काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३२१
प्राचीन मिश्र में चिकित्सा विज्ञान
प्राचीन ग्रीस देश के तथा अन्य विद्वानों के लेखों का अनुसन्धान करने पर ग्रीसवैद्यक का मूल स्त्रोत मुख्यरूप से मिश्र प्रतीत होता है। ग्रीस में वैज्ञानिक चिकित्सा के प्रारंभ होने से पूर्व ही मिश्र में वैज्ञानिक चिकित्सा की प्रतिष्ठा हुई थी। देशों की समीपता से भी यह बात सङ्गत प्रतीत होती है। इस प्रकार ग्रीस में मिश्र के भैषज्य विज्ञान रूपी बीजों के नये अङ्कुर प्रादुर्भूत हुए प्रतीत होते हैं। मिश्र का भैषज्य विज्ञान भी किसी दूसरे देश के विज्ञान से अनुप्राणित हुआ है अथवा अपने ही देश में स्वयमेव ही प्रादुर्भूत होकर प्रतिष्ठित हुआ है, इसका निश्चय करने के लिये बहुत से प्रमाणों की आवश्यकता है। अशोक के शिलालेख से उस समय (B. C. 273-233) भारत से मिश्र में भी भैषज्य संस्थाओं तथा चिकित्सकों के जाने का स्पष्ट उल्लेख मिलने से तथा भारत से विद्वानों तथा वैद्यों को आदरपूर्वक अपने देश में ले जाने वाले अलेक्जेण्डर की मृत्यु के बाद (B. C. 323) उदित हुए भैषज्य विज्ञान में अनेक स्थानों पर भारतीय छाया का सम्पर्क दिखाई देने से प्रतीत होता है कि उस समय तक मिश्र में भी भारतीय चिकित्सा विज्ञान का प्रभाव था। भाण्डारकर की अशोक¹ नामक पुस्तक के अनुसार एपीफेनिस (Epiphanius) ने वर्णन किया है कि अशोक के शिलालेख में भी निर्दिष्ट मिश्र के तुरमय (Ptolemy Philadelphos) नामक राजा ने अलेक्जेण्ड्रिया के प्रसिद्ध पुस्तकालय की स्थापना अथवा उसकी वृद्धि की थी तथा उस पुस्तकालय का अध्यक्ष बहुत से भारतीय ग्रन्थों के अनुवाद के लिये उत्सुक था। इरान तथा ग्रीस के ईस्वी पूर्व ४७९ में हुए युद्ध में प्लेटिया के रणक्षेत्र में ग्रीस के सैनिकों के साथ पूर्व निर्दिष्ट (पृ. ७८) भारतीय सेना के संघर्ष का अनुसन्धान² करने पर इतना तो स्पष्ट ही है कि इरान का भारत के साथ घनिष्ठ मैत्री संबन्ध था। अभियातव्य (जिस पर आक्रमण किया जाय) ग्रीस को भारत तथा अभ्यायात (आक्रमण करने वाले) भारतीयों को ग्रीस द्वारा अवश्य जानने के कारण यह कहा जा सकता है कि हिपोक्रिटस से पूर्व भी ग्रीस तथा भारत का परस्पर परिचय अवश्य था। उस युद्ध में भारतीयों के समान मिश्र देश वालों के भी सहभाव का वृत्तान्त मिलने से मिश्र तथा भारत के भी परस्पर परिचय की संभावना हो सकती है। महाभारत तथा कौटिल्य के अनुसार युद्ध करने की इच्छा से दूसरे देशों में जाने वाली भारतीय सेना के साथ भारतीय वैद्यों को भी साथ अवश्य होना चाहिये। उस समय न केवल ग्रीसदेश वालों द्वारा अपितु सहयोगी मिश्रदेश वालों द्वारा भी भारतीय वैद्यों के साथ परिचय का अनुमान किया जाता है। परन्तु उससे पूर्व मिश्र देश की चिकित्सा स्वयमेव उन्नत हुई थी अथवा दूसरे देशों के सहारे से इसका निर्णय करने की आवश्यकता है।
मिश्रगत प्राचीन भैषज्य विज्ञान के स्वरूप के विषय में अनुसन्धान करने पर प्राचीन भैषज्य विज्ञान के चिह्नस्वरूप ऐबिरस पेपिरस (Ebers-Papyrus) नाम से प्रसिद्ध त्वक्पत्र उपलब्ध हुए हैं। जिनमें से काहुन पेपिरस का समय प्रायः ईस्वी पूर्व १८५०, एडविन स्मिथ द्वारा उपलब्ध त्वक्पत्रों का समय प्रायः ईस्वी पूर्व १६०० तथा एबिरस पेपिरस का समय प्रायः ईस्वी पूर्व १००० वर्ष पूर्व माना जाता है। परन्तु इन समयों के विषय में विद्वानों में मतभेद होने से थोड़ा बहुत अन्तर भी हो सकता है विद्वान्³ लोगों का कहना है कि काहुन पेपिरस पत्र में विवेचन आदि के विषय, रोग, परिज्ञान, प्रतिकार, उपयोग में आने वाली ओषधियों तथा रोगचिकित्सा प्रक्रिया और एबिरस पेपिरस पत्र में सर्पदंश से लेकर क्षयपर्यन्त १७० अथवा अन्य मत से ७०० रोगों का निर्देश किया गया है। विल्डूराण्ट (Will Durant) नामक विद्वान् का यह भी कहना हैं कि 'उनमें कुछ रोग प्रतीकारव्यवस्था पत्र भी प्राप्त हुए हैं जिनमें किसी में पल्लीरुधिर (Lizard-छिपकली-गुहेरे आदि का रक्त) सूअर के कान, दान्त, मांस तथा मेदा, कछुए के मस्तिष्क, सोई हुई स्त्री का दूध, ब्रह्मचारिणी स्त्री का मूत्र तथा मनुष्य गदहा, कुत्ता, सिंह, मर्जार तथा यूका (जूं) के शुक्र आदियों का औषधरूप में निर्देश
१. १-३ की टि. सं. उपो. पृ. १४०-१४१ में देखें।