काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 327, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३१३
हैं। ‘राजान:’ इस पद के कारण यह अशोक सामयिक अलेक्जेण्डर ही प्रतीत होता है। यह सब होते हुए भी आठ सौ योजन तक के देशों में धार्मिक प्रभाव के होने से, सीरिया के आसपास के देशों में भारतीय चिकित्सापद्धति का भी विशेष प्रभाव होने से, इन दोनों शिलालेखों में ग्रीस के प्राचीन स्त्रोत के रूप में उल्लिखित मिश्र में भी भारतीय प्रभाव एवं आलोक के मिलने से, ग्रीस के मिश्र तथा सीरिया के समीप ही होने से, एपिरस तथा कोरिन्य प्रदेशों के भी ग्रीस में सम्मिलित होने से, ग्रीस द्वारा भारत तथा उसकी विद्या के परिचय की प्राप्ति के उल्लेख से, ग्रीस की आध्यात्मिक विद्या में भारतीय दर्शनों का प्रभाव मिलने से, हिपोक्रिटस के नाम से उत्तरोत्तर ग्रन्थों के संकलन से तथा उसके ग्रन्थों में आयुर्वेदीय विषयों की समानता मिलने से दार्शनिक तथा धार्मिक विषयों के समान चिकित्सा विज्ञान में भी अशोक के समय ग्रीस में भारतीय प्रभाव का परिचय मिलता है। इससे उस समय भी पाश्चात्त्य देशों में भारतीय आयुर्वेद विद्या, भारतीय चिकित्सापद्धति, भारतीय ओषधियों, भारतीय वैद्यों तथा भारतीय वैद्यक ग्रन्थों का कितना आलोक तथा गौरव था, इसका पर्याप्त ज्ञान हो जाता है।
ग्रीस तथा भारत का प्राचीन काल से सम्बन्ध
आजतक विशेष प्रमाणों के न मिलने पर भी प्राचीन काल में ग्रीस तथा भारत के पारस्परिक यातायात तथा वाणिज्य के सम्बन्ध को देखकर यह कहा जा सकता है कि भारतीय वैद्यक ग्रीस में पहुंची हुई थी। $^१$बक (Buck) नाम विद्वान् का कहना है कि अलेक्जेण्डर के काल से बहुत समय तक ग्रीस तथा भारत के घनिष्ठ संबन्ध के मिलने से तथा हिपोक्रिटस, डिओसकोराइडास (Dioscorides) तथा ग्यालन आदि के लेखों के अनुसन्धान से प्रतीत होता है कि भारतीय वैद्यों द्वारा व्यवहृत की जाने वाली बहुत सी ओषधियों तथा चिकित्सापद्धतियों का अभ्यास करने वाले ग्रीक वैद्यों ने ग्रहण किया हुआ था।
‘भारतीय तथा ग्रीसदेशीय प्राचीन वैद्यक विज्ञान में बहुत सी समानताएं मिलती हैं। ग्रीस के चिकित्साविज्ञान पर भारतीय प्रभाव को कुछ लोग जो नहीं मानते हैं तथा कुछ लोग संदिग्ध मानते हैं उसे देखकर हमें आश्चर्य होता है। हस्तलिखित प्राचीन पुस्तकों के मिलने से पूर्व प्रसिद्ध प्राचीन भारतीय ग्रन्थों का कालनिर्णय अत्यन्त कठिन था। परन्तु भारतीय विज्ञान की बहुत सी शाखाओं में स्वतन्त्ररूप से विचार तथा उनमें अन्यदेशीय विज्ञान के आलोक का अनादर मिलता है। भारतीय भैषज्य विषयों के अन्वेषण में आजकल बहुत से लोग भारतीय विषयों का भारतीय होना ही मानते$^२$
१. बक ने अपने ग्रन्थ ‘The Growth of Medicine from the Earliest Time to 1800’ में आधुनिक चिकित्साशास्त्र के उद्गम यूनानी चिकित्साशास्त्र पर भारतीय वैद्यक के प्रभाव को बहुत कम स्वीकार किया था। लेकिन इतिहास का अधिक परिशीलन करने के बाद उसे अपने विचारों में परिवर्तन कर यह कहना पड़ा कि ‘यह समझना अनुचित नहीं है कि दोनों देशों के व्यापारिक सम्बन्ध के द्वारा भारतीय वैद्यों के अनेक चिकित्सा कार्य प्राचीन यूनानियों को भी ज्ञात हुए होंगे। यद्यपि अबतक इस संबन्ध में कोई पुष्ट प्रमाण तो नहीं मिलता है। दूसरी ओर इतिहास के कुछ अधिक अर्वाचीन युग में अर्थात् सिकन्दर के भारत पर आक्रमण के बाद दोनों देशों में घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित हुआ जो कि कई सदियों तक अटूट रहा। इस युग के प्रारम्भिक हिस्से में यूनानी चिकित्सकों ने भारतीय वैद्यों द्वारा बरती जाने वाली अनेक ओषधियां और चिकित्सा की प्रक्रियाएं अपनाली थीं—ऐसा हिपोक्रिटस, डायस्कोरिडस और गेलन के लेखों से ज्ञात होता है।
(Fourth Oriental Conference Vol. II Pp. 425-426)
२. न्यूबर्गर कहते हैं—इस युग की भारतीय और यूनानी चिकित्सा शास्त्रों की रूपरेखा और अनेक विवरणों में इतना अधिक साम्य है कि यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि कितनी ही बार भारतीय चिकित्साशास्त्र की मौलिकता सन्देह की दृष्टि से देखी गई और कई बार तो अस्वीकार कर दी गई। इसका विशेष कारण यह है कि महत्वपूर्ण भारतीय ग्रन्थों में से अधिकांश का कालनिर्णय बहुत मुश्किल से हो पाया था और अभी हाल में अनेक पाण्डुलिपियों के प्रकाश में आने से पहले तक वह भी सर्वथा संदिग्ध था। आधुनिक खोजों के पीछे विज्ञान और कलाओं के क्षेत्र में भारतीयों की प्रमुख सफलताओं के विषय में विद्वानों का झुकाव उनकी मौलिकता को स्वीकार करने की ओर है।
(Neuberger. History of Medicine Vol. I P. 45)