काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३१६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
के ग्रन्थों में जो विषय दिये हुए हैं वे संभवतः उसी के परिष्कृत विचारों से उत्पन्न हुए तथा उसी के मस्तिष्क की उपज हों किन्तु उनमें भारतीय आयुर्वेद के विषयों से समानता रखने वाले जो शब्द, विषय तथा विचार मिलते हैं वे साक्षात् अथवा परम्परा से भारतीय प्राचीन वैद्यक के ही प्रतिफल होने चाहिये। यदि प्राचीन भारतीय आचार्यों द्वारा अन्यदेशीय प्राचीन भैषज्य सम्प्रदायों का अनुसरण किया गया होता तो उन प्राचीन आचार्यों के ग्रन्थ भी अन्यदेशीय सम्प्रदायों के अनुरूप ही होने चाहिये थे। किन्तु ऐसा नहीं है। अपितु पूर्वोक्त वर्णनों के अनुसार (पृ. ६४-६५) एक ही मूषा में रखी हुई अनेक प्रतिमाओं के समान एक ही प्रकार के ये विभिन्न निबन्ध किसी एक ही प्राचीन आयुर्वेदिक आर्षस्रोत से निकले हुए प्रतीत होते हैं। इसलिये हिपोक्रिटस द्वारा प्रवर्तित अथवा उससे प्राचीन ग्रीक वैद्यक का प्रभाव, वैदिक काल से चले आने वाले तथा ऐतिहासिक और भूगर्भ की दृष्टि से भी उससे प्राचीन काल से प्रसिद्ध भारतीय आयुर्वेद विज्ञान पर पड़ा हो—यह कहना कठिन है।
यद्यपि पांच हजार वर्ष पूर्व ज्योतिष विद्या के प्रवर्तक भी भारतीय ही थे, ऐसा पाश्चात्त्य¹ विद्वान् भी कहते हैं। परन्तु ग्रीस देश में ज्योतिषविद्या की उन्नति के विषय में, द्वितीय शताब्दी में होने वाले किसी यवन (ग्रीक) विद्वान् का जातक ग्रन्थ, विचारों की विशिष्टता के कारण प्रसारित हुआ भारतीयों द्वारा भी आदर की दृष्टि से संस्कृत में अनूदित किया जाकर यवनजातक नाम से भारत में यावनज्योतिष विद्या का दिग्दर्शन कराता है। वराहमिहिर आदि बाद के ज्योतिषाचार्य भी यवनाचार्य का निर्देश करते हैं। इस प्रकार रोम का सिद्धान्त भी भारत में प्रसिद्ध हो गया। प्राचीन वैद्यक के विषय में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता है जिससे उसे यवनों द्वारा प्राप्त कहा जा सके। यदि वैद्यक के विषय में भी ऐसा कोई प्राचीन यवनों का सम्पर्क अथवा सहयोग होता तो भारतीय शरीरशास्त्र, शल्यप्रक्रिया, कायचिकित्सा, ओषधियों अथवा अन्य भी किसी वैद्यक प्रक्रिया के विषय में यवन प्रभाव का निर्देश प्राचीन भारतीय आयुर्वेद के ग्रन्थों में अवश्य मिलना चाहिये था।
आत्रेय कश्यप आदि प्राचीन आचार्य 'बाहीकभिषक्' 'वाहीकभिषजो वा' 'बाहीकास्त्वपरे' इत्यादि शब्दों द्वारा कांकायन का नामग्रहणपूर्वक तथा अन्य भी वाहीक देश के वैद्यों का सम्मानपूर्वक आचार्यरूप से निर्देश करते हैं। आत्रेय तथा कश्यप आदियों द्वारा भी उल्लिखित यह बाहीक देश ग्रीकों के आक्रमण से पूर्व बलख नाम से प्रसिद्ध इरानदेश था। उस समय उस देश में वैद्यक विद्या की उन्नति भी तथा वह भी आत्रेय आदि आचार्यों के साथ विमर्श करने वालों की श्रेणी में काङ्कायन का निर्देश होने से भारतीय वैद्यक प्रक्रिया से मिलती जुलती ही थी, उनमें साधारण विचार मात्र का ही अन्तर था। यदि सुश्रुत के व्याख्याकार के लेख को मूल (Original) रूप में माना जाय तो उसमें काङ्कायन का सुश्रुत के सतीर्थ्य (सहपाठी) के रूप में उल्लेख होने से 'बाहीकभिषजां वरः' द्वारा निर्दिष्ट काङ्कायन में भी वैद्यक विज्ञान का स्रोत भारतीय ही प्रतीत होता है।
यदि भारतीय वैद्यक ग्रीक आचार्यों द्वारा प्रभावित होता तो पक्षपात शून्य होकर अत्यन्त सम्मान के साथ विदेशी विद्वानों को भी आचार्यों की श्रेणी में रखने वाले गुणग्राही तथा कृतज्ञ कश्यप आत्रेय आदि भारतीय आचार्य इसका अवश्य उल्लेख करते।
१. ज्योतिषशास्त्र के प्रवर्तक हिन्दू लोग थे। आधुनिक सभी ज्योतिषशास्त्री उनके समीक्षण की अतिप्राचीनता को स्वीकार करते हैं। कासिनी, बेली और प्लेफेयर आदि विद्वान् हमें बताते हैं कि हिन्दू ज्योतिषशास्त्रियों के ईसा से तीन हजार वर्ष पूर्व के निरीक्षण अभीतक तथा उस काल में उक्त विद्या के बीच में की गई उनकी प्रगति को सिद्ध करते हैं। भारत के प्राचीन ज्योतिषी पंचाग का निर्माण करते थे, वे ग्रहणों का निरीक्षण और उनके समय की घोषणा करते थे, उन्हें चन्द्र की कलाओं और उनके ग्रहों की गति का ज्ञान था। कोलब्रुक का मत है कि उनके अयन गति संबन्धी मन्तव्य टोलेमी की धारणा से कहीं अधिक ठीक थे।
(Short History of the Aryan Medical Science
Pp. 13-14 by H. H. Bhagvat sinhaee)