्पतियों का राजा था। उस थ्रित नामक वैद्य द्वारा क्षथ्रवैर्य तथा सहरवर से रोग निवृत्ति के उपायों को जानकर तथा शस्त्रचिकित्साविज्ञान को प्राप्त करके ज्वर, कास, शिरोरोग, क्षय आदि रोगों को दूर करने के वृत्तान्त तथा ओषधियों के निर्माण के पण्डित, सुशील तथा रोगियों को प्रसन्न करने वाले वैद्यों से भवितव्यता इत्यादि की शिक्षा को ग्रहण करने के वृत्तान्त मिलते² हैं। जेन्दावस्ता तथा वैदिकसाहित्य की आलोचना करने पर ज्ञात होता है कि दोनों के देवताओं के विषय में शब्दों का सादृश्य केवल देवताओं के नामों के विषय में ही नहीं है अपितु उनमें आई हुई गाथाओं के अनुवाद से प्रतीत होता है कि उनमें संस्कृत शब्दों की भी बहुत सी समानताएं मिलती हैं। भारत के प्राचीन सम्प्रदाय की तरह यहां भी अग्नि की उपासना, होम, इष्टि, याग, आदि बहुत से विषय मिलते हैं जिनका पहले (पृ. ७८) वर्णन किया जा चुका है। हओम शब्द वाले सोम की प्रशंसा, उसका ओषधियों का राजा होना यथा यज्ञ में उपयोग आदि बहुत से विषय इसमें मिलते हैं। जेन्द तथा संस्कृत भाषा में निम्न समान शब्द³ मिलते हैं—
| संस्कृत | जेन्द | संस्कृत | जेन्द |
|---|---|---|---|
| सरस्वती | हरह्यति | असुर | अहुर |
| सप्तसिन्धु | हप्तहिन्दु | देव | दैव |
| सोम | हओम | विश्वेदेव | विश्योदैव |
| नासत्य | नाहत्य | नराशंस | नैयोंसंघ |
| अर्यमन् | एर्यमन् | वायु | वयु |
| विवस्वत् | विवङ्ध्वत् | वृत्रहा | वेरेथ्रघ्न |
| काव्यउशनस् | कवउस | दानव | दानव |
| अध्वर्यु | रथ्वी | इष्टि | इशित |
| आहुति | आजू इति | होता | जओता |
| बर्हिः | वरेश्मन् | आप्री | आफ्री |
| गाथा | गाथा | पशु | पशु |
| अथर्वन् | अथ्रवन् | अहि | अज़ि |
| यज्ञ | यस्न | अपांनपात् | अपनंपात् |
१. १-३ की टि. सं. उपो. पृ. १४२-१४३ में देखें।
३२४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
इत्यादि बहुत से शब्द समान रूप एवं समान छाया वाले मिलते हैं। इस विषय में (Gatha by J. M. Chatterjji & Yasna by L. Mills) में विशेष निरूपण किया गया है। वेदों के समान अवेस्ता में भी ३३ प्रधान देवताओं की गणना की गई है। उपर्युक्त वर्णनों से प्रतीत होता है कि प्राचीन इरान तथा भारत के सम्बन्ध मिश्र, असीरिया, बेबिलोनिया आदि देशों की अपेक्षा भी घनिष्ठ थे।
चीन देश में भी प्राचीन भैषज्य के विषय में पहले (पृ. ७७) निर्देश किया जा चुका है। उस देश के सब से प्राचीन भैषज्य ग्रन्थ का समय ईस्वी पूर्व २५९७ बतलाया¹ गया है। चीन देश में भारतीय बौद्ध धर्म के प्रभाव, बौद्ध धर्म का प्रचार करने वाले भारतीयों का वहां जाना, भारतीय ग्रन्थों का वहां प्राचीन काल से प्रचार, महाभारत तथा प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में चीन देश के चीनांशुक (रेशम-Silk) आदि का वर्णन, तन्त्रग्रन्थों में चीनी आचार (सभ्यता) का निर्देश, कौटिलीय अर्थशास्त्र में चीन देश से आई हुई वस्तुओं पर शुल्कव्यवस्था (Duty) का निर्देश इत्यादि बहुत से पारस्परिक व्यवहार के साधनों के मिलने से, वैदिक काल में चीन देश का किस नाम से व्यवहार होता था इसका ज्ञान न होने पर भी यह स्पष्ट है कि चीन नाम वाले देश का भारत से तथा भारत का चीन से परस्पर परिचय, यातायात तथा वाणिज्य संबन्ध प्राचीन काल से ही था। काश्यपसंहिता में भी चीन देश का उल्लेख मिलता है। चीन तथा भारत के रास्ते में काराशर नामक स्थान पर वर्तमान प्राचीन कूच भाषा में भी भारतीय औषध वाचक शब्दों की समानता के मिलने का पहले (पृ. ७८) वर्णन किया जा चुका है।
