काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३१४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
हैं तथा भारतीय प्राचीन भैषज्य विद्या की आलोचना करते हुए तथा उसके गूढ़विचार, सूक्ष्मबुद्धि का विकास तथा लेख-सौष्ठव आदि के अनुसन्धान में उसका स्थान अत्यन्त ऊंचा होने का परिचय मिलता है' ऐसा¹ न्यूबर्गर (Neuberger) नामक विद्वान् का कहना है।
हेरोडोटस तथा फीलोष्ट्रेटस आदि प्राचीन पाश्चात्त्य विद्वानों का भी कहना है कि भारत का प्राचीन काल से ही पाश्चात्त्य देशों के साथ परिचय, सम्पर्क तथा व्यवहार था। प्रथम शताब्दी में होने वाले प्लेनी² नामक ग्रीक विद्वान् के लेख से भी भारतीयों द्वारा वानस्पतिक एवं योगौषधियों (Prepared Medicines) को विक्रय के लिये ग्रीसदेश में ले जाने का उल्लेख मिलता है। ग्रीस तथा भारत के प्राचीन काल में पारस्परिक संबन्ध को तथा पक्षाघात, अम्लपित्त आदि रोगों में भारतीयों द्वारा किये जाने वाले धतूरे के प्रयोग का यूरोपवालों द्वारा भी ग्रहण किये जाने का उल्लेख करता हुआ रॉयल्³ (Royle) नामक विद्वान् पाश्चात्त्य देशों में भी भारतीय प्रभाव का वर्णन करता है। हैमिल्टन⁴ नामक विद्वान् का भी मत है कि प्राचीन ग्रीक वैद्यक में भारतीय आयुर्वेद को कुछ अंशों में प्रभाव था तथा भारतीय और ग्रीक चिकित्सा प्रणाली में समानता दिखाई देती है। इस विषय में बनर्जी⁵ की भी यही सम्मति है। श्रीयुत रमेशचन्द्रदत्त ने भी अपनी पुस्तक⁶
१. न्यूबर्गर का कथन है कि 'भारतीयों का वैद्यकशास्त्र भले ही वह भारतीयों की अन्य विशिष्ट सफलताओं की समता न कर सकता हो तो भी लगभग उतना ही महत्वपूर्ण है। और अपनी ज्ञानसमृद्धि, गम्भीरचिन्तन एवं क्रमबद्ध विवेचन के कारण पौरस्त्य चिकित्सा शास्त्रों में उसका विशिष्ट स्थान है।
(Neuberger. History of Medicine Translated by Playfair Vol. I P. 437.)
२. डायस्कोरिडस के समकालीन रोमन लेखन प्लिनि ने अनेक भारतीय जड़ी बूटियों और ओषधियों का उल्लेख किया है।
(Hindu Achievements in exact sciences B. K. Sarkar P. 50-51.) और देखिये—
(Intercourse between India and the Western World P. 102 by H. G. Rawlinsno)
३. दमें में धतूरे के पत्तों का धूम्रपान करना यूरोप में आधुनिक बात है लेकिन भारत में यह बहुत पुराने समय से प्रचलित है (Royle) देखिये—
(Hindu achievements in exact sciences by B. K. Sarkar. P. 49 Antiquity of Hindu Medicine)
४. जब हम यह भी देखते हैं कि पाथागोरस ने ब्राह्मण-पद्धति को प्रचलित किया ..... (तब हमें मानना पड़ता है कि) प्राचीन यूनानी वैद्यक पर भारतीय वैद्यक का कुछ प्रभाव अवश्य था। भारतीय और यूनानी वैद्यक की समानताएं इतनी अधिक है कि काकतालीय न्याय से उनकी व्याख्या नहीं की जा सकती।
(W. Hamilton. History of Medicine Vol. I P. 43) Hellenism in Ancient India P. 196 by G. N. Banerjee)
५. ऐसा नहीं जान पड़ता कि हिन्दुओं ने अपना वैद्यक का ज्ञान अपनी किसी पड़ौसी जाति से लिया हो। यूनानी ही ऐसे थे जिनसे वे यह ज्ञान ले सकते थे लेकिन दोनों देशों की दूरी बहुत अधिक थी तथा उनके परस्पर संबन्ध भी सतत नहीं बने रहते थे साथ ही विदेश यात्रा और विदेशी सम्पर्क के प्रति हिन्दुओं की बड़ी अरुचि थी। इन सब बातों पर विचार करने से यह धारणा कि हिन्दुओं ने यूनानियों से वैद्यक ज्ञान प्राप्त किया, बहुत ही अपुष्ट आधार पर स्थापित जान पड़ती है।
(Hellenism in Ancient India P. 191 G. Banerjee)
६. यूरोप में भारतीय वैद्यक की प्राचीनता अभी तक समझी और मानी नहीं गई है। और समग्र आर्यसंस्कृति का उद्गम यूनानी संस्कृति को समझने की प्रवृत्ति निष्पक्ष विवेचन में बहुत बड़ी बाधा है। जैसा कि डॉ. वाइज ने ठीक ही कहा है—वैद्यक के इतिहास संबन्धी तथ्यों का अन्वेषण अभी तक केवल यूनानी और रोमन लेखकों के ग्रन्थों में ही किया गया है, और यूनानी संस्कृति से भिन्न उद्गम से निकलने वाली प्रत्येक बात को अमान्य करने की परिपाटी के अनुकूल उन्हें आयोजित कर दिया गया है। बचपन से ही हम प्राचीन साहित्य से परिचित हैं और प्राचीन लेखकों की प्रतिभा की प्रभा से दीप्त उन घटनाओं को, जो हमारे चित्त पर अंकित हैं, स्मरण करना हमें बहुत पसन्द है। इस प्रभाव को मिटाने के लिये विषय का गम्भीर परिशीलन, नवीन प्रमाणों की जांच तथा निष्पक्षता की आवश्यकता है। ज्ञान पिपासा और सत्यप्रेम हमें नवीन ऐतिहासिक प्रमाणों का परिशीलन करने को प्रेरित करते हैं।