भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३१७

ग्रीसदेश में शस्त्रचिकित्सा का बाद में प्रचार

यद्यपि जिस प्रकार प्राणियों की स्वास्थ्य रक्षा के लिये प्रारंभ से ही न्यूनाधिकरूप में ओषधियां विद्यमान थीं उसी प्रकार राजनैतिक संबन्ध से भिन्न-भिन्न राजाओं में प्राचीन काल से ही परस्पर संघर्ष के परिणामस्वरूप आहत (घायल) व्यक्तियों के उपचार के लिये शल्यचिकित्सा भी किसी न किसी रूप में प्राचीन काल से विद्यमान होनी चाहिये। होमर के लेख से ग्रीस में भी शल्य चिकित्सा की कुछ झलक मिलती है तथापि यह निश्चित है कि भारतीय भेषज्य विज्ञान को विदेशों में पहुंचाने वाले पाथागोरस आदि पाश्चात्य विद्वानों ने जिस प्रकार कायचिकित्सा (Medical Section) की प्रारम्भ में स्थापना की थी उस प्रकार वैज्ञानिक शल्यचिकित्सा (Surgical Section) की स्थापना नहीं की थी। ग्रीस में इस शल्यचिकित्सा का प्रचार कायचिकित्सा के बाद समयान्तर से ही हुआ प्रतीत होता है। मिश्रदेश में वैज्ञानिक शस्त्रवैद्यक के ईस्वी पूर्व तृतीय शताब्दी में होने तथा ग्रीस देश द्वारा मित्र से शस्त्रचिकित्सा के ईस्वी पूर्व प्रथम शताब्दी में ग्रहण करने का उल्लेख¹ मिलता है। हिपोक्रिटस के लेख से भी प्रतीत होता है कि उस समय उसे शिरा, धमनी, अस्थि आदि का शारीरिक (Anatomical) ज्ञान बिलकुल नहीं था। ²जी. एन. बनर्जी का भी यही विचार है। ग्रोट्स नामक विद्वान् का भी कहता है कि लिटरे³ (Littre) के मत में हिपोक्रिटस को शारीरिक हित के लिये व्यायाम आदि बाह्य ज्ञान के अतिरिक्त आन्तरिक ज्ञान विशेष नहीं था। हिपाक्रिटस के ग्रन्थों में शरीर के विषय में बहुत कम ज्ञान मिलता है और वह भी उसने मिश्र के द्वारा प्राप्त किया था—ऐसा ग्रीस के इतिहास में मिलता ⁴है। कीथ नामक विद्वान् ⁵की राय में ग्रीस में अस्थि, धमनी आदि के ज्ञान की सूचना देने वाला कोई प्राचीन लेख नहीं मिलता है। बनर्जी⁶ का भी कहना है कि ग्रीस में प्राचीन काल में सुश्रुत के समान कोई प्राचीन शारीरिक ग्रन्थ नहीं था।

किसी विद्वान् की ऐसी भी सम्मति है कि प्राचीन काल में भारत के काशी आदि पूर्व देशों में शस्त्रचिकित्सा तथा तक्षशिला आदि पश्चिम देशों में कायचिकित्सा का विशेष प्रचार होने से पाश्चात्य देशवाले सर्वप्रथम सन्निकृष्ट पश्चिम विभाग से कायचिकित्सा का ज्ञान ही अपने देशों में ले गये हों तथा फिर समयान्तर से धीरे-धीरे पूर्व देशों में भी अपने प्रसार, सम्पर्क तथा परिचय आदि के होने पर बाद में वहा के शस्त्रवैद्यक के ज्ञान को भी वे अपने देश में ले गये हों। परन्तु शस्त्रचिकित्सा सम्प्रदाय के काशिराज दिवोदास द्वारा प्रारम्भ किये जाने से मुख्यरूप से काशी आदि पूर्वदेशों में ही मिलने पर भी आत्रेय भेड कश्यप आदियों द्वारा भी बहुवचनान्त ‘धान्वन्तरा’ आदि शब्दों से अन्य प्रस्थान के रूप में निर्देश होने से तथा अपने कायचिकित्सा प्रधान उपदेशों में भी शस्त्रचिकित्सा सम्बन्धी कुछ विषयों का निर्देश करने से प्रतीत होता है कि आत्रेय आदियों द्वारा प्रचलित कायचिकित्सा में प्रसिद्ध पश्चिम प्रदेश में भी शस्त्रचिकित्सा विज्ञान प्रचलित था तथा उस सम्प्रदाय के अनुयायी भी संख्या में बहुत थे। तक्षशिला में अध्ययन करके विशिष्ट विद्वत्ता को प्राप्त करने वाले जीवक


१. १ और ३ की टि. सं. पृ. १३७ में देखें।
२. इस बात का अबतक कोई निश्चित प्रमाण नहीं मिला है कि हिपोक्रिटस के समय या उसके पीछे की दो सदियों में यूनानी वैद्य शवच्छेद करते थे। (Hellenism in Ancient India G. N. Banerji P. 191.)
४. संग्रह में कई ग्रन्थ हैं जिनमें पहला ‘सिर के घाव’ ई. पू. ४थी सदी का है। इसकी कई मिश्री हस्तलिखित ग्रन्थों से समता है। हो सकता है कि इसका कुछ अंश मिश्री उद्गम का हो। (E. B. Vol XI P. 585.)
५. यूनानी शल्यचिकित्सा के ग्रन्थों में मानव शरीर की अस्थियों की प्रारम्भिक सूची के अभाव के कारण भारत तथा यूनान के परस्पर प्राचीन संबन्ध के विषय में किन्हीं निश्चित प्रमाणों का मिलना लगभग असम्भव है।
(History of Sans. Lit. A. B. Keith P. 514.)
६. अस्थिशास्त्रीय सिद्धान्तों का कोई संक्षिप्त संग्रह प्रारम्भिक यूनानी संहिताओं में नहीं मिलता जैसा कि चरक और सुश्रुत में मिलता है। (Hellenism in Ancient India. by G. N. Banerji P. 194.)