प्राचीन भारत का अन्य देशों के साथ संबन्ध
उपर्युक्त वर्णन के अनुसार असीरिया, बेबिलोनिया, मेसोपोटेमिया, मिश्र आदि प्राचीन उन्नत देशों और शाखा-प्रशाखारूप में वर्तमान पाश्चात्य जातियों में, यहां तक की अमेरिका गत रेड इण्डियन (Red Indians) और चीन आदि दूर देशों में भी आजतक मिलने वाली वस्तुओं में भारतीय ग्रन्थ, भूगर्भ से मिले हुए विषय, आचार-व्यवहार तथा आयुर्वेदीय भैषज्य विद्या की समानता दिखाई देती है। जिस प्रकार आथर्वण सम्प्रदाय में प्रायः भूतप्रक्रिया एवं मान्त्रिक प्रक्रिया से युक्त चिकित्सा मिलती है उसी प्रकार का चिकित्सा सम्प्रदाय प्रायः सभी प्राचीन देशों तथा जातियों में मिलता है। सब देशों में इस प्रकार की असाधारण समानताएं केवल काकतालीय² न्याय से ही नहीं हो सकती हैं। इस प्रकार प्राचीन भारत तथा अन्य प्राचीन देशों में बहुत से स्थानों पर मिलने वाली समानताएं परस्पर साक्षात् अथवा परम्परा से (Direct of Indirect) उनके परिचय, सम्पर्क तथा व्यवहार को सूचित करती है।
प्राचीन भारत का प्राचीन काल से ही अन्य देशों के साथ सम्बन्ध होने का अनेक विद्वानों³ ने उल्लेख किया है। मिश्र तथा उसके समीप के अन्य आनों में भी भारत के वाणिज्य संबन्ध के होने का तत्कालीन (A. D. 100) मिश्र के पेरिप्लस⁴ (Periplus) नामक विद्वान् ने भी उल्लेख किया है। सर विलियम जोन्स (Sir William Jones), मेजर
१. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १४३ में देखें।
२. कोई बात जब एकदम अचानक (Purely accidental occurance) हो जाय तब उपर्युक्त कहावत प्रयुक्त होती है। जैसे एक कौवा अचानक आ जाता है और उसी समय ताल का फल भी अचानक ही उसके सिर पर गिर पड़ता है। दोनों घटनाएं अपने आप में बिलकुल सहसा हुई हैं। (काकस्यागमनं यादृच्छिकं तालस्य पतनं च। तेन तालेन पतता काकस्य वधः कृतः। एवमेव देवदत्तस्य तत्रागमनं दस्यूनां चोपनिपातः। तैश्च तस्य वधः कृतः। तत्र यो देवदत्तस्य दस्यूनां च समागमः स काकतालसमागमसदृशः)—अनुवादक
३. ३-४ की टि. सं. उपो. पृ. १४४ में देखें।
उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३२५
विलफोर्ड (Major Wilford) लुइस् ज्याकोलिओट् (Louis Jacolliot) आदि¹ विद्वानों ने भी प्रतिपादन किया है कि मिश्र में सभ्यता, कला तथा स्मृति आदि का ज्ञान भारत से ही गया था।
‘पाश्चात्य विद्वान् आधे मन से स्वीकार करते हैं कि भारतीय भेषज्य विद्या का प्रभाव ग्रीस देश की चिकित्सा पर पड़ा है। मिश्र, पर्शिया तथा अरब द्वारा भारतीय चिकित्सा विज्ञान ग्रीस में पहुंचा है तथा इन देश वालों ने भी इसे भारत से प्राप्त किया है’ इसप्रकार अपना मत प्रकट करते हुए जे. जे.