काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 337, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
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| सूर्यवंशी | सूरियस | मार्डिक | मर्डूक |
|---|---|---|---|
| क्षत्रिय | खेत | अप् | अप्सु |
| अत्रि | अत्तिस् | तमस् | त्यामत |
| मित्र | मिश्र | पुरोहित | पटेसिस |
| शरद् | सरदी | श्रेष्ठि | सेठ |
| रवि | रा | तैमात | तियामत् |
भारत¹ के समान मिश्र में लिङ्गपूजन तथा बैल का आदर और बेबिलोनिया में पृथ्वी की पूजा इत्यादि बहुत से समान सभ्यता के संबन्ध मिलते हैं।
ईरान के प्राचीन मूलग्रन्थ जेन्दावस्ता के चार भागों में एक भाग वेन्दिदाद नामक है, उसमें भैषज्यसम्बन्धी विषय दिये हुए हैं। उसमें सामा वंशोत्पन्न थ्रित नाम का वैद्य सर्वप्रथम था। उसने रोगनिवृत्ति के लिये अपने अहुरोमज्डा नामक देवता की प्रार्थना करके सोम (चन्द्रमा) के साथ-साथ वृद्धि को प्राप्त होने वाली दस हजार ओषधियों को प्राप्त किया। हओम (सोम) वनस्पतियों का राजा था। उस थ्रित नामक वैद्य द्वारा क्षथ्रवैर्य तथा सहरवर से रोग निवृत्ति के उपायों को जानकर तथा शस्त्रचिकित्साविज्ञान को प्राप्त करके ज्वर, कास, शिरोरोग, क्षय आदि रोगों को दूर करने के वृत्तान्त तथा ओषधियों के निर्माण के पण्डित, सुशील तथा रोगियों को प्रसन्न करने वाले वैद्यों से भवितव्यता इत्यादि की शिक्षा को ग्रहण करने के वृत्तान्त मिलते² हैं। जेन्दावस्ता तथा वैदिकसाहित्य की आलोचना करने पर ज्ञात होता है कि दोनों के देवताओं के विषय में शब्दों का सादृश्य केवल देवताओं के नामों के विषय में ही नहीं है अपितु उनमें आई हुई गाथाओं के अनुवाद से प्रतीत होता है कि उनमें संस्कृत शब्दों की भी बहुत सी समानताएं मिलती हैं। भारत के प्राचीन सम्प्रदाय की तरह यहां भी अग्नि की उपासना, होम, इष्टि, याग, आदि बहुत से विषय मिलते हैं जिनका पहले (पृ. ७८) वर्णन किया जा चुका है। हओम शब्द वाले सोम की प्रशंसा, उसका ओषधियों का राजा होना यथा यज्ञ में उपयोग आदि बहुत से विषय इसमें मिलते हैं। जेन्द तथा संस्कृत भाषा में निम्न समान शब्द³ मिलते हैं—
| संस्कृत | जेन्द | संस्कृत | जेन्द |
|---|---|---|---|
| सरस्वती | हरह्यति | असुर | अहुर |
| सप्तसिन्धु | हप्तहिन्दु | देव | दैव |
| सोम | हओम | विश्वेदेव | विश्योदैव |
| नासत्य | नाहत्य | नराशंस | नैयोंसंघ |
| अर्यमन् | एर्यमन् | वायु | वयु |
| विवस्वत् | विवङ्ध्वत् | वृत्रहा | वेरेथ्रघ्न |
| काव्यउशनस् | कवउस | दानव | दानव |
| अध्वर्यु | रथ्वी | इष्टि | इशित |
| आहुति | आजू इति | होता | जओता |
| बर्हिः | वरेश्मन् | आप्री | आफ्री |
| गाथा | गाथा | पशु | पशु |
| अथर्वन् | अथ्रवन् | अहि | अज़ि |
| यज्ञ | यस्न | अपांनपात् | अपनंपात् |
१. १-३ की टि. सं. उपो. पृ. १४२-१४३ में देखें।