भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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३२० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

होती है। उपर्युक्त दृष्टान्त से उसमें व्रणोपचार, शस्त्रचालन तथा व्रणबन्ध आदि में उसके सूक्ष्म विचारों तथा स्थान-स्थान पर विवेचन, रोगोत्पत्ति, निदान, औषधप्रयोग आदि बहुत से वैद्यक विषयों का उल्लेख मिलता है।

हार्नले$^१$ (Hoernle) के अनुसार ईस्वी पूर्व ६०० से पूर्व भी भारतीय चिकित्सा विज्ञान के अत्यन्त उन्नत होने, शस्त्रचिकित्सा, अस्थि आदियों का ज्ञान तथा शारीरज्ञान के होने, प्राचीन भारतीय वैद्यक ग्रन्थों में शरीर विज्ञान के विशेष विवरण को देखकर सबके विस्मय, हिपोक्रिटस के सम्प्रदाय में शवच्छेदन विद्या (Dissection) के न मिलने, टेरियस का भारत में आगमन, भारतीय शारीर विज्ञान के ग्रीसदेश के शारीर विज्ञान के मूल होने के खण्डन न हो सकने इत्यादि बहुत से भारतीय वैद्यक के गौरव के उल्लेख मिलते हैं।

इसी प्रकार डायज$^२$ (Diag), डॉ. हर्षबर्ग (Dr. Hirschberg) डॉ. हुइलेट (Dr. Huillet) डॉ. वाइज (Dr. Wise) तथा विट्नी (Whitney) आदि विद्वान् भी इसी का समर्थन करते हैं।


१. हम यह मानलें कि हिपोक्रिटस के समय शवच्छेद के प्रचलन का कोई पुष्ट प्रमाण नहीं मिलता है और हम यह जानते ही हैं कि लगभग ई. पू. ४०० में टेरियस भारत आया था। तब इस बात का प्रत्याख्यान सुगमता से नहीं किया जा सकता कि यूनानियों का शरीररचना विज्ञान भारतीय शरीररचना विज्ञान पर अवलम्बित है।
भारतीय ग्रन्थों में निहित शरीररचना शास्त्रीय जानकारी को प्रकाश में लाया जाय तो शायद बहुतों को बड़ा आश्चर्य होगा, मुझे भी ऐसा ही हुआ था। उसका विस्तार और सन्दर्भशुद्धि आश्चर्यजनक है। आवश्यकता इस बात की है कि उन पर विचार करते हुए ध्यान में रखा जाये कि वे बहुत प्राचीन (सम्भवतः ई. पू. ६ठी सदी) है और परिभाषा करने की उनकी अपनी ही शैली है।
(Medicine of Ancient India P. III Vol I by Hoernle)

२. कोनिसबर्ग विश्वविद्यालय के उपाध्याय डायज ने यूनानी चिकित्सा प्रणाली में से भारतीय सिद्धान्तों को स्पष्ट ढूंढ निकाला है।
बर्लिन के डॉ. हर्षबर्ग कहते हैं कि भारतीय विद्वानों के कौशलपूर्ण विधियों का ज्ञान हो जाने से यूरोप की सम्पूर्ण प्लास्टिक सर्जरी पर नवीन प्रकाश पड़ता है। संज्ञायुक्त त्वचा के एक हिस्से को दूसरे स्थान पर लगाने (Skin grafting) की विधि भी पूर्णरूप से भारतीय है। यही उपर्युक्त लेखक मोतियाबिन्द के आपरेशन के अन्वेषण का यश भी भारतीयों को ही देता है। इसका यूनानी, ईरानी अथवा अन्य किसी भी देश वालों को बिलकुल ज्ञान नहीं था। कई शारीरिक शल्यक्रियाओं के विषय में उन्होंने अपने एक विद्वत्तापूर्ण निबन्ध में लिखा है कि भारतीयों को शल्यक्रिया का अच्छा ज्ञान था और वे प्रवीणता से यह कार्य करते थे। यूनानी चिकित्सक इन क्रियाओं से सर्वथा अनभिज्ञ थे। इस सदी के प्रारंभ में हमने भी उनकी जानकारी पाकर बड़ा विस्मय प्रकट किया। (पृ. १७८-१९३)
पाण्डीचेरी के डॉ. हूलेट हमें विश्वास दिलाते हैं कि धन्वन्तरि को-जो कि हिपोक्रिटस से पूर्ववर्ती थे (Vaccination) का ज्ञान था।
डॉ. वाइज का कथन है-कि हिन्दुओं को शरीररचना शास्त्र और शरीरक्रियाविज्ञान का ज्ञान था। हिन्दू तत्ववेत्ताओं (दार्शनिकों) को इस बात का श्रेय है कि उन्होंने मृत शरीर की जीवित शरीर के लिये उपयोगिता स्वीकार की, हालांकि उन्हें इस विषय में कदम-कदम पर पूर्वग्राहियों का विरोध सहना पड़ा। हिन्दू ही वैद्यकशास्त्र की सबसे महत्वपूर्ण शाखा-शरीर रचना विज्ञान के सर्वप्रथम वैज्ञानिक ज्ञाता और प्रतिपादक थे। (पृ. १७९) आंख की तथा प्रसवसंबन्धी अन्य शल्यक्रियायें भारत में मुद्दत तक की जाती रही हैं और हमारे आधुनिक शल्यचिकित्सक हिन्दुओं से ही नाक की प्लास्टिक शल्यक्रिया जान सके हैं।
ह्विटनी कहता है—‘यद्यपि ओषधियों और उसके साथ विनियुक्त मन्त्रों के पाठ के रूप में आयुर्वेद का मूल वेदों में मिलता है तो भी वह (आयुर्वेद) बहुत कम महत्व की चीज है और उसका वाङ्मय (साहित्य) बहुत पीछे का है।
(Introduction to Whitney's Sanskrit Grammer P. XXII)