² मोदी ने वाइज् नामक विद्वान् का मत दिया है कि ‘सब देशों की चिकित्सा पद्धतियों का मूल एक ही है। पाथागोरस अथवा हिपोक्रिटस के पूर्वजों ने ग्रीसदेश में जिस चिकित्सा विज्ञान का सर्वप्रथम ग्रहण किया था वह मिश्र देश के विद्वानों की सहायता से ही प्राप्त किया था तथा मिश्र वालों ने भी इसे रहस्यपूर्ण पूर्व देश से प्राप्त किया था’। इस विषय में मोनियर विलियम्स³ (M. Monier Weillams) नामक विद्वान् का भी कहना है कि प्राचीन यूरोप के राष्ट्रों की उन्नति से पूर्व ही भारत ने ज्योतिष, गणित, विज्ञान तथा भेषज्य आदि विद्याओं में उन्नति कर ली थी। सभ्यता तथा ज्ञान के तत्त्व का प्रारम्भ पूर्वदेश में हुआ था तथा वहीं से ही वह पश्चिम दिशा में फैला था। इसके विपरीत वह पश्चिम से पूर्वदेशों में नहीं फैला है।
१. सर विलियम जोन्स ने रायल एशियाटिक सोसाइटी की रिपोर्ट में यह विश्वास व्यक्त किया है कि मिश्र बहुत प्राचीन काल में भारतीय आर्यों का उपनिवेश था। मेज़र विल्फोर्ड सरीखे लेखकों का मत था कि पुराणों का ‘मिश्रस्थान’ मिश्र से भिन्न नहीं था। दूसरी ओर इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिला है कि मिश्रवासियों ने भारत का प्रवास किया हो। इस प्रकार के प्रमाणों से कई यूरोपीय लेखकों ने जिनमें लुइस् जेकोलियट् प्रधान है—यह स्थापना की है कि मिश्र ने यूनान को सभ्यता का पाठ पढ़ाया और यूनानियों से रोम को सभ्यता का दान मिला। मिश्रने अपनी कला, संस्कृति और विज्ञान भारत से प्राप्त किया। मिश्र की चिकित्सा प्रणाली में ऐसा कोई तत्त्व नहीं है जो आयुर्वेद में न हो लेकिन इसके विपरीत आयुर्वेद में जो कुछ है उसका बहुत बड़ा अंश मिश्र की चिकित्सा प्रणाली में नहीं है।
(Short History of Aryan Medical Science P. 194-195)
२. ऐसा प्रतीत होता है कि यूनानी ओषधियों पर भारतीय ओषधियों के प्रभाव को आधे दिल से स्वीकार किया गया है तथा यह स्वीकार करते हुए वह मिश्र, इरान तथा अरब के माध्यम से यूनानी चिकित्सा पर भारत के अप्रत्यक्ष (Indirect) प्रभाव को भूल गया प्रतीत होता है। अब यह सिद्ध हो चुका है कि यूनानी चिकित्सा विज्ञान अपने ज्ञान के लिये बहुत अंश तक इन देशों की ऋणी हैं.......और इस प्रकार वह चिकित्सा संबन्धी ज्ञान के लिये भारत की ऋणी है। हिपोक्रिटस तथा पाथागोरस ने यूनानी चिकित्सा पर भारत के अप्रत्यक्ष प्रभाव का वर्णन किया है.......। डॉ. वाइज ने अपनी पुस्तक ‘Hindu System of Medicine’ में लिखा है कि इन सम्पूर्ण चिकित्सा पद्धतियों का कोई एक सामान्य स्त्रोत है......यूनानी तत्त्ववेत्ताओं (दार्शनिकों) को मिश्र के महात्माओं से सहायता प्राप्त हुई थी तथा इन मिश्र के महात्माओं ने अपना बहुत कुछ ज्ञान पूर्व के किसी रहस्यपूर्ण देश से प्राप्त किया था।
(Fourth Indian Oriental Conference Vol. II P. 426)
३. (a) यूरोप के बहुत से अतिप्राचीन राष्ट्रों द्वारा विविध विज्ञानों के परिचय और प्रयोग को जानने से पर्याप्त पहले ही हिन्दू लोगों ने ज्योतिष शास्त्र, बीजगणित, अंकगणित, वनस्पतिशास्त्र और चिकित्सा शास्त्र में विशेष उन्नति करली थी। व्याकरण में तो उनकी उच्चता का संकेत करने की आवश्यकता ही नहीं है।
(M. Monier Williams)
(संस्कृत इंगलिश डिक्शनरी पृ. सं. २१)
(b) सभ्यता और ज्ञान के तत्त्वों का उद्गम सदा प्राची से ही हुआ है। उनका प्रसार भी प्राची से प्रतीची की ओर हुआ है, न कि पश्चिम से पूर्व की ओर।
(संस्कृत इंगलिश डिक्शनरी पृ. सं. २३.)