भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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३२४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

इत्यादि बहुत से शब्द समान रूप एवं समान छाया वाले मिलते हैं। इस विषय में (Gatha by J. M. Chatterjji & Yasna by L. Mills) में विशेष निरूपण किया गया है। वेदों के समान अवेस्ता में भी ३३ प्रधान देवताओं की गणना की गई है। उपर्युक्त वर्णनों से प्रतीत होता है कि प्राचीन इरान तथा भारत के सम्बन्ध मिश्र, असीरिया, बेबिलोनिया आदि देशों की अपेक्षा भी घनिष्ठ थे।

चीन देश में भी प्राचीन भैषज्य के विषय में पहले (पृ. ७७) निर्देश किया जा चुका है। उस देश के सब से प्राचीन भैषज्य ग्रन्थ का समय ईस्वी पूर्व २५९७ बतलाया¹ गया है। चीन देश में भारतीय बौद्ध धर्म के प्रभाव, बौद्ध धर्म का प्रचार करने वाले भारतीयों का वहां जाना, भारतीय ग्रन्थों का वहां प्राचीन काल से प्रचार, महाभारत तथा प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में चीन देश के चीनांशुक (रेशम-Silk) आदि का वर्णन, तन्त्रग्रन्थों में चीनी आचार (सभ्यता) का निर्देश, कौटिलीय अर्थशास्त्र में चीन देश से आई हुई वस्तुओं पर शुल्कव्यवस्था (Duty) का निर्देश इत्यादि बहुत से पारस्परिक व्यवहार के साधनों के मिलने से, वैदिक काल में चीन देश का किस नाम से व्यवहार होता था इसका ज्ञान न होने पर भी यह स्पष्ट है कि चीन नाम वाले देश का भारत से तथा भारत का चीन से परस्पर परिचय, यातायात तथा वाणिज्य संबन्ध प्राचीन काल से ही था। काश्यपसंहिता में भी चीन देश का उल्लेख मिलता है। चीन तथा भारत के रास्ते में काराशर नामक स्थान पर वर्तमान प्राचीन कूच भाषा में भी भारतीय औषध वाचक शब्दों की समानता के मिलने का पहले (पृ. ७८) वर्णन किया जा चुका है।

प्राचीन भारत का अन्य देशों के साथ संबन्ध

उपर्युक्त वर्णन के अनुसार असीरिया, बेबिलोनिया, मेसोपोटेमिया, मिश्र आदि प्राचीन उन्नत देशों और शाखा-प्रशाखारूप में वर्तमान पाश्चात्य जातियों में, यहां तक की अमेरिका गत रेड इण्डियन (Red Indians) और चीन आदि दूर देशों में भी आजतक मिलने वाली वस्तुओं में भारतीय ग्रन्थ, भूगर्भ से मिले हुए विषय, आचार-व्यवहार तथा आयुर्वेदीय भैषज्य विद्या की समानता दिखाई देती है। जिस प्रकार आथर्वण सम्प्रदाय में प्रायः भूतप्रक्रिया एवं मान्त्रिक प्रक्रिया से युक्त चिकित्सा मिलती है उसी प्रकार का चिकित्सा सम्प्रदाय प्रायः सभी प्राचीन देशों तथा जातियों में मिलता है। सब देशों में इस प्रकार की असाधारण समानताएं केवल काकतालीय² न्याय से ही नहीं हो सकती हैं। इस प्रकार प्राचीन भारत तथा अन्य प्राचीन देशों में बहुत से स्थानों पर मिलने वाली समानताएं परस्पर साक्षात् अथवा परम्परा से (Direct of Indirect) उनके परिचय, सम्पर्क तथा व्यवहार को सूचित करती है।

प्राचीन भारत का प्राचीन काल से ही अन्य देशों के साथ सम्बन्ध होने का अनेक विद्वानों³ ने उल्लेख किया है। मिश्र तथा उसके समीप के अन्य आनों में भी भारत के वाणिज्य संबन्ध के होने का तत्कालीन (A. D. 100) मिश्र के पेरिप्लस⁴ (Periplus) नामक विद्वान् ने भी उल्लेख किया है। सर विलियम जोन्स (Sir William Jones), मेजर


१. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १४३ में देखें।
२. कोई बात जब एकदम अचानक (Purely accidental occurance) हो जाय तब उपर्युक्त कहावत प्रयुक्त होती है। जैसे एक कौवा अचानक आ जाता है और उसी समय ताल का फल भी अचानक ही उसके सिर पर गिर पड़ता है। दोनों घटनाएं अपने आप में बिलकुल सहसा हुई हैं। (काकस्यागमनं यादृच्छिकं तालस्य पतनं च। तेन तालेन पतता काकस्य वधः कृतः। एवमेव देवदत्तस्य तत्रागमनं दस्यूनां चोपनिपातः। तैश्च तस्य वधः कृतः। तत्र यो देवदत्तस्य दस्यूनां च समागमः स काकतालसमागमसदृशः)—अनुवादक
३. ३-४ की टि. सं. उपो. पृ. १४४ में देखें।