भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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३१२काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

भारतीय आलोक के प्रसार में अशोक के शिलालेख का स्थान

न केवल प्राचीन काल में अपितु अशोक$^१$ के समय उसके तेरह शिलालेखों$^२$ के अनुसार अन्तियोक (योन) नामक ग्रीक राजा (Antiochos Theos B. C. 261-246 King of Syria), तुर्मयस (Ptolemaeos Philadelphos, King of Egypt 285-247 B. C.), अन्तिकोन (Antigonos Gonates of Macedonia 278-239 B. C.), मगस (Magas of Cyrene to the West of Egypt-मृत्यु-258 B. C.) तथा अलीकसुन्दर (अलेक्जेण्डर- Alexander of Epirus 272-258 B. C. तथा मतान्तर से Alexander of Corinth 252-244 B. C.) के देशों तथा यवन, कम्बोज, नील, चोल, पाण्ड्य, ता पर्णी, दरदविष, वज्रनाभक, नाभप्रान्त, भोज, पित्ति, निकि, आन्ध्र तथा पुलिन्द आदि आठ सौ योजन के अन्तर से फैले हुए देशों में भी अशोक की धर्मविजय तथा धर्म के चिह्न मिलते हैं। इस लेख से ज्ञात होता है कि भारत के भिन्न-भिन्न प्रदेशों के समान सीरिया, मिश्र, मैसीडोनिया, पश्चिमी मिश्र, एपिरस, यवन, कम्बोज आदि दूर के देशों में भी अशोक ने भारतीय धर्म की प्रतिष्ठा की थी। विमलप्रभा$^३$ की कालचक्र नामक व्याख्या में भी बुद्ध के निर्वाण के बाद उन-उन देशों की उन-उन भाषाओं में यानत्रय, पिटकत्रय आदि बौद्धग्रन्थों के अनुवाद होने से धर्मप्रचार का निर्देश मिलता है। उसमें भी पारसीक देश तथा नील नदी के उत्तर में रुक्म देश का उल्लेख मिलता है। अशोक ने केवल धर्मविजय ही नहीं किया था अपितु उसके शाहावाज गडी नामक स्थान में मिले हुए—

'सर्वत्र विजिते देवानां प्रियस्य ..... मनुष्याणाम्' मूल उपोद्धात पृ. १३२ देखें।

इस द्वितीय$^४$ शिलालेख में अशोक द्वारा भारत के भिन्न-भिन्न प्रदेशों के समान भारत से बाहर अन्तियोक नामक ग्रीस राजा के तथा उसके आसपास के अन्य राजाओं के देशों में भी पशुओं तथा मनुष्यों के लिये पृथक्-पृथक् दो प्रकार के चिकित्सालय प्रारम्भ किये थे तथा उनमें पशुओं तथा मनुष्यों के उपयोगी ओषधियों की भी व्यवस्था की थी। आवश्यकतानुसार ओषधि, फल तथा मूलों के वृक्ष भी सब स्थानों पर लगाये जाने के उल्लेख से प्रतीत होता है कि उस समय तक भारत के समान भारत से बाहर अन्तियोक आदि के देशों में भी भारतीय चिकित्सापद्धति तथा ओषधियों की अपेक्षा (आवश्यकता) प्रवृत्ति तथा प्रचार था। तेरहवें धर्मविजय शिलालेख में अन्तियोक के साथ तुर्मया, अन्तिकोन, मग तथा अलीकसुन्दर आदि चारों राजाओं का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। वहां इन राजाओं के देशों के आठ सौ योजन तक फैले हुए होने का निर्देश है। दूसरे शिलालेख में अन्तियोक$^५$ नामक यवनाधिपति का तो नामपूर्वक ग्रहण किया गया है। अन्य राजाओं का 'ये चान्ये तस्यान्तियोकस्य सामन्ता राजानः' के द्वारा उनके समीपवर्ती होने से सामान्यरूप से उल्लेख होने पर भी अन्तियोक के साहचर्य से, भौगोलिक दृष्टि से सीरिया प्रदेश के चारों ओर स्थित होने से तथा सामन्त शब्द के औचित्य के कारण सम्भवतः ये वे ही तुर्मय, अन्तिकोन, मग तथा अलीकसुन्दर आदि राजा हैं जिनका तेरहवें$^६$ शिलालेख में अन्तियोक के साथ निर्देश किया गया है। ग्रीसाधिपति अलेक्जेण्डर के अशोक से प्राचीन होने के कारण अशोक के समकालीन अन्य राजाओं के साथ होना सम्भव न होने पर भी भारत में आने के कारण परिचित हुए अलेक्जेण्डर के पूर्वकालिक सम्बन्ध को लक्ष्य करके अलीकसुन्दर शब्द से प्रसिद्ध ग्रीसाधिपति अलेक्जेण्डर का ग्रहण करके ग्रीसदेश में भी भारतीय प्रभाव समझा जा सकता है। परन्तु ऐतिहासिक विद्वान् समय की विभिन्नता के कारण तथा अन्य राजाओं के अशोक के समकालीन होने से यहां अलीकसुन्दर शब्द से ग्रीसाधिपति अलेक्जेण्डर का ग्रहण न करके अशोक के समकालीन एपिरस प्रदेश के तथा कुछ विद्वानों के मत से कोरिन्थ प्रदेश के, अलेक्जेण्डर का ग्रहण करते


१. १-४ तक की टि. सं. उपो. पृ. १३२ में देखें।
५. इन दूसरे तथा तेरहवें शिलालेखों में सीरियाधिपति अन्तियोक का ही यवनराज के रूप में निर्देश है, अलीकसुन्दर का नहीं। इससे ज्ञात होता है कि प्राचीनकाल में सीरिया देश की जाति के लिये ही यवन शब्द का व्यवहार होता था। परन्तु आजकल तो यवन शब्द से ग्रीस वालों का ही ग्रहण होता है। यह विचारणीय प्रश्न है।
६. की टि. सं. उपो. पृ. १३२ में देखें।