भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 336, कुल 942 में से

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पृष्ठ 336

३२२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

किया गया है। कुछ रोगों में मान्त्रिक प्रक्रिया का भी निर्देश मिलता है। वे लोग प्रायः मन्त्रप्रयोगों में विश्वास करते थे। बारहवें वंश के राजा के भूमि से निकले हुए शव के साथ चषक (Vases-पात्र) छोटी कड़छियां (Spoons), शुष्क ओषधियां तथा मूल ओषधियां भी उपलब्ध हुई हैं। इस वर्णन से प्रतीत होता है कि मिश्र में प्राचीन काल में भी चिकित्सा की ओर रुचि थी। मिश्र में भैषज्य विद्या संबन्धी लेख त्वक्पत्र (पेपरी) रूप¹ से मन्दिरों में रखे हुए हैं। राजकुल में भी भैषज्यरूप में मन्त्रप्रयोग तथा उसकी प्रतिष्ठा थी। कुछ लोग कहते हैं कि एबिरस पेपिरस नामक पत्र में मनुष्यों तथा देवताओं के आरोग्य को करने वाले के रूप में 'रा'² नामक देवता का निर्देश मिलता है। उनका यह 'रा' देवता भारत के 'रवि' के समान प्रतीत होता है।

असीरिया तथा बेबिलोनिया में प्राचीन काल में भैषज्य विषयक ज्ञान

असीरिया तथा बेबिलोनिया में भी प्राचीन भैषज्यसम्बन्धी विषय का वर्णन पहले (पृ. ७६ में) किया जा चुका है। बेबिलोनिया के हेमूर्वन् (Hammurabi B. C. 1900 तथा अन्य मतानुसार B. C. 2500) नामक प्राचीन राजा के समय के तेरह लेखों के उपलब्ध होने का वृत्तान्त मिलता है। जिनमें व्रण आदियों की ठीक प्रकार से चिकित्सा करने वालों को पारितोषिक तथा शस्त्रचिकित्सा में विपरीत (Wrong) कार्य करने वालों को दण्ड इत्यादि देने का वर्णन मिलता है। मनु³ आदि ने भी मिथ्या उपचार करने वालों को दण्ड की व्यवस्था की है। हेमूर्वन् राजा के समय का पूर्ण वृत्तान्त न मिलने से केवल इतने से उस समय की परिस्थिति का सम्यक् ज्ञान नहीं होता है। उसके बाद असुरवनिपाल⁴ नामक राजा के समय भैषज्य विद्या में कुछ उन्नति प्रतीत होती है जिससे पूर्व प्रचलित मान्त्रिक उपचारों में कुछ शिथिलता दिखाई देती है। परन्तु उस समय भी मान्त्रिक प्रक्रिया द्वारा उपचार विद्यमान अवश्य था। कुछ विद्वानों का विचार है कि भैषज्य के विषय में मिश्र का प्राचीन⁵ स्त्रोत बेबिलोनिया प्रतीत होता है।

मिश्र, बेबिलोनिया, चीन, इरान आदि देशों में भारतीय शब्दों का सादृश्य

मिश्र, बेबिलोनिया, असीरिया, चाल्डिया तथा सुमेरिया आदि प्राचीन देशों की सभ्यता का अनुसन्धान करने पर उनमें भारतीय शब्द एवं विषयों की समान छाया वाले शब्द तथा विषयों के स्थान-स्थान पर मिलने से तथा इक्ष्वाकु आदि प्राचीन भारतीय राजाओं के नामों के सुमेरिया देश के राजाओं में मिलने से इनमें समान सभ्यता का प्राचीन संबन्ध प्रतीत होता है तथा कहीं-कहीं भैषज्य संबन्धी विषय तथा शब्दों की भी समानता मिलती है जिनका कि पहले भी (पृ. ७३-८२ में) निर्देश किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त निम्न शब्दों में भी सादृश्य⁶ मिलता है—

भारतमिश्रभारतबेबिलोनिया
सूर्य (हरि)होरसअहि
ईश्वरओसिरीससत्यव्रतहसिसद्र
ईश्वरीईसिस्अहिहन्ईहन्
शिवसेवदहनदगनु
शक्तिसेखेतचन्द्रसिन
प्रकृतिपख्तवायुविन
श्वेतसेतमरुत्मतु, मतु
मातृमेतेरदिनेशदियानिसु

१. १-६ तक की सं. उपो. पृ. १४१-१४२ में देखें।

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