भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 329, कुल 942 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 329

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

३१५

में ऐसा ही लिखा है। पीछे भी मंक नामक किसी भारतीय वैद्य द्वारा अरब के राजा (खलीफा) हारुन अल रशीद के (A. D. 700) राजकुल में जाकर उसके रोग को दूर करने तथा चरक के विपतन्त्र का पर्शियन भाषा में अनुवाद करने का उल्लेख मिलता है। शल्य (Saleb) नामक भी कोई भारतीय वैद्य खलीफा हारुन अल रशीद के राजकुल में था। उसने फिलस्तीन तथा वहां से मिश्र जाकर वहीं प्राणत्याग किया—ऐसा अरब के इब्न असेव नामक विद्वान् ने निर्देश¹ किया है। इस प्रकार इससे पूर्व भी बहुत से भारतीय वैद्य एवं विद्वानों के दूर-दूर जाने की संभावना हो सकती है।

उपर्युक्त वर्णनों के अनुसार पाथागोरस आदि के समय से समय-समय पर अनेक ग्रीक विद्वानों के विद्याप्राप्ति के लिये भारत में आने, भारत तथा उसके आसपास के प्रदेशों से विद्या के ग्रहण करने, प्राचीन काल में कुछ भारतीय विद्वानों के भी ग्रीस में जाने, भारतीय विद्वानों के वहां आदर, भारत से लौटते हुए ग्रीसाधिपति अलेक्जेण्डर द्वारा अत्यन्त अनुसन्धान करके भारतीय वैद्यों को अपने देश में ले जाने, अशोक के शिलालेखों के अनुसार उसके समय भी पाश्चात्त्य देशों में भारतीय चिकित्सा विज्ञान के प्रचार के वृत्तान्त मिलने, हिपोक्रिटस के नाम से प्रसिद्ध सब ग्रन्थों के प्राचीन न होकर विद्वानों के मतानुसार पीछे से विकसित विज्ञानयुक्त लेखों के उनमें मिलने से तथा भारतीय वैद्यक में ग्रीक वैद्यक के असाधारण विषयों के न मिलने से, अपितु ग्रीक वैद्यक ने भारतीय वैद्यक की छाया अनेक स्थानों पर मिलने से प्रतीत होता है कि प्राचीन काल से ही परस्पर परिचित एवं यातायात करने वाले पाथागोरस आदियों अथवा भारतीयों द्वारा ग्रीक वैद्यक को बढ़ाने के लिये न्यूनाधिकरूप में समय-समय पर भारतीय वैद्यक विज्ञान वहां पहुँचाया गया हो। हिपोक्रिटस अथवा उससे भी प्राचीन वैज्ञानिकरूप में विकसित हुई ग्रीक चिकित्सा पर न्यूनाधिकरूप में मिश्र, बेविलोनिया आदि अन्य प्राचीन देशों के विज्ञान का भी प्रभाव पड़ा है किन्तु ग्रीक चिकित्सा विज्ञान अन्य देशों की तरह साक्षात् अथवा परम्परा से भारत का भी अवश्य ऋणी है। तथा यह भी निश्चित है कि पीछे से उदित हुई ग्रीक वैज्ञानिक चिकित्सा का पूर्व प्रतिष्ठित भारतीय आयुर्वेद विज्ञान पर नाम मात्र भी प्रभाव नहीं है।

हिपोक्रिटस नामक प्रकाण्ड पण्डित ने अन्य देशों एवं प्रक्रियाओं के चिकित्सा संबन्धी विषयों का निरीक्षण करने तथा अपने विचारों एवं अनुभवों के आधार पर उनमें से उपयोगी विषयों को छांटकर चिकित्सा के विषय में अत्युत्तम निबन्ध तैयार किये थे। इसलिये उसे पाश्चात्त्य चिकित्सा का पिता (Father of Medicine) कहा जाता है। हिपोक्रिटस


समग्र प्राचीन संस्कृति और विशेष कर वैद्यक शास्त्र का आदि निर्माता होने का दावा यूनानी मनीषियों ने स्वयं कभी नहीं किया है जो कि परवर्ती विद्वान् उनकी ओर से कर रहे हैं।
नियर्सकस (उर्फ एरियन) ने लिखा है कि सर्पदंश की कोई चिकित्सा यूनानी चिकित्सक नहीं जानते, लेकिन भारतीय वैद्य बड़ी खूबी के साथ कर लेते हैं। एरियन ने ही कहा है कि—‘अस्वस्थ होने पर यूनानी लोग ब्राह्मणों से चिकित्सा कराते हैं और वे भारतीय प्रत्येक साध्य रोग की अद्भुत और दैवीय विधि से चिकित्सा कर देते हैं।
डायसोराइडस (ईसा की पहली सदी) प्राचीन द्रव्यगुण विज्ञान का सबसे प्रमुख लेखक था। डॉ. रायल ने अत्यधिक खोजपूर्ण निबन्ध में दिखाया है कि डायसोराइडस पुराने भारतीय द्रव्यगुण विज्ञान का कितना ऋणी था। ई. पू. तीसरी सदी के थियोफ्रेस्टस पर भी यही बात लागू होती है। ई. पू. ५ वीं सदी के यूनानी चिकित्सक क्लासियस के लेखों में भी भारतीय द्रव्यों का विवरण मिला है। यह प्रमाण शृङ्खला वहां पूर्ण होती है जब यह सिद्ध कर दिया जाता है कि ‘चिकित्साशास्त्र के पिता’ कहे जाने वाले हिपोक्रिटस ने अपना द्रव्यगुण विज्ञान हिन्दुओं से प्राप्त ज्ञान के आधार पर बनाया। हम इस विषय में डॉ. रॉयल का अद्भुत निबन्ध पढ़ने की सम्मति पाठकों को देते हैं। रॉयल कहते हैं—‘विश्व की पहली चिकित्सा प्रणाली के लिये हम हिन्दुओं के ऋणी हैं’।

\hfill (Civilisation in India Vol II P. 249.)
\hfill (हिन्दू सभ्यता का इतिहास)


१. इसकी टि. उपो. संस्कृत पृ. १३५ में देखें।