काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३१८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
के लिये महावग्ग आदि में शस्त्रचिकित्सा में कुशलता का उल्लेख होने से तक्षशिला में शस्त्रचिकित्सा विज्ञान की उन्नति भी स्पष्ट प्रतीत होती है। सुश्रुतसंहिता में दिवोदास के शिष्य सुश्रुत के सतीर्थ्य के रूप में अनेक देशवाले व्यक्तियों का परिचय मिलता है। उनमें से शल्य के विषय में विशेष तन्त्रों का निर्माण करने वाले चार¹ आचार्यों में पौष्कलावत का भी उल्लेख है। संभवतः यह पौष्कलावत प्राचीन गान्धार की राजधानी के रूप में ज्ञात पुष्कलावत् का रहने वाला हो। हो सकता है उसका भी सम्प्रदाय तक्षशिला के आसपास के प्रदेशों में प्रचलित हो। औपगव भी पश्चिम प्रदेश का रहने वाला आचार्य था तथा बाह्लीकभिषक् काङ्कायन के समान औरभ्र भी आधुनिक भारत से बाहर पश्चिमोत्तर प्रदेश (North western frontier Province) का रहने वाला था जिसकी कि हम आगे विवेचना विवेचना करेंगे। इस प्रकार सौश्रुतसम्प्रदाय के प्रसार के निर्देश न मिलने पर भी तक्षशिला तथा गान्धार आदि के आसपास का प्रदेश पश्चिम देशों में प्रसिद्ध इन पूर्वाचार्यों के सम्प्रदायों के उल्लेख के कारण शस्त्रचिकित्सा में भी उन्नत था—ऐसा प्रतीत होता है। जातक ग्रन्थों के अनुसार जीवक के तक्षशिला में अध्ययन के समय उसके गुरु द्वारा कपालभेदन करने के उल्लेख से तथा महावग्ग के अनुसार वहां से अध्ययन करके लौटने पर जीवक द्वारा भी कपालभेदन का उल्लेख मिलने से यह कहा जा सकता है कि उस समय तक्षशिला में ऊर्ध्वजत्रुविभागीय शालाक्य विज्ञान का भी प्रचार था।
३२७ ईस्वी पूर्व में अलेक्जेण्डर के भारत से लौटकर मृत्यु होने के बाद भी ३०४ ईस्वी पूर्व में मिश्र देश के अलेक्जेण्ड्रिया नगर में उद्घाटित संग्रहालय (Museum) में हिरोफिलस (Herophilus) तथा एरासिस्ट्रेटस (Erasistratus) नामक विद्वानों ने शारीरिक ज्ञान सम्बन्धी लेखों की स्थापना की थी जिनके ईस्वी पश्चात् द्वितीय शताब्दी में होने वाले ग्यालन नामक ग्रीक विद्वान् द्वारा ढूंढने पर भी उपलब्ध नहीं होने का उल्लेख ²मिलता है। ग्यालन ने भी मित्र से ही शरीरविज्ञान की प्राप्ति का उल्लेख किया है तथा उसके अन्य विषयों के अनुसन्धान से प्रतीत होता है कि मिश्र देश में तृतीय शताब्दी से शारीर तथा शस्त्रचिकित्सा का विशेष ज्ञान हुआ था। ग्रीस तथा मिश्रदेश के शस्त्रवैद्यक के शस्त्रों से भारतीय शस्त्रवैद्यक के शस्त्रों (Instruments) की समानता मिलती है। जी. एन ³मुखोपाध्याय भी कहते हैं कि ग्रीकवैद्यक के शस्त्र सुश्रुतोक्त शस्त्रों के अनुरूप थे। ⁴हार्नले नामक विद्वान् की भी यही राय है। इस समानता से भारतीय शस्त्रचिकित्सा का भी ग्रीकचिकित्सा पर कुछ थोड़े बहुत अंश में प्रभाव प्रतीत होता है।
भारत में इधर-उधर प्रौढ़रूप में विद्यमान अनेक विद्याओं तथा अन्य विद्याओं की अपेक्षा भी शल्य तथा कायचिकित्सा विभाग वाले भैषज्य विज्ञान की तक्षशिला आदि प्रदेशों में प्रसिद्धि को देखकर उन्हें अपने देश में पहुंचाने के लिये ग्रीस के राजा अलेक्जेण्डर महान् (Alexander the Great) द्वारा गान्धार के आचार्य पौष्कलावत तथा सुश्रुत के सम्प्रदायों से तक्षशिला, पुष्कलावत् तथा गान्धार आदि प्रदेशों में उन्नत वैज्ञानिक शस्त्रचिकित्सा का भी विशेषरूप से आदर तथा ग्रहण किया गया था। उसका प्रमाण यह है कि अलेक्जेण्डर के शिविर में भारतीय चिकित्सकों की नियुक्ति तथा उन्हें अपने देश में ले जाने का इतिवृत्त मिलता है। अपने देश में विद्या की वृद्धि के लिये तक्षशिला के राजा की सहायता
१. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १३७ में देखें।
२. (क) सिकन्दर महान् की मृत्यु और सिकन्दरिया के वस्तुसंग्रहालय की स्थापना (३०४ ई. पू.) तक एरासिस्ट्रेटस, हेरोफिलस आदि महान् शरीररचना विज्ञान वेत्ताओं ने अपने अन्वेषणों को लिपिबद्ध नहीं किया था। ग्यालन के समय उनकी कोई कृति विद्यमान नहीं थी। (Hellenism in Ancient India P. 192 G. N. Banerji)
(ख) हिपोक्रिटस के विषय में स्थिति चाहे कुछ भी क्यों न रही हो, लेकिन इतना तो असंदिग्ध है कि ई. पू. तीसरी सदी में हिरोफिलस और एरासिस्ट्रेटस के सिकन्दरिया के प्रतिष्ठानों में शवच्छेद प्रचलित था। (History of Sans, Lit. P. 514-A. B. Keith.)
३. ३-४ की टि. सं. उपो. पृ. १३८ में देखें।