काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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से विषयवासनाओं से विरक्त होकर वानप्रस्थवृत्ति को धारण करने वाले आध्यात्मिक विद्वान् कल्याण (Kalanos) को ले जाने वाला अलेक्जेण्डर बहुत से लोकोपयोगी तथा विशेषकर रात दिन संघर्ष करने वाले राजाओं द्वारा अपेक्षणीय शस्त्रचिकित्सों तथा कायचिकित्सकों को भी अपने देश में अवश्य ले गया होगा। अलेक्जेण्डर के इतिवृत्त में भी इसका उल्लेख मिलता है तथा—ईस्वी पूर्व ३२७ में भारत में पहुंचकर अलेक्जेण्डर के लौटते हुए मृत्यु के उपरान्त अलेक्जेण्ड्रिया में उद्घाटित वैज्ञानिक शस्त्रचिकित्सा के प्रदर्शन में भी दिखाई देने वाला भारतीय प्रभाव इसी बात को प्रकट करता है।
ईरान देश में मिश्रदेश के चिकित्सकों द्वारा प्रथम डेरियस नामक राजा की चिकित्सा के वृत्तान्त के मिलने से मिश्रदेश में ईस्वी पूर्व तृतीय शताब्दी से पूर्व भी शस्त्रचिकित्सा के होने की यद्यपि प्रतीति होती है तथापि उसमें उनकी असफलता के भी वृत्तान्त मिलने से उस शस्त्रचिकित्सा की अवस्था भी प्रकट होती है। मिश्र में प्राचीन काल में शारीरिक विज्ञान का उदाहरण नहीं मिलता है। और यदि मिलता भी है तो उसपर भारतीय प्रभाव था जिसका कि इस आगे वर्णन करेंगे।
ग्रीसदेश में उपलब्ध प्राचीन मूर्तियों में मांसपेशियों के यथावत् चित्रण के दर्शन से भी यह नहीं कहा जा सकता कि उन्हें प्राचीन काल में विशेष शारीरिक ज्ञान था। मूर्तियों में मांसपेशियों का चित्रण तो भारत, सुमेरिया, बेविलोनिया आदि देशों में भी प्राचीन काल से ही मिलता है। मूर्तियों में बाह्यपेशियों के चित्रण में अच्छाई या बुराई से तो केवल चित्रकला की कुशलता अथवा अकुशलता का ही परिचय मिलता है। इसमें किसी का मतभेद नहीं है कि आन्तरिक शारीरिक अवयवों का ज्ञान होने पर भी चित्रकला में उसे बढ़ाकर दिखाया जा सकता है। परन्तु चित्र में यथावत् अङ्कन के दर्शनमात्र से आन्तरिक शारीरिक अवयवों के विशेषज्ञान की कल्पना नहीं की जा सकती। वास्तव में शस्त्रवैद्यक के लिये उपयोगी शारीरिक ज्ञान तो आन्तरिक, सूक्ष्म एवं बहुत विषयों से युक्त भिन्न ही वस्तु है। आजकल भी बहुत से ऐसे व्यक्ति मिल सकते हैं जो चित्रकला में निष्णात होते हुए भी आन्तरिक शारीरिक ज्ञान से शून्य हैं तथा आन्तरिक शारीरिक ज्ञान में पूर्ण होते हुए भी चित्रकला में एकदम कोरे होते हैं। इसप्रकार बाह्य एवं आन्तरिक ज्ञान बिलकुल भिन्न-भिन्न वस्तुएं हैं। इसलिये एक विषय में ज्ञान होने से दूसरे विषय में ज्ञान होना आवश्यक नहीं है। भारत में साकेत (अयोध्या) तक पहुंचकर बाद में बौद्ध धर्म ग्रहण करने वाले ग्रीस देश के मिलाण्डर (Melander) के वृत्तान्त संबन्धी मिलिन्द प्रश्न नामक बौद्ध पाली ग्रन्थ में ग्रीस के राजा मिलाण्डर के प्रति उपदेश तथा धन्वन्तरि¹ आदि के उल्लेख का पहले ही वर्णन किया जा चुका है। उसमें लिखा है कि बाण² द्वारा विद्ध व्रण में मांस की विकृति से त्रिदोष की वृद्धि होकर ज्वर आदि हो जाने पर शस्त्रचिकित्सक व्रण को शस्त्र से ठीक करके, क्षार आदि द्वारा शोधन करके तथा लेपों से शोथ को हटाकर उपचार करते हैं। ऐसा करने में वे कोई पाप नहीं करते हैं अपितु इसमें लोकोपकार की ही भावना
१. नारद, धन्वन्तरि, अंगिरा और कपिल आदि विद्वान् रोगों की सम्प्राप्ति, कारण, स्वरूप, प्रगति और उपचार आदि को भली प्रकार जानते थे। इनमें से प्रत्येक ने अपनी-अपनी संहिताएं (ग्रन्थ) लिखी हैं।
मिलिन्द प्रश्न
(T. W. Rhys Davids (द्वारा सम्पादित Vol XXXVI)
२. कल्पना करो कि एक व्रण की चिकित्सा करते हुए......एक अनुभवी वैद्य और शल्यचिकित्सक तेज गन्ध वाली और काटने वाली खुरदरी मल्हम का लेप कर देते हैं और उससे व्रण की शोथ दूर हो जाती है........। कल्पना करो कि वे उसे नश्तर से चीर देते हैं और कास्टिक से जला देते हैं। इसके बाद वे उसे किसी क्षारीय द्रव से धुलवाकर एक लेप लगा देते हैं जिससे अन्त में घावं भर जाता है और वह व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है। अब हे राजन्! बतलाओ, क्या चिकित्सक ने मल्हम का लेप, नश्तर से चीर-फाड़, कास्टिक स्पर्श और क्षारीय जल से प्रक्षालन—यह सब हिंसा से प्रेरित होकर किया था।
(The Questions of King Milinda)
(Translated by T. W. Rhys Davids Vol. XXXV.)