भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 325, कुल 942 में से

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३११

सब दार्शनिक विद्वानों की अपेक्षा अधिक सम्मान करता था। पीछे देह त्याग की इच्छा से चिता पर आरूढ़ होने पर ग्रीसाधिपति ने उसका अत्यन्त गौरव के साथ अन्तिम सम्मान किया था। राप्सन$^१$ (Rapson) नामक विद्वान् ने लिखा है कि इस भारतीय विद्वान् का वर्णन एरियन तथा स्ट्राबो नामक विद्वानों ने भी किया है। मैक्समूलर के कथनानुसार वह कल्याण$^२$ नामक विद्वान् ग्रीस तक भी गया था। यह एक उदाहरण ही भारत के तात्कालिक गौरव को सूचित करता है।

अलेक्जेण्डर द्वारा अपनी सेना में ग्रीक वैद्यों के होते हुए भी उनको सर्पविषचिकित्सा का ज्ञान न होने से सर्पविष की चिकित्सा के लिये भारतीय वैद्यों के रखने, अन्य रोगों की चिकित्सा$^३$ में भी प्रवीण होने से अलेक्जेण्डर द्वारा अपने शिविर में भारतीय वैद्यों को रखने, स्वदेश को लौटते हुए ग्रीसाधिपति द्वारा भारतीय वैद्यों को आदर संहित अपने साथ$^४$ ले जाने के तथा अपने देश की लौटते हुए मार्ग में भी भारतीय चिकित्सक द्वारा सर्पदष्ट की चिकित्सा के उल्लेख मिलने से भारतीय आयुर्वेद का प्रभाव पीछे भी ग्रीसदेश में दिखाई देता है।


१. १-२ की सं. उपो. पृ. १३०-१३१ में देखें। ३. यह (भारतीय चिकित्सा) विज्ञान यूनानियों के भारत में आगमन पर्यन्त (३२७ ई. पू. तक) निरन्तर बढ़ता रहा। यूनानी इतिहास लेखक एरियन ने सिकन्दर के आक्रमण के समय भारत की अवस्था का वर्णन करते हुए एक विचित्र तथ्य का उल्लेख किया है जिससे तात्कालीन हिन्दू चिकित्सकों के गौरव का परिचय मिलता है। वह कहता है कि सिकन्दर की सेना के साथ यद्यपि अनेक कुशल यूनानी चिकित्सक विद्यमान थे परन्तु उन्होंने सर्पदंश (जो कि पंजाब में प्रायः होते हैं) के प्रति अपनी असमर्थता प्रकट कर दी थी। इसलिये सिकन्दर को इस विषय में भारतीय वैद्यों को बुलाना पड़ता था जो कि सर्पदंश की सफलतापूर्वक चिकित्सा करते थे। मैसीडोनिया का राजा इनके हस्तकौशल से इतना प्रभावित हो गया था कि निर्याकस के अनुसार उसने अपने शिविर में बहुत से अच्छे भारतीय वैद्यों को नियुक्त कर रखा था तथा अपने साथियों को उसने सर्पदंश अथवा अन्य भी दारुण रोगों में इन भारतीय वैद्यों से सलाह लेने को कह रखा था। एक ओर जब कि यूरोपीय विषविज्ञान के पण्डित आजतक भी सर्पविष के लिये किसी विशिष्ट (Specific) ओषधि की तलाश में लगे हुए हैं, भारतीय चिकित्सकों को लगभग २२०० वर्ष पूर्व इस कुशलता का गौरव प्राप्त था। इसीलिये संभवतः अलेक्जेण्डर जिसे भारत में सिकन्दर कहा जाता है—यहां से लौटते हुए अपने साथ कुछ भारतीय चिकित्सा शास्त्र के अध्यापकों को अपने देश ले गया था। यूनानी चिकित्सा शास्त्र के प्रारंभिक इतिहास से भी इस अनुमान अथवा कल्पना की कुछ पुष्टि होती है। (Short History of Aryan Medical Science. P. 189-190. by H. H. Bhagvatsinhajee.) ४. 'E. J. Rapson रचित Cambridge History of India' नामक ग्रन्थ के प्रथम भाग पृ. ४०६ पर निर्याकस के नाम से उद्धरण दिया है कि—'भारत में चिकित्सकों के लिये सर्पदष्ट रोगियों की चिकित्सा के अतिरिक्त और कोई कार्य नहीं था, क्योंकि जैसा कि यूनानी लोग समझते थे, भारतीयों को रोग बहुत कम होते थे'। तथा इसके विपरीत 'Arrian's Indica' नामक ग्रन्थ में निर्याकस का निम्न उद्धरण दिया है—सिकन्दर के पास चिकित्सा कार्य में अत्यन्त निपुण बहुत से भारतीय व्यक्ति थे। उसने अपने सारे शिबिर में यह घोषणा कर रखी थी कि यदि किसी व्यक्ति को सांप काटले तो उसकी शाही शिबिर में चिकित्सा कराई जाय। परन्तु ये ही व्यक्ति अन्य रोगों एवं कष्टों को भी दूर करने में समर्थ थे—पृ. २२३। इस लेख के अनुसार वे केवल आजकल के सपेरों के सदृश ही नहीं थे अपितु आयुर्वेद के आठ प्रस्थानों में आये हुए विषतन्त्र के समान वे अन्य चिकित्सा विज्ञान के भी ज्ञाता थे। इसीप्रकार के भारतीय वैद्यों को सिकन्दर ने अपने पास रखा था तथा उन्हें अपने देश में ले गया प्रतीत होता है। इसप्रकार 'Cambridge History of India' में निर्याकस का 'But these very same men were able to cure other diseases and pains also' यह वाक्य न मिलना तथा उन्हें केवल सपेरों के समान ही बताना—आश्चर्यजनक है।


२१ का.सं.

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